जाना कहाँ है

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किसीने पूछा – जाना कहाँ है।

मैं हँसा – अभी तक ये जाना कहाँ है।

 

जब जान जाऊँगा,

तुम्हे ही नहीं,खुद को भी बताऊँगा।

 

चलने दो,

अभी फुर्सत नहीं है रुकने की।

पैरों को थमना नहीं गवारा है।

जब तक दायरों में बँटे नहीं हम,

तब तक सारा जहाँ हमारा है।

मंजिल

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बहुत तूफान देखे हैं

बहुत किनारे देखे हैं।

हासिल मुकाम भी,

अपने वो सारे देखे हैं।

जो नहीं देख पाया

उसे देखने को अब तो,

सूरज ही मुझे चाहिये,

बहुत चांद-तारे देखे हैं।

 

 

मदहोशी

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गहरा   वो   समंदर  था,

या  डूबता  किनारा  था।

मुँह फेरने की अदा थी वो

या    कोई   ईशारा   था।

 

बेखुदी    का    मंजर   वो

कितना  खुशगवार  हुआ।

कि चलते  तीर   तम्हारे थे

और चाक सीना हमारा था।

 

 

भूल जाता हूँ

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खयाल  रखता  हूँ,पर  बताना भूल  जाता हूँ,

मानता हूँ, अपनी नजरें झुकाना भूल जाता हूँ।

 

है अच्छा लगता सुनता रहूँ जो औरों के किस्से,

कुछ बात है कि अपना फसाना भूल जाता हूँ।

 

तकल्लुफ  हो  नहीं पाता  यारों  अब मुझ से,

तसल्ली गहरी हो  तो मुस्कुराना भूल जाता हूँ।

 

अदब  के कायदे  सारे  यूँ मुझको भीआते हैँ,

पर  जब वक्त  आता है, बहाना  भूल जाता हूँ।

 

सीखे हैं  दोस्ती  के गुर  कुछ  इस तरह हमनें,

सरे-जंग  भी  दुश्मनी   निभाना  भूल  जाता  हूँ।

 

ये जिद है कि कह  देने से  ये हल्का ना हो जाये,

किसीके लब पे अपना लहू दिखाना भूल जाता हूँ।

मैं रोता हूँ

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मैं रोता हूँ।

किसी को जिन्दगी से हारा देखूँ तो,

किसी को अपने से  हारा  देखूँ  तो,

मैं रोता हूँ।

 

संजोये किसीके सपने टूट जायेँ तो,

मन-से किसीके अपने छूट जायेँ तो,

मैं रोता हूँ।

 

आँखों मे चिंगारी हो,

रग-रग में आग हो,

बेसाख्ता हलचल हो,

बस आगे की दौड़-भाग हो,

एसे में किसी को बेफिक्र वापस जाता देखूँ तो,

और किसी गिरे अजनवी को उठाते देखूँ तो,

मैं रोता हूँ।

वजह नहीं पर ऐसा होता रहता है,

करता वही हूँ जो सही मन कहता है,

ऐसेमें कोई मुझे देख मुस्कुराये तो,

और धीरे-से मुझे सही बताये तो,

मैं रोता हूँ।

 

ऐसा कई बार हुआ है,

कि जिससे मिला हूँ उसने मुझे छुआ है।

उस स्पर्ष को लेकर आगे बढ गया हूँ,

तब नहीं कहा,अब अनकहा यह जमा पड़ा है।

कभी उनसे नजरें मिलाऊँ तो,

उन्होने मुझे बनाया है-बतलाऊँ तो,

मैं रोता हूँ।

संशय आशा विश्वास

img_7554मुझसे शुरू होकर

दिगंत तक जो जाता है,

हर बार प्रश्न बनकर जो लौट-लौट आता है,

क्या यह सब एक छलावा है।

या कहीं कुछ इसके भी अलावा है।

 

संशय

 

क्या हूँ, कहाँ हूँ, कौन हँ,

आक्रांत हूँ और मौन हूँ।

क्या इस प्रश्न का उत्तर मेरा देय है।

क्या बँधा हूँ मैं

किन्ही यक्ष प्रश्नों के बंधनों में,

या इस सबसे अलग

मेरे होने का कोई ध्येयहै।

कया होगा

अगर उत्तर मिल भी गया तो।

क्या लगेगा कोई पूर्ण विराम,

या काल के प्रवाह में

यह अद्रिष्य-सा सूक्ष्म कण

रहेगा निन्दित अपने अहम के लिये।

अपने सारे वहमके लिये।

और खुल जायेंगे

मुझे बेधते-मुझे भेदते

नये-नये आयाम।

क्या सचमुच है कहीं कोई पूर्ण विराम।

 

पर प्राण की जो आग है,

मन में जलता जो आलोक है,

और अहर्निष झंझा-सी जो ये चेतना है,

उसका मैं क्या करूँ।

जड़ हो जाऊँ, चुप रहूँ

और समा जाऊँ अपने ही अंदर

कि इस ब्रह्मांड में इतना ही मेरा दावा है।

या इसके भीकुछ अलावा है।

 

 

आशा

 

 

अनन्त-सा इतना बड़ा संसार,

इतने चमत्कार,

इतने सारे अद्भुत व्यापार,

व्यर्थ तो नहीं होग।

सूर का उगना-ढलना,

जीवन चक्र कारुकना-चलना,

इनमें कोई अर्थ तो कहीं होगा।

यदि हाँ- तो सम्भावनाएँ हैं,

विकल्प हैं

आधार है।

तर्क से परे, ज्ञान से अलग

आशा का जो प्रस्फुटन है

मूर्त होता बरवस वह निराकार है।

और इसके बाद

संघर्ष है पर भय नहींहै।

अपने होने पर कोई संशय नहीं है।

धमनियों में बहता लहू उष्ण पर बेचैन नहीं है।

अस्तित्व अपने हीं प्राण की आग में जलता दिन-रैन नहीं है।

सृष्टि सिर्फ मेरी नहीं,

पर इसमें मेरा हिस्सा है।

नहीं अनूठी सबसे लेकिन

मेरा भी एक किस्सा है।

मन सुनता अंतर्मन से आता एक बुलावा है।

हाँ-हाँ, इसके भी कुछ अलावा है।

 

विश्वास

 

समग्र का एक अंग हूँ,

सूक्ष्म-सा तरंग हूँ।

हूँ छोटी-सी वह कोशिका,

चेतना की दुःश्रव्य ध्वनि,

है शृष्टि यह जिससे बनी।

हर गति में,

हर प्रगति में,

अमूर्त में, साकार में,

व्योम के विस्तार में,

संघर्ष में अवकाश में,

और हरेक विकाश में।

मैं हर जगह मौजूद हूँ,

और चेतना के साथ हूँ,

इस संवेदना के साध हूँ,

कि इस रचना का रचयिता हूँ।

जान गया हूँ अब मैं खुद को,

मैं स्वयं ही अपनी अस्मिता हूँ।

 

मत दो दोष मुझे अहंकार का,

पूजक मैं तेरे विस्तार का,

मैं नतमस्तक, मैं श्रद्धामय

मुझमे अनुभूति तेरे आभार का।

 

मुझको मेरी निजता दे दो,

और दे दो अपनी साँसों पर अधिकार,

मुझमें जो सर्जन की क्षमता,

मुझमें जो चिंतन की क्षमता,

मात्र इसे कर लो स्वीकार।

 

मैं जीव हूँ, छाया नहीं,

चलता हूँ, मात्र गया चलाया नहीं।

यह पूरा अनछुआ सच है,

नहीं इसमें कोई दिखावा है।

छलावा जो भी हो,

इतना तो निश्चय ही इसके अलावा है।

गम

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पास आये गम तो

बुरा नहीं  मानना।

आँखें हों  नम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

सूखी आँखों ने जला डाले

ना जाने कितने मंजर,

कभी भींगे जो दामन तो

बुरा नहीं  मानना।

 

उम्रभर चले आगे

साध औरों के होने,

पीछे जो अब लौटें कदम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

सुना है बाँटने से

कम होती नहीं कभी,

फिर भी कभी खुशियाँ लगै कम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

कभी आवाज आये

बहुत दूर से कहीं

और बेसाख्ता मुड़ै कदम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

अपनी सुनी,किया जो चाहा

फिर भी शिकवे बाकी है,

हो अपने से ऐसे अनबन तो

बुरा नहीं  मानना।

 

थमने को और मुड़ने को

बुजदिली कहेंगे बेशक सब,

पर रफ्तार से कभी जो जाओ सहम तो

बुरा नहीं  मानना।