समय

pexels-photo-2613407.jpeg
Photo by sergio souza on Pexels.com

 

समय के साथ चलते-चलते,

प्रवाह के साथ बहते-बहते,

कभी डूबकर, कभी तैरते,

कभी उनींदे, कभी सजग मन,

नापना समय को याद रहा,

पर उसे जानना भूल गया।

 

याद रहे क्षण, प्रहर और पल,

खगोल पिंड गति याद रही,

परंतु यह है क्या, क्यौं हमे मिला,

कभी इसकी चर्चा हुई नहीं।

 

आदि हीन लगता अनंत-सा,

अखण्डित, अक्षुण्ण और निरंतर,

पर ज्ञात नहीं यह चलता हमसे,

या सारी सृष्टि है इस पर निर्भर?

 

है श्रोत कहीं जो इसका उद्गम?

बीत गया तो गया कहाँ यह ?

यह चलता है या हम चलते ?

या दोनो ही हैं भ्रम के प्रत्यय ?

 

या अंतहीन यह किसी वलय-सा,

चिरंतन, काल चक्र आवर्ती?

तो क्या हम बस इस गति के हैं इन्धन,

अभिशापित, अर्थहीन, क्षणव्यापी?

 

नाप तौल की बात करूँ तो,

है क्यौं इतना स्थिति सापेक्ष यह?

कभी रुका-रुका सा लगता,

और कभी विषमगति, वक्र, ह्रासमय।

 

प्रश्न बहुत हैं जिन्हे विज्ञान समझे,

पर मेरी एक भोली जिज्ञासा,

मैं समय के गोद पड़ा हूँ,

या है समय मुट्ठी से पल-पल रिसता-सा?

 

अनादि, अनंत, अखंडित, शाश्वत,

अप्रमेय, सर्वग्राही, सर्वत्र विद्यमान ।

समदर्शी, समस्पर्षी, सुलभ सबको एक समान,

हे देवतुल्य, चिरसखा समय, शाश्वत प्रणाम।

शाश्वत प्रणाम ।

 

 

हर पीड़ा, हर अभिनंदन में

Photo by Simon Berger on Pexels.com

बसे भाव बहुतेरे मन में,

कुछ चिन्हित कुछ स्मरण में,

गोपियों का निर्बाध हो नर्तन,

ज्यों बीच रात में वृंदावन में।

थोड़े-से अज्ञान-बोध के,

स्वीकार ‘बहुत कुछ ज्ञात नहीं है’,

पर इसमें जो तंद्रिल भावुकता,

क्या प्रेम पगा सौगात नहीं है?

कुछ सखा भाव भी मन में अद्भुत,

मार हिलोरें रहते हैं,

सारी दुनियाँ मुझ सा ही सम,

हो परे न कोई कहते हैं।

वय:संधि के भाव विलक्षण,

मन छाते हर क्षण रंग नये,

प्रत्यक्ष खोता अर्थ निरंतर,

जगते रंग स्वप्निल जग के।

एक भाव मात्र सृजन को माने,

तज बंध सकल बस रचने दे।

‘लहर प्राण की कम न होगी,

यदि गढा न कुछ रुधिर दे के।‘

भाव अलग जीवन दर्शन के,

क्यों हम, क्यों यह सृष्टि बनी,

हम हैं कठपुतली इस जग के,

या इसके उद्देश्य हैं हम ही?

यदि मानव शीर्ष कड़ी विकास का,

क्या नहीं उस पर अन्याय हुआ?

कि जिये, रचे और वरे मृत्यु को,

जैसे मात्र अंतिम अध्याय हुआ।

भाव कभी अंतिम नहीं होते,

कभी कहीं नहीं रुकता मन।

आवर्ती आशा और निराशा,

जिज्ञासा इस प्रवाह का ईंधन।

भाव अर्थ, गति, ऊर्जा, गुंजन,

शिखर और आधार जीवन के,

हर्ष, विषाद, लालित्य, मधुरिमा,

और स्पंदन क्षण-क्षण के।

हर पीड़ा, हर अभिनंदन में,

हर जड़ता, हर स्पंदन में।

गोपियों का निर्बाध हो नर्तन,

जैसे बीच रात में वृंदावन में।

कोई मिला नहीं

Photo by Jou00e3o Jesus on Pexels.com

हर बात को हर जगह जाता मुझसे कहा नहीं,

जिक्र अपनी तनहाई का इसलिये मैंने किया नहीं।

हर लड़ाई को जीतने का प्रयास तो बुरा नहीं,

हर वक्त जीतने की प्यास? दोस्तों मुझे पता नहीं।

ख्वाब तो हैं जीने से मुहब्बत करने की अदा,

जो जगना अपने ख्वाब से लगे कभी बुरा नहीं।

दावा यह नहीं कि झुकाया ही नहीं कभी मैंने,

अपने ही आगे शर्म से सर कभी झुका नहीं।

सिर्फ अपनी ही नहीं, हर एक की अजीज थी यारों,

मजबूरी जैसी भी रही, थी जिंदगी बद्दुआ नहीं।

मैं नहीं कहता कि मुश्किलें कमतर थी मेरी,

जिन्दगी के गमों को, किसीने कम सहा नहीं।

बातें साफगोई की मैं भी अक्सर किया करता हूँ,

उलझा अपने से अधिक, मुझको कोई मिला नहीं।

आसमान पर लकीरें मैंने भी खींची हैं बहुत

कभी उन लकीरों से बन पाया मेरा चेहरा नहीं।

भटका तलाश में सबसे बड़े मुद्दे की हर तरफ ,

दिल में गैरों के लिये प्यार से बड़ा मुद्दआ नहीं।

लोग बदहवास हैं कि कोई फूलों से इश्क करता है,

खूबसूरती का सजदा करना, इतनी बड़ी खता नहीं।

या दोनो ही

Photo by sergio souza on Pexels.com

सुबह सवेरे उठकर सूरज,

बातें करता मुझसे हँस कर,

लगता कभी समझ पाता हूँ,

कभी संशय से जाता मैं भर।

छू कर उसने क्या बात कही?

‘उपहार तुम्हारा नव प्रभात यह,

संचित मधुर स्वप्नों का संग्रह।‘

या

‘जब समर प्रतीक्षा में हो तेरे,

नहीं शोभते आलस्य, अंधेरे।‘

या दोनों ही?

मंद-मंद सुरभित बयार,

ले कर मुझे सपनों के द्वार,

चेतना को करती भ्रमित,

कभी नि:शब्द, कभी पुकार;

क्या ध्वनि मेरे कानों में देती?

‘हो भार मुक्त, तुम तैरो-उतराओ,

तोड़ बंध सकल, स्वछंद हो जाओ।‘

या

‘संग चल, अभी बहुत दूर जाना है,

संजीवनी क्षितिज पार से लाना है।‘

या दोनों ही।

सावन की रिमझिम फुहारें,

गीली होती मन की दीवारें,

मिट्टी से उठती आदिम खुशबू,

क्या रचे नया, क्या-क्या सँवारे;

मुझे भिंगा क्या बता गयी?

‘रंग विलक्षण सारे जीवन में,

जी, हर शब्द, गंध भर मन में।‘

या,

‘है मिटटी की महक हमें बुलाती,

एक मरु की तो उर्वर कर छाती।‘

या दोनों ही।

घनघोर अंधेरा मन समेट कर,

तारों के प्रकाश, संकेत भेज कर,

बांध रहस्य, रोमांच के तंतु में,

जड़-चेतन को संग सहेज कर,

जिज्ञासा कुछ पूछने लगी।

‘अर्थ जीवन का या पोषण पहले,

महिमा, गरिमा या यौवन पहले।‘

या

‘मृदुलता का त्याग बल के लिये,

माया है जीना सिर्फ कल के लिये।‘

या दोनों ही।

जीवन निश्चय बहुआयामी,

सदा समन्वय, सदा दोनो ही।

जिन्दगी

Photo by Nacho Juu00e1rez on Pexels.com

राहों की, गुजरगाह की, हर रहगुजर की,

वह शिकायत भी क्या जो हो उम्र भर की।

खफा ख्वाब से, खयाल से और जिन्दगी से,

कोई मंजिल कभी क्या होगी ऐसे सफर की।

अंधेरा अगर है गहरा तो जरूरी कि बातें हों,

सिर्फ हौसले की, ना इधर की ना उधर की।

किस काम का वो आलम बेखयाली का यारों,

जिसमें राह कोई पूछे बस अपने ही घर की।

दिल ढूँढता है कैफियत अगले पड़ाव का, पर

जेहन याद है दिलाता, बातें पिछले सफर की।

कुछ तो हो जिसे तुम मानो और मैं भी मानूँ,

जहाँ पर फर्क नहीं हो कोई, तेरी-मेरी नजर की।

वादा तो बस इतना, चाहता हूँ हर किसी से,

यकीन न डगमगाये, चाहे दुनियाँ लगे बिखरती।

अरमान कुछ बचे नहीं, पर जीने की आरजू है,

ये भी रंगे-जिंदगी है कि हरदम कम है पड़ती।

क्षितिज के पार

Photo by Samir Jammal on Pexels.com

ले मुझे क्षितिज के पार चलो,

सखा, मान इसे उपकार चलो,

पर चलो, क्षितिज के पार चलो।

विवेक असंकुचित, चित्त उदार हों,

उन्मुक्त गगन हो, खुले द्वार हों,

नीतियाँ सांझी, न्याय सुलभ हो,

मनुज भेद-हीन एक प्रकार हों।

चेतना सामूहिक और विशाल हो,

शीष हों उन्नत, प्रशस्त भाल हों,

जिज्ञासा, ज्ञान और अन्वेषण,

मौलिक संचालक, प्रत्येक काल हों।

होगा कहीं तो यह संसार, चलो।

ले मुझे क्षितिज के पार चलो।

जहाँ ज्ञान मुक्त, स्नेह मुक्त हो,

आत्मा सबकी सदेह मुक्त हो,

कलुष धुले नयनो के जल से,

मानवता सरल, संदेह मुक्त हो।

धर्म करे समता को धारण,

एक दूसरे के सम्मान का वरण,

गणना महत्व और लघुता के किंचित,

दूषित कर पाये न आचरण।

सदा हो मर्यादित व्यवहार, चलो।

ले मुझे क्षितिज के पार चलो।

दृष्टि किसीकी हमें ना तौले,

बरबस आवरण कभी ना खोले,

वाणी मात्र संवेदना का वाहक,

आघात, आक्षेप में कोई ना बोले।

बहे जो आँसू, मुझको रोने दे,

मैं जिस करवट चाहूँ सोने दे,

नियम जग के सब स्वीकार्य मुझे,

बस अपने जैसा मुझको होने दे।

बिताऊँ प्रहर वहाँ दो-चार, चलो।

ले मुझे क्षितिज के पार चलो।

गोधूलि की रक्तिम बेला में,

जिज्ञासा में नहीं अकेला मैं,

क्या है उद्देश्य जीवन का कोई,

या भीड़ मात्र और मेला मै?

उत्तर मुझे मिले न मिले,

दो कदम तो हम उस ओर चलें,

जीवन की मौलिक जिज्ञासा को,

इतना सम्मान तो दे हम लें।

करने यह सपना साकार, चलो।

ले मुझे क्षितिज के पार चलो।

सर्जन के हर प्रयास तुम्हीं से,

नव निर्माण का विश्वास तुम्हीं से,

सखा, वेदना सारी झेल मैं लूंगा,

होऊँ समर्थ यह आस तुम्हीं से।

माना ब्रह्मांड का भार है तुम पर,

सकल सृष्टी व्यापार है तुम पर,

सखा, सविनय एक निवेदन तुमसे,

कि धन्य होऊँ मैं यह जीवन जी कर।

रख कुछ मेरे कंधों पर भार, चलो।

ले मुझे क्षितिज के पार चलो।

मेरा अकेलापन

Photo by Maria Orlova on Pexels.com

यूँ तो बहुत सारी बातें करता है,

मेरा अकेलापन मुझसे,

पर कभी-कभी चुपचाप बैठ जाता है,

धीरे से आकर मेरे बगल में।

हम घंटों बैठे रहते हैं,

ऐसे ही चुपचाप,

न उसे ऊब होती है,

न मुझे ग्लानि या पश्चाताप।

कोई ललक नहीं बहुत करीब होने की,

हम आराम से अगल बगल बैठते हैं,

और कोई परहेज नहीं एक-दूसरे से,

तो कभी-कभी हमारे कंधे छू लेते हैं,

ये छुअन हमदोनों को,

थोड़ा और बेफिक्र कर देती हैं,

एक अपनापन भरे तसल्ली से भर देती हैं।

कुछ कहती नहीं,

पर हम दोनो को और करीब कर देती हैं।

मेरे बहुत सारे चाहनेवाले,

कई बार, उसमें और मुझमें,

फर्क नहीं कर पाते हैं।

मेरी जगह उससे ही बातें कर जाते हैं।

मुझे अच्छा ही लगता है,

कि चलो, मेरे अकेलेपन को मिला कोई,

दो बातें करने वाला।

खुशी यह जान कर भी होती है,

मेरा खैरख्वाह उसे थोड़ा खोया-खोया पाता है,

और ढेर सारा प्यार लुटाता जाता है।

सच कहूँ तो बड़ी खुशी होती जब भी,

ऐसा होता नजर आता है।

गफलत से भी मिले तो,

प्यार किसे नहीं भाता है।

हम सूनी राहों पर चलते,

और भीड़ से गुजरते,

साथ-साथ ही रहते हैं,

पर जब भी कभी उससे दूर हो कर,

औरों में उलझ जाता हूँ,

वह एक कोने में छुप कर,

तब तक करता है इंतजार,

जबतक मैं फिर से बुला ना लूँ एकबार।

पर ऐसे में भी वह कभी,

मुझ से नाराज नहीं होता,

बल्कि मुस्कुरा कर कहता है,

मैं समझता हूँ यार।

नहीं, वह मेरी परछाई नहीं है,

क्योंकि घुप्प अंधेरे में भी,

वह मेरे साथ होता है,

और रौशनी के बदलने पर,

अपना कद नहीं बदलता है।

बड़े सुकून की बात है कि,

दोनों में से किसीकी भी कोई मजबूरी नहीं है।

हम दोनों के होने के लिये,

कुछ भी और जरूरी नहीं है।

कुछ लोग मुझसे,

इसकी वजह से खफा हो जाते हैं,

अगर समझाऊँ तो,

नाराज अक्सरहा हो जाते हैं।

पर मुझे ये बातें चुभती नहीं,

इन्हें हँसकर टाल सकता हूँ।

बस मुस्कुराता हूँ,

और अपने इस हमसफर का खयाल रखता हूँ।

क्यों कि मैं जानता हूँ

अकेलापन बीच की नहीं,

घर की दीवार है,

सूनेपन की जलन नहीं,

मन में बसा प्यार है।

मुझसे होती मेरी पहचान है,

हर जुनून में मेरा निगहबान है।

नामुमकिन की हद तक सच्चा है,

मेरे मन में पलता हुआ बच्चा है।

हर पल का हमसफर है,

मेरी भटकती राहों का रहबर है।

मुझे मेरे सफर में कभी रोकता नहीं है,

अपने मन की करूँ तो टोकता नहीं है।

सही इरादों से कभी दूर नहीं करता है,

डर कर समझौता करने को मजबूर नहीं करता है।

नदी और हम

Photo by Quang Nguyen Vinh on Pexels.com

उनके लिये सब कुछ बदल जाने के पहले,

उनके सागर में समाने से पहले,

कहा नदी ने, अपनी बूंदों से,

शेष हो रहा है एक खण्ड काल का,

भृकुटी बदल रही है समय के भाल का,

परंतु, अपना रूप और आकार खोने पर

कभी नहीं रोना,

और अपना अस्तित्व, अपना इतिहास

कभी मत खोना।

यह एक प्रवाह है,

निरंतरता का निर्वाह है,

            यहाँ कुछ भी समाप्त नहीं होता;

परिवर्तन का स्वागत कर,

उत्सव मना कि जिया जी भर,

पाये को छोड़े बिन, नया कुछ प्राप्त नहीं होता।

जिन राहों से तुम गुजरे हो,

जहाँ चले और जहाँ ठहरे हो,

          है उन सब की स्मृति तेरे मन में;

ध्यान जिनका भी तेरे प्रवाह ने खींचा,

जिन पौधों को तुमने सींचा,

            है सबकी उपस्थिति तेरे मन में।

सुगंध-सुवास उन सब रातों का,

रहस्य-रोमांच उन सब बातों का,

                    तेरे ही हैं, बस तेरे हैं;

वह राग भोर के, दुपहर की चुप्पी,

साँझ की नटखट लूका-छुपी,

               तेरे, जिये हर साँझ-सवेरे हैं।

दौड़ समय का, जीवन स्पंदन,

ऋतु परिवर्तन, प्रकृति का नर्तन,

             प्रकाश पुंज और टिमटिम तारे;

हरित पत्र पर मधुर-सी फिसलन,

भीषण प्रपातों का भयावह गर्जन,

             सदा रहेंगे बस तेरी निधि सारे।

छुआ जिसे वह हर कण तेरा,

जिया जो तुमने, हर क्षण तेरा,

                  तेरा, तेरे हर रंग रूप में;

तुम ही साधक, तुम ही चिंतन,

तुम अध्येता, तुम ही अध्ययन,

              हर सौंदर्य में, और विद्रूप में।

आशंकित, चिंतित खड़ा पार्श्व में,

सुन संवाद, था अविश्वास में,

              यह क्या कुछ मुझे नदी ने कह दिया?

सागर में समा जाना स्वत:,

है नियति हर बूंद की अंतत:,

                         फिर भी हर बूंद ने जीवन जिया।

नदी संघर्ष रत मानव जाति,

और हम मानव बूंद की भाँति,

                वह कहती वत्स – तुम अक्षय हो;

जन्म संयोग, मृत्यु है नियति,

पर अंत के निश्चित होने पर भी,

              जिजीविषा अक्षुण्ण, जीवन की जय हो।

कोई व्यापक उद्देश्य, या मात्र यंत्रवत,

हम चेतन कर्ता, या भवितव्य नियत,

                           प्रश्न नहीं यह भी आधारभूत है;

जन्म और मृत्यु के बीच का सारा,

समय, चेतना, आकाश हमारा,

                           छोटी नहीं, यह निधि अकूत है।

यदि नियति सृष्टी निर्धारित, तब भी,

रहे जो हम अपने जीवन जी,

                      उसके कारक और रचयिता हम हैं;

दी विधि ने इतनी स्वतंत्रता,

दैवत्व का एक निजी हिस्सा,

                   कि अपने ब्रह्मांड के नियंता हम हैं।

अपनी ही छवि

Photo by Johannes Plenio on Pexels.com

कुशल क्षेम पूछता हूँ प्रियवर,

कहो सखा, सकुशल तो हो ?

बहुत दिन हुए देखे तुमको,

पहले-से ही निर्मल तो हो?

तेरी सुध मैं ले नहीं पाया,

ना ही तुमने मुझको टोका,

लगता है किसी असमंजस में,

दोनों ही ने खुद को रोका।

इस बीच लगा, मैं व्यस्त रहा,

कई महत्वपूर्ण प्रयोजन में,

तंद्रा टूटी, तो भान हुआ,

था खड़ा अकेला आंगन में।

सब चले गये अपने-अपने घर,

इसका जरा भी रोष नहीं,

व्यथा मात्र इस बात की है कि,

मैं खोया विवेक, निर्दोष नहीं।

समझ रहा था जगहित जिसको,

जब उसमें मुझको खोट मिली,

साहस विरोध का नहीं कर पाया,

सहा, मन पर जो चोट मिली।

कुछ अनुचित देख कर भी,

प्रतिवाद को तैय्यार नहीं,

कई बार हो चुका है ऐसा,

निश्चय, यह पहली बार नहीं।

किन भावों के कारण मन,

झुक, ऐसे समझौते करता है?

कल की अनिश्चिता से या कि,

बीते के अनुभव से डरता है?

उत्तर अबतक मिला नहीं है,

और शायद बाहर मिले नहीं,

जीवन मेरा, मन भी मेरा,

तो समाधान भी मुझसे ही।

मित्र, मेरी करुण वेदना,

कहीं कर ना दे कातर तुझको,

मिल कर कुछ और बताऊंगा,

अभी इसी को इति समझो।

बस इतना और कहे बिना,

पूरी होगी यह बात नहीं,

शस्त्र अभी धरे नहीं मैंने,

रण छोड़ना मुझको ज्ञात नहीं।

कभी-कभी उलझ जाता हूँ,

जैसा हूँ मैं, वैसा क्यूँ हूँ?

गुरु द्रोण नहीं, गांडीव नहीं,

अर्जुन नहीं, अभिमन्यू हूँ।

कर्तव्य बोध सदा आता है,

चिंतन और मनन से ऊपर,

पर सत्य और न्याय से निष्ठा,

रहे सदा प्राणों में बसकर।

रत कर्मों में, शुद्ध विवेक से,

निर्णय अपने लेता हूँ,

यदि हार गया, या छला गया,

क्षण भर रुक, चल देता हूँ।

चलो, व्यस्त हूँ, पर जल्दी ही,

तुझसे मिलने आऊंगा,

आशा है मित्र, बाहें पसारे,

तुम्हें अपने मन में पाऊंगा।

तुम्हें देखने की इच्छा है,

पूरी जल्दी ही कर लूंगा,

धो कलुष समग्र, मन-दर्पण में,

अपनी ही छवि अवलोकूंगा।

मनोरथ

Photo by Kaique Rocha on Pexels.com

जीवन रथ था गुजर रहा,

सुगम मार्ग पर समगति सरपट,

रोमांच वेग का,

मन धवल श्वेत था,

था बल सुलभ मन चंचल, नटखट।

पर भोलेपन को प्यार चाहिये,

संरक्षण, स्वीकार चाहिये,

बीते कल के ऋण से मुक्ति,

भविष्य भय से उद्धार चाहिये,

योग क्षेम को अर्थ और ऊर्जा,

विस्त्रित सबल आधार चाहिये।

इन साध्यों के अर्जन में लग,

निर्माण में उस आधार के सजग,

निष्ठा रत था, जान न पाया,

मूल्य चुकाया कैसे और कब,

नये भाव मन में प्रविष्ट हो,

नयी इच्छाओं का कर रहे थे उद्भव।

बनने लगे उद्देश्य नये,

नये कथानक, रहस्य नये,

उचित लगे संचित निधियों का,

बने लक्ष्य, परिदृश्य नये,

नये मनोरथ मन को भाये,

आँखों में पनपे भविष्य नये।

मनोरथ इच्छा-शक्ति प्रणेता,

विचारों को गति और ऊर्जा देता,

पर यह जीवंत, पुष्पित रहने को,

माया की माटी, आकांक्षा जल लेता,

होगा पंक, हों माटी और जल तो,

यह पंक गढ नया अवयव एक देता।

मनोरथ, जीवन में पंक-सा उपजे,

अंकुरण और भू हरित-श्यामल दे,

पर मूल्य चुकाने समरसता का,

थोड़ा ऋण लेता मन चंचल से,

अब भी गति, पर रथ का पहिया,

जा फँसता, मनोरथ के दलदल में।

मन के पंक में फँसता जीवन रथ,

शाश्वत द्वन्द्व है इस संसार का,

जीवन गति का, आदर्श की क्षति का,

आकार, अस्तित्व और निर्विकार का,

हो भिन्न-भिन्न रूपों में उजागर,

रचे समन्वय विचार और व्यवहार का।

जीवन रथ है गुजर रहा,

कठिन मार्ग पर रुक, सम्हाल कर,

बुद्धि, विवेक रत,

चित्त स्थिर, शीष उन्नत,

हर पंक से जूझ, रथ निकाल कर।

पहले

Photo by Karolina Grabowska on Pexels.com

दिल के दर्द का एहसास था मुझे, मगर और भी थीं कुछ मुश्किलें,

भरना तो ठीक था आँखों का, बस रुकना था उन्हें छलकने के पहले।

नसों में, लहू में, सीने में और हर्फों मे, शोलों की बातें सबों ने की,

आग तो अच्छी थी वाकई, उनके के अपने घरों में दहकने के पहले।

इन्किलाब की बातें अच्छी किसे नहीं लगती, बंद कमरों के अंदर,

कदम लड़खड़ाते हैं अक्सर, लहू-लुहान गलियों में भटकने के पहले।

अंधेरों से डरते तो रातें गुजरती, किसी कोने में आँखों को मीचे,

तलाशी रौशनी, और स्याह रातों में भी मेरे सब सपने थे रुपहले।

सुन पाओ तो पत्थरों में भी होती है धड़कन, धड़कना बड़ी बात नहीं,

धड़कना उम्र भर और लम्बा सफर है, सोच लो तुम धड़कने के पहले।

कल के कंधों पर चढ कर ही, हम हैं आज पहुँच पाये यहाँ तक,

खामोश परिंदों ने कुछ यूँ कहा खुद से, सुबह में चहकने के पहले।

कितना कुछ कहना रह गया, कितने हैं बाकी शुक्रिया अदा करने को,

मेरी रूह ने हर बार कहा, इन्सानियत के सजदे में सिमटने के पहले।