संतोष सृजन का

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हर जीवन यात्रा के जैसी,

है मेरी जीवन य़ात्रा भी,

अंश उस अनंत यात्रा का,

जो है प्रत्यक्ष पर मायावी।

इसमें धैर्य है, ठहराव है,

है उद्यम, और आपाधापी।

सर पर शीतल हाथ वरद,

तलवों तले जलती चिंगारी।

.

हर प्रयास को झुठलाता लेकिन,

जीवन के अर्थ का अभाव है।

पर अंतत:, संतोष सृजन का,

जिजीविषा और सखा भाव है।

.

वैर भी है, वैमनस्य भी,

जिज्ञासा, शोध, और प्रतिशोध है,

असीमित गति की इच्छा,

पर परिवर्तन का विरोध है।

सौन्दर्य, सत्य है प्रथम ईष्ट,

अनुरंजन पहली अभिलाषा,

संग ही छल और प्रतिघात भी,

चलती जैसे ज्योति और छाया।

.

दिखे सरल पर बहुत जटिल इसमें,

भय और उत्कंठा का प्रभाव है।

पर अंतत:, संतोष सृजन का,

जिजीविषा और सखा भाव है।

.

करता अनुभव प्रत्येक क्षण,

चेतना का सहज स्पंदन,

जुड़ा है जीवन सकल सृष्टि से,

अटूट श्रृंखला, अनबूझ बंधन।

पर, नहीं है सुसुप्त यह श्रृंगार,

इच्छा पहुँचती मन के द्वार,

ले आकांक्षाओं के तरंग,

ले नये नियम और नये विचार।

.

इस अखण्ड द्वन्द्व का ताप,

देत जीवन को इसका स्वभाव है।

पर अंतत:, संतोष सृजन का,

जिजीविषा और सखा भाव है।

.

ढूँढ नहीं, तू अर्थ सृजन कर,

सारे संकेतों का यही भाव है,

मूलत: जीवन संतोष सृजन का,

जिजीविषा और सखा भाव है।

बालक और मैं

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क्या तुम भी मेरे जैसे ही थे?

प्रश्न सुन कर चौंक उठा।

सम्मुख एक नन्हा-सा बालक,

कुछ जाना कुछ अनजाना-सा,

कौतूहल से सराबोर था,

देख रहा वह मेरी ओर था।

.

कौतूहल से उपजा कौतूहल,

जिज्ञासा में भी सम्हल-सम्हल,

मैं चलके उसके पास गया,

झुका, उसके समकक्ष हुआ,

जितना सरल मैं हो सकता था,

होकर, मुस्काया और पूछ लिया,

क्यों लगा तुम्हे मैं उत्तर दूंगा?

पर चलो मैं तुमसे बात करूंगा।

.

क्या रात अंधेरे डर लगता था?

परछाईयाँ थीं हवा में दिखती,

रंग रूप बदलती, चलती फिरती,

पैर जमते और कोसों लम्बा,

घर तक का सफर लगता था?

क्या तुमको भी डर लगता था?

.

कहना चाहा, बिल्कुल सच है,

कैसे सवाल ये गढ रहे हो,

तुम कैसे मुझको बिन जाने,

मेरा बचपन पढ रहे हो?

पर हिचका,

अपने कवच मैं खोल न पाया,

लगा सम्हालने अपने कद को,

उतना सच मैं बोल न पाया।

बच्चे ने जाने क्या समझा,

भायी शायद मेरी चुप्पी,

और फिर से वह लगा पूछने,

सुबह-सुबह की नींद का टूटना,

क्या तुमको भी लगता सबसे बड़ा दुख था?

समय की सीमा भूल खेलना,

नहीं क्या साक्षात सुख सम्मुख था?

.

आँखें मेरी भर-भर आयीं,

हाँ, मैं तेरे ही जैसा था,

शायद हर कोई होता है,

कहना चाहा तभी लपक कर,

मेरे कानों में मुझ को छू कर,

धीमे से वह फुसफुसाया,

जैसे अपनी किसी साजिश का,

सहज सहभागी मुझे बनाया।

बड़ा होना कैसा होता है?

क्या सबकुछ अलग जैसा होता है?

क्या बड़ों की बातें बड़ी होती है?

वे काम बहुत ही भारी करते,

क्या खेल-खुशी भी ज्यादा होती,

या हमसे भी हैं ज्यादा लड़ते?

.

अब कितना कुछ था कहना मुझको,

पर पहला सिरा नहीं मिल पाया,

बच्चा आगे गया बोलता,

मेरा सुनते जाना और भी भाया।

क्या अच्छा लगना अच्छा लगता है?

क्या मन उसे ढूँढता रहता हर क्षण?

बुरी जो लगती उन बातों से क्या,

हैं दूर भागते बड़े भी हरदम?

बच्चा यूँ कहता ही जाता,

पर मैंने बीच में टोक दिया,

कोई बांध हृदय में टूट रहा था,

बड़े जतन से रोक लिया।

.

हाँ, मैं तेरे जैसा ही था,

शुरु में सब ही खरे होते हैं।

सबसे अच्छा बनने के सपने,

देख-देख बड़े होते हैं।

बड़े होने में तन खिंचता है,

तन के संग मन भी खिंचता है,

और इस खिंचाव पर कई बार,

नहीं रहता अपना कोई अख्तियार,

एक सिरा सम्हालो तो

दूसरा पकड़ से फिसल जाता है,

लगता है सब है सधा हुआ,

पर हाथ से सब कुछ निकल जाता है।

अंत में जो संग बचता है,

तुम्हारी पहचान बन जाता है,

असली रंग रूप से भले तुम्हारे,

नहीं कोई इसका नाता है,

अच्छा लगना अभी भी अच्छा लगता,

पर अच्छे का चेहरा जटिल हो गया है,

बुरा लगना भी बुरा ही लगता,

पर व्यवहार इसका कुटिल हो गया है,

हाँ, एक और बात,

जो नहीं रह सकता बिना बताये,

कह लेने दो ताकि मेरी,

बात अधूरी ना रह जाये।

तुम्हें अच्छे याद देर तक रहते,

तुम बुरे को जल्दी भूल हो जाते,

हम अच्छे को बहुत परखते,

अच्छा मानने से हैं कतराते,

बुरे को जिन्दगी भर मन में पालते,

पिला पिला कर खून जिलाते।

.

बच्चा थोड़ भ्रमित-चकित-सा,

एक पल मुझको रहा निहारता,

बोला मुड़कर अपने बचपन में,

क्या रूठना और मनाना,

बड़े भी करते हैं अनबन में?

क्या अब भी वैसे ही हक से,

अब भी प्यार जताते हो,

क्या कुछ अच्छा नहीं लगता तो,

खुलकर तुम बतलाते हो?

.

बच्चा रुका, तो मैं भौंचक था,

रहा निहारता उसको कुछ पल,

चाहा उत्तर ना दूँ कोई,

पर कर न पाया मैं ऐसा छल।

रुका, साँस ली, आँखों के जल को,

दिया सूखने, और फिर बोला,

पता नहीं कैसे पायी हिम्मत,

इसबार नहीं बदल पाया चोला।

जैसे जैसे हम बढते हैं,

रूठते तो नहीं बताते हैं,

और मनाये जाने का हक,

हरदम अपना ही जतलाते हैं,

कोई मुझसे क्यों कर रूठे,

मैं तो सदा सही करता,

रही बात मनाने की तो,

करता नहीं, बस दम भरता।

जो अच्छा नहीं लगे बतलाना,

उसे असंगत कहने लगते हैं,

आभार मानना, प्यार जताना,

हमें भावुकता लगने लगते हैं।

.

मैं ठिठका, बच्चे को देखा,

आखिर क्या यह कर रहा हूँ,

बाल सुलभ जिज्ञासू मन में,

हताशा अपनी क्यों भर रहा हूँ।

छिपा-छिपा हारों को अपनी,

कह रहा सब विधि का लेखा।

मैंने फिर से बच्चे को देखा।

.

आँसू बहने लगे धार-से,

गले लगा कर सहज प्यार से,

उसकी आँखों मे मुस्काया,

मन की बात कहने पर आया।

जो तुम देख रहे हो सच है,

जो हुआ है अब तक उसका फल है।

व्यक्ति हारते, सपने मरते,

हर दौर गुजरता लड़ते-लड़ते।

पर कुछ है जो कभी न मरता,

अच्छे में विश्वास अडिग हो,

तो पराजय से भी विश्वास उभरता।

मानव सिमित है, चूक है सकता,

पर कभी न हारती मानवता,

जब तक तुम हो प्रश्न तेरे हैं,

प्रगति के पथ पर तू है चलता।

चिर जिज्ञासू

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इस निष्ठुर नियति के संसार में,

‘हूँ क्यों मैं?’ के निर्मम विचार में,

मोह भंग और आसक्ति ज्वार में,

चिर सृजन-ध्वंश के पारावार में,

कर्तव्य और अधिकार, हैं तेरे स्वीकार के याचक,

विधि सदैव तटस्थ, यदि पहुँच सको तुम उस तक।

जीवन के प्रति सहज आभार में,

गति और दिशा के परिष्कार में,

ईंधन के अर्जन और उपचार में,

उचित-अनुचित की तीक्ष्ण धार में,

कुछ भी सत्य ना मिथ्या, जीवन मात्र जीवन है होता,

तू ही लिखता भवितव्य, विधि बस तेरे संग है सोता।

लुप्तप्राय सृष्टि के विस्तार में,

सूक्ष्म चेतना के हर चमत्कार में,

प्रकाश पुंज और अंधकार में,

इस जीवन के सकल आकार में,

हर वेदना स्वीकार, यदि हो सृजन के हेतु तो,

नमन अंगीकार यदि, यदि उन्नयन के हेतु तो।

अकिंचनता के हाहाकार में,

दिनचर्या के सतत व्यापार में,

भूख, पिपासा, लवण-क्षार में,

अस्तित्व रक्षण के हर उधार में,

हर यत्न तेरा अधिकार, यदि जीवन-प्राण हेतु तो,

हर भीति पर प्रहार, यदि लक्ष्य के संधान हेतु तो।

प्रश्न तुम्हारे, अर्थ तुम्ही हो, निश्चय कुछ निर्माण हेतु हो,

सब रंग जीवन के हैं तेरे, हो चिर जिज्ञासू, ज्ञान सेतु हो।  

सूरज-सा उगते ढलते

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सारे सम्बंधों को छोड़कर,

सारे अनुबंधों को तोड़कर,

मन जब चला,

वेग तो था,

नियंत्रण नहीं था।

गंतव्य तो थे,

कोई आमंत्रण नहीं था।

.

सारी सीमाओं को लांघ कर,

सारी दुविधाओं को बाँध कर,

उठे जब हाथ तारों को छूने,

लालसा थी, उत्साह नहीं था,

आकांक्षाएँ बहुत सघन थीं,

पर निष्काम कर्म प्रवाह नहीं था।

.

धो कर सारे रुग्ण कलुष को,

बिना किसी लिप्सा के वश हो,

जब विश्व पटल को रंगना चाहा,

रंग तो खूब छिटके,

उनमें कोई आकार नहीं था,

चेष्टा मुखर थी,

जीवन से इसका कोई सरोकार नहीं था।

.

अवचेतन में बार-बार कौंधता,

पूरा दिखता नहीं, पर लगता स्पष्ट-सा,

निर्बंध होने और बंधन के बीच,

दिशाहीनता और आमंत्रण के बीच,

वह सम्पूर्ण संसार है जो बुलाता है,

व्यर्थ ही मन यहाँ-वहाँ दौड़ लगाता है।

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प्रचंड ताप और निष्ठुर शीत के बीच,

अदम्य आकांक्षाओं और विरह के गीत के बीच,

सारी गतियाँ हैं, सारे प्रवाह हैं;

जो मिलेंगे चलते चलते,

सूरज-सा जीवन में उगते-ढलते,

आक्रांत मत कर जीवन को,

इसे जी,

इसमें सारे रंगों का निर्वाह है।

क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

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क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

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जो लिया, मात्र वही संचित है,

पर जिसे लिया, वह ऋण निश्चित है,

वह मेरा धन मैं मान लूँ कैसे?

गाँठ भरी पर मन चिंतित है।

प्रश्नों के हर पग पर पहरे।

क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

.

जो दिया सम्भवत: देय मात्र था?

मैं किसी श्रेय का नहीं पात्र था?

और दे दिया तो मेरे पास नहीं है,

बस मन में एक विश्वास कहीं है,

कि कुछ है पाने-खोने से आगे चलके।

क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

.

जीवन दुविधा है, संघर्ष सकल है,

पर उल्लास अभिष्ट इसका हर पल है,

फिर भय और संताप कहाँ से आते?

आजीवन क्यों हम ऋण को चुकाते,

क्षद्म विलास और परपीड़ण के?

क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

.

कोई क्यों चाहे अंतिम उत्तर,

यदि करते ये जीवन को दुष्कर,

सहज धन्यता धन-सा लगता,

पश्चाताप से ऋण है जगता,

लक्ष्य कि मन के भार हों हलके।

क्या धन और क्या ऋण जीवन के?

उन्मुक्ति

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सुना था,

प्रेम बाँधता नहीं,

उन्मुक्त करता है;

बिना देखे-सुने-छुए ही,

खुद को व्यक्त करता है।

मुक्त करता है,

अवांछित बंधनों से,

और बंधनों के टूटने के भय से;

सुख के पाश से,

और भविष्य के अनावश्यक संशय से।

मुक्त करता है,

मात्र व्यक्ति को नहीं,

व्यक्ति में बसे प्राण को भी;

हृदय में छुपी तृष्णा को ही नहीं,

चित्त को बाँधते अभिमान को भी।

प्रेम खोलता है सारे बंद द्वारों को,

और आने देता है निर्मल बयार को;

दीये को बुझने से बचाने को,

नहीं कर लेता बंद सम्पूर्ण संसार को।

सुलझाता है उन तंतुओं को,

जो उलझाते हैं पिपासा से अनुराग को;

शीतल करता सब कुछ पाने की लालसा को,

और अर्थहीन संचय की आग को।

और मैं ने देखा है,

जो तरंग उठती है,

बंधनों के उन्मुक्त होने से,

देती है सार्थकता,

हमारे अश्रु को, हास को;

जीवन में बसे,

जीवन की पूर्णता के विश्वास को।

प्रेम जब जगता है,

हृदय के हर स्पंदन में पलता है;

सहेजो तो जीवन भर,

चतुर्दिक प्रकाश फैलाता,

ईंधन बन जलता है।

सुन्दर सुयोग सर्वथा

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सुबह नींद खुले और आँख कृतज्ञता से नम नहीं हो,

और सीने की जलन आँसुओं से कम नहीं हो,

किसी को देख कर उसे पुकारने को जी नहीं करे,

गहराती साँझ में यूँ ही भटकने का मन कभी नहीं करे,

पुरानीं यादें कभी अचानक अचरज से सराबोर नहीं कर दे,

छूट गये साथियों के किस्से मीठा-सा अफसोस नहीं भर दे,

कभी ऐसा नहीं लगे कि बहुत कुछ करना अभी बचा हुआ है,

मैं अर्जुन हूँ महाभारत का, जो मेरे अंदर मचा हुआ है,

तो समझो जड़ता घेर रही है, अंधकार व्याप्त हो रहा है।

जीने के आनंद का युग धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।

पुरानी बातें यदि, नयी वेशभूषा में ललचाए नहीं कभी,

कुछ नयी बातें, अपनी धृष्टता से चौंकाए नहीं कभी,

इतिहास में जाकर कुछ मिटाने का मन नहीं करे,

असंभव सा कुछ बदलने का पौरुष जतन नहीं करे,

कुछ सोच कर अनायास बाँह नहीं फड़के,

किसी और जग से आये संकेतों से हृदय नहीं धड़के,

प्रत्यक्ष से परे जीने को सपनो का कोई संसार नहीं हो,

आज के यथार्थ से ऊपर और कोई विचार नहीं हो।

तो निश्चय ही जीवन की ऊर्जा का क्षय हो रहा है,

चेतना का जड़ता में विलय हो रहा है।

और कुछ नहीं तो मन के आकाश को खंगाल,

कुछ भी अंतिम नहीं होता, वृथा संशय न पाल,

रात कितनी भी गहरी हो, लौ से लौ जलती है,

चेतना क्षिण हो कर भी जिज्ञासा को संग लिये चलती है,

खोजोगे तो पाओगे, विवशता या वरदान जीवन तय करके नहीं आता,

यथार्थ की पीड़ा ही नहीं, यहाँ सम्भावनाओं का अनंत भी समाता,

जलने से डर कर यदि बाती को आगे नहीं बढाते,

दोष जिसे भी दें, अंत में हैं, धुआँ और अंधकार ही पाते।

बाहें खोल स्वागत, हर स्पर्श का, संकेत का,

प्राण है प्रणम्य, जीवन सुन्दर सुयोग सर्वथा।

तू गढ

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तू गढ।

जीवन का मूल चलना, सही,

पर मात्र उगना, ढलना नहीं,

गति निरर्थक हो सकती है,

जीवन को भँवरों में खो सकती है,

गति को दिशा दे अहर्निश,

लक्ष्य की ओर बढ।

तू गढ।

वेदना की मिट्टी ले कर,

कुछ अश्रु, कुछ स्वेद दे कर,

निर्माण कर कुछ आकार नये,

कि एक भय-भ्रांति हीन संसार बने।

फिर फूँक दे प्राण उनमें,

मंत्र-मानवता पढ।

तू गढ।

संग चेतना की प्रखर ज्वाला,

मन को बना निर्माणशाला,

दे आहूति अपने अहंकार की

तप कर बन अश्व, रथ और सारथी,

बाट जोह मत किसीकी,

तू ऊपर चढ।

तू गढ।

भयप्रद सृष्टि का अनंत विस्तार,

मत छोड़ निज कर्म का अधिकार,

जितना जो कुछ तेरा निर्माण,

इस अनंत यात्रा में तेरा योगदान,

कोरा है जीवन अब तक,

उसमें अर्थ मढ।

तू गढ।

जोड़, सँवार त्रुटि और फिर जोड़,

मुड़ विच्छेद से निर्माण की ओर,

शाश्वत तुझको तेरी रचना करता,

अभिष्ट सदा कृति की सुन्दरता।

निरंतर बना सोपान अपना,

और उसके ऊपर चढ।

तू गढ।

क्या यायावर को याद रहा?

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क्या यायावर को याद रहा?

रास्ते जटिल और टेढे-मेढे,

राह के चुभते पत्थर काँटे,

कुछ चिलचिलाती दोपहरिया,

और कोसों बिखरे सन्नाटे।

कुछ लहूलुहान-से घटना क्रम,

और कुछ अनगढ इतिहास,

खुशियाँ दिखती दूर खड़ी,

पर तृष्णा सदा बहुत ही पास।

थपेड़े खाती सागर में नावें,

और दमतोड़ ऊँचाई पहाड़ों की,

गहरे तिलस्म अंधियारों के,

अनबुझ भाषा चांद-सितारों की।

अपने बूते पर लड़-लड़ कर,

क्या पाया,

बचा क्या इसके बाद रहा?

क्या यायावर को याद रहा?

नर्म दूब वह अपने पथ की,

सुबह की संगी शीतल बयार,

कभी उऋण होने ही ना दे,

सरल प्रेम के अद्भुत उधार।

बिन मांगे आशीष बहुतेरे,

अंधेरों में जल उठती बाती,

वरदान ऐसी निर्भयता की,

हर समर गर्व से चौड़ी छाती।

और बहुत से ऋण हैं बाकी,

बाकी हैं और बहुत उपकार,

इनके बंधन में जग लेकिन,

यायावर का अलग प्रकार।

इन कृपा के दम पर बहुत चला,

पर इनके भार का,

हर गतिरोध तो याद रहा।

क्या यायावर को याद रहा?

यायावर अकृतज्ञ नहीं होता,

आभार सभी के सबसे ऊपर,

पर जतलाने को नहीं रुकेगा,

है तो आखिर एक यायावर।

पाँव के छाले, बेदम साँसें,

नहीं बदले में कुछ भी पाने को,

याद उन्हे वह रखता है,

अगले यायावर को बतलाने को।

यायावर वह भाग मनुज का,

जो सारी वर्जनाएँ छोड़ सके,

नित नये का संधान करे,

बंधनों को सारे तोड़ सके।

जो रुष्ट उनसे, वे हुआ करें,

नहीं रुकना,

उसका अंतिम संवाद रहा।

क्या यायावर को याद रहा?

पल और युग

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पल ने युग से कहा,

सबकुछ तो मैंने सहा,

रुका नहीं, चलता रहा,

बुझा नहीं, जलता रहा,

था कोई प्रारब्ध नहीं जिसकी सुनता,

बस गति थी, रहा अनवरत बुनता,

जुड़ती रही सम्भावनाओं के तार नये,

और तुम बन गये।

युग,

तुम बढते गये,

स्मृति की ठंढी सीढियाँ चढते गये,

तुम धरती बने, क्षिति और व्योम बने,

सर्वव्यापी, सर्वग्राही और सर्वभौम बने,

मैं सूक्ष्मतम एक बिंदु पर डोलता,

तुम्हें देखता-भालता रहा;

तुम्हारा निर्माण रुके नहीं,

इसलिये स्वयम को सम्हालता रहा।

मैं गति हूँ, पर कहीं जाता नहीं हूँ,

तुम मुझसे बनते, पर मैं तुम्हें बनाता नहीं हूँ,

निर्पेक्ष हूँ,

दिशा का अर्थ नहीं मुझमें;

स्वच्छंद हूँ,

कोई पूर्वाग्रह व्यर्थ नहीं मुझमें;

मैं जीना सिखाता हूँ, स्वयम जीता नहीं,

इसीलिये मरता नहीं, होता कभी बीता नहीं।

फिर हो तुम बनते कैसे?

तुम किससे बनते,

तुम्हें बनाता कौन है?

सृष्टि में व्याप्त कोलाहल,

या कि चेतना का सघन मौन है?

तुम्हारा विस्तार,

एक अर्थहीन प्रसार है?

या अनुभव और स्मृतियों से बुना,

समय को परिभाषित करता,

जीवन का सामूहिक सार है?

तुम्हारे पटल पर बिखरी,

असंख्य रंगो की अनुरंजना;

मनोहारी और भयावह,

हैं किसी उपयोग के,

या अर्थहीन प्रवंचना?

युग कभी उत्तर नहीं देता,

बस होता है,

पल अपनी जिज्ञासा परंतु,

कभी नहीं खोता है।

जीवन बना समृतियों से,

संवेदना, अनुभव और विचारों से;

प्रशस्त चेतना से,

सधा हुआ कर्मों से, बंधा हुआ संस्कारों से;

जीता तो इन्ही पलों में,

पर उत्तरदायी युगों के प्रति,

और परखा जाता इतिहास के,

मृत हो चुके आधारों से।

जीता मनुष्य सदा वर्तमान में,

पलों में है।

पर दिशा उसकी तय होती,

बीते पलों की आकांक्षाओँ,

संवेदनाओँ, संरचनाओँ,

विश्वास और छलों से है।

जीवन पलों में चलायमान माया है,

युग देता उसको आकार और काया है।