स्वीकार यदि यह हो तुझे

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गा सकूँ, गुनगुना सकूँ,

व्यथित मन बहला सकूँ,

छू सकूँ, सहला सकूँ,

गीत ऐसे दो मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

जब चाहूँ मैं आ सकूँ,

व्यथा अपनी दिखला सकूँ,

नि:संकोच अश्रु बहा सकूँ,

ले चल उस मंदिर को मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

ज्ञान और स्वभिमान सब में,

सबके लिये सम्मान सब में,

सबके साँझ विहान हों अपने,

यह स्वप्न बुनने दो मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

रंग सारे संग रहें मिल,

भावनाएँ सबकी हों शामिल,

वृहत्त लघु को करे न बोझिल,

यह ज्ञान हो सबको, मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

व्योम न हो उद्विग्न अनिश्चित,

साँसें सम, सौम्य और सुरभित,

ग्रीवा उन्नत, नयन हों सस्मित,

ऐसा जग रचने दो मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

स्पर्धा यदि हो तो स्वयम से,

विमुख नहीं धर्म से या रण से,

संकल्प शुचिता, संवरण के,

इन स्वप्नों में निष्ठा हो मुझे।

स्वीकार यदि यह हो तुझे।

यह दौर

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लगा कि जाग गया हूँ,

पर उलझन में हूँ कि

वही हूँ या थोड़ा नया हूँ।

चारों ओर हर चीज वैसी की वैसी ही है,

पर तबीयत मेरी न जाने कैसी-कैसी है,

सब कुछ अपनी जगह और बाकायदा है,

मेरे यकीन के सिवा।

तय करना मुश्किल है,

कि मैं हूँ,

जिंदा हूँ,

और हूँ जगा हुआ?

तभी अचानक,

चुपके से, धीरे से,

दबे पाँव आकर,

चारों तरफ से छा कर,

एक डर मुझे घेरने लगा।

और जब मैं बँध गया पूरी तरह,

इस तिलिस्म में,

तो मेरा पूरा वजूद,

बेचैनी के गाढे समंदर में,

डूबने तैरने लगा।

कैसा जहल,

कोई सलाहियत नहीं,

नकाब नहीं।

नये दौर का अदब नहीं,

औरों का भी लिहाज नहीं।

खुला चेहरा, घर के बाहर,

लोगों के हाथों को छूता,

चलता फिरता मौत का सौदागर।

लेकिन इस दरम्यान भी,

लगता रहा मुझे,

कि कहीं कुछ गलत है,

कुछ अनबुझ-सा हो रहा है,

यह एक मायाजाल है,

इसमें यकीन ही नहीं,

वहम भी कहीं खो रहा है।

तय नहीं कर पा रह था,

हूँ जिंदा या मर गया?

खुश होऊँ, अगर जिंदा हूँ मैं?

पर ऐसा नहीं होता महसूस,

क्यों इस कदर शर्मिंदा हूँ मैं?

या फिर मैं मर गया हूँ?

हर पल के खौफ से और

नाउम्मीदी से उबर गया हूँ?

हर पल डर कर जीने से,

इस तरह बेबसी की जिल्लत के घूँट पीने से,

मरना बेहतर है।

पर निजात इतनी आसान होगी,

यह बात समझ से बाहर है।

उहापोह में मन,

कैसे भ्रमित हैं पल-क्षण?

इस अंधेरे में भी,

क्यों कोई किरण ढूँढ रहा हूँ?

क्यों लगता है, है कुछ अधूरा,

जैसे मृत्यु में फिर जीवन ढूँढ रहा हूँ।

अरे, यह कैसा आभास है?

जैसे कुछ बदला है,

नया कुछ मेरे आसपास है।

अब जो महसूस हुआ,

तसल्ली थी या हैरत?

नहीं मरने की खुशी थी,

या मर भी नहीं पाने की जिल्लत?

क्या सपना था यह सब,

मैं जागता पड़ा हुआ हूँ?

आँख खुली है,

एक सुकून है कि जिंदा हूँ,

साथ ही फिर एक बार जीने से शर्मिंदा हूँ।

फिर से कैसी जगी है,

बस इस दौर के गुजर जाने की हसरत?

जो चाह अब रहा हूँ,

वह मौत है या मोहलत?

इन्सानियत डरी हुई,

इन्सान हर डरा हुआ,

हर लब पर सिर्फ शिकायतें,

हर जज्बात खौफजदा।

कंधे नहीं जिन पर सर रखें,

हर किसीने इतना कुछ खोया है।

साँसों पर पहरे के इस दौर में,

किसका ईमान नहीं रोया है?

पर मुर्दों के फूँक कर जिलाता-सा,

कहीं पनपा है एक खयाल सर उठाता-सा,

इस भीड़ में शामिल होने का,

कुछ और नहीं तो आँसुओं से,

चंद दाग कहीं भी धोने का,

जैसे मुझको घेर रहा है।

क्या हुआ यदि,

विश्वास भी हर आदमी से,

अपना चेहरा फेर रहा है।

इस भयानक चीत्कार में भी,

उम्मीदों के टूटने के हाहाकार में भी,

जलते पाँव ही सही, चलना होगा।

चाहे जो भी जले हवन में,

एक केंद्रबिंदु तो बनना होगा।

ध्यान को केंद्रित कर कल्याण पर,

ज्ञान को अर्जित करें सम्मान कर,

रिसते घावों पर न परे छाया कलुष की,

भरते जख्मों पर धरें फूकें हुलसती,

आज जहाँ तक हो सके,

जड़ छोड़ते यकीन के दरख्तों को,

मजबूत करें,

समझाने से परे हो गये मन के,

टुकड़ों को जोड़े,

फिर से उन्हें साबूत करें।

हर कोई जानता है,

यह दौर गुजर जायेगा।

बाकी बचेगा सिर्फ वह,

जो आनेवाला वक्त हमारे बारे में,

आनेवाली नस्लों को,

हमारे बारे में बतायेगा।

उम्मीद का उदाहरण बनें,

जो बन सकता है करें,

अपनी ही आँखों मे कल शर्मसार न हों,

आफत के इस दौड़ में हर कदम,

हम इस तरह धरें।

प्रयाण के सहचर

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पराजय का स्वाद,

मन के विषाद,

संवेदना पर आघात,

हर नियम के अपवाद,

जो मिले नहीं आगंतुक बनकर,

तो,

जीत के उल्लास,

मन के स्मित हास,

चित्त की दृढता के प्रयास,

हर सीमा को लांघने का विश्वास,

कैसे होते इस प्रयाण के सहचर?

मन की सहज जिज्ञासा,

प्रकृति को जानने की पिपासा,

बहुत कुछ बदल पाने की आशा,

सबके लिये स्नेह की भाषा,

जो मिले नहीं आगंतुक बनकर,

तो,

चेतना का विकास,

जुड़े होने का आभास,

सर्जन की सम्भावना में विश्वास,

समरसता में जीने का प्रयास,

कैसे होते इस प्रयाण के सहचर?

अंतर्मन से कहना-सुनना,

अपना एक अंतरिक्ष बुनना,

रख कर सिंचित, जड़ से जुड़ना,

जो राह कठिन हो, उसको चुनना,

जो मिले नहीं आगंतुक बनकर,

तो,

उदय अध्यात्म का अंधकार में,

अस्तित्व भान तमस के विकार में,

विश्वास अपने मूलाधार में,

रचना में, सतत विकास के अधिकार में,

कैसे होते इस प्रयाण के सहचर?

मार्ग मध्यम है

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विचित्र व्यामोह,

हल्कापन अच्छा लगता है,

जब तक देता है,

स्वच्छंदता से हलके-हलके तैरने की क्षमता,

और लगने लगता अपना अंतरिक्ष का हर कोना;

पर जिस क्षण लालसा जगती है गुरुत्व की,

जैसे ही छूता है अस्तित्व की

भारहीनता का आभास,

अनायास,

भार का महत्व,

समझ में आने लगता है।

गुरुत्व के प्रति आदर,

मन में छाने लगता है।

असम्भव-से दिखते,

विपरीत तत्वों के समन्वय में ही,

सम्भवतः छिपे प्राण और जीवन हैं।

वरना,

प्रकृति में बिछे चरम शीत,

और विद्यमान अनन्त ताप बीच,

संभावनाओं से भी क्षीण,

एक अति संकीर्ण छोटी-सी पट्टी पर,

असम्भव-सा संतुलन बनाये,

आदि काल निरंतर चलते,

कैसे ये मानवता के चरण हैं?

सारी विषमताएँ द्वितीय हैं,

मोह के बंधन, अर्जन के भ्रम,

मानचित्र की रेखाएँ, ऊँचे-नीचे के क्रम,

मान्यता की सीमाएं द्वितीय हैं,

संयोजन उचित सम्भावनाओं का,

समन्वय विरोधाभासों का प्रथम है।

अतिरेक का सम्मोहन प्रचंड हो भले ही,

जीवन का मार्ग मध्यम है।

शोक में, श्रृंगार में भी

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शोक में, श्रृंगार में भी,

वर्जना, मनुहार में भी,

यश-अपयश के पंक में,

और जीत में भी, हार में भी,

चित्त यदि स्थिर रहे तो,

विवेक उचित है यदि कहे तो,

जीवन गति की दिशा सही है।

दिवस अर्थमय, निशा सही है।

अंधकूप हो, या प्रकाश हो,

कौंधती शंका, या दृढ प्रयास हो,

नीरव लय या गीत नैसर्गिक,

शुष्क छंद या अनुप्रास हो,

मन के भाव यदि दृढ करें पग,

तन को स्फूर्त, हर अंग सजग,

तो चेतना सच में फलीभूत हुआ है।

सत्य, शिव को आहूत हुआ है।

गुरु प्राप्य है, ज्ञान प्राप्य है,

बल, कौशल, विधान प्राप्य है,

कर्म परंतु करने से होता,

समय मात्र वर्तमान प्राप्य है।

सम्मुख क्षण यदि लक्ष्य समर्पित,

करे प्रयोजन समष्टि के हित,

यात्रा अब तक निश्छल रही है।

आहूति तुम्हारी सफल रही है।

दालान पर एक अजनबी

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किसीने मेरे घर के आगे दीवार खड़ी कर दी एक,

सूरज अब जरा देर से उगता है मेरे घर में।

सोचता हूँ कभी शुक्रिया कर आऊँ मैं उसका,

हवाओं से डर के अब मेरी छत नहीं उड़ती।

एक अजनबी आ के बैठा है मेरे दालान पर,

डर है कि कहीं कोई तकाजेवाला न हो वह,

डर से सामने जा न सकता खुद मैं,

बच्चे के हाथों खैरियत और पानी भिजवा दिया है।

नदी ने जबसे अपनी राह बदल ली है,

बच्चों को खेलने की कुछ और जगह मिली है,

गाँववालों को लेकिन एक डर सता रहा है,

कोई देवता किसी भूल पर नाराज तो नहीं हैं?

मेरे नहीं पड़ोस के गाँव में लगता है वह मेला,

जिसके गुब्बारों और चर्खियों से बचपन मेरा भरा है,

मुझे खुद पता नहीं है कि क्यों उदास हूँ मैं,

जो वह मैदान अब एक चकमकाते बाजार का पता है?

सादे लिबास में आजकल रातों में घूमता है,

कुछ लोग डर जायेंगे यह भी उसे पता है,

हुआ तो कुछ जरूर है पिछले कुछ दिनों में,

कि करीब के लोग भी अब मुँह फेरने लगे हैं।

इस नदी के घाट पर कभी हुई थी बड़ी लड़ाई,

किनके बीच और क्यों यह तय नहीं है अब तक,

सदियों से बहता पानी बहता कुछ इस तरह है,

कि ऐसी मामूली बातें तो होती रहती हैं अक्सर।

मेरे घर के पीछे से गुजरती है एक पगडंडी,

दोनो किनारों से घास ने बढ कर छिपा लिया है,

उधर जाता नहीं हूँ, पर सोचकर गुदगुदी होती है,

कि पाँवों से लिपट के पत्ते क्या-क्या मुझे कहेंगे।

अश्रुजल

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शनै:-शनै:, शीतल-शीतल,

कभी भाव, कभी उसके प्रतिफल,

जाये वेदना या करुणा के,

नयन संचित होते अश्रुजल।

संघनित चेतना के तुहिन कण,

द्रवित पाषाण से भरते नयन,

जब सब कुछ समापन के समीप,

नया अंकुरण, नव उज्जीवन।

युगों की संचित निधियाँ मन की,

कोमलतम भावनाएँ जीवन की,

क्षण भर में दे दे जैसे कोई,

अंतिम संवेदना समर्पण की।

सूखे आनन पर रेखाचित्र-से,

अर्थ विशद पर रंग में हलके,

छलके जब भी बंध तोड़ कर,

कितने इतिहास पटल पर झलके।

अन्वेषण की कथा शेष है,

उपजी इससे व्यथा शेष है,

भर जो आये एकांत में अकारण,

ज्ञात नहीं क्यों, पर विशेष है।

सखा जब तुम बन जाते हो

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मेरी पीड़ा पर भी मंद-मंद मुस्काते हो,

अपनी लड़ाई खुद लड़ने को बार-बार उकसाते हो,

अलस मन जब भी सबकुछ करता है तुम्हे समर्पित,

करते अस्वीकार समर्पण, तंद्रा से मुझे जगाते हो।

अब मैं अपने संघर्ष का

बड़े से बड़ा दर्द सह सकता हूँ,

पर, तेरी मुस्कुराहट खो जाये तो,

पल भर भी नहीं रह सकता हूँ।

अपनी उन्मुक्तता बेहद ही मुझको प्यारी है,

पर यदि उद्देश्य न हो तो स्वतंत्रता भी भारी है,

बात फिर वहीं पहुँचती जहाँ से चली थी,

विवेक भ्रमित हुआ था, चेतना गयी छली थी।

होना क्या स्वयम हो सकता है अपना अभिप्राय?

यदि नहीं तो क्या हैं होने से पहले के अध्याय?

यहीं कहीं ग्रीवा झुकती है, आभार-नत कर जाते हो।

इस वेदना में जो अर्थ छुपा है, पीड़ा हर समझाते हो।

मेरी पीड़ा पर भी मंद-मंद मुस्काते हो।

जीवन कितना सुगम हो जाता है,

सखा जब तुम बन जाते हो।

तुमको देखा

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स्थिर गगन, नि:शब्द पवन,

घनघोर तिमिर, कण-कण में सजग प्राण,

सृष्टि के इस छोड़ से उस छोड़ तक

कौंध गयी एक रेखा,

मैं ने तुमको देखा।

बड़ा अनर्गल लगता था जब,

कोई बात रहस्यों की करता था,

तर्क और विज्ञान पार्श्व थे,

हर प्रमेय सुलझा लगता था।

चलता रहा अजेय-सा मद में,

संवेदनाओं को कर अनदेखा।

तुम तो थे, मैं ने नहीं देखा।

ज्ञान अनेक भूगोल, खगोल के,

समस्त शास्त्र के, नाप तौल के,

लगता था अब बस जीना है,

हों बाहों में बल और हौसले।

मन थे रण, चित्त थी जिज्ञासा,

उठा-उठा कर तृणवत फेका।

उद्देश्य मात्र जीवन यापन था,

देख-देख भी तुझको नहीं देखा।

कभी-कभी पर ध्वनि हृदय की,

संकेत व्योम से, पुकार अंतर की,

क्या हूँ, क्यों हूँ, गन्तव्य कहाँ है,

असीम लगे विह्वलता उर की,

जगत देखती शांत मुखौटा,

आड़ोलन मन का किसने देखा?

संकेत ढूँढता, सूत्र ढूँढता,

अमूर्त छवि विकल हृदय ने देखा।

वह विधि थी या था निषेध,

मूर्छा थी या चेतना का प्रवेश,

ढगा-सा तकता रहा निर्निमेष,

दिखता सरल पर कितना विशेष,

सूक्ष्म परंतु स्पर्श प्रत्यक्ष था,

निश्चय मन का, विधि का लेखा?

सकल सृष्टि में भाव उजागर,

मैं ने फिर से तुमको देखा।

विस्मृति

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विस्मृति,

कैसे अद्भुत, तुम्हारे उपकार,

कितने मनोरम तुम्हारे उपहार।

तुम क्या-क्या हर लेते हो,

उन्मुक्ति भर देते हो,

आभार में कुछ कहूँ इससे पहले,

छोड़ स्मृतियों के तपोवन में चल देते हो।

कई बार,

चल जो पाया हूँ,

गिरते-गिरते सँभल जो पाया हूँ,

अंधकूपों को जाते,

अपने रास्ते बदल जो पाया हूँ,

लगता है माया है,

सब तेरे किये ही हो पाया है।

जब-जब भी भूला हूँ,

पावों की शिथिलता,

रीढ की दुर्बलता,

और अकर्मन्यता, इच्छाशक्ति का ह्रास,

मन में पुलकित हुआ एक विश्वास,

और सहसा, जैसे विद्युत रेखा-सी कुछ कौंधी,

जड़ तंतुओं में फिर से प्राण का हो चला संचार।

कितने मनोरम तुम्हारे उपहार।

कभी अनायास क्षमा बन कर, 

कभी इर्ष्या, द्वेष के तापों को हर,

शनैः शनैः कभी तो कभी सत्वर,

अनोखे रंग मेरे चरित्र में भर,

धोये कितने कलुष, हर लिये कितने संताप;

अद्भुत, विस्मृति, तेरे परिष्कार।

कितने मनोरम तुम्हारे उपहार।