ओस की बूंद

Photo by NEOSiAM 2021 on Pexels.com

ओस की बूँदों नें,

घास की झुकी नोकों से उतरते हुए,

अपना सफर खत्म करते हुए,

जड़ों में समाने से पहले,

आखिरी बार अपनी तरलता

महसूस कर पाने से पहले,

कहा, बहुत कुछ करता याद,

चलो इतने लम्बे सफ़र के बाद,

एक चक्र पूरा हुआ।

बस शुरू होने को एक नया।

मिट्टी के कणों में समाहित,

मिट्टी का ही अंश,

नहीं अलग से परिभाषित,

अंधकार ही जिसका संसार था,

किसी और में विलीन जिसका आकार था,

मात्र होना था, होने का ज्ञान नहीं था,

ना अस्तित्व,

ना ही इसकी सम्भावनाओं का कोई विचार था।

कुछ ज्ञात नहीं,

पर कुछ हुआ कहीं,

एक सूक्ष्म स्पंदन का संचार हुआ,

एक गति, एक दिशा और एक उद्देश्य

अकस्मात साकार हुआ।

भले अत्यंत जटिल थी राहें,

थी शक्ति कोई जो ले चलती थी,

बहती सूक्ष्म रंध्रों में थी,

किसीके प्राणों में वह पलती थी।

इस होने में एक बंधन था,

और उस बंधन में भी सुख था,

खुशी बहुत, कि कारण है किसी जीवन का,

पर गहरे कहीं कुछ था जो अब भी विमुख था।

मोह बंधन का चुक जाता है,

कुछ दूर चलकर रुक जाता है,

सम्मोहन खुलकर जी पाने का,

दुस्सह फिर भी मन भाता है।

अंत:स्थल के रंध्रों से चलकर,

निकल आना हरे मृदुल सतहों पर,

बोध था उन्मुक्ति का नया-नया,

नये भावों एक नया संसार मुखर।

पवन का हिंडोला, सूर्य के किरणों की छुअन,

कभी मृदुल पोषण, कभी अस्तित्व को जूझता जीवन,

था कृतकृत्य मन, थोड़ा असहज, पर पुलक भरा;

पर अब लगी लुभाने क्षितिज की सीमाएँ हर क्षण।

फिर एक दिन चाहे-अनचाहे,

पवन के कंधों पर, किरणो के संग,

उड़ चला, ऊपर, बहुत ऊपर,

लिये नया रूप, जैसे एक उन्मुक्त तरंग।

क्षितिज को देखा, उस के पार देखा,

घूमा अनंत में बिन लेखा-जोखा,

चाह हुई हर पूरी,

पर विस्मय,

उसे अपनी ही भारहीनता ने टोका।

बहुत हुआ बिन उद्देश्य घूमना,

ढूँढ प्रयोजन अब कोई अपना,

शेष जीवन यदि इसी गति चला तो,

क्या होगा उचित इसे जीवन कहना?

कहाँ-कहाँ उड़ता फिरा,

ज्ञात नहीं, पर फिर कुछ ऐसा लगा,

चाह रहा वह अपने भार का अनुभव,

और शनै:-शनै: विस्तार संघनित होने लगा।

आभास कर एक वांछित दबाव,

जैसे नया अर्थ कोई, नया एक भाव,

स्पर्श पाकर तृण के कोमल कोपल का,

बूंद बन ठहर गयी वहीं,

और घास थोड़ा झुकी उसके प्रभाव।

पूरा हुआ एक चक्र जीवन का ।

अर्थ हीन या बहुत गूढ है,

प्रश्न शेष यह शंकित मन का।

दिशा

Photo by Joshua Welch on Pexels.com

चाहे जैसे भी बंधन हों,

जैसी भी हो पराधीनता,

अंतत:, अपनी दिशा चुनने का अधिकार,

हमसे कोई नहीं छीनता।

हम चाहे जो भी कथा गढें,

अपनी वेदना पर चाहे जितनी भी महिमा मढें

हर कल पर आज की छाया है,

जो बोया था कभी, फल उसी का पाया है।

दिशा को चुनने का विकल्प,

होता है मात्र दिशा हीनता।

पहला बंधन, पर जीवन;

दूसरा अर्थहीन और निष्कृय स्वाधीनता।

जो भी पास नहीं होता,

मन उसी में आकर्षण पाता है।

पर चुन सकने का अधिकार तज कर,

मनुष्य जी पाने की संभावना ही हार जाता है।

उद्देश्य जीवन का कहाँ,

ढूढते रहते हैं जीवन की परीधि पर,

उसके मिलने के अवसर जबकि,

होते हैं जीवन में हर पल के अंदर।

हर बार मना लेता है

Photo by Pixabay on Pexels.com

जंग जिन्दगी का मुझसे माँग क्या-क्या लेता है,

एक मेरा दिल है कि मुझे हर बार मना लेता है।

सिर्फ जख्म ही नहीं मरहम भी दिये हैं इसने,

मना करता रहूँ फिर भी हाथों से लगा देता है।

एक मैं हूँ कि दुनियाँ से अदावत किये बैठा हूँ,

एक वो है कि किसीसे भी अपनापन जता लेता है।

सहमा-सहमा-सा मैं मुड़ के  लौट जाऊँ कहीं से,

इससे पहले ही कदम अपना वो आगे बढा लेता है।

मायूस न हो जाऊँ देख उसकी आँखों में आँसू मैं,

जब भी रोता है तो अपना चेहरा छुपा लेता है।

जब भी पनाह आँखों में नींद को नहीं मिलती है,

चुपके से उन्हें अपने घर का पता बता देता है।

मैं चूक भी जाऊँ तो कोई रंज नहीं होता उसको,

बड़े खयाल से मेरे गुनाह आगोश में छुपा लेता है।

अपने सपनों से डर के जब भी जगता हूँ अंधेरों में,

फेर हाथ सर पे मेरे अपनी बाहों में सुला लेता है।

जब भी भूलता हूँ किसी दर्द से अपने रिश्ते को,

उस दर्द का हासिल मुझे सिलसिलेवार बता देता है।

है बड़ी छोटी-सी चीज अदावत कर लेना यारों,

बड़े मुहब्बत से मुझे हर बार ये समझा लेता है।

मुकम्मल होने की जद्दोजहद में मुझको पा कर,

मुस्कुरा के मेरी कोशिश को मुकम्मल बना देता है।

मेरी खुशियों में शरीक हुए हैं कई हमसफर यूँ तो,

एक यही है कि गम में भी चार चांद लगा देता है।

आरजू यही कि वह रूठे नहीं मुझसे कभी भी,

जब वो रूठता है तो मुझे अजनबी बना देता है।

हे बोधातीत

Photo by Ben Mack on Pexels.com

एक मैं हूँ जो भूलता रहता हूँ,

और एक तुम हो जो बस मुस्कुराते रहते हो;

इस ओर मैं कुछ नहीं कहता,

उस ओर तुम मेरा कुछ भी सुनने आते रहते हो;

मैं अनायास ही भटकता हूँ,

तुम उतनी ही तत्परता से प्रकाश दिखाते रहते हो;

मेरी उच्छृंखलताएँ जो किसी को नहीं भातीं,

कितनी सहजता से सहते हो।

मुझे वास्तविक विस्मय किंतु इस पर होता है,

कि तुम मुझे कुछ भूलने से भी नहीं रोकते हो;

असमय चुप रहने की उदंडता करता हूँ,

तुम कभी नहीं टोकते हो;

मेरे भटकने को भी सहज स्वीकारते हो,

आश्चर्य कि इतने सहिष्णु कैसे हो सके हो?

सीमाओं को छू पाने की मेरी लालसा,

मेरी धृष्टता को बढाये चली जाती है;

पर हर बार तुम्हारी क्षमा,

मेरे अपराध से बड़ी हो जाती है।

बंधनों को तोड़ने के हठ ने,

कई बार तुम्हारे विधान का अतिक्रमण किया है;

कभी नियमों अर्थ बदल,

कभी सुझा कर नये हल,

तुमने मेरे चित्त के उद्वेग का शमन किया है।

सृजन को मान अपना अधिकार,

प्रमाद में,

मैंने विध्वंस का भी निर्माण किया है;

कितने वत्सल भाव से तुमने उन्हें भी,

अंगीकार कर,

उन्हें एक नया नाम दिया है।

एक मैं हूँ, जो अधिकार दिखाने से,

कभी चूकता नही हूँ;

एक तुम हो कि उपकार कर पाने में,

कभी रुकते नहीं हो।

अब तक ऐसा कुछ भी घटित नहीं,

जिसमें मैं तुझे पहचान नहीं पाया हूँ;

लज्जित हूँ, पर सत्य है कि,

तुम कौन हो जान नहीं पाया हूँ।

सच कहूँ मेरे सबसे बड़े धन्यता के हैं,

वह कुछेक क्षण;

जब मैं मान लेता हूँ कि तुम हो ही नहीं,

और तुमने मेरे इस अहंकार को स्वीकार कर,

पूरा इतिहास भुला कर,

दिया है मुझे अकलुष नवजीवन।

जीवन के कुछ परिचय

Photo by Lucas Pezeta on Pexels.com

जो पाँवों के नीचे होता है,

वही आधार होता है;

भ्रम में मत रहो,

सर के ऊपर तो भार होता है।

आँखें चाहे जितना भी समा ले अपने में,

मन के अंदर ही बसा हुआ,

जीवन का पूरा विस्तार होता है।

किसी तक चल कर जाना,

किसी को छू कर,

दोनों के होने का एहसास दिलाना,

आँखों से कुछ कह पाना,

और साँसों की समता में,

चेतना का साक्षात लय पाना;

ये ही कुछ जीवन के परिचय हैं;

शेष कवच, कुंडल,

महिमा मंडल,

और आवरण में खुद को,

छिपाने के निर्णय हैं।

हाथों से छू पाना,

जैसे कि सचमुच जान जाना,

सबसे अधिक जीवंत अनुभूति, स्पर्श होता है;

मूर्त-अमूर्त का मिलन,

जैसे क्षितिज पर मिलते धरती गगन,

पहुँच पाना ऐसी जगह,

जहाँ संवेदना को आकार मिलता है,

निराकार और प्रत्यक्ष का संघर्ष होता है।

आगे बढते कदम,

कभी तेज-तेज, कभी हिचकिचाते;

त्याग सारी शंकाओं को,

पथ के काँटो की चुभन को झुठलाते;

कभी अहंकार छोड़,

और कभी तोड़ संयम के बंधन को,

जब पहुँचते हैं किसी तक;

अर्थ देते हैं जीवन को,

बस अपने में ही हो कर,

जियो मत निरर्थक।

गति ही तो चेतना का प्रमाण है;

अन्यथा समय तो उन जगहों पर भी गुजरता ही है,

जहाँ सबकुछ जड़ है, गतिहीन पाषाण है।

साँसें कभी सम, कभी मध्यम,

कभी बहुत ही गहरी,

हर रूप में लय से भरी,

प्राण की सहचरी;

कोई आमंत्रण नहीं, तिरस्कार नहीं,

अनवरत चलती, कभी थकती एकबार नहीं,

जीवन की पहली लय,

जीवन के आखिरी छंद;

साँसें एकसूत्रता के परिचायक,

समता के वाहक और स्वच्छंद।

पलकें उठी हों तो दूर तक दिखाई देता है,

पर ऐसे में सिर्फ देखना होता है,

जैसे सब कुछ समेट लेना अपने अंदर;

कोई वाद नहीं, विवाद नहीं,

कोई तर्क नहीं,

बस एक सुख है निहारना, वर्तमान को जी भर;

झुकी हों, तो कम दिखता है,

पर देखने से अधिक कहती हैं;

जैसे एक जुड़ाव हो,

हर देखने में एक भाव हो,

भावनाएँ जो कहीं पहुँचे ना पहुँचे,

आँखों से बहती हैं,

पलकें जब बंद होती हैं,

सब कुछ समेट लेती हैं,

कुछ भी कहीं बदलता नहीं,

कुछ भी रुकता या चलता नहीं,

निस्पृह संवेदना,

कि सारी सृष्टि को यूँ हीं छोड़ देती हैं,

फिर भी सहजता से उसे हमसे जोड़ देती हैं।

बस इतना ही

Photo by Philip Ackermann on Pexels.com

सारी बाधाओं को पार कर,

मन को असंख्य दुविधाओं से उबार कर,

कदम दर कदम चढते ऊपर,

सामर्थ्य की अंतिम सीमाओं का स्पर्श कर,

बार-बार मन में आ कौंधती विरक्ति से संघर्ष कर,

शिखर पर खड़े हो कर,

जैसे ही जीवन सार्थक लगने लगता है,

और धन्यता का भाव चित्त में जगने लगता है,

एक अमूर्त जिज्ञासा सर उठाती है,

क्षण भर में सम्पूर्ण अस्तित्व को है झकझोर जाती है,

क्या यही है हासिल,

बस इतना ही?

हवा यहाँ निर्मल है,

पर थोड़ी विरल है,

उनमें शीतलता तो है,

पर साँसों में लगता अधिक बल है।

क्या गणणा कहीं छली गयी है?

चित्त की सहजता कहीं चली गयी है।

क्या और मूल्य चुकाना बाकी है अभी?

या बस इतना ही।

दृश्य मनोरम, स्वच्छ, धवल है,

हृदय धन्य है, पर तनिक विकल है,

क्या यह नियति का उपहास मुखर है,

कि जो कुछ भी दिखता सुन्दर है,

या तो छूट गया नीचे है

या फिर दिखता बहुत ऊपर है।

हासिल क्या, दूर है दिखती अपनी घाटी?

बस इतना ही।

चांद यहाँ से भी है दिखता,

पहले सा ही मगरूर,

और आकाश अभी भी है उतना ही दूर,

पास क्या है,

एक निजी कहानी और बहुत सारा अकेलापन है,

तीखी ढलानें हैं, गति पर बंधन है,

सिर्फ दिल में ही नहीं,

कदमों में भी एक कमजोरी-सी जगी है,

बहुत गहराई से अपनों की दुआ-बंदगी याद आने लगी है,

भ्रम में हूँ, क्या ऐसी नियति थी चाही?

बस इतना ही।

खड़े होकर उस तुंग शिखर पर,

चारों ओर फैलाते नजर,

सारा मान तिरोहित हो जाता है,

अब तक का सारा ज्ञान तिरोहित हो जाता है,

जहाँ तक आँखें देख पाती हैं,

अनगिनत शिखरों का समूह नजर आता है,

यह तो बस एक है,

ऐसे कितने ही शिखर और भी हैं,

जिसे आखिरी कह सकें,

ऐसा शिखर कोई नहीं है।

लघुता की यह टीस फिर कभी छूट नहीं पाती।

बस इतना ही।

कर संधान शिखर,

वहीं का होकर,

बीते की दीप्ति में चमकना यदि उद्देश्य न हो,

तो कदम थमे नहीं रह सकते,

मन मान न सकता किसी भी बंधन को,

यहाँ बहुत हैं क्षद्म, विपर्यय,

अद्भुत-सा एक छलना है,

यहाँ से आगे चलने का मतलब,

सिर्फ नीचे उतरना है।

अर्थ बहुत ही व्यापक है, है हार जीत की जायी।

बस इतना ही।

नत होता मन

Photo by Ylanite Koppens on Pexels.com

चेतना का सहज विस्तार दिखे तो,

हृदय चिर कृतज्ञ, उदार दिखे तो,

स्वागत में नये विचार दिखें तो,

मानवता का ललित त्यौहार दिखे तो,

प्रेनोन्मुख, उन्नत होता मन।

नत होता मन।

नाम या परिचय ज्ञात नहीं हो,

शत्रु या मित्र आभास नहीं हो,

मात्र करुणा से हो संचालित,

कोई ‘मैं हूँ तुम्हारे साथ’ कहे तो,

आभारी सतत होता मन।

नत होता मन।

भीषण झंझा, निविड़ अंधकार हो,

अंतिम दीये की बुझती लौ को,

हाथ भरे निधियों को तज कर,

हाथों से ढँक कोई बचा सके तो,

हो विभोर, प्रणत होता मन।

नत होता मन।

हो क्या भाषा जन से जन की,

क्या संभव परिभाषा जीवन की?

प्रश्न उठें, पर इससे पहले,

यदि बातें हों बस अपनेपन की,

हृदय सहज, सम्मत होता मन।

नत होता मन।

निर्बल जब निर्भय हो जाये,

बलशाली करुण, सदय हो पाये,

अपनी प्रतिष्ठा से पहले जब,

मन औरों के सम्मान को धाये.

द्रवित भाव शत्-शत् होता मन।

नत होता मन।

समर्पण

Photo by Guillaume Meurice on Pexels.com

भाव समर्पण, जगने से पहले,

मिलने को, सजने से पहले,

थाम अंगुलियाँ लेता है मन,

मन वीणा के बजने से पहले।

अभी-अभी तो प्यास जगी है,

अभी चंचल उल्लास जगा है,

कुसुमित होने लगी भावनाएँ,

स्वाद मधुर, और नया-नया है।

अभी मिलन की बात न करना,

कुछ, जो बिता दे रात, न करना,

फिर से यह ऋतु छाये न छाये,

अभिसार पर, आघात न करना।

असीम लालसा, घोर मुदित मन,

अज्ञात अपेक्षा से पुलकित तन,

परंतु भाव एक कौंधता मन में,

क्या सचमुच प्रस्तुत हूँ प्राणपण?

क्या स्नेह का अंतिम सोपान,

शून्य जहाँ हो जाता अभिमान,

चढ पाया हूँ, दम्भ छोड़ कर,

या यह तर्पण, मात्र शोभा संधान?

जब तक जिज्ञासा प्रश्न रहेंगे,

उन्हें तर्क और ज्ञान चाहिये,

उत्तर कभी अंतिम नहीं होते,

यदि श्रद्धा को प्रमाण चाहिये।

उचित प्रश्न और जिज्ञासा भी है,

यह परंतु समर्पण मार्ग नहीं है,

मूँद नयन जो छवि हो प्रस्तुत,

जिसे हृदय कहे आराध्य वही है।

अति दुर्लभ आराध्य को पाना,

है उससे दुर्लभ भाव समर्पण,

सबसे दुर्लभ प्रस्तुत हो पाना,

बिन संशय, बिन मन के बंधन।

हर पीड़ा, हर अभिनंदन में

Photo by Simon Berger on Pexels.com

बसे भाव बहुतेरे मन में,

कुछ चिन्हित कुछ स्मरण में,

गोपियों का निर्बाध हो नर्तन,

ज्यों बीच रात में वृंदावन में।

थोड़े-से अज्ञान-बोध के,

स्वीकार ‘बहुत कुछ ज्ञात नहीं है’,

पर इसमें जो तंद्रिल भावुकता,

क्या प्रेम पगा सौगात नहीं है?

कुछ सखा भाव भी मन में अद्भुत,

मार हिलोरें रहते हैं,

सारी दुनियाँ मुझ सा ही सम,

हो परे न कोई कहते हैं।

वय:संधि के भाव विलक्षण,

मन छाते हर क्षण रंग नये,

प्रत्यक्ष खोता अर्थ निरंतर,

जगते रंग स्वप्निल जग के।

एक भाव मात्र सृजन को माने,

तज बंध सकल बस रचने दे।

‘लहर प्राण की कम न होगी,

यदि गढा न कुछ रुधिर दे के।‘

भाव अलग जीवन दर्शन के,

क्यों हम, क्यों यह सृष्टि बनी,

हम हैं कठपुतली इस जग के,

या इसके उद्देश्य हैं हम ही?

यदि मानव शीर्ष कड़ी विकास का,

क्या नहीं उस पर अन्याय हुआ?

कि जिये, रचे और वरे मृत्यु को,

जैसे मात्र अंतिम अध्याय हुआ।

भाव कभी अंतिम नहीं होते,

कभी कहीं नहीं रुकता मन।

आवर्ती आशा और निराशा,

जिज्ञासा इस प्रवाह का ईंधन।

भाव अर्थ, गति, ऊर्जा, गुंजन,

शिखर और आधार जीवन के,

हर्ष, विषाद, लालित्य, मधुरिमा,

और स्पंदन क्षण-क्षण के।

हर पीड़ा, हर अभिनंदन में,

हर जड़ता, हर स्पंदन में।

गोपियों का निर्बाध हो नर्तन,

जैसे बीच रात में वृंदावन में।

कोई मिला नहीं

Photo by Jou00e3o Jesus on Pexels.com

हर बात को हर जगह जाता मुझसे कहा नहीं,

जिक्र अपनी तनहाई का इसलिये मैंने किया नहीं।

हर लड़ाई को जीतने का प्रयास तो बुरा नहीं,

हर वक्त जीतने की प्यास? दोस्तों मुझे पता नहीं।

ख्वाब तो हैं जीने से मुहब्बत करने की अदा,

जो जगना अपने ख्वाब से लगे कभी बुरा नहीं।

दावा यह नहीं कि झुकाया ही नहीं कभी मैंने,

अपने ही आगे शर्म से सर कभी झुका नहीं।

सिर्फ अपनी ही नहीं, हर एक की अजीज थी यारों,

मजबूरी जैसी भी रही, थी जिंदगी बद्दुआ नहीं।

मैं नहीं कहता कि मुश्किलें कमतर थी मेरी,

जिन्दगी के गमों को, किसीने कम सहा नहीं।

बातें साफगोई की मैं भी अक्सर किया करता हूँ,

उलझा अपने से अधिक, मुझको कोई मिला नहीं।

आसमान पर लकीरें मैंने भी खींची हैं बहुत

कभी उन लकीरों से बन पाया मेरा चेहरा नहीं।

भटका तलाश में सबसे बड़े मुद्दे की हर तरफ ,

दिल में गैरों के लिये प्यार से बड़ा मुद्दआ नहीं।

लोग बदहवास हैं कि कोई फूलों से इश्क करता है,

खूबसूरती का सजदा करना, इतनी बड़ी खता नहीं।