भाव खिले कुछ कौतूहल के

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भावशून्य और दिशाहीन-सा,

बिन उद्देश्य और तृण-सा हलका,

मन के अंतरिक्ष  निर्बंध विचरता,

बन सहज शून्य, उन्मुक्त सरलता।

इस जड़ता के सुख में सहसा,

यह कौन आया मुझ तक चलके?

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

शांत हृदय था, व्यथा हीन था,

जीवन था निर्वाण-सा लगता,

पर प्रतीति अपूर्णता की हर क्षण,

स्थिति यह परित्राण या जड़ता?

सुख जड़ता का, आनंद न होता,

तंद्रा तोड़ जग पड़ा सँभल के।

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

स्फुटन हुआ, प्राणों में आड़ोलन,

आत्मा सजग, चित्त में स्पंदन,

सूक्ष्म गति में उद्देश्य मिल गया,

सृष्टि हुई जीवन का अभिनंदन।

ठगा-ठगा सोचता रह गया

कहाँ छुपे थे, अब अर्थ जो झलके?

फिर भाव खिले कुछ कौतूहल के।

चरम शांति और दुर्धर्ष समर में

दोलन है, कोई अंतिम तत्व नहीं है

जीवन के इस महा गाथा में

विराम भले हो, अमरत्व नहीं है।

जिज्ञासा बिन मृतप्राय मनुज है,

गति और संधान से जीवन चलते।

यूँ भाव खिले कुछ कौतूहल के।

कितना चले हम

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दो हाथ अगर ढँक लें,

फिर फर्क नहीं पड़ता कि तूफान कितना बड़ा है,

लौ जलता रहता है।

आस्था अगर स्थिर हो,

फिर फर्क नहीं पड़ता कि समक्ष कौन खड़ा है,

जीवन चलता रहता है।

यह नहीं कि कहाँ से शुरू हुए हम,

बात होनी चाहिये कि कितना चले हम,

यही रास्ता, यही मंजिल है।

यह नहीं कि कितना पा लिया है,

दे क्या पाये, कितना उठे देने के पहले हम?

यही जिन्दगी का हासिल है।

कितने हमारे पीछे चले,

कुछ भी नहीं करता है साबित कभी,

हम उसी जगह पहुँचते हैं।

कितनों के साथ चले हम,

कितनों को यह साथ जगत के हित लगी,

सार्थकता इसी को कहते हैं।

बेमानी है बात यह कि,

यहाँ तक पहुँचने में कितनी लड़ाईयाँ लड़ी,

संघर्ष हर जीवन का हिस्सा है।

कितना बल पाते हैं हमसे,

जो आज लड़ रहे हैं कल के लिये हर घड़ी

बस उतना ही है हमारा किस्सा है।

जो बीता है

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क्षेम कुशल और नेह निमंत्रण नया-नया है,

जो बीता है कठिन, किंतु फिर भी अच्छा है,

स्मृति से जो चित्र उकेरूँ, रोष ना करना,

याद वही है आता जो कि बीत गया है।

आड़े-तिरछे जैसे भी सोपान बने थे,

पग धर उन पर ही हैं इस पल तक आये,

अरुचि, असहमति चाहे जितनी भी हो हम में,

सामर्थ्य उसी कल से है, हम कल के ही जाये।

नव्यता के उत्सव से क्यों बैर किसीको,

जीवन तो हर क्षण उत्सुक आह्वान इसी का,

पर समिधा बन जो भस्म हुआ हवन-यज्ञ में,

उस प्रत्यक्ष को क्या चाहिये प्रमाण किसी का?

होड़ श्रेय का सहज मानव दुर्बलता है,

किंतु लौ बनती जलते तेल और बाती ही से,

आज का जो भी, जितना भी सुन्दर है,

गढा गया है मात्र कल की माटी ही से।

इस कृतज्ञता से विहीन जब भी मन होगा,

सोचे जब कल उसका मूल्यांकन होगा,

उसके सारे श्रम और चिंतन का भी,

ऐसे ही हीन भावों से अवलोकन होगा।

सहानुभूति, सम्वेदना और भाव नमन के,

हों प्रस्तुत पहले, अतीत के विश्लेषण के,

प्रगति और उत्थान की निरंतरता की,

अक्षुण्णता संभव, मात्र एक श्रृंखलित बंधन से।

महिमा मंडन बिन उद्यम हो भले अरुचिकर,

मूलाधार से चिर कृतज्ञता का भाव सच्चा है।

क्षेम कुशल और नेह निमंत्रण नया-नया है,

जो बीता है कठिन, किंतु फिर भी अच्छा है।

अंधेरा-उजाला

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मेरे दिल के एक कोने में

अभी भी अंधकार है,

फिर भी हकीकत है कि

उस कोने से, मुझको बहुत प्यार है।

वह प्यार नहीं जो किसी सोते हुए

बच्चे को देख कर आता है।

वह प्यार भी नहीं जो किसी रोते हुए

बच्चे को देख कर आता है।

कुछ वैसा, जैसा सबकुछ खोते हुए

किसी आदमी को देख कर आता है,

जिसे पता भी न हो कि उसका सबकुछ

उससे हमेशा के लिये दूर हुआ जाता है।

हुआ कुछ यूँ है कि

बाकी जगहों को रोशन करने में,

इस कोने ने कभी रोका नहीं,

अंधेरे को अपने घर को भरने में।

क्या भान नहीं था कि इस अंधेरे से,

उसकी अपनी रोशनी गुम हो जायेगी?

या यह यकीन था इसके पीछे कि,

रोशनी बाँटने से बढती ही जायेगी।

बहरहाल मुझे अंधेरा तनिक भी

रास नहीं आता है,

पर इससे उस कोने से मेरा लगाव

तनिक भी कम नहीं हुआ जाता है।

अंधेरे से मेरी लड़ाई

बदस्तूर जारी है,

पर किसी को रोशन करने को,

खुद अंधेरे में रह पाने की अदा अब भी प्यारी है।

वह कोना एक और इल्म

मुझे देता है,

कि रोशनी कहीं भी हो,

कुछ तो रोशन होता है।

और समेट लेने से कहीं भी,

अंधेरा यकीनन कम होता है।

अगर फिर से मुझे अंधेरे-उजाले के

बँटवारे का सवाल कभी उलझायेगा,

अंधेरा सिमटेगा मेरे अंदर,

सिर्फ उजाला ही बाहर जायेगा।

कर्म योग

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वंचित मत कर मुझे प्रहार से,

बस सहने की क्षमता संग दे दे।

कुंठित मत कर सदाचार से,

मन में कुछ हिलोरें, तरंग दे दे।

मानना तो चाहता हूँ,

पर कुछ नये बनाना चाहता हूँ,

नियम जीवन के अबतक के,

एक बार दोहराना चाहता हूँ।

कोई तिरस्कार नहीं कहीं भी,

रंच मात्र अहंकार नहीं,

किसी भी पथ, पंथ के प्रति,

कोई कुत्सा नहीं धिक्कार नहीं।

हठ नहीं, समर्पण है,

है सम्मान उसी अवधारणा का,

समग्र सृष्टि का उत्थान मात्र ही,

हो लक्ष्य सारी साधना का।

इसी बिन्दु से हम दोनों का,

निकला पहला परिचय है।

यदि मिले तो, उसी बिन्दु पर,

फिर से मिलना निश्चय है।

निषेध, भले ही किसी भाव का,

पूर्णता से बंचित ही करता,

बचने का प्रयास आघात से,

अवांछित भय है मन में धरता।

जो स्थापित उससे व्यवहार के

दो विधियाँ होती निश्चित ही,

पर बिना कसौटी पर परखे क्या,

निर्णय होगा उचित कभी?

दासता तेरी कृपा का,

फिर भी रहेगी दासता,

आहूति नव निर्माण में ही,

गोचर तेरी सच्ची कृपा।

मुखर मेरी जिज्ञासा को कर,

जूझने का सहज उमंग दे दे।

सुख-भोग की निष्क्रियता से मुक्ति दे,

कर्म योग के छंद दे दे।

कुंठित मत कर सदाचार से,

कुछ हिलोरें, तरंग दे दे।

कर्मस्थल

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मन की सीमाहीन गहराइयों में

कहीं कहीं ज्योति पुंज हैं,

शेष चतुर्दिक अंधकार।

कहीं कहीं ध्वनि सजग है,

अन्यथा नीरवता साकार।

व्याख्या प्रकाश की विस्तृत सर्वथा,

अपरिभाषित सदा अंधकार,

ध्वनि सदा शब्द और संगीत हो गूँजे,

तिरस्कृत नीरवता हर प्रकार।

खोजने में इनके अर्थ,

कितने सक्षम हम कितने समर्थ,

प्रश्न नहीं, हमारे ज्ञान की सीमारेखा है,

इनके आगे जो है, अनजाना अनदेखा है।

छुपी कहीं इस नीरवता के सघन विस्तार में,

और इस सर्वव्यापी, सूचिभेद्य अंधकार में,

हमारे उन प्रश्नों के उत्तर हो सकते हैं,

जिन्हें हम उजालों में ढूँढते नहीं थकते हैं।

तो क्या अब भी कोई संशय है,

कि यही अगले अनुसंधान का पहला विषय है?

नीड़वता से संयम, अंधकार से दूरी,

अज्ञात से सुरक्षा, पूरी की पूरी,

क्यों हमारा स्वभाव होता जा रहा है,

क्यों जिज्ञासा का स्वाद खोता जा रहा है?

क्या जीवन यह शब्दहीनता और नरम धूप में,

बनी बीतने सुख सुविधा के अंधकूप में?

क्या क्षितिज के पार देखने की आकांक्षा,

बुझ जायेगी, सीमित प्रांगण के रंग-रूप में?

अर्जित सारे प्रकाश पुंज और शब्द ब्रह्म सब,

निधियाँ हैं, शीष सदा नत आदर को तेरे,

पर सविनय एक अनुमति मन माँग रहा हूँ,

शेष नीरवता और अंधकार कर्मस्थल हों मेरे।

कर्मस्थल

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मन की सीमाहीन गहराइयों में

कहीं कहीं ज्योति पुंज हैं,

शेष चतुर्दिक अंधकार,

कहीं कहीं ध्वनि सजग है,

अन्यथा नीरवता साकार।

व्याख्या प्रकाश की विस्तृत,

अपरिभाषित सदा अंधकार,

ध्वनि सदा शब्द और संगीत हो गूँजे,

तिरस्कृत नीरवता हर प्रकार।

खोजने में इनके अर्थ,

कितने सक्षम हम कितने समर्थ,

प्रश्न नहीं, हमारे ज्ञान की सीमारेखा है,

इनके आगे जो अनजाना अनदेखा है।

छुपी कहीं इस नीरवता के सघन विस्तार में,

और इस सर्वव्यापी, सूचिभेद्य अंधकार में,

हमारे उन प्रश्नों के उत्तर हो सकते हैं,

जिन्हें हम उजालों में ढूँढते नहीं थकते हैं।

तो क्या अब भी कोई संशय है,

कि यही अगले अनुसंधान का पहला विषय है?

नीड़वता से संयम, अंधकार से दूरी,

अज्ञात से सुरक्षा, पूरी की पूरी,

क्यों हमारा स्वभाव होता जा रहा है,

क्यों जिज्ञासा का स्वाद खोता जा रहा है?

क्या जीवन यह शब्दहीनता और नरम धूप में,

बनी बीतने सुख सुविधा के अंधकूप में?

क्या क्षितिज के पार देखने की आकांक्षा,

बुझ जायेगी, सीमित प्रांगण के रंग-रूप में?

अर्जित सारे प्रकाश पुंज और शब्द ब्रह्म सब,

निधियाँ हैं, शीष सदा नत आदर को तेरे,

पर सविनय एक अनुमति मन माँग रहा हूँ,

शेष नीरवता और अंधकार कर्मस्थल हों मेरे।

मन के बंधन

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बँधी भुजाएँ, ज्ञान रुद्ध था,

लगता सारा जग विरुद्ध था,

सारी मति थी भटकी-भटकी,

वेग थमा-सा, गति थी अटकी,

दिग्भ्रमित प्राण था होता जाता,

कोई छोर नहीं दिखता था।

धर चुटकी में सिरा कौन तुम,

समस्त सृष्टि को कर मौन तुम,

विश्वास एक मेरे मन में डाला,

फिर बड़े जोड़ से मुझे उछाला।

था इस अनुभव का रोमांच नया,

खुला मैं और खुलता ही गया।

पाशमुक्ति और भारहीनता,

भर-भर मन में चिर कृतज्ञता,

संशय, भय और क्रोध ले गयी,

उन्मुक्तता का बोध दे गयी।

शक्ति मुझे दो, कि बँधने पर,

खुलने को सबकुछ दाव पर दूँ धर,

सामर्थ्य वही, ऊपर उठने को,

मन के बंधन खोल सके जो।

रथ को मोड़ा

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लीक बनी, गंतव्य ज्ञात था,

पथिक साथ थे, द्रव्य साथ था,

बहुत प्रलोभन, दंभ भी थोड़ा,

फिर भी मैंने रथ को मोड़ा।

देवालय मेरे सम्मुख था,

पूजन-अर्चन बिधिसम्मत था,

गुरुजनों का आशीष प्राप्त था,

सजे थाल में फूल-अक्षत था।

सहज ज्ञान आगे चल, कहता,

नक्षत्रों ने सम्मोहन जोड़ा।

फिर भी मैंने रथ को मोड़ा।

गोचर पथ का स्नेह आमंत्रण,

नये देश में निश्चित अभिनंदन,

उन्नत भविष्य के संकेत सुलभ,

पर जाने कैसा अज्ञेय-सा बंधन,

चेतना को कर कर के उद्वेलित,

अकस्मात मन को झकझोरा,

तंद्रा भंग कर रथ को मोड़ा।

राह बनायी कभी किसी की,

यात्रा और गंतव्य परिभाषित,

दोहराना स्वयम को आयोजन-सा,

क्या मैं मात्र एक यंत्र हूँ निर्मित?

तज सम्भावना ऋद्धि-सिद्धि के,

बिखरते स्वयम को समेट बटोरा।

रुका उसी क्षण रथ को मोड़ा।

हूँ कृतज्ञ, नतमस्तक, धन्य,

कि छोड़ दिया, कि छोड़ सका,

तोड़े बंधन, पथ एक अपना,

अपने हाथों से लिया बना।

होने और हो पाने की दूरी,

पूरी की, कुछ अपना जोड़ा।

हूँ कृतकृत्य कि रथ को मोड़ा।

सबके अपने-अपने जीवन

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धीर, शांत और मुदित नयन,

निहारता उत्ताल लहरों का नर्तन,

अठखेलियां करती उर्मियाँ, पवन,

अगाध वक्ष में संचित कर जीवन।

सागर नि:संग हो करता अवलोकन,

देखता चतुर्दिक योजनों के योजन,

स्थितप्रज्ञ, विचारता सकल जल मेरा,

यद्यपि बूंद मात्र नहीं मेरे प्रयोजन।

उदात्त चरित्र का अपना सम्मोहन,

स्वयम से कहता हर पल हर क्षण,

मोह हीन मैं, क्षोभ हीन मैं,

मेरा जल हेतु जगत के  जीवन।

टूटी तंद्रा, देख जल को होते स्वच्छंद,

और उठते वाष्प का निरंतर उर्ध्वगमन,

बिन अनुमति यह चला क्योंकर,

इतने क्षीण क्या सम्बंध और बंधन।

उठता उपर, क्षण क्षण जीवन में गहराता,

संघनित वाष्प हो गया नभ में मेघ सघन,

बरसता, बहता, उफनता, लहराता,

सहज आ मिला पुन: सागर से प्रवाह बन।

भ्रम कि जो मुझमें है, मेरा है,

आधारहीन, क्षणभंगुर, भ्रांतिक दर्शन,

आवरण, काया, विवेक, अंतर्मन अपने,

पर सबके हैं अपने-अपने जीवन।