जीवन सहचर्य है

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बारिश के बाद छत से टपकती बूंदें,

भले ही उल्लास नहीं जगाती,

प्रणय-विरह के गीत नहीं गाती,

पर अपने विषम लय में कुछ कहती जाती है,

समझाती है,

कि जीवन का झमाझम उत्सव

जब खत्म हो जाता है,

ज्वार जब उतरने को आता है,

जिंदगी तब भी

उतनी ही खूबसूरत होती है,

जितनी पढी हुई किताब,

मुश्किल पहेलियों के जवाब,

और जितनी उम्मीदों से भरी

जीने की हसरत होती है।

भावनाओं का उन्माद जब थमता है,

अतिरेक पर संयम जब जमता है,

विषयों के अर्थ नये पनपते हैं,

पुराने परिदृश्य बदलने लगते हैं,

स्पष्ट होने लगती है,

अपने विचारों की विषमता,

जिन्दगी तब भी कम खूबसूरत नहीं होती,

अपनी आभा तनिक भी नहीं खोती,

धीरे-धीरे समझाती है:

जीने के बहुत सारे ढंग होते हैं,

अनगिनत पटल और बेशुमार रंग होते हैं।

यह न्याय शास्त्र नहीं,

यहाँ सही-गलत, अच्छे-बुरे,

मिलते हैं बहुत घुले मिले,

हम इनसे नहीं हैं बंधे हुए,

हर रूप में जीवन मनोहारी,

हम इससे ऋजुता से जुड़े हुए।

किसी झंझा के अंत में,

जब ब्यापता सन्नाटा है,

मन के भीतर गहरे जाकर,

एकांत जब गहराता है,

जीवन रुकता नहीं,

भारमुक्त हो थोड़ा ऊपर उठ जाता है।

गति है द्रुति है,

हैं लय, लालित्य के रंगमहल,

उल्लास का उत्सव मनाते,

जीवन प्रवाह के मंगल स्थल।

सघन भाव, गहन स्थिरता,

यात्रा अंतर्मुखी मर्म तक,

सहज संवेदना, एकांत कुछ रचता,

तपोस्थली जीवन के

सार्थकता के हवन कुंड निर्मल।

जीवन के हर अणु में सौन्दर्य है।

जीवन सदैव सहचर्य है।

स्मृति का उद्यान

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स्मृति का उद्यान अनूठा,

कितना कुछ पीछे है छूटा,

कितना, क्या-क्या शेष बचा है,

बोध, भ्रांति का समर रचा है।

कौतूहल, विस्मय, संशय अगणित,

विश्वास, हर्ष और दंश समाहित,

जो कुछ इनमें दिखता, मिलता,

निर्मल या पूर्वाग्रह प्रायोजित?

यहाँ काल क्रम स्थिर नहीं होता,

एक बोध कल फिर नहीं होता,

सघन अतीत मायावी लगता,

स्वप्न सरीखा जगता सोता।

उन्माद बड़े ही प्यारे दिखते,

भावुकता टिम-टिम तारे दिखते,

द्वेष, क्लेश जैसे बस व्यतिक्रम,

विजय बहुत-से हारे दिखते।

जुगनू अनेकों दीप बहुत-से,

अंतरमन को जगमग करते,

स्नेह, सुभाव मन-वचन-कर्म के,

बिना छद्म के सतत विचरते।

ये वितान, रंग और चित्र सारे,

सब सच्चे कुछ भी ना झूठा,

तुममें रचा-बसा अब तेरा सच,

स्मृति का उद्यान अनूठा।

रोशनी भी हो छाया भी

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जी, मैं भटक नहीं रहा था,

कुछ तलाश रहा था।

शहर से दूर भले ही था,

हकीकत के पास रहा था।

रात की स्याही को साजिश कह-कह कर,

दिखे बहुत-से तीर चलाने वाले।

रोशन करते रहे राहों को

चुपचाप चिराग जलाने वाले।

गर्दिश के गुबार की तिजारत भी

रही है दिल फरेब हर जमाने में,

इल्जाम सूरज पर अंधेरे का,

बंद लोगों को रखा तहखाने में।

कहा किसीने कि भौरों ने

फिजाँ की खुशबू सारी पी ली है,

कहीं से खबर चली थी कि

बची हुई हवाएँ जहरीली हैं।

धुआं कहीं भी उठे,

अगजनी ही क्यों उसका दिल ढूंढता है?

अंगीठी भी किसीकी जली,

तो शहर भर कातिल ढूंढता है?

हैरत अंगेज समाँ कि

बहुतों को बस डराते डरते देखा।

सरोकार उजाले से था,

बात ताउम्र अंधेरे की करते देखा।

बात मुख्तसर सी है जो

हमने उन्हें बतलाया भी,

मिले हर जगह वो ठिकाने,

जहाँ रोशनी भी हो, छाया भी।

फलसफे में रूप भी हो, काया भी,

साथ अपना भी रहे, पराया भी।

मन फिर से तूँ पंख पसार

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स्मृति में संचित कालखंड के,

अवशेषों को दे बिसार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

ध्वनि सुनी,

प्रतिध्वनि सुनी,

वाद सुने,

प्रतिवाद सुने,

सुने अनेकों नाद अलौकिक,

भौगोलिक संवाद सुने।

सारी ध्वनियाँ कम्पन बन जब,

चेतना में हो गयी समाहित,

एक अनोखी नीरवता छायी,

ना हर्ष सुने अवसाद सुने।

यह कोई उपलब्धि नहीं,

मात्र संस्मरण का एक प्रकार।

चल इसके पार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

ओस में भींगे मरु को देखा,

जल में सूखे तरु को देखा,

क्षार में उगता जीवन देखा,

हास विलास और क्रंदन देखा।

कहीं रुकूँ, यह नहीं लगा,

गहरे तम में जगा जगा,

खेता रहा पतवार।

यह गंतव्य नहीं, है मझधार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

श्रृंगों का स्पर्श किया,

जिये अवसाद और हर्ष जिया,

अपवादों के अतल गर्त में

चेतना का उत्कर्ष जिया।

पर मन के श्रृंगार भवन में,

शेष मात्र सुगंध हवन के,

बिन हठ नहीं रुकते विकार।

चित्त पर मात्र तेरा अधिकार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

शब्द, दृष्य और ख्याति पराक्रम,

मन पर सरल इनका सम्मोहन,

पर ये सदा विगत ही होते,

सहज-गति-रोधक, मति के बंधन।

बहुधा लेते मान इनको

हम वर्तमान का अपना संसार।

मत होने दे यह अनाचार।

मन फिर से तूँ पंख पसार।

सम्पूर्ण हो

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थोड़ा अपनापन से,

थोड़े अधिकार से,

और थोड़े विश्वास से,

कुछ प्रश्न उठे मन में अनायास से,

और मैं ने निहायत ही अपनेपन से पूछा,

अपने सहचर जीवन से पूछा-

कभी तो मुझसे  कहो-

‘तुम क्या हो?’

प्रश्न की गम्भीरता से,

या फिर मेरे इस परिहास की अधीरता से,

स्तब्ध जीवन चुप रहा,

बहुत देर तक कुछ न बोला,

तो मै ने कुरेदा-

‘क्यों मौन हो?’

चकित करता प्रतिप्रश्न था-

‘तुम कौन हो?’

इस हमले की चुभन से हतप्रभ,

अपनी पीड़ा उछालता उसपर,

उसकी तिलमिलाहट देखने को

झाँकते उसकी आँखों में,

कहा मैं ने-

‘तुम्हे अपनी पीठों पर ढोता,

बीते के सैलाब में खाता गोता,

आज के सँकरे,ऊबड़ खाबड़ रास्तों से होता,

तिलस्मी कल की ओर दौड़ता,

एक खिलौना हूँ।

और कई बार, मुगालते में सोचता हूँ,

सृष्टि के चलने मे मेरी भागीदारी है,

समय के साथ कदम मिलाकर,

कुछ दूर चलने की मेरी अपनी पारी है,

अनंत के उस छोर तक जाना चाहता हूँ,

कद में भले ही थोड़ा बौना हूँ।‘

चिर संगी जीवन हँसा-

‘इतना कुछ जानते हो,

फिर मुझसे क्या माँगते हो?’

मैं ठिठका,

पल दो पल खड़ा रहा,

जो सुना अच्छा लगा,

पर अपने प्रश्न पर अड़ा रहा-

‘तुम क्या हो?

कुछ इस पर भी कहो।‘

उसने कुछ नहीं कहा,

कुछ देर मैं भी चुप रहा,

फिर इसके ठीक पहले

कि मेरा धैर्य चुकता,

उसने करुणा से कहना शुरू किया-

‘मात्र तुम्हारा होना हूँ,

इसके अलावा कुछ भी नहीं,

बिना प्रतिरूप के छाया,

बिना जीव के प्राण देखा है कहीं।

तेरे होने से मैं हूँ,

मुझ से तुम नहीं।

मैं होता हूँ, जब तुम होते हो,

व्यथित करते हो,

जब कहते हो कि मुझे ढोते हो।

मेरी वेदना तुझ तक जाये,

मुझे अच्छा नहीं लगता।

मैं तो देखना चाहता हूँ तुझमें,

धर्म और स्वाभिमान जगता।

एक और उलाहना दिये बिना

रुक नहीं सकता,

मेरे सर्वस्व हो,

हर रूप में सच्चे लगते हो,

पर किसीसे भी अपनी प्रामाणिकता

का साक्ष्य माँगते

नहीं जरा भी अच्छे लगते हो।

चाहे सात रंगों में हो या विवर्ण हो,

अपने आपमें सम्पूर्ण हो।‘

कहाँ से आता है बल

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चढ-चढ कर दुर्दांत शिखर पर,

आज का अपना सब कुछ दे कर,

थक कर दिन जब जाता ह ढल,

कहाँ से आता है बल,

फिर से अपने स्नेह में सिक्त होने का,

बीते कल के भार से रिक्त होने का,

और कैसे मलिन मन

फिर से एक आहुति को होता है निर्मल,

कहाँ से आता है बल?

 

यह कोई अमूर्त आकांक्षा है,

या कोई अमिट जिज्ञासा है,

है कोई विचलन, मतिशून्यता,

या स्वर्णिम कल की आशा है?

 

अवचेतन मन में लिखा हुआ ,

यह अबूझ कोई प्रारब्ध है,

और सारी गति, हर घटना क्रम का,

संकेत कहीं उपलब्ध है?

 

अनाहूत है, विध्वंसमुखी है,

या कहीं  कोई नियंत्रण है,

इतनी ऊर्जा क्षय करता यह,

कहाँ इसका अक्षय ईंधन है?

 

ज्ञान सही, विज्ञान सही है,

जहाँ बंधे चित्त ध्यन सही है,

पर इनमें भी मेरी जिज्ञासा का,

सटीक समाधान नहीं है।

 

उत्तर सारे मिल जाते जो,

क्या रहता फिर ले आने को,

बिन ऐसे मौलिक प्रश्नों के,

कहता ‘तुझे’ क्या समझाने को।

 

आभार कि रहस्य ये विद्यमान हैं,

नत हूँ, जिजीविषा अक्षय प्राण है,

जीवन जीने से महान है,

जीने के अनुभव से महान है।

मन माँगता एकांत है

woman sitting on wooden planks
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जीवन की सरपट उच्छृंखलता से,

समय की मूल्यहीन चंचलता से,

मन थोड़ा क्लांत है।

मन माँगता एकांत है।

 

लक्ष्य विशाल क्यों नत नहीं करता?

क्यों ज्ञान हमें सम-मत नहीं करता?

क्यों कुछ अनुभव व्यापक नहीं करते?

विवेक सदैव उन्नत नहीं करता?

 

किस दीर्घा में दौड़ रहे हैं?

लेने किससे होड़ चले हैं?

करतल ध्वनि को लालायित हैं ,

शब्द ब्रह्म क्यों छोड़ चले हैं?

 

क्यों चुप हूँ, विक्षुब्ध हूँ,?

क्या चेतना शून्य हूँ, स्तब्ध हूँ?

शायद उत्तर ढूंढ रहा है,

चित्त अभी भी उदभ्रांत है।

मन माँगता एकांत है।

जल में भी तृष्णा बाकी क्यों है?

विकट यह आपाधापी क्यों है?

क्या-क्या कह समझाऊँ स्वयम को,

है भी तो ऐसा सर्वव्यापी क्यों है ?

 

लक्ष्य बड़े हों, ध्येय बड़ा हो ,

सबके पग तल वही धरा हो,

कोई न दुहरा झुका खड़ा हो,

कंधे किसी के न कोई चढा हो।

 

प्रतिध्वनि हँसती ‘क्या रहस्य तुम खोल रहे हो,’

बात पुरानी बोल रहे हो,

पर अपने इस उपहास में भी

मन थोड़ा शांत है।

मन माँगता एकांत है।

 

गति है तो फिर दौड़ स्वाभाविक,

राजनीति, गठजोड़ स्वाभाविक,

हर व्यतिक्रम के स्वभाव हैं अपने,

बंद गली और मोड़ स्वाभाविक।

 

नाम बड़े, पद-नाम बड़े हों,

मुकुट और पनही रत्न जड़े हों,

पर मानवता की परिभाषा में,

सब के सब समकक्ष खड़े हों।

 

नंगे पाँव, अनंत विस्तार,

छोटी नौका, छोटी पतवार,

गंतव्य अज्ञेय पर गोचर है अब,

इस यात्रा का मूल आधार,

उदात्त लहरें नहीं भयप्रद

अब चित्त मेरा निर्भ्रांत है।

मन माँगता एकांत है।

डाल पर पंछी

 

beautiful bird bloom blossom
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पंख खोले डाल पर पंछी ,

उड़ने को तैयार,

पहली बार,

क्या सोचता है?

उसके मन किन भावों का होता है संचार ?

 

दिगंत तक फैला नीला नभ,

मनोरम,

पर विशालता में भयप्रद,

करता मुझे हतप्रभ।

 

सर्वव्यापी अदृश्य पवन,

मुझे छू_छू कर जाता,

कभी सहलाता, कभी उत्प्लावित कर जाता,

उड़ान का आधार,

संग ही करता भय का संचार।

 

वात्सल्य से करती विभोर धरा,

हर पल खींचती अपनी ओर धरा,

इस ममता में सम्मोहन है,

पर चाहे जितनी बार विचारूँ,

इस आकर्षण में आशंका है, बंधन है।

 

पर इस सबसे ऊपर,

बहुत गहरे, मर्मस्थल के अंदर,

प्रश्न बहुत ही सरल, सालता,

क्या सचमुच मैं उड़ पाऊंगा?

आकांक्षाओं से जुड़ पाऊंगा?

उठा न पाया यदि अपना ही भार,

क्या सह पाऊंगा सारी सृष्टि का तिरस्कार?

 

बस एक किरण,

बस एक पवन,

बस एक ध्वनि या एक शब्द,

एक दृष्टि या एक स्पर्श,

एक संकेत या परामर्श,

रचते उस पंछी का प्रारब्ध।

 

गगन, पवन और समग्र धरा,

हैं भाग जिस अद्भुत रचना के,

तुम चेतन हो, तुम अंश हो,

उसी समेकित विश्व चेतना के।

मात्र याचक नही नत याचना में,

उन्नत पराक्रम के ग्राहक हो,

संशय हो किंचित भी नहीं

इस दुर्धर्ष सृष्टि के क्रम वाहक हो।

 

नहीं बाट जोहना समता की,

न दया भाव, नहीं ममता की,

विश्वास अडिग, संकल्प प्रबल,

जागृति करते हर क्षमता की।

 

कर्तव्य भी, अधिकार भी,

स्वभाव भी, व्यवहार भी,

मात्र नियति नहीं है उड़ना,

है तेरा लक्ष्य, साधना साकार भी।

 

हास नहीं, उपहास नहीं,

लांछना नहीं धिक्कार नहीं,

तू स्वतंत्र, तेरे अनुमति बिन,

छू सकता कोई तिरस्कार नहीं।

 

असफलता है घटना कलंक नहीं,

प्राण रहा, फिर खेलोगे तुम,

प्रयास से पलायन का जीते जी,

पातक क्योंकर झेलोगे तुम?

 

कभी हल्की एक सिहरन मन की,

कभी स्वप्न अनजाने कल के,

सबको मिलती है अपनी ‘गीता’

अपनी राह बनाकर चलते।

 

पंख खोले डाल पर पंछी ,

उड़ने को तैयार,

कृतसंकल्प,

उड़ेगा सीमाओं के पार।

बस इतने से

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अपने मन से बातें कर रहा था,

निपट एकांत, कोई दूसरा ना था,

घुप्प अँधेरे तहखानों को,

अब तक ना खुले रोशनदानों को,

खुद भी भूल चुके गुफा को,

घिस कर मिटती पहचानों को,

छुपा हुआ सब खोल दिया था,

देख यही हूँ, बोल दिया था।

 

फिर अपने सपने बता रहा था,

घाव बदन के गिना रहा था,

मन में और भी ना जाने क्या था,

कि भंग हो गयी मेरी यह गाथा।

 

‘घबरा गये बस इतने से ही,

ये बातें हैं पहले पन्ने की,

नहीं क्या तुम अपनी किताब लिखोगे,

जहाँ मंजिल, सफर और ख्वाब लिखोगे?’

 

जीवन के कितने सोपान अभी बाकी हैं,

अधूरे पड़े हुए निर्माण अभी बाकी हैं,

कहानी बाकी है हिम्मत की,

फलक के पार की उड़ान अभी बाकी हैं।

 

सहने बहुत-से सर्पों के दंश अभी बाकी है,

मिलने मानसरोवर के हंस अभी बाकी है ,

बाकी हैं कितने ही भँवर और शिखर समय के,

दिखने महाप्रलय में अविचल परमहंस अभी बाकी हैं।

 

शेष हैं द्वीप बहुत से काल के प्रवाह के,

शेष हैं रंगमंच अनेको जीवन के निर्वाह के,

हल पहेलियों के बहुत सारे, और

शेष हैं बहुत फैसले बिना बहस, गवाह के।

 

अपने होने का अर्थ जानना बचा हुआ है,

ऐसे ही होना था,

मानना बचा हुआ है,

लाभ-हानि से कर तटस्थ भी बीच समर में,

है कौन जो बैठा अनमना बचा हुआ है?

 

आभार तुम्हारा, हे अशेष,

जीवन के दुर्बलतम प्रहरों में भी,

कितने अद्भुत हैं जीवनके ये अवशेष!

रुकना,थकना, झुकना, पीछे हटना,

कई बार बढना और बढकर फिर घटना,

हो सकते हैं उपकथाएं,

समग्र जीवन बहुत विशेष।

हर पल पहला मान जियें हम

 

red moon during night time
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स्पर्ष का पहला भाव,

सीधे हृदय तक जाती पहली सिहरन,

पहले सफर का पहला पड़ाव,

पहली अभिव्यक्ति, पहला प्रस्फुटन;

 

गहरी नींद का पहला सपना,

आँखें खुलने पर पहली कचोट,

पहली बार खुद से यह कहना,

गहरी है कितनी यह पहली चोट;

 

जीवन का पहला अश्वमेध,

पहला निश्चय, दूँ गगन भेद,

पहली आस्था अपनी क्षमता पर,

जीवन ग्रंथ का पहला अनुच्छेद;

 

सौन्दर्य की पहली परिभाषा,

पहला-पहला स्वाभिमान,

सबके सुख की पहली आशा,

स्वस्फुट पहला कविता गान;

 

स्वाद अपने लहू का पहला,

पहला प्रण न हारेंगे हम,

पहला स्वाद जय-पराजय का,

पहले घर लौटते कदम;

 

पहला शिखर पतन स्वप्न का,

पहला भाव सब कुछ खोने का,

फिर पहला संकल्प पुनर्योजन का,

आयजीवन आत्मजयी होने का;

 

अनमोल धरोहर हर कुछ पहला,

पर काल प्रवाह का हर पल पहला,

प्रकृति का पहला संकेत है,

हर क्षण है सृष्टि पुनर्नवा;

 

आओ,

जीवन का रोमांच गढें हम,

हर पल पहला मान जियें हम।