निवृति

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कैसा गुजरा, वक्त जाने।

मैं जिया।

लिया दिया,

खोया पाया,

हँसा रोया,

बहुत कुछ है विस्म्रिति के भूतल में,

बहुत कुछ चिन्हित स्मृति पटल पे,

बहुत कुछ भूला, बहुत कुछ जाना,

पर हर क्षण में अपनी चेतना का स्पर्ष किया।

मैं जिया।

 

सकुचे शर्माये नहीं,

डरे घबड़ाये नहीं,

कीचड़ में पाँयचे उठाये नहीं,

लहू और पसीने से

अपने आपको बताये नहीं,

भीड़ में शामिल होके,

भँवर में दाखिल होके,

दूर-दूर तक अमृत को ढूँढा,

जरूरत हुई तो विष को भी पिया।

मैं जिया।

 

खुद को कभी खोया नहीं,

पैरों चला, अपने को ढोया नहीं,

जो किया, जो कहा,

उसका पूरा दायित्व लिया,

यह युद्ध नहीं था जीवन धा,

घाव सहे, सम्मान किया।

मैं जिया।

 

किससे सीखा, यह मत पूछो,

कब रहा अनछुआ याद नहीं,

सबके ऋण साँसों मे हैं,

कोई इसका अपवाद नहीं।.

 

अपनी शर्तों पर जीने वाला,

क्या दंभ करूँ कुछ देने का,

बस कोशिश की और ध्यान दिया,

सबको अपना-सा मान दिया।

 

कुछ ऐसे हीं मैं जिया।

एकांत

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अपना सबकुछ अपने आपको ही दे देना।

 

जैसे खुद ही नाव और खुद ही पतवार भी,

खुद ही किनारा और खद ही मँझधार भी,

 

खुद ही धारा और खुद ही बहावभी,

किनारों से दिखती सम गति भी और

पानी में  दिखता ठहराव भी,

 

ना समरसता की ऊब

ना परिवर्तन की हिलोड़ें,

कोई तृष्णा नहीं पूछती-

क्या पकड़ें क्या छोड़ें।

 

भयावह नहीं लगता अंतहीन विस्तार,

सहज सरल लगते जो दिखते

साकार निराकार निर्विकार।

 

ऎसे में

कभी पतवार यूँ चलाना

कि गति तो हो

पर नहीं कोई स्पंदन,

एक पीड़ाहीन व्यथा

पर नहीं कोई क्रंदन।

 

बस स्वयं से एक नीरवसंवाद

और आत्मा से निकलती एक मादक मूर्छा-

कि समग्र अस्तित्व पूछ उठे-

यह क्या था,यह क्या था।

 

ना कोई घात ना प्रतिघात,

ना कोई अपराधबोध,

ना ही अहम और पराक्रम की विभीषिका।

मात्र पूरे  ब्रह्मांड से तरल सहजता।

 

मैं ने अपने आप को खुद को दे दिया।

 

अन्तर्निहित

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अजीब-सी बेफिक्री में हँ आजकल।

कल के खयाल भी आज याद नहीं आते।

कितना कुछ खो जाता है।

पर मलाल नहीं है।

अपने से आँख तरेरे कोई सवाल नहीं है।

 

अच्छा लगने लगा है

कि कुछ भी ठहरता नहीं है,

अनचाहे उद्वेगों की गति सम होने लगी है

और किसी भी चीज पकड़ने की जिद भी

कम होने लगी है।

 

कुछ किसी और का हो जाये न कहीं-

डसता नहीं है भरमाता नहीं है।

खोने का डर भी हर पल कुछ संजोकर

रखलेने को उकसा पाता नहीं है।

 

कोई कातरता नहीं है,

इस अपरिग्रह में, इस विराग में

लगता है सब कुछ सही है।

नहीं, कहीं से भी यह

हौसले की कमी नहीं है।

 

केई समझौता नहीं वहाँ तक पहुँचने

अपने तरीकों से

और कोई बदलाव नहीं चीजों से रू-ब-रू होनेके

अपने सलीकों में,

बस पाने और खोने का फर्क

अपना रंग खोने लगा है।

ऊपर से यह कि हारने और छोड़ने

के बीच का महीन-सा फर्क अब

साफ-साफ दिखने और भाने लगा है ।

सचमुच इस बेलगाम बेफिक्री में

जीने का मजा आने लगा है।

 

 

स्निग्धद्धता

 

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कभी-कभी रोया करो।

 

आँखें नम होंगी

तो जलन कम होगी।

 

धुँधलका छँटेगा

और दूर तक दिखेगा।

 

दाग धब्बे कम नजर आयेंगे

मिटते वहम नजर आयेंगे।

 

एक बात बताता हूँ

करके देखोगे तो मान जाओगे

जब भी सूखेगी पलकें

अपने आप को धुला पुछा पाओगे।

सानिध्य

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तल्खियों को बसएक शाम की जरूरत है।

हमें तो शिकायतों से भी मुहब्बत है।

 

ये शोखियाँ, ये कहकहे,

कितने किस्से अधकहे,

ये हल्की-हल्की बेखुदी,

यकीनन,

जिन्दगी बड़ी खूबसूरत है।

नीरव नाद

यह  कैसा  वैराग्य   है   बंधु  यह  कैसा   मधुमास,
होठों लगा हो  मधु  का  प्याल  गले  लगी हो प्यास।

कोलाहल और नीरवता  दोनो  ही  मुझको  प्यारे हैं,
एक है  मेरे दिल की धड़कन  एक  मन का  विश्वास।

तिनका-तिनका बुना बसेरा पर झंझा से आक्रांत नहीं,
निशचल रहा निश्छल मन मेरा जब पवनबहे उनचास।

पाने का  खोने  का कुछ  फर्क  नहीं अब  मेरे मनमें
रेत कण-कण रहा फिसलता पर बांध लिया आकाश।

प्रतिरोध और करुणा

प्रतिरोध अगर न कहीं पड़े,
पौरुष अगर न कहीं अड़े,
तो बल कोइ कहाँ लगायेगा?
शून्य से लड़ क्या पायेगा?

आँखों में यदि पानी न हो,
पड़ पीड़ा पहचानी न हो,
दिन रात बीतते जायेंगे
क्या यह जीवन कहलायेगा?
या शून्य ही शून्य रह जायेगा?