हे चिर अशेष

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जगमग करते नभ में तारे,

अपनी सज्जा में स्वयम मगन,

मैं हूँ इनमें या ये हैं मुझमें,

इस परिहास से मुदित गगन,

यह सब मेरा या मैं हूँ इनका,

जिज्ञासा में उद्वेलित मानव मन।

पास बुलाते जैसे हर पल,

हरा-भरा और शस्य श्यामल,

बसुधा ओढती इनको ऊपर,

या हैं ये वन उनके वल्कल?

आकर्षित भी, आतंकित भी,

पहली छवि आसक्ति का निर्मल।

दुग्ध-सिक्त तप-मग्न शिखर,

किसी सिद्धि में लीन विप्रवर,

प्रेरणा लक्ष्य और आकांक्षा के,

जागृत करते संकल्प प्रखर,

धन्य बनूँ बन उपासक इनका,

या बनूँ इनसा मैं अजर अमर।

विस्तृत प्रांगण का चिर सम्मोहन,

वक्ष स्थल आदि पुरुष का पावन,

उद्वेलन और स्थिरता संग संग,

सागर मनीषी का आत्ममंथन,

सीखूँ समेटना उत्ताल तरंगें,

या अंतर्मन का स्वभाव गहन।

अद्भुत यह विविधता, समावेश,

मैं चिर याचक का धरे भेष,

मन के यायावर से पूछ रहा,

जियूँ या निहारूँ प्रकृति निर्निमेष,

हे रचनाकार समग्र सृष्टि के,

दे सहज समर्पण, हे चिर अशेष।

अनुराग-विराग

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विराग अंकुरित हो रहा था,

स्नेह तंतु सब सूख रहे थे,

ज्ञान,तर्क लगने लगे थे ओछे,

कि क्षण एक प्रस्फुटित हो गया,

अनगिनत संवादों में,

एक ध्वनि के, एक किरण के,

संकेत भरे अनुरागों में।

समाधान नहीं, कुछ प्रश्न ही उभरे,

सिमटते क्या कुछ और ही बिखरे,

पर व्यथा नहीं थी ताप नहीं था,

सरल बोध था, सहज जिज्ञासा,

शीतलता थी, संताप न था।

वैराग्य नहीं था अभाव जनित,

श्रोत कहीं अलगाव में था,

आकांक्षाओं, आशाओं, संचय के

अर्थहीन बिखराव में था।

समर्पण-हीन अभियोजन प्राय:,

विमुख ही करता मूल विषय से,

निर्णय कठिन, फिर भी बल मिलता,

चेतना हो यदि जुड़ा हृदय से।

प्रश्न प्रमुख, क्या आकांक्षा मेरे,

सत् हैं, हैं अंतर्मन से अपने?

तोड़ गया विराग वलयों को,

मृदुलता सद्य: लग गयी पनपने।

क्या अनुराग-विराग मौलिक हैं,

या हैं ये विषय विकार के जाये?

सत हो चित्त में, पूर्वाग्रह ना हो,

चलें राह जो विधना दिखलाये।

सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है?

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चपल शिशु का क्रीड़ा प्रांगण,

अभिसारिका का सज्जित आंगन,

अंतरिक्ष का प्रसार विहंगम,

हर रंग में करता सम्मोहित,

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

सागर से उठ उड़ते बादल,

हिमनद से झरता निर्मल जल,

जटिल जीवन चक्र के मूल सरल,

सबके सब हैं स्वत: जनित,

या सन्निहित इनमें कोई प्रयास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

उत्सर्ग अभिमान पर सारी निधियाँ,

ढूंढते जीवनभर ऋद्धि-सिद्धियाँ,

अनगिन धारना अनगिन बिधियाँ,

हैं निराधार या आधार कोई विश्वास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

बल, बुद्धि, स्नेह की सतत पिपासा,

पल-पल होती त्वरित जिज्ञासा,

टूट-टूटकर जुड़ती आशा,

मनके सारे भाव स्वयम्भू,

या किसी अपरिभाषित का आभास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

अपना मौलिक अर्थ ढूँढता,

ज्ञान, विवेक, परमार्थ ढूँढता,

निरे अस्तित्व में अर्थ गूंथता,

सत्य, मोक्ष के अन्वेषण में,

कैसी अद्भुत अमिट प्यास है।

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

जीवन सहचर्य है

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बारिश के बाद छत से टपकती बूंदें,

भले ही उल्लास नहीं जगाती,

प्रणय-विरह के गीत नहीं गाती,

पर अपने विषम लय में कुछ कहती जाती है,

समझाती है,

कि जीवन का झमाझम उत्सव

जब खत्म हो जाता है,

ज्वार जब उतरने को आता है,

जिंदगी तब भी

उतनी ही खूबसूरत होती है,

जितनी पढी हुई किताब,

मुश्किल पहेलियों के जवाब,

और जितनी उम्मीदों से भरी

जीने की हसरत होती है।

भावनाओं का उन्माद जब थमता है,

अतिरेक पर संयम जब जमता है,

विषयों के अर्थ नये पनपते हैं,

पुराने परिदृश्य बदलने लगते हैं,

स्पष्ट होने लगती है,

अपने विचारों की विषमता,

जिन्दगी तब भी कम खूबसूरत नहीं होती,

अपनी आभा तनिक भी नहीं खोती,

धीरे-धीरे समझाती है:

जीने के बहुत सारे ढंग होते हैं,

अनगिनत पटल और बेशुमार रंग होते हैं।

यह न्याय शास्त्र नहीं,

यहाँ सही-गलत, अच्छे-बुरे,

मिलते हैं बहुत घुले मिले,

हम इनसे नहीं हैं बंधे हुए,

हर रूप में जीवन मनोहारी,

हम इससे ऋजुता से जुड़े हुए।

किसी झंझा के अंत में,

जब ब्यापता सन्नाटा है,

मन के भीतर गहरे जाकर,

एकांत जब गहराता है,

जीवन रुकता नहीं,

भारमुक्त हो थोड़ा ऊपर उठ जाता है।

गति है द्रुति है,

हैं लय, लालित्य के रंगमहल,

उल्लास का उत्सव मनाते,

जीवन प्रवाह के मंगल स्थल।

सघन भाव, गहन स्थिरता,

यात्रा अंतर्मुखी मर्म तक,

सहज संवेदना, एकांत कुछ रचता,

तपोस्थली जीवन के

सार्थकता के हवन कुंड निर्मल।

जीवन के हर अणु में सौन्दर्य है।

जीवन सदैव सहचर्य है।

स्मृति का उद्यान

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स्मृति का उद्यान अनूठा,

कितना कुछ पीछे है छूटा,

कितना, क्या-क्या शेष बचा है,

बोध, भ्रांति का समर रचा है।

कौतूहल, विस्मय, संशय अगणित,

विश्वास, हर्ष और दंश समाहित,

जो कुछ इनमें दिखता, मिलता,

निर्मल या पूर्वाग्रह प्रायोजित?

यहाँ काल क्रम स्थिर नहीं होता,

एक बोध कल फिर नहीं होता,

सघन अतीत मायावी लगता,

स्वप्न सरीखा जगता सोता।

उन्माद बड़े ही प्यारे दिखते,

भावुकता टिम-टिम तारे दिखते,

द्वेष, क्लेश जैसे बस व्यतिक्रम,

विजय बहुत-से हारे दिखते।

जुगनू अनेकों दीप बहुत-से,

अंतरमन को जगमग करते,

स्नेह, सुभाव मन-वचन-कर्म के,

बिना छद्म के सतत विचरते।

ये वितान, रंग और चित्र सारे,

सब सच्चे कुछ भी ना झूठा,

तुममें रचा-बसा अब तेरा सच,

स्मृति का उद्यान अनूठा।

रोशनी भी हो छाया भी

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जी, मैं भटक नहीं रहा था,

कुछ तलाश रहा था।

शहर से दूर भले ही था,

हकीकत के पास रहा था।

रात की स्याही को साजिश कह-कह कर,

दिखे बहुत-से तीर चलाने वाले।

रोशन करते रहे राहों को

चुपचाप चिराग जलाने वाले।

गर्दिश के गुबार की तिजारत भी

रही है दिल फरेब हर जमाने में,

इल्जाम सूरज पर अंधेरे का,

बंद लोगों को रखा तहखाने में।

कहा किसीने कि भौरों ने

फिजाँ की खुशबू सारी पी ली है,

कहीं से खबर चली थी कि

बची हुई हवाएँ जहरीली हैं।

धुआं कहीं भी उठे,

अगजनी ही क्यों उसका दिल ढूंढता है?

अंगीठी भी किसीकी जली,

तो शहर भर कातिल ढूंढता है?

हैरत अंगेज समाँ कि

बहुतों को बस डराते डरते देखा।

सरोकार उजाले से था,

बात ताउम्र अंधेरे की करते देखा।

बात मुख्तसर सी है जो

हमने उन्हें बतलाया भी,

मिले हर जगह वो ठिकाने,

जहाँ रोशनी भी हो, छाया भी।

फलसफे में रूप भी हो, काया भी,

साथ अपना भी रहे, पराया भी।

मन फिर से तूँ पंख पसार

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स्मृति में संचित कालखंड के,

अवशेषों को दे बिसार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

ध्वनि सुनी,

प्रतिध्वनि सुनी,

वाद सुने,

प्रतिवाद सुने,

सुने अनेकों नाद अलौकिक,

भौगोलिक संवाद सुने।

सारी ध्वनियाँ कम्पन बन जब,

चेतना में हो गयी समाहित,

एक अनोखी नीरवता छायी,

ना हर्ष सुने अवसाद सुने।

यह कोई उपलब्धि नहीं,

मात्र संस्मरण का एक प्रकार।

चल इसके पार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

ओस में भींगे मरु को देखा,

जल में सूखे तरु को देखा,

क्षार में उगता जीवन देखा,

हास विलास और क्रंदन देखा।

कहीं रुकूँ, यह नहीं लगा,

गहरे तम में जगा जगा,

खेता रहा पतवार।

यह गंतव्य नहीं, है मझधार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

श्रृंगों का स्पर्श किया,

जिये अवसाद और हर्ष जिया,

अपवादों के अतल गर्त में

चेतना का उत्कर्ष जिया।

पर मन के श्रृंगार भवन में,

शेष मात्र सुगंध हवन के,

बिन हठ नहीं रुकते विकार।

चित्त पर मात्र तेरा अधिकार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

शब्द, दृष्य और ख्याति पराक्रम,

मन पर सरल इनका सम्मोहन,

पर ये सदा विगत ही होते,

सहज-गति-रोधक, मति के बंधन।

बहुधा लेते मान इनको

हम वर्तमान का अपना संसार।

मत होने दे यह अनाचार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

सम्पूर्ण हो

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थोड़ा अपनापन से,

थोड़े अधिकार से,

और थोड़े विश्वास से,

कुछ प्रश्न उठे मन में अनायास से,

और मैं ने निहायत ही अपनेपन से पूछा,

अपने सहचर जीवन से पूछा-

कभी तो मुझसे  कहो-

‘तुम क्या हो?’

प्रश्न की गम्भीरता से,

या फिर मेरे इस परिहास की अधीरता से,

स्तब्ध जीवन चुप रहा,

बहुत देर तक कुछ न बोला,

तो मै ने कुरेदा-

‘क्यों मौन हो?’

चकित करता प्रतिप्रश्न था-

‘तुम कौन हो?’

इस हमले की चुभन से हतप्रभ,

अपनी पीड़ा उछालता उसपर,

उसकी तिलमिलाहट देखने को

झाँकते उसकी आँखों में,

कहा मैं ने-

‘तुम्हे अपनी पीठों पर ढोता,

बीते के सैलाब में खाता गोता,

आज के सँकरे,ऊबड़ खाबड़ रास्तों से होता,

तिलस्मी कल की ओर दौड़ता,

एक खिलौना हूँ।

और कई बार, मुगालते में सोचता हूँ,

सृष्टि के चलने मे मेरी भागीदारी है,

समय के साथ कदम मिलाकर,

कुछ दूर चलने की मेरी अपनी पारी है,

अनंत के उस छोर तक जाना चाहता हूँ,

कद में भले ही थोड़ा बौना हूँ।‘

चिर संगी जीवन हँसा-

‘इतना कुछ जानते हो,

फिर मुझसे क्या माँगते हो?’

मैं ठिठका,

पल दो पल खड़ा रहा,

जो सुना अच्छा लगा,

पर अपने प्रश्न पर अड़ा रहा-

‘तुम क्या हो?

कुछ इस पर भी कहो।‘

उसने कुछ नहीं कहा,

कुछ देर मैं भी चुप रहा,

फिर इसके ठीक पहले

कि मेरा धैर्य चुकता,

उसने करुणा से कहना शुरू किया-

‘मात्र तुम्हारा होना हूँ,

इसके अलावा कुछ भी नहीं,

बिना प्रतिरूप के छाया,

बिना जीव के प्राण देखा है कहीं।

तेरे होने से मैं हूँ,

मुझ से तुम नहीं।

मैं होता हूँ, जब तुम होते हो,

व्यथित करते हो,

जब कहते हो कि मुझे ढोते हो।

मेरी वेदना तुझ तक जाये,

मुझे अच्छा नहीं लगता।

मैं तो देखना चाहता हूँ तुझमें,

धर्म और स्वाभिमान जगता।

एक और उलाहना दिये बिना

रुक नहीं सकता,

मेरे सर्वस्व हो,

हर रूप में सच्चे लगते हो,

पर किसीसे भी अपनी प्रामाणिकता

का साक्ष्य माँगते

नहीं जरा भी अच्छे लगते हो।

चाहे सात रंगों में हो या विवर्ण हो,

अपने आपमें सम्पूर्ण हो।‘

कहाँ से आता है बल

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चढ-चढ कर दुर्दांत शिखर पर,

आज का अपना सब कुछ दे कर,

थक कर दिन जब जाता ह ढल,

कहाँ से आता है बल,

फिर से अपने स्नेह में सिक्त होने का,

बीते कल के भार से रिक्त होने का,

और कैसे मलिन मन

फिर से एक आहुति को होता है निर्मल,

कहाँ से आता है बल?

 

यह कोई अमूर्त आकांक्षा है,

या कोई अमिट जिज्ञासा है,

है कोई विचलन, मतिशून्यता,

या स्वर्णिम कल की आशा है?

 

अवचेतन मन में लिखा हुआ ,

यह अबूझ कोई प्रारब्ध है,

और सारी गति, हर घटना क्रम का,

संकेत कहीं उपलब्ध है?

 

अनाहूत है, विध्वंसमुखी है,

या कहीं  कोई नियंत्रण है,

इतनी ऊर्जा क्षय करता यह,

कहाँ इसका अक्षय ईंधन है?

 

ज्ञान सही, विज्ञान सही है,

जहाँ बंधे चित्त ध्यन सही है,

पर इनमें भी मेरी जिज्ञासा का,

सटीक समाधान नहीं है।

 

उत्तर सारे मिल जाते जो,

क्या रहता फिर ले आने को,

बिन ऐसे मौलिक प्रश्नों के,

कहता ‘तुझे’ क्या समझाने को।

 

आभार कि रहस्य ये विद्यमान हैं,

नत हूँ, जिजीविषा अक्षय प्राण है,

जीवन जीने से महान है,

जीने के अनुभव से महान है।

मन माँगता एकांत है

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जीवन की सरपट उच्छृंखलता से,

समय की मूल्यहीन चंचलता से,

मन थोड़ा क्लांत है।

मन माँगता एकांत है।

 

लक्ष्य विशाल क्यों नत नहीं करता?

क्यों ज्ञान हमें सम-मत नहीं करता?

क्यों कुछ अनुभव व्यापक नहीं करते?

विवेक सदैव उन्नत नहीं करता?

 

किस दीर्घा में दौड़ रहे हैं?

लेने किससे होड़ चले हैं?

करतल ध्वनि को लालायित हैं ,

शब्द ब्रह्म क्यों छोड़ चले हैं?

 

क्यों चुप हूँ, विक्षुब्ध हूँ,?

क्या चेतना शून्य हूँ, स्तब्ध हूँ?

शायद उत्तर ढूंढ रहा है,

चित्त अभी भी उदभ्रांत है।

मन माँगता एकांत है।

जल में भी तृष्णा बाकी क्यों है?

विकट यह आपाधापी क्यों है?

क्या-क्या कह समझाऊँ स्वयम को,

है भी तो ऐसा सर्वव्यापी क्यों है ?

 

लक्ष्य बड़े हों, ध्येय बड़ा हो ,

सबके पग तल वही धरा हो,

कोई न दुहरा झुका खड़ा हो,

कंधे किसी के न कोई चढा हो।

 

प्रतिध्वनि हँसती ‘क्या रहस्य तुम खोल रहे हो,’

बात पुरानी बोल रहे हो,

पर अपने इस उपहास में भी

मन थोड़ा शांत है।

मन माँगता एकांत है।

 

गति है तो फिर दौड़ स्वाभाविक,

राजनीति, गठजोड़ स्वाभाविक,

हर व्यतिक्रम के स्वभाव हैं अपने,

बंद गली और मोड़ स्वाभाविक।

 

नाम बड़े, पद-नाम बड़े हों,

मुकुट और पनही रत्न जड़े हों,

पर मानवता की परिभाषा में,

सब के सब समकक्ष खड़े हों।

 

नंगे पाँव, अनंत विस्तार,

छोटी नौका, छोटी पतवार,

गंतव्य अज्ञेय पर गोचर है अब,

इस यात्रा का मूल आधार,

उदात्त लहरें नहीं भयप्रद

अब चित्त मेरा निर्भ्रांत है।

मन माँगता एकांत है।