अनजाना-अपना कुछ

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जब नींद में भी चैन नहीं आये,

आराम में सुकून नहीं मिल पाये,

पता नहीं चले क्या चाहता है मन,

सोचें क्या, यह भी समझ नहीं आये,

तो जरूर अपने ही वजूद का कोई हिस्सा,

बुला रहा है, जिसे जानना छूट गया है,

कोई बेचैन है सीने की धड़कनों में,

जो मिलने से पहले ही रूठ गया है।

.

आहटें सुनाई दे, कोई दिख नहीं रहा हो,

अपनी ही धड़कनें लगे, कहीं कुछ बज रहा हो,

महसूस हो वक्त अपनी साँसों से होकर गुजरता,

खामोशी में जैसे कि कोई तिलस्म सज रहा हो,

शायद अपना ही एक भूला-बिसरा चेहरा,

जिंदगी में फिर से लौट आने को,

बहुत दूर से आवाज दे रहा हो,

तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो?

.

अपनी ही लहरों पर तैरते उतराते सपने,

नींद के भँवर में बल खाते सपने,

सपना है या हकीकत, समझना नामुमकिन,

सच को सच से ही उलझाते सपने,

बेवजह परेशान नहीं करती,

दरअसल है जिंदगी कुछ और ही कहती,

सच बहुत कुछ है दिखते सच के अलावा,

हैं बहुत सारी कहानियाँ हर कहानी में रहती।

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