मन और जीवन का रण

Photo by Rafael Minguet Delgado on Pexels.com

जीवन के अनवरत रण में,

निश्चिंतता के किसी क्षण में,

स्वयम अपने ही सम्मोहन में,

डूबता-उतराता मन पूछता है,

क्या सारा यथार्थ है, मात्र जीवन के यापन में?

.

किसी तृषित की मरीचिका हो,

या आशा की लहराती दीप शिखा हो,

संभावनाओं की अनगिनत श्रृंखला हो,

प्रश्न जगता एक ही निरंतर,

अनायास या कोई चला रहा सृष्टि की अद्भुत रचना को?

.

बीते काल के अनुभव से,

मधुर स्मृतियों के वैभव से,

हर विजय और हर पराभव से,

साक्षात्कार हो तो आता है विचार,

सभी व्यापार सधने से पहले दिखते थे असंभव-से।

.

सहज स्वीकार हर प्रश्न-प्रमेय,

मन का उत्कर्ष ही अंतिम ध्येय,

लक्ष्य ज्ञान, परंतु परिणाम अज्ञेय,

भाव उन्नयन यदि प्रेरित करता,

जिस विधि दखो, अमिट जिजीविषा सदा अजेय।

.

जिज्ञासा मन का सहज विस्तार,

श्रम, स्वेद की महिमा का आधार,

चेतना सबके मूल में महत् निराकार,

गणना चाहे जिस भी विधि हो,

जीवन, जिजीविषा, आकांक्षा और उत्कर्ष से साक्षात्कार।

poems.bkd@gmail.com

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment