और जीवन चलता रहा।

white and black light streaks
Photo by Alex Conchillos on Pexels.com

और जीवन चलता रहा।

 

हाथ टटोलते घुप अंधेरे,

विवेक हीन अज्ञान ने मेरे,

जो छुआ उसे अपना माना,

कृतज्ञ हृदय, बाहों में घेरे।

पहली संवेदना- स्वीकार की,

जगी, प्रवाह का उद्गम बना।

और जीवन चलता रहा।

 

पहला ज्ञान स्वीकार का

जिज्ञासा कितने जगा गयी,

साहस यहीं कहीं पनपा,

फिर कथा पराक्रम शुरू हुई।

कौतूहल, विश्वास ने मिल कर

अब साहस का हाथ धरा।

और जीवन चलता रहा।

 

बढा कदम अनुसंधान का,

स्वभाव नही सीमित हो रहना,

न बंधन करे कातर कोई,

शीष उठा पूरा कर सपना।

चला प्रगति रथ उर्ध्व दिशा,

मानव मन को विस्तार मिला।

और जीवन चलता रहा।

 

अंध कूप से पार क्षितिज,

कहानी है अदम्य चेतना की,

अडिग संकल्प, उत्सर्ग प्राण का,

सृष्टि पर्व की, वेदना की।

नत, विनीत; पर मनुज ही क्या

जो विपदा से डर रुक गया।

और जीवन चलता रहा।

 

साँस

blue spiral neon light
Photo by Frank Cone on Pexels.com

नमी है, उष्णता है,

ऊर्जा है, गति है।

विश्वास है, निरंतरता है,

प्राण की अनुभूति है।

 

आरोह में अवरोह में

महसूस कर रहा हूँ,

साँसों को अपनी,

जैसे स्वयम को जानने की शुरुआत हो,

इस अकेलेपन में शायद खुद से फिर मुलाकात हो।

 

दहकती दोपहर में,

उनींदी आँख सहर में,

घबड़ाया जो दिल तो,

अपने अंदर टटोला,

जो बच्चा रो रहा था,

जो पागल हँस रहा था,

दोनो से बोला,

क्या मैं ‘तुम लोग’ हूँ?

किस से पूछूँ, कैसे पहचानूँ?

 

वे हैरत से बोले ‘पता नहीं’,

खुद से पूछो,

क्यौं हमें उलझाते हो,

हम यूँ हीं भले हैं,

कुसूर बस इतना है कि तेरे संग हो चले हैं।

 

कदम पीछे हटा लिया,

वह बच्चा भी अच्छा था,

और वह पागल भी सच्चा था।

‘वे नहीं मैं,’

सोच कर चल पड़ा था,

क्या कह कर विदा लूँ –

दुविधा में खड़ा था,

कि अनायास,

ली एक उच्छवास,

अरे, यह क्या?

क्या प्राण मेरे कोई संकेत मुझको दे रहे हैं?

‘हम तीनो साँस एक साथ ले रहे हैं।‘

 

द्रवित हृदय से गले लगाया,

‘तुम मैं हो।‘ उन्हे बताया।

उत्तर में वह दोनो बोले,

‘हिचक मत, अपनी राह हो ले।

डर मत,

हम कहीं नहीं जाते,

हम कभी नहीं मरते।

हाँ,

कभी-कभी तुम ही इतनी दूर चले जाते हो,

कि हमें देख नहीं पाते हो।

और ये जो साँसों की डोर बंधी है,

इसे मत तोड़ना।

अच्छा चलो, जाओ,

प्रत्यक्ष तुम्हारी जो जिंदगी है,

उससे मुँह कभी मत मोड़ना।‘

 

आँखों में नमी लिये,

सीने में आभार लिये,

मन में अनोखा-सा यह

साँसों का उपहार लिये,

चल पड़ा मैं निपट अकेला,

जैसे सचमुच,

यह स्वयम को जानने की शुरुआत हो,

इस अकेलेपन में शायद खुद से फिर मुलाकात हो।

आवरण

close up photo of rose quartz
Photo by Karolina Grabowska on Pexels.com

खिंचाव उतना ही बढता है,

आवरण जितना महीन होता है,

और ऐसे में नजर झिलमिलाती है,

सोच ठहर जाती है,

अपनी ही समझ पर,

कहाँ खुद को भी पूरा यकीन होता है।

 

हिम्मत,

जैसे हैं वैसे दिखने की,

गिरवी रख दी, बहुत पहले,

हमने एक दिन,

जब कहा किसी को अपना,

और किसीसे कि रह लेंगे तेरे बिन।

 

छुपाये रखना बहुत कुछ,

अब अदा नहीं रहा,

हमारे हकों में शुमार है,

हैरत की बात है लेकिन,

कि हर किसी से खुलेपन की

उम्मीद हमारी अब भी बरकरार है

 

कोई गफलत नहीं,

कि हम सर से पाँव तक,

अलग-अलग रंगों में रंगे पुते हैं,

और जहाँ रंगे नहीं हैं,

कई-कई पर्दों में ढके हुए हैं।

दम यह फिर भी भरते हैं,

कि हम जैसे बाहर हैं,

बिल्कुल वैसे ही अंदर हैं।

 

बात यदि यहीं तक होती,

तो शायद फिर भी कुछ होती।

हम

सब कुछ जानने वहम रखते है,

खिलाफ जिसके सारा जंग था,

मुड़-मुड़ के उन्ही राहों पर कदम रखते हैं।

 

इतना रंज इसलिये

कि औरों ने हमको सही नहीं माना।

सच तो दरअसल यह है कि

अपनी जिद में हमने तुम्हे नहीं जाना।

 

आओ

एक ईमानदार शुरुआत करें,

लकीरें खींचना छोड़ दें,

और इस भूल भुलैय्या से बाहर निकलें।

यकीन मानो

दुनियाँ लकीर के दोनो ओर एक-सी है,

फर्क सिर्फ इस बात का है कि

लकीर कहाँ है और हम कहाँ खड़े हैं,

क्यौंकि गलत हो कर भी खुदको

सही साबित करनेवाला सचमुच जहीन होता है।

खिंचाव उतना ही बढता है,

आवरण जितना महीन होता है।

बादल बरसता रहा रात भर

photo of thunderstorm
Photo by Rodrigo Souza on Pexels.com

बिन घाट देखे, बिन बाट देखे,

बादल बरसता रहा रात भर।

ना हाल पूछा, ना चाह पूछी,

बस अपनी ही कहता रहा रात भर।

 

ना वक्त देखा, ना नीन्द देखी,

बचपन के दोस्त-सा, अहमक,

पास बैठा रोता-लरजता रहा, फिर

दबे पाँव चल दिया मुँह फेर कर।

 

सवेरे धुला-धुला-सा था सारा समाँ,

जैसे कि ओस में पिघलती सुबह की धूप,

तन्हाई लग रही थी खूबसूरत इतनी,

जी चाहता था आज रो लूँ मैं जी भर।

 

खालीपन कैसे भरता है किसी को,

ऐसी एक नयी  समझ आयी,

वह हल्का करता रहा मुझे सवेरे,

खुद को मुझ में भर-भर कर।

 

जो चाहे और जब भी चाहे,

कह सके बिन लाग लपेटे के,

ऐसा एक बादल का टुकड़ा,

रखता हूँ सदा छुपा कर भीतर।

कहो दोस्त, अच्छे तो हो

green fern leaf
Photo by Evie Shaffer on Pexels.com

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

अपना नहीं यादों का रिश्ता,

और नहीं वादों का रिश्ता,

जो भी जितना साझा है वह सब,

साझा हरदम किये रहो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

तेरी मेरी राह अलग थी,

अपनी अपनी चाह अलग थी,

अलग अलग हम जुड़ गये जितने,

उस बंधन की बात करो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

हीन पराजय, जय कोलाहल,

योजन दूर, पर एक धरातल,

जीत हार के भाव छलें ना,

कुछ ऐसे मेरी बाँह धरो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

ध्यान तुम्हारा घर का आंगन,

धूल भरा पर सुरभित बचपन,

दौड़ूँ तो गिरने का डर मन से

फूक मार तिरोहित कर दो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

माँग रह हूँ कब से तुम से,

मुद्दत हुई जो तुमसे बिछड़े,

माँग मुझसे सखा भाव तुम

कुंठा सारी विगलित कर दो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

अंतरंग

rawpixel-633849-unsplash

पोर-पोर में बसते

जीवन की खुशबू-सी अपनी,

अनजाने राहें, टेढी-मेढी,

मुड़-मुड़ के देखती आखों से धुंधली,

मौजूद मुझमें हर पल बंधु,

तुम कौन हो,

क्यौं मौन हो?

 

कौतूहल जगा-जगा कर,

दबे पाँव आ-आ कर,

मुझे ले चलते,

असंभव-सी ऊँचाईयों पर,

न पाँव तले जमीन,

न सहारे को तिनका,

रोमांच का अतिरेक,

ठहरा-सा जाता पल,

कोई फर्क नहीं यदि

आगे कुछ भी हो, न हो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

 

अररबेल-सी लिपट-लिपट कर,

इस काया को बाहों में भर,

डोर कभी साँसों-सी बाँधे,

और दोस्त-सा पास सिमटकर,

मेरे संग-संग

अपना करती सारी दुनिया को,

कहाँ से लाते इतना प्यार, कहो?

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

किसी पिता-सा ज्ञीर्ष हाथ धर,

एक भरोसा अंतिम पल तक,

‘उतर पड़ो जीवन समर में,

सिद्धि तय जो संकल्प हो सार्थक।‘

विश्वास जिंदगी को देते,

और भरते एक नया प्राण

तुम मुझमें किस विधि अहो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

संवेदनाएँ प्राणों में रची सूक्ष्मतम,

कर जड़ अनुभूतियों को चेतन,

रोष नहीं था किंचित मन मे, जब

चढा कसौटियों पर मैं हर क्षण।

ऋणी हूँ परीक्षा के लिये,

इस सृजन का श्रेय स्वीकार करो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

मेरा गाँव

img_7325मेरा गाँव मुझे बहुत याद आता है।

जैसे मेरे गुजरे हुए पुरखे याद आते हैं।

वे लौट कर आयेंगे नहीं,

और मैं लौट कर जाऊंगा नहीं।

फिर भी एक रिश्ता है,

जो निभता चला आया है अभी तक।

कभी एक माँ और उसके खोये बच्चे की तरह,

कभी एक बच्चे और टूट चुके सबसे प्यारे खिलौने की तरह।

 

ऐसा नहीं कि वे ठगते नहीं।

पर उनका छल सरल होता है।

कुछ ऐसा कि उनकी गाँठें तब भी झलकती रहती है,

जब वे अपना सबसे गहरा चोला पहने होते हैं।

और अक्सर वे जानते हैं कि उनका पर्दा इतना पतला है,

कि उनके मन के सारे कोने साफ साफ दिख रहे होते हैं।

मैं जानता हूँ कि ऐसी दलीलें कुछ साबित नहीं करती,

पर मैं कुछ साबित करना भी नहीं चाहता,

बस एक पुराने लगाव का इजहार है,

जिसमे मैं किसी हद से गुजरना भी नहीं चाहता।

 

कुछ तो बात है कहीं कि

अब भी उसकी बाँहें खुली मिलती हैं मुझे,

आगोश में जकड़ती नहीं,

गुनहगार-सा पकड़ती नहीं,

उसकी जहालत भी ओस से धुली मिलती हैं मुझे।

उसकी गलियों में मुझे

पायचों के मैले होने की फिक्र नहीं होती,

आस्तीन से पोछ लेता हूँ पसीना,

तो भी अपने कद की ऊँचाई नहीं खोती।

 

हुआ है कई बार ऐसा,

कि अपनी खुदगर्जियों ने मुझे बेपरदा कर दिया है।

मैं ने चाहा है कि कोई कहे मुझ से,

तू ने खुद को ही नही अपनो को भी नंगा किया है।

हर बार ऐसे में

एक आवाज दालान-आंगन से उठी है,

तू तो सगा है,

मालूम है तम्हारी भी मजबूरियाँ होंगी।

तुम्हे बाँधना हमारी मंशा कभी न थी हमारी,

तुम आगे बढो,

हम तुम्हारे ही रहेंगे,

बीच में चाहे जितनी भी दूरियाँ होगीं।