
फूल सजाना भूल गया था,
फिर भी अच्छे लगते थे,
शब्द सुने कुछ अनगढ़-से थे,
फिर भी सच्चे लगते थे।
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यद्यपि करुणा से परिपूरित,
हृदय अनंत को भर लेता,
दीप शिखा बँट-बँट कर बनता,
प्रकाश श्रोत का सहज प्रणेता।
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स्पर्श कोई स्पंदित कर के,
लुप्त हो गया दृष्टि पटल से,
उबर न पाया हृदय कभी फिर,
जीवन बीता संग-संग चलते।
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टंगा किसी स्मृति की डोर से,
था आवर्तों में झूल रहा मन,
करुणा किसी की समझ में आयी,
कृतज्ञता में सहज बहा मन।
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प्रश्न सनातन आज भी सम्मुख,
है स्वरूप बड़ा या गुण प्रधान,
मन की महिमा सीमाहीन,
काया का हो कितना सम्मान?
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चित्त के तंतु सदा ही चंचल,
नित्य गढ़ें नये आयाम,
काया कभी प्रतिवाद न करता,
सदा संग, बिन लोभ या दाम।
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जीवन श्रृंखला में बँध चलता,
संयोजन इसका मूल स्वभाव,
किंतु विचलन और विलोम के,
भाव जोड़ते वृहद प्रभाव।
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