सबके अपने-अपने जीवन

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धीर, शांत और मुदित नयन,

निहारता उत्ताल लहरों का नर्तन,

अठखेलियां करती उर्मियाँ, पवन,

अगाध वक्ष में संचित कर जीवन।

सागर नि:संग हो करता अवलोकन,

देखता चतुर्दिक योजनों के योजन,

स्थितप्रज्ञ, विचारता सकल जल मेरा,

यद्यपि बूंद मात्र नहीं मेरे प्रयोजन।

उदात्त चरित्र का अपना सम्मोहन,

स्वयम से कहता हर पल हर क्षण,

मोह हीन मैं, क्षोभ हीन मैं,

मेरा जल हेतु जगत के  जीवन।

टूटी तंद्रा, देख जल को होते स्वच्छंद,

और उठते वाष्प का निरंतर उर्ध्वगमन,

बिन अनुमति यह चला क्योंकर,

इतने क्षीण क्या सम्बंध और बंधन।

उठता उपर, क्षण क्षण जीवन में गहराता,

संघनित वाष्प हो गया नभ में मेघ सघन,

बरसता, बहता, उफनता, लहराता,

सहज आ मिला पुन: सागर से प्रवाह बन।

भ्रम कि जो मुझमें है, मेरा है,

आधारहीन, क्षणभंगुर, भ्रांतिक दर्शन,

आवरण, काया, विवेक, अंतर्मन अपने,

पर सबके हैं अपने-अपने जीवन।

समेकित संवेदना

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इस अंतहीन यात्रा में चलते हुए,

तुम्हारी छाया में पलते हुए,

तुम्हारे सानिध्य को जलते हुए,

जो काल खण्ड आलोकित हुए हैं,

बस उतने ही प्राण के हित हुए हैं।

देवालय को जाते हुए,

दो भावों के बीच डोलता समर्पण,

पात्रता है सम्पूर्ण कि नहीं,

समर्पण आराध्य को स्वीकार्य तो सही।

समर्पण और स्वीकार,

की इसी अनिश्चितता में,

उगते हैं बोध जीवनकी

उपलब्धि और सार्थकता के।

गर्भगृह में हो उपस्थित,

अंत:स्थल के कपाट जब खोलता है मन,

सम्मुख देव नहीं दुविधा होती है,

एकात्म नहीं विविधा होती है,

क्या ईष्ट कभी साक्षात मिलेंगे,

क्या पात्र तज पायेगा कौंधता वह अहंकार,

कि पा लिया उसने इस संधि का अधिकार।

समर्पण में अहंकार का

श्रोत यहीं कहीं होता है,

एक भ्रमित पग अग्रसर

फिर भ्रमजाल कभी न खोता है।

सबकुछ दृष्टिमान,

फिर भी किसी अगोचर को निहारते नयन,

अमूर्त अनुसंधान, विस्मय में हृदय,

अंतर्मुखी यात्रा का अंतहीन आकलन।

असाध्य गति, चरम स्थिरता के बीच

जो घर्षण है, वही ज्ञान है, चेतना है।

असक्ति या अनासक्ति अर्थहीन,

खोना और पाना नहीं,

जीवन का सार

हर द्वन्द्व के आगे की

समेकित संवेदना है।

जन्नत

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सुना कि वहाँ इन्सान जा नहीं पाते,

अब अच्छी नहीं लगती मुझको जन्नत की बातें,

पता नहीं वहाँ इन्सानियत है कि नहीं।

नायाब बहुत-सी चीजें होंगीं वहाँ पर,

रहनेवालों के जेहन में मासूमियत है कि नहीं।

तकलीफ नहीं कोई, मुसीबतें भी न होंगी,

गले लगाने का वहाँ भाईचारा है कि नहीं।

किसीको किसीकी जरूरत नहीं ना सही,

पर किसीने किसीको यूँ ही पुकारा है कि नहीं।

अदबो-आदाब से सब रहते होंगे यकीनन,

बेखुदी में बहका कोई कदम आवारा है कि नहीं।

जो नयी तहजीब की बात सोचे कोई तो,

ऐसे काफिरों का वहाँ होता गुजारा है कि नहीं।

सब अपने में मुतमइन होंगे माना,

फिर भी कोई शख्स फरियादी है कि नहीं।

जीने को नहीं कुछ करने की हो जरूरत,

पर कुछ कर पाने की आजादी है कि नहीं।

बड़े ही आराम से रहते होंगे सब महलों में,

घर से जुड़े घर की कहीं आबादी है कि नहीं।

जी करे तो बेवजह ही किसीके पास जाकर,

दिल की कहने सुनने की आजादी है कि नहीं।

वो बचपन, वो नादानी, तिलस्मों की दुनियाँ,

आसमान छू लेने की फितरत है कि नहीं।

नायाब बहुत-सी चीजें होंगीं वहाँ पर,

रहनेवालों के जेहन में मासूमियत है कि नहीं।

टेढी लकीरें

      

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खुल के जियो तो घर में

साजो-सामान बिखर जाते हैं,

बँधी तहजीबों में दिल नहीं लगता,

जरा ख्वाबगाह हो के आते हैं।

एक तस्वीर ही तो हिली है थोड़ी,

आप क्यों परेशान नजर आते हैं।

साँसों को तहजीब में बाँधते-बाँधते,

न बोल पाते हैं न गा पाते हैं।

टेढी लकीरें अच्छी नहीं लगती,

क्या इसलिये चेहरे को छुपाते हैं।

परछाइयाँ भी न दिखें बहकी,

यूँ खयालातों को सपाट बनाते हैं।

परेशान आप न हों नाहक हमसे,

हम खामोशी से गुनगुनाते हैं।

तकदीर सँवरने में वक्त लगता है,

इतनी जल्दी क्यों सर झुकाते हैं।

ता उम्र इंतजार हमने किया,

इल्जाम तन्हाई का मुझ ही पर लगाते हैं।

दोस्ती अपनी अच्छी रही है ऐसे,

तुम जताते हो, एहसान हम चुकाते हैं।

बेअदब कह कह के सही पुकारा उसने,

झुकने के तरीके मुझे कम ही आते हैं।

ये शौक भी बड़ा खूबसूरत है यारों,

पहले मारते हैं फिर जिलाते हैं।

आप कहते हैं तो रंगीन होगी फिजा,

पर चिराग जलते कम नजर आते हैं।

बहुत दिन हुए परछाइयाँ देखे,

चलो एक शमा घर में हम जलाते हैं।

जीने की लत कभी कम नहीं होगी,

ख्वाबों उम्र ही तनिक बढाते हैं।

प्रयास

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सपने इतने सुहाने नहीं होते,

अगर नींद के संग टूटते नहीं।

बचपन इतना प्यारा नहीं लगता,

अगर सदा के लिये बीतता नहीं।

जिज्ञासा प्रश्न ही रह जाती,

यदि सम्मुख अज्ञात नहीं होता,

गति सहज प्रवृत्ति नहीं होती,

यदि अंतत: प्रयास जीतता नहीं।

आशा से स्पंदित, रंजित

भोर की अमल अरुणिमा,

शौर्य, श्रम से रंगी स्थिर-सी

संध्या की सघन लालिमा,

प्रकाश का अर्थ नहीं होता,

यदि अंधकार प्रतीतता नहीं।

गति सहज प्रवृत्ति नहीं होती,

यदि अंतत: प्रयास जीतता नहीं।

सपनों के पलने के हेतु

गति विराम आवश्यक है,

कितना अद्भुत कि इतिहास ही

प्रगति का पहला वाहक है।

पहली राह नहीं बन पाती,

यदि व्यवधानें होती पता नहीं।

गति सहज प्रवृत्ति नहीं होती,

यदि अंतत: प्रयास जीतता नहीं।

करुणा, क्षमा और परहित जीवन,

शौर्य, शक्ति के जाये हैं,

भाव उत्पीड़न और आधिपत्य के,

संशय और भय ने उपजाये हैं।

मन का पात्र भरता फिर कैसे

यदि पुर्वाग्रह से रीतता नहीं?

गति सहज प्रवृत्ति नहीं होती,

यदि अंतत: प्रयास जीतता नहीं।

तिलांजलि

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क्या लिया यह बात बड़ी है, चाहे जो सौगात मिली,

बहुधा तिरस्कार में भी भावनाएँ फूली फली,

कभी कभी स्वीकार से लगती है परित्यक्ति भली,

ऋणता के भाव सारे, आज तुमको तिलांजलि।

बोझ-सी थी बन गयी, आकांक्षाएँ मन में पली,

धूप, छाँव, नमी और प्रश्रय माँगती कुसुमित कली,

निपट शून्यता में भी जी कर, जब वह अपने आप खिली,

वेदना से चेतना की यात्रा, तय कर अपनी राह चली।

भय, संशय, तृष्णा को करके जब आत्मसात चली,

दुविधा के घन हुए मनोरम, मन में दृढता बढी पली,

जिजीविषा ने जाना जीवन, मृत्यु लगी एक अंत भली,

सहसा यात्रा लक्ष्य बन गयी, और जिज्ञासा उत्तर पहली।

कर्म और जीवन मात्र हैं मेरे, शेष भ्रम और कही-सुनी,

धन-ऋण सारे मन के उपजे, क्या धरूँ भर अंजलि,नने

करता अपने भावों का अर्पण, कोई चाहे क्यों पुष्पांजलि,

ऋणता के भाव सारे, आज तुमको तिलांजलि।     

पाषाण बहती धार का

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क्या बीत गया, क्या बचा रहा,

क्या गुजर गया, क्या ठहर गया,

पाषाण बहती धार का,

यह सोचता आठों पहर रहा।

आभा पहली किरणों का,

शीत, शांत, सघन विश्वास,

रक्त रंजित अरुणिमा,

बल तन का, ऊर्जा और प्रकाश।

ढलती प्रहरें, आकलन दिवस का,

कल के संघर्ष हेतु शक्ति संचयन,

अंधकार, उत्सर्जन कलुष का,

कल का प्रभात हो एक नवजीवन।

स्पर्श काया पर स्नेहिल जल का,

लहरों के कलरव, उच्छवास,

स्तब्ध काल, संगीत पवन का,

सम्मोहन भरता अनायास।

रुद्ध प्रवाह और जल आप्लावन,

त्वरित शिलाओं के आघात,

किसी प्रयोजन से विस्थापन,

निर्वासन का कटु संताप।

होना तो फिर भी होना है,

बाकी सब इसके विम्ब विधान,

अमृत, गरल व्यापक और विद्यमान

मध्य में जीवन प्रत्यक्ष प्रमाण।

सचमुच अच्छा लग रहा है

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आँखों से जो कुछ बह रहा है,

जमी हुई पीड़ा नहीं है,

मन मे जमा कुछ धुल रहा है,

अवरोध कलुष का घुल रहा है,

चित्त का अपना रंग अब जग रहा है,

सचमुच अच्छा लग रहा है।

किसी प्रमाद में, हठ में,

सरल क्षणों में,

या स्थिति किसी विकट में,

सहज संयम को हार कर,

अपनी मर्यादा को पार कर,

जब भी मैं ने अभिमान किया है,

मलिनता की एक परत चढ गयी,

जिन्दगी तो अपनी राह बढ गयी,

पर बोध उस क्षण का अबतक रहा है।

फिर आज सचमुच अच्छा लग रहा है।

किसी विपत्ति में, भावों की हीनता में,

लक्ष्य के संधान को,

प्राण रक्षा में, सामर्थ्य की विहीनता में,

स्वाभिमान को मार कर,

पराजय अपनी स्वीकार कर,

जब भी मैं ने अपमान पिया है,

विषाद हृदय में बैठ गया है,

बहुत गहरे तक पैठ गया है,

विषाद पतन का अबतक जग रहा है।

फिर आज सचमुच अच्छा लग रहा है।

किसी तर्क से, किसी युक्ति से, विपत्ति में,

अधिकारों का अतिक्रमण किया है,

प्राप्त किसी सिद्धि को करने,

मानवता का हनन किया है,

आत्मा की शुचिता को भग्न कर,

छद्म को प्रयासों में संलग्न कर,

जब भी कोई अभियान लिया है,

मन में तंतु अवरुद्ध हो गये,

बहुत से मेरे परिचय सो गये,

अन्याय का यह आघात सबसे अलग रहा है।

फिर आज सचमुच अच्छा लग रहा है।

आँखों से जो कुछ बह रहा है,

आत्मबोध है, कृतज्ञता है,

भाव हो प्रेम का पृथुल रहा है,

संकुचन आज मन का खुल रहा है,

चित्त हो जैसे सजग रहा है।

सचमुच अच्छा लग रहा है।

मनुज इतिहास

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सुदूर किसी हिम शिला पर बेसुध,

खोते हुए चेतना के अंतिम तंतु,

सामर्थ्य की सीमाओं का कर अतिक्रमण,

जो कदम अस्तित्व की रक्षा को

संघर्ष कर रहा होगा,

मनुज इतिहास का अध्याय एक

गढ रहा होगा।

कल के लिये करने संचित अंगारों को,

जूझते हुए दावानल की लपटों से,

जिस वीर ने झोंक दिया होगा,

सर्वस्व अनल के काल-ग्रास से लहरों में,

लायी होगी चिंगारी मृतप्राय प्राण से,

प्रणम्य पुरोधा,

प्रगति का पहला सोपान चढ रहा होगा।

मनुज इतिहास का अध्याय एक

गढ रहा होगा।

बढते कुटुम्ब, जीवन दुर्घर्ष,

भोजन के कण-कण को संघर्ष,

शूल क्षुधा के सहकर निज की,

किसी याचक को अपना भाग दिया होगा,

सहज करुण के सूत्र पिरोता,

मानवता की पहली परिभाषा पढ रहा होगा।

मनुज इतिहास का अध्याय एक

गढ रहा होगा।

तज बंधन सारे, रूढि पाश सब,

उत्ताल ज्वार में हो प्रविष्ट जब,

धर कर शीष मान्यता के कुठार पर

जिसने किया परिभाषित ईश्वर,

सार्थकता की संजीवनी भर कर,

एक जंतु मात्र-से मनुष्य के सर

अदृश्य मुकुट आत्मा का मढ रहा होगा।

मनुज इतिहास का अध्याय एक

गढ रहा होगा।

मुलाकात

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सुबह उठा तो आँखें भरी हुई थी,

आदतन तबीयत थोडी डरी हुई थी,

पर ना कोई चुभन,

ना कोई तल्खी,

डरी भले ही,

पर तबीयत हल्की-हल्की,

सुकून में भी हैरान,

मन बार बार पूछता रहा,

एक दिलफरेब सपने-सा,

यह जो हुआ, कैसे हुआ?

शुक्रगुजार यह दिल बेचारा,

ढूँढ ढूँढ कर थक थक हारा,

किन परतों में, किस कोने में,

क्या होने, क्या ना होने में ,

छुपा हुआ कुछ है जादू-सा,

जिसने इस सुबह को,

एक नूर से नहला दिया,

मेरे वजूद को इतना बड़ा बना दिया?

बहुत टटोला,

यादों की सारी गिरहों को खोला,

बीते हर लम्हे का लेखा जोखा,

दे गया धोखा।

इससे पहले कि यह एहसास

कमजोर पड़ जाता,

पूरा जेहन में

आज के खून-पसीने का असर भर आता,

कहीं यादों के तार जुड़े,

ठहरे घने बादल के बीच,

एक धारदार बिजली चमक उठी,

सपनो की, सपनो-सी हर बात झलक उठी।

एक अजनबी-सा शख्स मेरे पास आया था,

करीब आकर हल्के से मुस्कुराया था,

हल्के से मेरे कंधे पर रखकर हाथ,

मुझे अपना कहा था।

फिर कहीं वह चला गया।

उसकी आँखों की नमी

उतर आयी मेरी आँखों में,

बड़े सुकून से सोया होऊँगा इसके बाद।

बाकी सब भूल गया पर,

अब तक ताजा है जहन में,

इस मुलाकात का स्वाद।