
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर चलना,
कभी-कभी लड़खड़ाना,
पर झट से सम्हलना,
साथ चलते-चलते तुम्हें अपना मान लेना,
शुरुआती झिझक को पीछे छोड़,
तुम्हें अपनी आखिरी पहचान देना;
यह अब तक के सफर का एक दिलचस्प हासिल है,
कि पाँव के नीचे पक्की जमीन है,
और आँखों में सपनों की तिलस्मी झिलमिल है ।
बिना कोई भय पैदा किये,
समय अब मुझ से हो कर बह रहा है ।
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यह मैं नहीं कहता,
मेरा जीवन मुझसे कह रहा है ।
तुझे जानने में न जाने कितने वसंत गये हैं,
कितनी शुरुआतें आती रही हैं,
बीत कितने ही अंत गये हैं,
हर बार लगा कि कहीं कोई चूक हो गयी है,
हर बार नये सिरे से लगा,
क्या गलत, क्या सही है,
हर बार अपने आप को समझाता रहा हूँ,
कि मैं तुम्हें समझने और करीब,
आता रहा हूँ,
हर बार सवाल उठते रहे,
हर बार मिलता जवाब उसी जगह रहा है ।
मेरा जीवन मुझसे कह रहा है ।
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तुझे कंधों पर बोझ की तरह ढोना,
क्या जीना होता ?
तुम से डर के जीना,
मुझसे कभी ना होता,
तुझसे मुझे प्यार है,
ऐसा भी नहीं कह सकता,
पर इतना जान गया हूँ तुम्हें,
कि तुझे कहता हूँ अपना आखिरी पता ।
अवसान,
अब समाप्ति का बोध असहज नहीं करता;
कुछ बचा रह गया,
स्वीकारता हूँ, हाँ, ऐसा हुआ,
पर सब कुछ छूट जायेगा,
इस बात से मन नहीं डरता ।
तुम्हारे साथ यह सफर,
बेहद खूबसूरती से निबह रहा है ।
यह मैं नहीं कहता,
मेरा जीवन मुझसे कह रहा है ।
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