हृदय कलश

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हृदय कलश कुछ रीत गया है,

तनिक उसे अब भरने दो,

कुछ और समाये इसके पहले,

स्वीकार मुझे यह करने दो।

बड़े जतन से एक हिस्सा इसका,

हरदम खाली रखता हूँ,

यदि सुपात्र न कोई मिले तो,

किसी आगंतुक से बाँटा करता हूँ।

यदि भरा यह रहे लबालब,

कुछ नया न कभी आ पायेगा,

द्रव संग्रहित वृथा रहेगा,

निष्प्रयोजन विघटित हो जायेगा।

कितना भी कुछ हो मूल्यवान,

बिन परिवर्तन स्थूल, हीनप्राण,

जीवन तक ना पहुँचे तो अमृत कलश भी

मात्र एक घट, एक उपादान।

हृदय कलश, अंतर्मन घट मेरा,

संचित करे सारे मधु कृतज्ञ हो,

कर दे शीतल प्यास किसी की,

दे नमीं जहाँ आवश्यक हो।

मोह न हो बाधक देने में,

जहाँ हों ग्राहक, सबकुछ दे दे,

भर ले फिर से सुधा संजीवनी,

यह यायावर कुछ ऐसे खेले।

यह क्रीड़ा सीमा विहीन हो,

उन्मुक्त पात्रता के प्रभाव से,

जिससे, जब भी मिले नव्यता,

ग्रहण करे नत, श्रद्धा भाव से।

व्यर्थ उद्यम का दोष न दो,

जो कर सकता हूँ करने दो।

हृदय कलश कुछ रीत गया है,

तनिक उसे अब भरने दो।

कालखंड

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काल नहीं कभी खण्डित होता,

चलता समगति, लय नहीं खोता,

नहीं कोई विराम, नहीं कोई विश्राम,

उसकी कोई दिशा नहीं, नहीं उसके कोई धाम,

निज को कभी नहीं दोहराता,

जो बीत गया नहीं फिर आता,

इसके मार्ग कभी लक्षित नहीं होते,

पग चिन्ह कहीं अंकित नहीं होते,

ज्ञात नहीं आरम्भ है इसका,

बीते का अवशेष ना मिलता।

तथ्य मात्र हैं, नहीं ज्ञान ये,

विचारूँ चाहे जितना ध्यान दे,

भ्रम से रहित नहीं चित्त होता।

काल नहीं कभी खण्डित होता।

जीवन हैं पर, खंड काल के,

पल, दिन, मास और साल ये,

जिनसे जीवन को चलना है,

है काल नहीं बस गणना है?

काल में जीते, काल है छूता,

नहीं कोई आयाम अछूता,

इसे जानने का दम्भ न पालें,

इसके दिये आशीष सम्हालें

जो कालखंड जिस अर्थ हमारे,

उनकी सुन्दरता उसी भाँति सवारें।

काल मात्र देता है अवसर,

बिन बंधन, बिन बाधित कर,

इसकी दृष्टि, कोई हीन नहीं,

और कोई महिमा मंडित नहीं होता।

काल नहीं कभी खण्डित होता।

तलाश

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तलाश उस तरंग की जो डूबने दे, उतराने दे,

झूमने दे, इतराने दे,

चाहूँ तो थमने दे, चाहूँ तो लहराने दे,

साथ ही अपने पर विश्वास कर पाने दे

कि मैं जुड़ा हुआ हूँ हर पल,

अपनी मूल चेतना से,

और सक्षम हूँ अपनी निजता को सम्हाल पाने में।

तलाश उस निर्बाध गति की,

जो बिना सवालों के जाने दे,

चाहूँ तो फिर लौट कर आने दे,

क्षितिज के पार,

और फिर उसके भी पार,

बार-बार,

स्वाद, सुगंध और संस्कृति लाने दे,

कोई प्रतिबद्धता नहीं,

कोई बंधन नहीं उन्हे त्यागने या अपनाने के,

पर मुझे चरम उन्मुक्तता को,

एक बार छू पाने दे।

तलाश उस क्षमता की,

जो अपने सम्मोहन के पार जाने दे,

जहाँ कोई नहीं गया एक बार जाने दे,

विश्वास और उद्देश्य दे,

हारे संबल को बार-बार प्रबल कर पाने दे,

दुर्गम हिम शिखरों पर चढ़ जाने दे,

सागर के गर्भ से अमृत कलश ले आने दे,

सृष्टि को मनोरम बनाने के,

हर युक्ति को सहज हो आजमाने दे।

तलाश प्राणशक्ति के नियामक प्रवर की,

तलाश उस ईश्वर की,

जो इस नश्वर की,

खोज को अनवरत चल पाने दे।

संकेतों से बुलाये,

अपनी छाया में आने दे।

भाव खिले कुछ कौतूहल के

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भावशून्य और दिशाहीन-सा,

बिन उद्देश्य और तृण-सा हलका,

मन के अंतरिक्ष  निर्बंध विचरता,

बन सहज शून्य, उन्मुक्त सरलता।

इस जड़ता के सुख में सहसा,

यह कौन आया मुझ तक चलके?

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

शांत हृदय था, व्यथा हीन था,

जीवन था निर्वाण-सा लगता,

पर प्रतीति अपूर्णता की हर क्षण,

स्थिति यह परित्राण या जड़ता?

सुख जड़ता का, आनंद न होता,

तंद्रा तोड़ जग पड़ा सँभल के।

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

स्फुटन हुआ, प्राणों में आड़ोलन,

आत्मा सजग, चित्त में स्पंदन,

सूक्ष्म गति में उद्देश्य मिल गया,

सृष्टि हुई जीवन का अभिनंदन।

ठगा-ठगा सोचता रह गया

कहाँ छुपे थे, अब अर्थ जो झलके?

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

चरम शांति और दुर्धर्ष समर में

दोलन है, कोई अंतिम तत्व नहीं है

जीवन के इस महा गाथा में

विराम भले हो, अमरत्व नहीं है।

जिज्ञासा बिन मृतप्राय मनुज है,

गति और संधान से जीवन चलते।

यूँ भाव खिले कुछ कौतूहल के।

कितना चले हम

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दो हाथ अगर ढँक लें,

फिर फर्क नहीं पड़ता कि तूफान कितना बड़ा है,

लौ जलता रहता है।

आस्था अगर स्थिर हो,

फिर फर्क नहीं पड़ता कि समक्ष कौन खड़ा है,

जीवन चलता रहता है।

यह नहीं कि कहाँ से शुरू हुए हम,

बात होनी चाहिये कि कितना चले हम,

यही रास्ता, यही मंजिल है।

यह नहीं कि कितना पा लिया है,

दे क्या पाये, कितना उठे देने के पहले हम?

यही जिन्दगी का हासिल है।

कितने हमारे पीछे चले,

कुछ भी नहीं करता है साबित कभी,

हम उसी जगह पहुँचते हैं।

कितनों के साथ चले हम,

कितनों को यह साथ जगत के हित लगी,

सार्थकता इसी को कहते हैं।

बेमानी है बात यह कि,

यहाँ तक पहुँचने में कितनी लड़ाईयाँ लड़ी,

संघर्ष हर जीवन का हिस्सा है।

कितना बल पाते हैं हमसे,

जो आज लड़ रहे हैं कल के लिये हर घड़ी

बस उतना ही है हमारा किस्सा है।

जो बीता है

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क्षेम कुशल और नेह निमंत्रण नया-नया है,

जो बीता है कठिन, किंतु फिर भी अच्छा है,

स्मृति से जो चित्र उकेरूँ, रोष ना करना,

याद वही है आता जो कि बीत गया है।

आड़े-तिरछे जैसे भी सोपान बने थे,

पग धर उन पर ही हैं इस पल तक आये,

अरुचि, असहमति चाहे जितनी भी हो हम में,

सामर्थ्य उसी कल से है, हम कल के ही जाये।

नव्यता के उत्सव से क्यों बैर किसीको,

जीवन तो हर क्षण उत्सुक आह्वान इसी का,

पर समिधा बन जो भस्म हुआ हवन-यज्ञ में,

उस प्रत्यक्ष को क्या चाहिये प्रमाण किसी का?

होड़ श्रेय का सहज मानव दुर्बलता है,

किंतु लौ बनती जलते तेल और बाती ही से,

आज का जो भी, जितना भी सुन्दर है,

गढा गया है मात्र कल की माटी ही से।

इस कृतज्ञता से विहीन जब भी मन होगा,

सोचे जब कल उसका मूल्यांकन होगा,

उसके सारे श्रम और चिंतन का भी,

ऐसे ही हीन भावों से अवलोकन होगा।

सहानुभूति, सम्वेदना और भाव नमन के,

हों प्रस्तुत पहले, अतीत के विश्लेषण के,

प्रगति और उत्थान की निरंतरता की,

अक्षुण्णता संभव, मात्र एक श्रृंखलित बंधन से।

महिमा मंडन बिन उद्यम हो भले अरुचिकर,

मूलाधार से चिर कृतज्ञता का भाव सच्चा है।

क्षेम कुशल और नेह निमंत्रण नया-नया है,

जो बीता है कठिन, किंतु फिर भी अच्छा है।

अंधेरा-उजाला

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मेरे दिल के एक कोने में

अभी भी अंधकार है,

फिर भी हकीकत है कि

उस कोने से, मुझको बहुत प्यार है।

वह प्यार नहीं जो किसी सोते हुए

बच्चे को देख कर आता है।

वह प्यार भी नहीं जो किसी रोते हुए

बच्चे को देख कर आता है।

कुछ वैसा, जैसा सबकुछ खोते हुए

किसी आदमी को देख कर आता है,

जिसे पता भी न हो कि उसका सबकुछ

उससे हमेशा के लिये दूर हुआ जाता है।

हुआ कुछ यूँ है कि

बाकी जगहों को रोशन करने में,

इस कोने ने कभी रोका नहीं,

अंधेरे को अपने घर को भरने में।

क्या भान नहीं था कि इस अंधेरे से,

उसकी अपनी रोशनी गुम हो जायेगी?

या यह यकीन था इसके पीछे कि,

रोशनी बाँटने से बढती ही जायेगी।

बहरहाल मुझे अंधेरा तनिक भी

रास नहीं आता है,

पर इससे उस कोने से मेरा लगाव

तनिक भी कम नहीं हुआ जाता है।

अंधेरे से मेरी लड़ाई

बदस्तूर जारी है,

पर किसी को रोशन करने को,

खुद अंधेरे में रह पाने की अदा अब भी प्यारी है।

वह कोना एक और इल्म

मुझे देता है,

कि रोशनी कहीं भी हो,

कुछ तो रोशन होता है।

और समेट लेने से कहीं भी,

अंधेरा यकीनन कम होता है।

अगर फिर से मुझे अंधेरे-उजाले के

बँटवारे का सवाल कभी उलझायेगा,

अंधेरा सिमटेगा मेरे अंदर,

सिर्फ उजाला ही बाहर जायेगा।

कर्म योग

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वंचित मत कर मुझे प्रहार से,

बस सहने की क्षमता संग दे दे।

कुंठित मत कर सदाचार से,

मन में कुछ हिलोरें, तरंग दे दे।

मानना तो चाहता हूँ,

पर कुछ नये बनाना चाहता हूँ,

नियम जीवन के अबतक के,

एक बार दोहराना चाहता हूँ।

कोई तिरस्कार नहीं कहीं भी,

रंच मात्र अहंकार नहीं,

किसी भी पथ, पंथ के प्रति,

कोई कुत्सा नहीं धिक्कार नहीं।

हठ नहीं, समर्पण है,

है सम्मान उसी अवधारणा का,

समग्र सृष्टि का उत्थान मात्र ही,

हो लक्ष्य सारी साधना का।

इसी बिन्दु से हम दोनों का,

निकला पहला परिचय है।

यदि मिले तो, उसी बिन्दु पर,

फिर से मिलना निश्चय है।

निषेध, भले ही किसी भाव का,

पूर्णता से बंचित ही करता,

बचने का प्रयास आघात से,

अवांछित भय है मन में धरता।

जो स्थापित उससे व्यवहार के

दो विधियाँ होती निश्चित ही,

पर बिना कसौटी पर परखे क्या,

निर्णय होगा उचित कभी?

दासता तेरी कृपा का,

फिर भी रहेगी दासता,

आहूति नव निर्माण में ही,

गोचर तेरी सच्ची कृपा।

मुखर मेरी जिज्ञासा को कर,

जूझने का सहज उमंग दे दे।

सुख-भोग की निष्क्रियता से मुक्ति दे,

कर्म योग के छंद दे दे।

कुंठित मत कर सदाचार से,

कुछ हिलोरें, तरंग दे दे।

कर्मस्थल

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मन की सीमाहीन गहराइयों में

कहीं कहीं ज्योति पुंज हैं,

शेष चतुर्दिक अंधकार।

कहीं कहीं ध्वनि सजग है,

अन्यथा नीरवता साकार।

व्याख्या प्रकाश की विस्तृत सर्वथा,

अपरिभाषित सदा अंधकार,

ध्वनि सदा शब्द और संगीत हो गूँजे,

तिरस्कृत नीरवता हर प्रकार।

खोजने में इनके अर्थ,

कितने सक्षम हम कितने समर्थ,

प्रश्न नहीं, हमारे ज्ञान की सीमारेखा है,

इनके आगे जो है, अनजाना अनदेखा है।

छुपी कहीं इस नीरवता के सघन विस्तार में,

और इस सर्वव्यापी, सूचिभेद्य अंधकार में,

हमारे उन प्रश्नों के उत्तर हो सकते हैं,

जिन्हें हम उजालों में ढूँढते नहीं थकते हैं।

तो क्या अब भी कोई संशय है,

कि यही अगले अनुसंधान का पहला विषय है?

नीड़वता से संयम, अंधकार से दूरी,

अज्ञात से सुरक्षा, पूरी की पूरी,

क्यों हमारा स्वभाव होता जा रहा है,

क्यों जिज्ञासा का स्वाद खोता जा रहा है?

क्या जीवन यह शब्दहीनता और नरम धूप में,

बनी बीतने सुख सुविधा के अंधकूप में?

क्या क्षितिज के पार देखने की आकांक्षा,

बुझ जायेगी, सीमित प्रांगण के रंग-रूप में?

अर्जित सारे प्रकाश पुंज और शब्द ब्रह्म सब,

निधियाँ हैं, शीष सदा नत आदर को तेरे,

पर सविनय एक अनुमति मन माँग रहा हूँ,

शेष नीरवता और अंधकार कर्मस्थल हों मेरे।

कर्मस्थल

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मन की सीमाहीन गहराइयों में

कहीं कहीं ज्योति पुंज हैं,

शेष चतुर्दिक अंधकार,

कहीं कहीं ध्वनि सजग है,

अन्यथा नीरवता साकार।

व्याख्या प्रकाश की विस्तृत,

अपरिभाषित सदा अंधकार,

ध्वनि सदा शब्द और संगीत हो गूँजे,

तिरस्कृत नीरवता हर प्रकार।

खोजने में इनके अर्थ,

कितने सक्षम हम कितने समर्थ,

प्रश्न नहीं, हमारे ज्ञान की सीमारेखा है,

इनके आगे जो अनजाना अनदेखा है।

छुपी कहीं इस नीरवता के सघन विस्तार में,

और इस सर्वव्यापी, सूचिभेद्य अंधकार में,

हमारे उन प्रश्नों के उत्तर हो सकते हैं,

जिन्हें हम उजालों में ढूँढते नहीं थकते हैं।

तो क्या अब भी कोई संशय है,

कि यही अगले अनुसंधान का पहला विषय है?

नीड़वता से संयम, अंधकार से दूरी,

अज्ञात से सुरक्षा, पूरी की पूरी,

क्यों हमारा स्वभाव होता जा रहा है,

क्यों जिज्ञासा का स्वाद खोता जा रहा है?

क्या जीवन यह शब्दहीनता और नरम धूप में,

बनी बीतने सुख सुविधा के अंधकूप में?

क्या क्षितिज के पार देखने की आकांक्षा,

बुझ जायेगी, सीमित प्रांगण के रंग-रूप में?

अर्जित सारे प्रकाश पुंज और शब्द ब्रह्म सब,

निधियाँ हैं, शीष सदा नत आदर को तेरे,

पर सविनय एक अनुमति मन माँग रहा हूँ,

शेष नीरवता और अंधकार कर्मस्थल हों मेरे।