मैं रोता हूँ

img_7471

 

मैं रोता हूँ।

किसी को जिन्दगी से हारा देखूँ तो,

किसी को अपने से  हारा  देखूँ  तो,

मैं रोता हूँ।

 

संजोये किसीके सपने टूट जायेँ तो,

मन-से किसीके अपने छूट जायेँ तो,

मैं रोता हूँ।

 

आँखों मे चिंगारी हो,

रग-रग में आग हो,

बेसाख्ता हलचल हो,

बस आगे की दौड़-भाग हो,

एसे में किसी को बेफिक्र वापस जाता देखूँ तो,

और किसी गिरे अजनवी को उठाते देखूँ तो,

मैं रोता हूँ।

वजह नहीं पर ऐसा होता रहता है,

करता वही हूँ जो सही मन कहता है,

ऐसेमें कोई मुझे देख मुस्कुराये तो,

और धीरे-से मुझे सही बताये तो,

मैं रोता हूँ।

 

ऐसा कई बार हुआ है,

कि जिससे मिला हूँ उसने मुझे छुआ है।

उस स्पर्ष को लेकर आगे बढ गया हूँ,

तब नहीं कहा,अब अनकहा यह जमा पड़ा है।

कभी उनसे नजरें मिलाऊँ तो,

उन्होने मुझे बनाया है-बतलाऊँ तो,

मैं रोता हूँ।

संशय आशा विश्वास

img_7554मुझसे शुरू होकर

दिगंत तक जो जाता है,

हर बार प्रश्न बनकर जो लौट-लौट आता है,

क्या यह सब एक छलावा है।

या कहीं कुछ इसके भी अलावा है।

 

संशय

 

क्या हूँ, कहाँ हूँ, कौन हँ,

आक्रांत हूँ और मौन हूँ।

क्या इस प्रश्न का उत्तर मेरा देय है।

क्या बँधा हूँ मैं

किन्ही यक्ष प्रश्नों के बंधनों में,

या इस सबसे अलग

मेरे होने का कोई ध्येयहै।

कया होगा

अगर उत्तर मिल भी गया तो।

क्या लगेगा कोई पूर्ण विराम,

या काल के प्रवाह में

यह अद्रिष्य-सा सूक्ष्म कण

रहेगा निन्दित अपने अहम के लिये।

अपने सारे वहमके लिये।

और खुल जायेंगे

मुझे बेधते-मुझे भेदते

नये-नये आयाम।

क्या सचमुच है कहीं कोई पूर्ण विराम।

 

पर प्राण की जो आग है,

मन में जलता जो आलोक है,

और अहर्निष झंझा-सी जो ये चेतना है,

उसका मैं क्या करूँ।

जड़ हो जाऊँ, चुप रहूँ

और समा जाऊँ अपने ही अंदर

कि इस ब्रह्मांड में इतना ही मेरा दावा है।

या इसके भीकुछ अलावा है।

 

 

आशा

 

 

अनन्त-सा इतना बड़ा संसार,

इतने चमत्कार,

इतने सारे अद्भुत व्यापार,

व्यर्थ तो नहीं होग।

सूर का उगना-ढलना,

जीवन चक्र कारुकना-चलना,

इनमें कोई अर्थ तो कहीं होगा।

यदि हाँ- तो सम्भावनाएँ हैं,

विकल्प हैं

आधार है।

तर्क से परे, ज्ञान से अलग

आशा का जो प्रस्फुटन है

मूर्त होता बरवस वह निराकार है।

और इसके बाद

संघर्ष है पर भय नहींहै।

अपने होने पर कोई संशय नहीं है।

धमनियों में बहता लहू उष्ण पर बेचैन नहीं है।

अस्तित्व अपने हीं प्राण की आग में जलता दिन-रैन नहीं है।

सृष्टि सिर्फ मेरी नहीं,

पर इसमें मेरा हिस्सा है।

नहीं अनूठी सबसे लेकिन

मेरा भी एक किस्सा है।

मन सुनता अंतर्मन से आता एक बुलावा है।

हाँ-हाँ, इसके भी कुछ अलावा है।

 

विश्वास

 

समग्र का एक अंग हूँ,

सूक्ष्म-सा तरंग हूँ।

हूँ छोटी-सी वह कोशिका,

चेतना की दुःश्रव्य ध्वनि,

है शृष्टि यह जिससे बनी।

हर गति में,

हर प्रगति में,

अमूर्त में, साकार में,

व्योम के विस्तार में,

संघर्ष में अवकाश में,

और हरेक विकाश में।

मैं हर जगह मौजूद हूँ,

और चेतना के साथ हूँ,

इस संवेदना के साध हूँ,

कि इस रचना का रचयिता हूँ।

जान गया हूँ अब मैं खुद को,

मैं स्वयं ही अपनी अस्मिता हूँ।

 

मत दो दोष मुझे अहंकार का,

पूजक मैं तेरे विस्तार का,

मैं नतमस्तक, मैं श्रद्धामय

मुझमे अनुभूति तेरे आभार का।

 

मुझको मेरी निजता दे दो,

और दे दो अपनी साँसों पर अधिकार,

मुझमें जो सर्जन की क्षमता,

मुझमें जो चिंतन की क्षमता,

मात्र इसे कर लो स्वीकार।

 

मैं जीव हूँ, छाया नहीं,

चलता हूँ, मात्र गया चलाया नहीं।

यह पूरा अनछुआ सच है,

नहीं इसमें कोई दिखावा है।

छलावा जो भी हो,

इतना तो निश्चय ही इसके अलावा है।

गम

blue and purple cosmic sky
Photo by O1234567890 on Pexels.com

 

पास आये गम तो

बुरा नहीं  मानना।

आँखें हों  नम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

सूखी आँखों ने जला डाले

ना जाने कितने मंजर,

कभी भींगे जो दामन तो

बुरा नहीं  मानना।

 

उम्रभर चले आगे

साध औरों के होने,

पीछे जो अब लौटें कदम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

सुना है बाँटने से

कम होती नहीं कभी,

फिर भी कभी खुशियाँ लगै कम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

कभी आवाज आये

बहुत दूर से कहीं

और बेसाख्ता मुड़ै कदम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

अपनी सुनी,किया जो चाहा

फिर भी शिकवे बाकी है,

हो अपने से ऐसे अनबन तो

बुरा नहीं  मानना।

 

थमने को और मुड़ने को

बुजदिली कहेंगे बेशक सब,

पर रफ्तार से कभी जो जाओ सहम तो

बुरा नहीं  मानना।

 

संशय आशा विश्वास

img_7515

मुझसे शुरू होकर

दिगंत तक जो जाता है,

हर बार प्रश्न बनकर जो लौट-लौट आता है,

क्या यह सब एक छलावा है।

या कहीं कुछ इसके भी अलावा है।

 

संशय

 

क्या हूँ, कहाँ हूँ, कौन हँ,

आक्रांत हूँ और मौन हूँ।

क्या इस प्रश्न का उत्तर मेरा देय है।

क्या बँधा हूँ मैं

किन्ही यक्ष प्रश्नों के बंधनों में,

या इस सबसे अलग

मेरे होने का कोई ध्येयहै।

कया होगा

अगर उत्तर मिल भी गया तो।

क्या लगेगा कोई पूर्ण विराम,

या काल के प्रवाह में

यह अद्रिष्य-सा सूक्ष्म कण

रहेगा निन्दित अपने अहम के लिये।

अपने सारे वहमके लिये।

और खुल जायेंगे

मुझे बेधते-मुझे भेदते

नये-नये आयाम।

क्या सचमुच है कहीं कोई पूर्ण विराम।

 

पर प्राण की जो आग है,

मन में जलता जो आलोक है,

और अहर्निष झंझा-सी जो ये चेतना है,

उसका मैं क्या करूँ।

जड़ हो जाऊँ, चुप रहूँ

और समा जाऊँ अपने ही अंदर

कि इस ब्रह्मांड में इतना ही मेरा दावा है।

या इसके भीकुछ अलावा है।

 

 

आशा

 

 

अनन्त-सा इतना बड़ा संसार,

इतने चमत्कार,

इतने सारे अद्भुत व्यापार,

व्यर्थ तो नहीं होग।

सूर का उगना-ढलना,

जीवन चक्र कारुकना-चलना,

इनमें कोई अर्थ तो कहीं होगा।

यदि हाँ- तो सम्भावनाएँ हैं,

विकल्प हैं

आधार है।

तर्क से परे, ज्ञान से अलग

आशा का जो प्रस्फुटन है

मूर्त होता बरवस वह निराकार है।

और इसके बाद

संघर्ष है पर भय नहींहै।

अपने होने पर कोई संशय नहीं है।

धमनियों में बहता लहू उष्ण पर बेचैन नहीं है।

अस्तित्व अपने हीं प्राण की आग में जलता दिन-रैन नहीं है।

सृष्टि सिर्फ मेरी नहीं,

पर इसमें मेरा हिस्सा है।

नहीं अनूठी सबसे लेकिन

मेरा भी एक किस्सा है।

मन सुनता अंतर्मन से आता एक बुलावा है।

हाँ-हाँ, इसके भी कुछ अलावा है।

 

विश्वास

 

समग्र का एक अंग हूँ,

सूक्ष्म-सा तरंग हूँ।

हूँ छोटी-सी वह कोशिका,

चेतना की दुःश्रव्य ध्वनि,

है शृष्टि यह जिससे बनी।

हर गति में,

हर प्रगति में,

अमूर्त में, साकार में,

व्योम के विस्तार में,

संघर्ष में अवकाश में,

और हरेक विकाश में।

मैं हर जगह मौजूद हूँ,

और चेतना के साथ हूँ,

इस संवेदना के साध हूँ,

कि इस रचना का रचयिता हूँ।

जान गया हूँ अब मैं खुद को,

मैं स्वयं ही अपनी अस्मिता हूँ।

 

मत दो दोष मुझे अहंकार का,

पूजक मैं तेरे विस्तार का,

मैं नतमस्तक, मैं श्रद्धामय

मुझमे अनुभूति तेरे आभार का।

 

मुझको मेरी निजता दे दो,

और दे दो अपनी साँसों पर अधिकार,

मुझमें जो सर्जन की क्षमता,

मुझमें जो चिंतन की क्षमता,

मात्र इसे कर लो स्वीकार।

 

मैं जीव हूँ, छाया नहीं,

चलता हूँ, मात्र गया चलाया नहीं।

यह पूरा अनछुआ सच है,

नहीं इसमें कोई दिखावा है।

छलावा जो भी हो,

इतना तो निश्चय ही इसके अलावा है।

दोस्ती

pexels-photo-1090972

 

दोस्ती

ताना बाना नहीं है,

बँधना बँधाना नहों है।

बस खुलते जाना है।

 

दोस्ती

एक दूसरे तक आना जाना नहीं है,

दूर होकर भी साथहोने एहसास जताना है।

 

दोस्ती

सुनना सुनाना नहीं है,

रूठना मनाना नहीं है,

खोना औरपाना भी नहीं है,

दोस्ती

बिना कुछ कहे भी

एक दूसरे को समझ पाना है।

दोस्ती

विश्वास की चट्टान है,

चरित्र का खजाना है।

और इसका रंग

उतना ही गहरा

जितना यह पुराना है।

 

ःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःः

 

 

दोस्ती बचपन की पहली चाहत,

दोस्ती औरों को अपनाना,

मैं को खोना, हम को पाना,

दोसती सुकून उम्र भर की है,

घबड़ाहट में जैसे राहत।

 

दोस्ती है खुद को दे देना,

पीछे रख कर तेरा-मेरा,

जहाँ मिल गये वहीं बसेरा,

देने से परहेज नहीं,

और लेना जैसे खुद से लेना।

 

दोस्ती जैसे घर का पता हो,

कभी कहीं जो भटक गये तो,

पता लौट के कहाँ है जाना,

-नहीं सूझता कुछ यार बता दो-

दोस्ती जैसे घर का पता हो।

 

दोस्ती खुली आँखों का सपना,

कभी भी बाँधे नहीं बँधेगा,

कभी साँचे में नहीं ढलेगा,

झगड़े, प्यार, मनुहार दिल्लगी,

रोना गाना सब है अपना।

 

दोस्ती मुक्ति का बोध हरेक क्षण,

पोर-पोर बस खुलते जाना,

गप्प सराके, हँसी ठहाके,

यह भी भूला, वह भी विस्म्रित,

शेष बचा तो केवल जीवन।

दोस्ती मुक्ति का बोध हरेक क्षण।

 

निवृति

pexels-photo-1085695

 

कैसा गुजरा, वक्त जाने।

मैं जिया।

लिया दिया,

खोया पाया,

हँसा रोया,

बहुत कुछ है विस्म्रिति के भूतल में,

बहुत कुछ चिन्हित स्मृति पटल पे,

बहुत कुछ भूला, बहुत कुछ जाना,

पर हर क्षण में अपनी चेतना का स्पर्ष किया।

मैं जिया।

 

सकुचे शर्माये नहीं,

डरे घबड़ाये नहीं,

कीचड़ में पाँयचे उठाये नहीं,

लहू और पसीने से

अपने आपको बताये नहीं,

भीड़ में शामिल होके,

भँवर में दाखिल होके,

दूर-दूर तक अमृत को ढूँढा,

जरूरत हुई तो विष को भी पिया।

मैं जिया।

 

खुद को कभी खोया नहीं,

पैरों चला, अपने को ढोया नहीं,

जो किया, जो कहा,

उसका पूरा दायित्व लिया,

यह युद्ध नहीं था जीवन धा,

घाव सहे, सम्मान किया।

मैं जिया।

 

किससे सीखा, यह मत पूछो,

कब रहा अनछुआ याद नहीं,

सबके ऋण साँसों मे हैं,

कोई इसका अपवाद नहीं।.

 

अपनी शर्तों पर जीने वाला,

क्या दंभ करूँ कुछ देने का,

बस कोशिश की और ध्यान दिया,

सबको अपना-सा मान दिया।

 

कुछ ऐसे हीं मैं जिया।

एकांत

pexels-photo-1606399

अपना सबकुछ अपने आपको ही दे देना।

 

जैसे खुद ही नाव और खुद ही पतवार भी,

खुद ही किनारा और खद ही मँझधार भी,

 

खुद ही धारा और खुद ही बहावभी,

किनारों से दिखती सम गति भी और

पानी में  दिखता ठहराव भी,

 

ना समरसता की ऊब

ना परिवर्तन की हिलोड़ें,

कोई तृष्णा नहीं पूछती-

क्या पकड़ें क्या छोड़ें।

 

भयावह नहीं लगता अंतहीन विस्तार,

सहज सरल लगते जो दिखते

साकार निराकार निर्विकार।

 

ऎसे में

कभी पतवार यूँ चलाना

कि गति तो हो

पर नहीं कोई स्पंदन,

एक पीड़ाहीन व्यथा

पर नहीं कोई क्रंदन।

 

बस स्वयं से एक नीरवसंवाद

और आत्मा से निकलती एक मादक मूर्छा-

कि समग्र अस्तित्व पूछ उठे-

यह क्या था,यह क्या था।

 

ना कोई घात ना प्रतिघात,

ना कोई अपराधबोध,

ना ही अहम और पराक्रम की विभीषिका।

मात्र पूरे  ब्रह्मांड से तरल सहजता।

 

मैं ने अपने आप को खुद को दे दिया।