तुमने कैसे सच मान लिया

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कभी कहा था मैंने,

कि मैं हार गया,

गणना में लाभ हानि के।

याद हैं मुझे अपने शब्द वे,

बिना किसी ग्लानि के।

पर यह अब तक है,

मेरे हृदय को सालता

कि किस भ्रम में,

तुमने उसे सच मान लिया।

जीवन का प्रवाह कभी कभी,

संगठित होने को,

या दिशा बदलने को,

रुकने का आभास देता है।

फिर तोड़ सारे बंधन,

पुनर्स्फूर्त हो चलता है।

वृक्ष, तजते मोह आज का,

कल के पत्तों को पाने को,

कभी कभी मृत्यु का स्पर्ष,

आवश्यक, अंतरतम तक जाने को।

गति यदि उर्ध्वगामी हो तो,

छाया स्थिर दिखती भू पर,

ठहरा हुआ मन ही तो अंततः,

जाग्रत रखता प्राणों को छू कर।

मैं जब भी थका, झुका या हारा,

बस रुका और फिर चलने का ठान लिया।

किस भ्रम में किसी हार को मेरी,

तुमने कभी सच मान लिया।

अभिप्राय

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हृदय बसा अंधकार विषम-सा,

पौ फटने के पहले तम-सा,

नीति कहाँ है, न्याय कहाँ है?

जीवन का अभिप्राय कहाँ है?

इतने जतन से लिखा जिसे था,

पहला वह अध्याय कहाँ है?

समता मानवता के स्तर पर,

स्वाभिमान से उन्नत हर सर,

मन उन्मुक्त, स्वच्छंद विचार,

सबके लिये होँ सारे अवसर।

क्यों लगता सबकुछ खोता-सा,

अपने ही भ्रम में रोता-सा,

विकल, विवश और हीन भाव से,

थककर रणभूमि में सोता-सा?

क्या थी, कैसी थी वह आशा?

संघर्ष पूर्व फल की प्रत्याशा?

बिना सहे पीड़ा रचना की,

असत्य, प्राप्ति की हर परिभाषा।

माना शुचिता के साथ खड़े तुम,

क्या चमत्कार की आस खड़े तुम?

बिन उद्यम आकांक्षा फल की,

मान स्वार्थ को विश्वास पड़े तुम?

दीन, हीन, कातर और विह्वल,

भाव समर्पण के निश्चय निर्मल,

पर बिन उद्यम प्राप्ति की इच्छा,

प्रमाद, प्रवंचना, वैचारिक दलदल।

कर संघनित शक्तियाँ सारी,

निर्मित कर बस एक चिंगारी,

प्रखर विवेक कर, जीवन यज्ञ में

स्वाहा कर अपनी कुंठा सारी।

शक्ति-संकेत गहराते तम में,

सृजन बिंदु हर स्थिति विषम में,

कोरे पृष्ठ हम ले कर आते,

जीवन रचते प्रण और उद्यम में।

संवेदना और विश्वास

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चतुर्दिक जड़ता का विस्तार,

सघन नीरवता और अंधकार,

चेतना के अंतिम गह्वर में,

प्रस्फुटित हो अंतिम प्रहर में,

गहरे कहीं प्राणों में संवेदनाएँ उग पड़ी,

सस्मित अर्थपूर्णता थी पार्श्व  खड़ी।

दूर नहीं था फिर क्षितिज पर,

धरे लालिमा ललाट धर भास्कर,

निर्मल भोर के प्रकाश-सा ज्ञान,

हुआ उदित बन एक चिर सहचर,

उदित संवेदना से ज्ञान तक की पगडंडी,

सामूहिक मानव चेतना की पहली कड़ी।

जगा विवेक ज्ञान से उग कर, 

ज्यों उठा सूर्य नभ में कुछ ऊपर,

फिर उसकी उष्मा प्राणों में भर,

मानवता की  भाषा आयी उभर।

 सकलता, उन्मुक्तता, प्रेरणा कर्म की,

 आधार बनी आध्यात्म की, धर्म की।

  द्वंद्व, आलोचना, विरोधाभास,

  प्रश्न, प्रतिकार, निजता के अभ्यास,

  सबके सब आड़ोलन मन के,

  पूर्णता के विग्रह, संधि-समास।

  उद्यम, कीर्ति, पराक्रम, प्रेम, रुदन और हास,

  संलग्न दो ही रज्जु से, संवेदना और विश्वास।

क्या भाव जगे थे, कुछ तो बोलो

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नहीं द्वेष था, नहीं विकलता,

अपना लगता जगत सकल था,

बाल सुलभ क्रीड़ा, किलकारी,

चित्त का हर विषय सरल था।

ना आकांक्षा, ना अभिलाषा,

नहीं भविष्य की कोई प्रत्याशा,

‘नि:शुल्क नहीं कुछ जग में’,

सुनी प्रथम जब तुमने यह भाषा।

‘बिन उद्देश्य के जीवन शापित,

ढूँढ प्रयोजन, उसके हो लो।’

क्या भाव जगे थे, कुछ तो बोलो।

रुधिर वेग से दौड़ रहा था,

किससे लेने होड़ चला था?

न्याय सृष्टि को देने को,

मन सारे बंधन तोड़ चला था।

अपने को न्यौछावर करके,

जग बदलूंगा जी के मरके,

बहुत दूर तक भाव चले संग,

जाने कहाँ फिर गये बिछड़ के?

जब कहा हृदय ने लज्जा मत कर,

बस मुड़ के उनको देख तो लो।

क्या भाव जगे थे, कुछ तो बोलो।

स्मृति एक माया लगती थी,

बंधन-सी काया लगती थी,

होना एक विपर्यय लगता,

घेर रही छाया लगती थी।

फिर भी तुमने नयन उठाये,

बिन किंचत अवसाद दिखाये,

नहीं तनिक भी धैर्य गँवाये,

असीम दृढता से थे मुस्काये।

बसा मन में विवेक जब बोला,

बंद कपाट को अब तो खोलो,

क्या भाव जगे थे, कुछ तो बोलो।

अब जब शिखर के पार हो चले,

मिट चुके रहस्य सारे वह पिछले।

सागर, सरिता पार कर चुके हो,

चकाचौंध सब लगते धुँधले।

स्वयम अपना ही हाथ पकड़कर,

अच्छा लगता, चलना जी भर,

पूछा किसी परिचित ने हँसकर,

‘लगा कैसा यह जीवन जी कर ?’

हर्ष, विषाद क्या उपजा मन में

बनो न पत्थर तनिक तो डोलो।

क्या भाव जगे थे, कुछ तो बोलो।

सदाशय

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जो वृक्ष आसमान में पंख पसारते हैं,

ऊपर उठते हैं, दूर तक निहारते हैं,

छाया देते हैं, शीतलता देते हैं,

कुछ लेते नहीं, मात्र देना स्वीकारते हैं,

होने के तथ्यों को और जीवन के सत्यों को,

मन में विचारते हैं,

उनकी जड़ें भी उसी मिट्टी में गड़ी होती हैं।

निस्पृह भाव भार उठाती हैं,

और किसी भी और पेड़ की तरह,

बिना किसी दम्भ के किये उसे खड़ी होती हैं।

जड़ से लिपटी मिट्टी वही होती है,

जड़ के जमीन से जुड़ने का भाव खास होता है।

ऊपर उठने को आकाश का आकर्षण नहीं,

जरूरी मन का विश्वास होता है।

ऊपर के विस्तार को बहुधा,

सामर्थ्य और बल से जोड़ा जाता है,

पर इन का निर्माण जड़ से पहुँचने वाली,

सूक्ष्म कोशिकाओं से ही हो पाता है।

अपनी टहनियों को सम्हालना,

अपनी जड़ों से कृतज्ञता का जुड़ाव

वृक्षों में और मानव मे भी,

भरता है, निर्लिप्त सदाशयता के भाव।

अभिप्राय जरूरी है,

संवेदनाएँ जरूरी है,

कल से जुड़ाव जरूरी है,

और कल की संभावनाएँ जरूरी हें।

मैंने देखा है

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सारी भावनाओं को, सारी संवेदनाओं को,

सारी इच्छाओं को, सारी चिंतन धाराओं को,

अनुभूति के एक सतह पर,

मैंने साथ-साथ चलते देखा है।

भिन्न रंग और भिन्न पकृति के दिखते,

लेकिन अंततः,

मन के अंतरिक्ष में सबको

एक बिंदु पर मिलते देखा है।

सारे दुखों को, सारे सुखों को,

सारी सुन्दरता को, सारे पराक्रम को,

अस्तित्व के एक पड़ाव पर,

मैंनें एक साथ चलते देखा है,

कुछ को आँखों के सामने खुल कर,

कुछ को अगले मोड़ के पार छुप कर,

घर-आंगन में पलते देखा है।

अलग-अलग पहचान बनाये,

आगे पीछे दौड़ लगाते,

हठात कहीं बरबस उलझाते,

कहीं-कहीं पर घात लगाये,

और कहीं षडयंत्र रचाते,

कहीं भँवरों में वृताकार,

पर अंत में पग आगे बढाते,

उस ओर जहाँ खिंची

मानव की नियति रेखा है।

मैंने देखा है,

जीवन के महासमर अथाह को,

मानव चेतना के महाप्रवाह को,

समतल वितानों से,

अंतहीन विवर गर्तों से,

और उतुंग पर्वत शिखरों से,

जूझते लड़ते और निर्बाध गुजरते,

होकर चतुर्दिक निर्वाह के जंजाल से,

दिखते अंतहीन भ्रमजाल से,

बिना किसी संकोच के विचरते,

और मानवता के वक्षस्थल-सा,

साँसों के संग उगते ढलते देखा है।

आदि काल से संहार-सृजन को,

द्वेष-प्रेम और निंदा-वंदन को

मैंने साथ-साथ चलते देखा है।

खुद से हुए संवाद

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याद आते हैं मुझको खुद से हुए संवाद,

रंगबिरंगी मोह-मधुरता, और घने अवसाद।

लज्जा के पल, तिरस्कार के क्षण, घड़ियाँ भोलेपन की,

उल्लास जीत के, गर्त ग्लानि के सबके सब हैं याद।

बल है मेरा, या पाँव की बेड़ी, यह मेरा इतिहास?

कठिन प्रश्न, पर कौंध रहा है उत्तर का आभास।

बीता जो है बीत चुका है,

मान कर सब कुछ विसार दूँ,

विश्वासघात-सा लगता है,

कि इस भाँति मन को विस्तार दूँ।

क्या सारे बीते के अवयव हैं मुझमें विद्यमान नहीं?

क्या उनसे ऋणि-धनी है मेरा वर्तमान नहीं?

पर उनके प्रति करने बैठूँ आज यदि मैं न्याय,

बीते से आगे नहीं बढेंगे जीवन के अध्याय।

चाहे जो उपयोग हो इसका बीता न परिशोधित होगा,

नहीं मिटेगी कुंठा, बस आज अवरोधित होगा।

रुद्ध आज को कर, बीते का विश्लेषण करना,

निश्चय, न भूत और न ही भविष्य के हित होगा।

इतिहास सखा है, और है निस्पृह शिक्षक अभिज्ञान,

पाठ पढें, चरण धूलि लें, यही उसका सार्थक सम्मान।

आगे बढें नवनिर्माण को इस शिक्षा से होकर उन्नत,

संकल्प-स्थिर डग, उर्ध्व ग्रीवा और नयन आभार-नत।

संघर्ष तो स्वभाव सहज है, नहीं इसका कोई अवसाद।

ऐसे याद आते हैं मुझको खुद से हुए संवाद।

हृदय कलश

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हृदय कलश कुछ रीत गया है,

तनिक उसे अब भरने दो,

कुछ और समाये इसके पहले,

स्वीकार मुझे यह करने दो।

बड़े जतन से एक हिस्सा इसका,

हरदम खाली रखता हूँ,

यदि सुपात्र न कोई मिले तो,

किसी आगंतुक से बाँटा करता हूँ।

यदि भरा यह रहे लबालब,

कुछ नया न कभी आ पायेगा,

द्रव संग्रहित वृथा रहेगा,

निष्प्रयोजन विघटित हो जायेगा।

कितना भी कुछ हो मूल्यवान,

बिन परिवर्तन स्थूल, हीनप्राण,

जीवन तक ना पहुँचे तो अमृत कलश भी

मात्र एक घट, एक उपादान।

हृदय कलश, अंतर्मन घट मेरा,

संचित करे सारे मधु कृतज्ञ हो,

कर दे शीतल प्यास किसी की,

दे नमीं जहाँ आवश्यक हो।

मोह न हो बाधक देने में,

जहाँ हों ग्राहक, सबकुछ दे दे,

भर ले फिर से सुधा संजीवनी,

यह यायावर कुछ ऐसे खेले।

यह क्रीड़ा सीमा विहीन हो,

उन्मुक्त पात्रता के प्रभाव से,

जिससे, जब भी मिले नव्यता,

ग्रहण करे नत, श्रद्धा भाव से।

व्यर्थ उद्यम का दोष न दो,

जो कर सकता हूँ करने दो।

हृदय कलश कुछ रीत गया है,

तनिक उसे अब भरने दो।

कालखंड

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काल नहीं कभी खण्डित होता,

चलता समगति, लय नहीं खोता,

नहीं कोई विराम, नहीं कोई विश्राम,

उसकी कोई दिशा नहीं, नहीं उसके कोई धाम,

निज को कभी नहीं दोहराता,

जो बीत गया नहीं फिर आता,

इसके मार्ग कभी लक्षित नहीं होते,

पग चिन्ह कहीं अंकित नहीं होते,

ज्ञात नहीं आरम्भ है इसका,

बीते का अवशेष ना मिलता।

तथ्य मात्र हैं, नहीं ज्ञान ये,

विचारूँ चाहे जितना ध्यान दे,

भ्रम से रहित नहीं चित्त होता।

काल नहीं कभी खण्डित होता।

जीवन हैं पर, खंड काल के,

पल, दिन, मास और साल ये,

जिनसे जीवन को चलना है,

है काल नहीं बस गणना है?

काल में जीते, काल है छूता,

नहीं कोई आयाम अछूता,

इसे जानने का दम्भ न पालें,

इसके दिये आशीष सम्हालें

जो कालखंड जिस अर्थ हमारे,

उनकी सुन्दरता उसी भाँति सवारें।

काल मात्र देता है अवसर,

बिन बंधन, बिन बाधित कर,

इसकी दृष्टि, कोई हीन नहीं,

और कोई महिमा मंडित नहीं होता।

काल नहीं कभी खण्डित होता।

तलाश

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तलाश उस तरंग की जो डूबने दे, उतराने दे,

झूमने दे, इतराने दे,

चाहूँ तो थमने दे, चाहूँ तो लहराने दे,

साथ ही अपने पर विश्वास कर पाने दे

कि मैं जुड़ा हुआ हूँ हर पल,

अपनी मूल चेतना से,

और सक्षम हूँ अपनी निजता को सम्हाल पाने में।

तलाश उस निर्बाध गति की,

जो बिना सवालों के जाने दे,

चाहूँ तो फिर लौट कर आने दे,

क्षितिज के पार,

और फिर उसके भी पार,

बार-बार,

स्वाद, सुगंध और संस्कृति लाने दे,

कोई प्रतिबद्धता नहीं,

कोई बंधन नहीं उन्हे त्यागने या अपनाने के,

पर मुझे चरम उन्मुक्तता को,

एक बार छू पाने दे।

तलाश उस क्षमता की,

जो अपने सम्मोहन के पार जाने दे,

जहाँ कोई नहीं गया एक बार जाने दे,

विश्वास और उद्देश्य दे,

हारे संबल को बार-बार प्रबल कर पाने दे,

दुर्गम हिम शिखरों पर चढ़ जाने दे,

सागर के गर्भ से अमृत कलश ले आने दे,

सृष्टि को मनोरम बनाने के,

हर युक्ति को सहज हो आजमाने दे।

तलाश प्राणशक्ति के नियामक प्रवर की,

तलाश उस ईश्वर की,

जो इस नश्वर की,

खोज को अनवरत चल पाने दे।

संकेतों से बुलाये,

अपनी छाया में आने दे।