दूर खड़े सखा मेरे

scenic view of forest during night time
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बसती मेरे जीवन की कथा में,

भाँति-भांति की उप-कथाएँ,

मित्रों की, परिजनों की,

सम्बन्धों की, समीकरणों की,

जीवंत उल्लास और नि:शक्त विवशताएँ,

निश्छल आसक्ति, मोह की काई,

परिदग्ध स्नेह और शीतल लांछनाएँ।

 

बहुत प्रिय हैं सब के सब,

निधि हैं मेरे,

मेरे जीवन के छंद,

मेरे इतिहास के अलंकार,

मेरी शक्ति, मेरा संयम,

दुर्बलता के क्षणों के

मेरे अवलंब-आधार।

 

कहीं किसीकी सफलता ने

हीनता मुझमें भर दिया,

कहीं दूर जाता देख मुझे

मित्रों ने स्नेह पाश में जकड़ लिया।

 

कभी किसी के सहज एकांत को

समझ अकेलापन झकझोर दिया,

कभी किसी ने देख भीड़ में,

निपट अकेला देख छोड़ दिया।

 

कई बार कंधे ढूँढे तो

पत्थर-से स्तम्भ आ खड़े हुए,

और मूल्यांकन के चौपड़ में

हम क्षत-विक्षत थे पड़े हुए।

 

इतना रंग-विरंगा जीवन,

मधुर, कटु और सुरम्य मनोहर,

इनके बदले कुछ भी ना लूँ,

कृतज्ञ हूँ ,

जैसे जिया, मैं जी कर।

 

एक अलग-सा भाव कहीं है,

कुछ कहने को कहता है,

वहाँ भावनाओं से, और संवेदनाओं से,

ऊपर एक गंध और स्वाद बसता है।

 

संग बहुत पहले छूटा था,

साथ बहुत छोटा –सा है,

उम्मीदों अपेक्षा का

ना कोई तंतु हमें बांधता है।

 

जब मिलते हैं मुझे न जाने,

ऐसा कुछ क्यों लगता है,

यही निजता मैं  ढूंढ रहा था,

नहीं जानता,

इसको जग क्या कहता है?

 

उस्थिति जहाँ ना  भार लगे,

बस संग होने में ही प्यार लगे,

स्तर का अंतर  अर्थहीन,

सहज सारा संसार लगे।

 

शब्द चयन की बात नहीं  हो,

घात नहीं  प्रतिघात नहीं हो,

जीत-हार,

नही कोई करता हो अंकित,

नहीं आवरण सम्मुख जब हों,

पीछे पीठ  नहीं मन हो शंकित।

 

परिचय मौलिक सम्बन्धों से,

सम्बोधन सखा तुल्य, हर्षित हो,

आभास न हो अपेक्षाओं का,

करता वातावरण दूषित हो।

 

उस दुनियाँ,

जहाँ स्वीकार सरल है,

मैं खुद जैसा रह पाता हूँ,

फिर भी मोह पाश में बँध,

वहाँ दौड़ नही आ जाता हूँ ?

 

सही-गलत अब आप बतायें,

बस इतना मैं कह पाऊंगा,

अपनी लोलुपता से कलुषित,

इस निधि को ना करना चाहूँगा।

नुपुर का  संगीत

low angle view of spiral staircase against black background
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काल तेरे का नुपुर का संगीत सुनना चाहता हूँ।

सुनी तेरी आहटें,

और बदलती करवटें,

कर्णभेदी अट्टहास,

मौन और परिहास।

सुन लिये गर्जन हैं तेरे ,

निर्घोष वज्र प्रहार के,

चक्र जीवन के न चलते,

बिना क्षति, संहार के,

मानता हूँ पर, क्षमा दो,

मैं अपनी नयी एक राह चुनना चाहता हूँ ।

काल तेरे का नुपुर का संगीत सुनना चाहता हूँ।

 

तुझ में विलीन हो जन्मा तुझसे ही

कहूँ सखा-तुल्य, यह दम्भ नहीं,

मरण-जन्म का आवर्त सनातन,

पर मृत्यु मिटा सका कभी जीवन के स्तम्भ नहीं।

 

अनंत है तेरा भाल पटल,

और असंख्य जीवन वृत्त मेरे,

कल्पना किसी बैर की तुझसे,

नहीं स्वप्न में ना चित्त मेरे,

हठ फिर भी ना त्याग सकता कि,

उन्मुक्त हो मैं अपना स्वप्न बुनना चाहता हूँ।

काल तेरे का नुपुर का संगीत सुनना चाहता हूँ।

 

काँपती मेरी भुजाएँ,

पर नहीं होना व्यथित तनिक तुम,

तेरी सीमाओं से जाकर ऊपर,

संधान नहीं, तो क्यों हैं हम।

तेरा तांडव माप दण्ड हो मेरा,

नयन भीति से झुके नहीं।

हों सारे प्रलय स्वीकार्य हमें

और  प्रगति रथ रूके नहीं,

नतमस्तक सम्मुख तेरे,

पर स्वाभिमान से अस्तित्व के अर्थ गुनना चाहता हूँ।

काल तेरे का नुपुर का संगीत सुनना चाहता हूँ।

यायावर घर नहीं गया

silhouette of man during nighttime
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गहन तिमिर,

सारी दिशाएँ मूक, स्थिर,

मात्र तारा मंडल का प्रकाश,

नहीं कोई स्पंदन,

नहीं कोई गति,

जैसे विश्राम में लेटी नियति,

निविड़ नीरवता पर तरंगें बनाती

बस अपनी ही साँस।

अकस्मात सिहर उठा मन,

मंत्र मुग्ध करता

अंदर ही अंदर कुछ बरस गया,

प्रकृति के इस

चित्रपट पर रच बस गया।

फिर एक अस्फुट स्वर ने

कानों मे कुछ बता दिया।

यायावर को उसके घर का पता दिया।

सम्मोहित यायावर ठगा हुआ-सा खड़ा रहा,

घर का पता मिलने पर भी

घर नहीं गया।

स्वच्छंदता के झीने आकर्षण में

बंधा रहा।

 

सघन निशा,

सूचि भेद्य अंधकार चारों दिशा,

उल्का, ग्रह, नक्षत्र,

गतिमान यथावत,

जीवन ऊर्जा अदृश्य, पर मूर्तिमान,

अणु-अणु का कम्पन,

स्पर्ष करता अनंत तक फैला वर्तमान।

हठात,

चेतना के एक तरंग का संचार,

कर गया जड़ता पर सूक्ष्म प्रहार,

जीवन की उष्मा सजग हुई,

और सम्मोहन पिघल गया,

स्वच्छंदता का मोह कुछ क्षीण हुआ,

जब मुक्ति बोध ने हाथ गहा।

यायावर ने देखा घर अपना,

पर नहीं गया।

इस बार भी,

यायावर घर नहीं गया।

अब सकल विश्व था घर उसका,

जोड़े संवेदना के तंतु जगत से,

पर, ठहर कहीं पर नहीं गया।

यायावर घर नहीं गया।

तुम कहाँ थे 

multicolored abstract painting
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अब कहते हो सब कुछ गलत है, गुम कहाँ थे?

नगर  का निर्माण  हो रहा था,  तुम कहाँ थे।

सृजन  में यूँ भी  तुम्हें  विश्वास  कम  था,

कर्म  नहीं था आलोचना थी, तुम   जहाँ  थे।

क्योंकि  ये नक्शे  अलग थे  तुझ  से थोड़े,

दरारों की शक्ल तुम हर महल के दर्मयाँ थे।

किस रौशनी ने  तुमको अंधा कर दिया था,

परछाईंयोँ  से  जंग  करते   तुम  वहाँ थे।

तंग  कोनों  को रौशन खुद जल कर करते,

पर हुआ यह, तुम  बसे हुए घर जला रहे थे।

ईंट और  पत्थर  तराशने वालों  के हाथों ,

किसी जिद में थे  कि बारूद पकड़ा रहे थे।

बात थी बिन छालों के कैसे  काटें पत्थर,

तुम संगतराशी को ही गलत बतला रहे थे।

सपने  सब देखें वही  जो तुम दिखलाओ,

इस जिद पर सपने  को ही दफना रहे थे।

लहू नहीं तो धड़कन बन कर बस सकते थे,

जानें क्यों तुम दिल  मुट्ठी में दबा रहे थे।

 

रात की स्याही सुबह किसी को क्या बता दे,

नींद में भी  क्या इस बात से घबड़ा रहे थे?

वेदना  है  विध्वंश  में भी  और  सृजन में,

क्यों जीने से पहले गीत मौत के गा रहे थे।

क्षत पत्र

close up photo of leaf
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मात्र एक क्षत पत्र हूँ ,

हर काल हूँ , सर्वत्र हूँ।

कर्तव्य च्युत नहीं,

आंधियाँ सही- लड़ा, भागा नहीं,

जगा रहा सोया नहीं,

अटका-लटका,

उड़ा,

दूर-दूर तक गया,

कोई शिकायत नहीं,

कि मुझे किसी ने छू कर मुझको,

तनिक भी अपनापन नहीं दिया।

जमीन पर पड़ा रहता हूँ,

मिट्टी में समाता हूँ,

अपने आपको खो कर मैं

एक पेड़ बन जाता हूँ।

फिर उसी में उगता हूँ,

और अपनी टहनी पर लटक जाता हूँ।

कोई अपेक्षा नहीं,

किसीकी उपेक्षा नहीं,

कोई अभिमान नहीं,

सृष्टि का मौलिक उपादान हूँ,

एक शाश्वत प्राण हूँ।

अजेय हूँ , अमिट हूँ ,

सरल जीवन चक्र हूँ।

 

मात्र एक क्षत पत्र हूँ ,

हर काल हूँ , सर्वत्र हूँ।

दुआ

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शायद जरूरत भी नहीं है ,

और मैं दुनियाँ को बदलने का

दावा नहीं करता,

जमीन से थोड़ा ऊपर चलने का

दिखावा नहीं करता,

कोशिश बस इतनी है कि

कोशिश में कमी ना रहे,

थोड़े-से ही बदलें सही,

हाले-सूरत ऐसी ही बनी ना रहे।

 

जो अच्छा है, कयों अच्छा है

मालूम हो मुझे,

जो अच्छा नहीं, कयों अच्छा नहीं

बात छुपी ये ना रहे।

 

भूख का है इल्म मुझको,

इससे कोई समझौता नहीं,

वजह बहुत से और भी हैं,

आँसुओं के बहने के।

 

सारे आँसू पोंछ डालूँ

शायद हो मुमकिन नहीं,

पर किसी को हक न हो कि,

वह किसी को चोट दे।

 

मुस्कुराना लगता है अच्छा,

जैसे तुम्हें वैसे मुझे,

चाहता हूँ जब जो चाहे,

खिलखिला कर हँस सके।

 

वक्त बहुत लग जायेगा,

है इसका डर मुझको भी पर,

आँसू नहीं रुके हैं किसीके,

हँसी किसी की छीन के।

 

जो करूँ जैसा करूँ

अब सब तुम्हारे हाथ है,

बस इतनी दुआ दे कि,

ना हिलूँ कभी यकीन से।

बचपन

photo of multicolored abstract painting
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अब भी आँखें भर आती हैं,

रुकती नहीं छलक जाती हैं ,

अब भी चेहरा खिल जाता है,

जो सरे-आम कोई मिल जाता है।

अब भी ढोल पर थाप पड़े तो,

झूम कर कोई नाच उठे तो,

मन को बड़ा अच्छा लगता है।

जिन्दा है बच्चा लगता है।

 

उम्र में इतने बड़े हो गये हैं,

फिर भी रोएँ खड़े हो गये हैं,

साँझ, अंधेरी रात से डरना,

मिले जो भी वह हाथ पकड़ना,

बात पुरानी याद जो आयी,

सुबह-सुबह बजती शहनाई

जैसे मन पर रचा हुआ है,

अब भी बचपन बचा हुआ है।

 

हर सुबह एक नया सवेरा,

शाम घने तिलस्म का घेरा,

जुगनुओँ की आँख मिचौली,

हरदम चलती हँसी ठिठोली,

जगे हुए सपना लगता है,

मन ही मन अपना लगता है,

माँग रहा है थका हुआ मन,

खेल कूद मिट्टी में सन-सन।

 

कभी कहा नहीं ‘इतना ही बस’,

कुछ भी कर जाने का साहस,

हार मिली तो मान लिया,

रुक,फिर लड़ने का ठान लिया,

नहीं ग्लानि जो न मिली सफलता,

अगर किया जो था कर सकता,

बिन पेंचों की सीधी बातें,

चकमक तारे नीन्द की रातें।

 

गुरू-ज्ञानी जन यही बताते,

पर कैसे, समझा नहीं पाते,

जोड़ें बिन गाँठों के जैसे,

स्वार्थ बिना उद्देश्य हो कैसे?

संभव है यदि दुख के दर्शन,

निर्माण करे ना दुख के कारण,

बीज सभी से अपनेपन का,

मरा नहीं, है पनप रहा,

स्नेह की उसे तरलता दे दो,

बचपन की सरलता दे दो।

 

कठिन सही पर बात कहो एक,

सरल-गलत कर जियोगे कब तक,

करो कभी जो सच्चा लगता है,

मन को बड़ा अच्छा लगता है।

जिन्दा है बच्चा लगता है।

कर्म दे दो

 

monk holding prayer beads across mountain
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अमरत्व के दर्शन,

सृष्टि के उद्गम की सोच,

अभी रहने दो।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष,

ज्ञान सभी रहने दो,

अभी मुझे तुम कर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

बहुत भूख है करनी ठंढी,

फसल बहुत-से बोने हैं,

आँसू की कालिख बहुत-से

बच्चों के मुँह से धोने हैं।

रोक सम्मोहन सपनों का,

विष, ताप सहे वह चर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

 

मै ने देखे अंधकूप हैं,

और उनमें बसते जीवन को,

भावशून्यता उनकी करती,

अंधकारमय इस मन को।

रख लालिमा भोर-साँझ की,

जल दीप बनूँ, वह मर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

सर के ऊपर जगह नहीं है,

झुकना शायद जरूरी है,

पर आकाश ज्ञान नही हो,

ऐसी क्या मजबूरी है?

ऊंचा छत और आकाश बनूँ,

सर कुछ उठें मुझसे ऐसे कुछ सत्कर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

बिन आँसू के हँसती आँखें,

सहज मान से उन्नत शीष,

हर कोने में दीप जले हों,

हर मन ईश्वर का आशीष।

फिर मुझे लालित्य दो,

रस-रंग दो, जगत-धर्म दे दो।

अभी,

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

selective focus photography of child hand
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मेरे अंतर्मन की व्याकुलता को,

अपने स्नेह-स्पर्ष से

स्वीकार में बदलते हो,

दिखते नहीं,

कोई कहता नहीं,

पर मुझे लगता है हर पल,

तुम साथ मेरे चलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

जीवन मरु के नग्न ताप में

दग्ध हो जाती  संवेदनाएँ,

मन के तंतु चीख-चीख कर,

माँगती शीतल जल धाराएँ,

मुझ से छुपकर, मुझ से भी पहले,

तुम ही तो पिघलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

निज लघुता के हाहाकार में,

दसों दिश छाते अंधकार में,

अर्थहीन लगते जीवन के,

विकृत भयावने विस्तार में,

सगा, अबोध या निरीह समझ

पथ प्रकाश को जलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

भर सामर्थ्य के उन्मादों में,

इतराया जो धरातल से ऊपर,

या प्रमाद कीर्ति का किंचित भी

छाया, तो तुमने अंगुली ली धर,

कैसे-कैसे सूक्ष्म संकेत,

देते हो मुझे सम्हलने को।

बंधु, क्यौं छलते हो?

और जीवन चलता रहा।

white and black light streaks
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और जीवन चलता रहा।

 

हाथ टटोलते घुप अंधेरे,

विवेक हीन अज्ञान ने मेरे,

जो छुआ उसे अपना माना,

कृतज्ञ हृदय, बाहों में घेरे।

पहली संवेदना- स्वीकार की,

जगी, प्रवाह का उद्गम बना।

और जीवन चलता रहा।

 

पहला ज्ञान स्वीकार का

जिज्ञासा कितने जगा गयी,

साहस यहीं कहीं पनपा,

फिर कथा पराक्रम शुरू हुई।

कौतूहल, विश्वास ने मिल कर

अब साहस का हाथ धरा।

और जीवन चलता रहा।

 

बढा कदम अनुसंधान का,

स्वभाव नही सीमित हो रहना,

न बंधन करे कातर कोई,

शीष उठा पूरा कर सपना।

चला प्रगति रथ उर्ध्व दिशा,

मानव मन को विस्तार मिला।

और जीवन चलता रहा।

 

अंध कूप से पार क्षितिज,

कहानी है अदम्य चेतना की,

अडिग संकल्प, उत्सर्ग प्राण का,

सृष्टि पर्व की, वेदना की।

नत, विनीत; पर मनुज ही क्या

जो विपदा से डर रुक गया।

और जीवन चलता रहा।