उन्मुक्ति

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सुना था,

प्रेम बाँधता नहीं,

उन्मुक्त करता है;

बिना देखे-सुने-छुए ही,

खुद को व्यक्त करता है।

मुक्त करता है,

अवांछित बंधनों से,

और बंधनों के टूटने के भय से;

सुख के पाश से,

और भविष्य के अनावश्यक संशय से।

मुक्त करता है,

मात्र व्यक्ति को नहीं,

व्यक्ति में बसे प्राण को भी;

हृदय में छुपी तृष्णा को ही नहीं,

चित्त को बाँधते अभिमान को भी।

प्रेम खोलता है सारे बंद द्वारों को,

और आने देता है निर्मल बयार को;

दीये को बुझने से बचाने को,

नहीं कर लेता बंद सम्पूर्ण संसार को।

सुलझाता है उन तंतुओं को,

जो उलझाते हैं पिपासा से अनुराग को;

शीतल करता सब कुछ पाने की लालसा को,

और अर्थहीन संचय की आग को।

और मैं ने देखा है,

जो तरंग उठती है,

बंधनों के उन्मुक्त होने से,

देती है सार्थकता,

हमारे अश्रु को, हास को;

जीवन में बसे,

जीवन की पूर्णता के विश्वास को।

प्रेम जब जगता है,

हृदय के हर स्पंदन में पलता है;

सहेजो तो जीवन भर,

चतुर्दिक प्रकाश फैलाता,

ईंधन बन जलता है।

सुन्दर सुयोग सर्वथा

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सुबह नींद खुले और आँख कृतज्ञता से नम नहीं हो,

और सीने की जलन आँसुओं से कम नहीं हो,

किसी को देख कर उसे पुकारने को जी नहीं करे,

गहराती साँझ में यूँ ही भटकने का मन कभी नहीं करे,

पुरानीं यादें कभी अचानक अचरज से सराबोर नहीं कर दे,

छूट गये साथियों के किस्से मीठा-सा अफसोस नहीं भर दे,

कभी ऐसा नहीं लगे कि बहुत कुछ करना अभी बचा हुआ है,

मैं अर्जुन हूँ महाभारत का, जो मेरे अंदर मचा हुआ है,

तो समझो जड़ता घेर रही है, अंधकार व्याप्त हो रहा है।

जीने के आनंद का युग धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।

पुरानी बातें यदि, नयी वेशभूषा में ललचाए नहीं कभी,

कुछ नयी बातें, अपनी धृष्टता से चौंकाए नहीं कभी,

इतिहास में जाकर कुछ मिटाने का मन नहीं करे,

असंभव सा कुछ बदलने का पौरुष जतन नहीं करे,

कुछ सोच कर अनायास बाँह नहीं फड़के,

किसी और जग से आये संकेतों से हृदय नहीं धड़के,

प्रत्यक्ष से परे जीने को सपनो का कोई संसार नहीं हो,

आज के यथार्थ से ऊपर और कोई विचार नहीं हो।

तो निश्चय ही जीवन की ऊर्जा का क्षय हो रहा है,

चेतना का जड़ता में विलय हो रहा है।

और कुछ नहीं तो मन के आकाश को खंगाल,

कुछ भी अंतिम नहीं होता, वृथा संशय न पाल,

रात कितनी भी गहरी हो, लौ से लौ जलती है,

चेतना क्षिण हो कर भी जिज्ञासा को संग लिये चलती है,

खोजोगे तो पाओगे, विवशता या वरदान जीवन तय करके नहीं आता,

यथार्थ की पीड़ा ही नहीं, यहाँ सम्भावनाओं का अनंत भी समाता,

जलने से डर कर यदि बाती को आगे नहीं बढाते,

दोष जिसे भी दें, अंत में हैं, धुआँ और अंधकार ही पाते।

बाहें खोल स्वागत, हर स्पर्श का, संकेत का,

प्राण है प्रणम्य, जीवन सुन्दर सुयोग सर्वथा।

तू गढ

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तू गढ।

जीवन का मूल चलना, सही,

पर मात्र उगना, ढलना नहीं,

गति निरर्थक हो सकती है,

जीवन को भँवरों में खो सकती है,

गति को दिशा दे अहर्निश,

लक्ष्य की ओर बढ।

तू गढ।

वेदना की मिट्टी ले कर,

कुछ अश्रु, कुछ स्वेद दे कर,

निर्माण कर कुछ आकार नये,

कि एक भय-भ्रांति हीन संसार बने।

फिर फूँक दे प्राण उनमें,

मंत्र-मानवता पढ।

तू गढ।

संग चेतना की प्रखर ज्वाला,

मन को बना निर्माणशाला,

दे आहूति अपने अहंकार की

तप कर बन अश्व, रथ और सारथी,

बाट जोह मत किसीकी,

तू ऊपर चढ।

तू गढ।

भयप्रद सृष्टि का अनंत विस्तार,

मत छोड़ निज कर्म का अधिकार,

जितना जो कुछ तेरा निर्माण,

इस अनंत यात्रा में तेरा योगदान,

कोरा है जीवन अब तक,

उसमें अर्थ मढ।

तू गढ।

जोड़, सँवार त्रुटि और फिर जोड़,

मुड़ विच्छेद से निर्माण की ओर,

शाश्वत तुझको तेरी रचना करता,

अभिष्ट सदा कृति की सुन्दरता।

निरंतर बना सोपान अपना,

और उसके ऊपर चढ।

तू गढ।

क्या यायावर को याद रहा?

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क्या यायावर को याद रहा?

रास्ते जटिल और टेढे-मेढे,

राह के चुभते पत्थर काँटे,

कुछ चिलचिलाती दोपहरिया,

और कोसों बिखरे सन्नाटे।

कुछ लहूलुहान-से घटना क्रम,

और कुछ अनगढ इतिहास,

खुशियाँ दिखती दूर खड़ी,

पर तृष्णा सदा बहुत ही पास।

थपेड़े खाती सागर में नावें,

और दमतोड़ ऊँचाई पहाड़ों की,

गहरे तिलस्म अंधियारों के,

अनबुझ भाषा चांद-सितारों की।

अपने बूते पर लड़-लड़ कर,

क्या पाया,

बचा क्या इसके बाद रहा?

क्या यायावर को याद रहा?

नर्म दूब वह अपने पथ की,

सुबह की संगी शीतल बयार,

कभी उऋण होने ही ना दे,

सरल प्रेम के अद्भुत उधार।

बिन मांगे आशीष बहुतेरे,

अंधेरों में जल उठती बाती,

वरदान ऐसी निर्भयता की,

हर समर गर्व से चौड़ी छाती।

और बहुत से ऋण हैं बाकी,

बाकी हैं और बहुत उपकार,

इनके बंधन में जग लेकिन,

यायावर का अलग प्रकार।

इन कृपा के दम पर बहुत चला,

पर इनके भार का,

हर गतिरोध तो याद रहा।

क्या यायावर को याद रहा?

यायावर अकृतज्ञ नहीं होता,

आभार सभी के सबसे ऊपर,

पर जतलाने को नहीं रुकेगा,

है तो आखिर एक यायावर।

पाँव के छाले, बेदम साँसें,

नहीं बदले में कुछ भी पाने को,

याद उन्हे वह रखता है,

अगले यायावर को बतलाने को।

यायावर वह भाग मनुज का,

जो सारी वर्जनाएँ छोड़ सके,

नित नये का संधान करे,

बंधनों को सारे तोड़ सके।

जो रुष्ट उनसे, वे हुआ करें,

नहीं रुकना,

उसका अंतिम संवाद रहा।

क्या यायावर को याद रहा?

पल और युग

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पल ने युग से कहा,

सबकुछ तो मैंने सहा,

रुका नहीं, चलता रहा,

बुझा नहीं, जलता रहा,

था कोई प्रारब्ध नहीं जिसकी सुनता,

बस गति थी, रहा अनवरत बुनता,

जुड़ती रही सम्भावनाओं के तार नये,

और तुम बन गये।

युग,

तुम बढते गये,

स्मृति की ठंढी सीढियाँ चढते गये,

तुम धरती बने, क्षिति और व्योम बने,

सर्वव्यापी, सर्वग्राही और सर्वभौम बने,

मैं सूक्ष्मतम एक बिंदु पर डोलता,

तुम्हें देखता-भालता रहा;

तुम्हारा निर्माण रुके नहीं,

इसलिये स्वयम को सम्हालता रहा।

मैं गति हूँ, पर कहीं जाता नहीं हूँ,

तुम मुझसे बनते, पर मैं तुम्हें बनाता नहीं हूँ,

निर्पेक्ष हूँ,

दिशा का अर्थ नहीं मुझमें;

स्वच्छंद हूँ,

कोई पूर्वाग्रह व्यर्थ नहीं मुझमें;

मैं जीना सिखाता हूँ, स्वयम जीता नहीं,

इसीलिये मरता नहीं, होता कभी बीता नहीं।

फिर हो तुम बनते कैसे?

तुम किससे बनते,

तुम्हें बनाता कौन है?

सृष्टि में व्याप्त कोलाहल,

या कि चेतना का सघन मौन है?

तुम्हारा विस्तार,

एक अर्थहीन प्रसार है?

या अनुभव और स्मृतियों से बुना,

समय को परिभाषित करता,

जीवन का सामूहिक सार है?

तुम्हारे पटल पर बिखरी,

असंख्य रंगो की अनुरंजना;

मनोहारी और भयावह,

हैं किसी उपयोग के,

या अर्थहीन प्रवंचना?

युग कभी उत्तर नहीं देता,

बस होता है,

पल अपनी जिज्ञासा परंतु,

कभी नहीं खोता है।

जीवन बना समृतियों से,

संवेदना, अनुभव और विचारों से;

प्रशस्त चेतना से,

सधा हुआ कर्मों से, बंधा हुआ संस्कारों से;

जीता तो इन्ही पलों में,

पर उत्तरदायी युगों के प्रति,

और परखा जाता इतिहास के,

मृत हो चुके आधारों से।

जीता मनुष्य सदा वर्तमान में,

पलों में है।

पर दिशा उसकी तय होती,

बीते पलों की आकांक्षाओँ,

संवेदनाओँ, संरचनाओँ,

विश्वास और छलों से है।

जीवन पलों में चलायमान माया है,

युग देता उसको आकार और काया है।

मेरे कुछ सपने

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मेरे मन में कुछ सपने हैं!

तुम शायद हँसोगे सुनकर,

लगें नहीं तुमको ये सुन्दर,

पर द्वार खोलते आशा के हैं,

उत्तर हर जिज्ञासा के हैं,

स्नेह भाव से सहज बने हैं।

मेरे मन में कुछ सपने हैं!

सूरज जब अपने घर जाये,

हर घर दीया जला कर जाये,

सुलाये अंधेरा बाहों में लेकर,

सवेरे चूम, जगा कर जाये।

समय कभी भी भारी ना हो,

गुजरे तो ऐसे दाग न छोड़े,

कि भरे कभी वे घाव नहीं,

बस दुख के परतों में दबता जाये।

खुशियाँ कभी लुटे न किसीकी,

कोई ठगा न जाये छल से,

चाहे जो भी ले ले बदले में,

हर पल गले लगा के जाये।

न माँगे हिसाब मेरे बोझों का,

उम्र न थके, न मुझे थकाये,

बस संग रहे और चले साथ में,

रोऊँ तो बचपन में ले जाये।

सिर्फ तोड़े ही नहीं पत्थर,

तराशे टुकड़ों को और जोड़े भी,

हाथ देखे अपने छालों को तो,

मुस्कुराये और गर्व से सहलाये।

बहुत दूर निकलने की जल्दी में,

पैर कुछ भी कुचले ना नीचे,

चले इस तरह कि जो पीछे हों,

राह प्रशस्त उनका कर जाये।

सिर्फ शोर ना करे धड़क कर,

रखे जगह कुछ खामोशी की भी,

दिल अपनी लय-तालों से,

हर किसी को गुदगुदाता जाये।

जो भी आये मुझसे मिलने,

हँसता और मुस्कुराता आये,

जब तक चाहे संग रहे,

संग खुशियाँ झोली भर ले जाये।

बड़े प्यार से जिया हूँ अबतक

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खुद को समझा नहीं पाता,

तो दम भर को ठहर जाता हूँ,

अंदर को मुड़ती राहों पर,

दो-चार कदम चल के आता हूँ।

झूठ की जिद नहीं करता,

करता हूँ खुशामद, मनाता हूँ,

नया यह है कि वह मानता नहीं,

तो मैं खुद ही मान जाता हूँ।

बहस लम्बी चलती है तो,

फिर मिलने की बात करता हूँ,

उसका पता पूछता हूँ,

और उसे अपना पता दे आता हूँ।

मसखरी भी कभी-कभी दोस्तों,

खूब होती रहती है हममें,

वह ढूँढता रहता है मुझे,

और मैं छुपता चला जाता हूँ।

कई बार मिलता हूँ उससे,

कभी के बंजर हो चुके खेतों में,

पत्थर हुई मिट्टी को,

फसलों के किस्से सुना आता हूँ।

पनघट पर भी जाता हूँ,

साथ मरघट भी हो आता हूँ,

प्यास में डूब मरे लम्हों को,

जिला कर वापस ले आता हूँ।

हँसने वालों की मुझपर,

कभी कमी नहीं रही है यारों,

कोई और नहीं मिलता है तो,

फिर से उन्ही को हँसा आता हूँ।

कई चोट भी हसीन हैं अपने,

किसी से उन्हे छुपाना कैसा,

अपने उन खूबसूरत दागों को,

देख कर अक्सर सुकून पाता हूँ।

बात मुख्तसर-सी है इतनी,

तनहाई में जिंदा हूँ, शर्मिंदा नहीं,

बड़े प्यार से जिया हूँ अबतक,

बड़े फख्र से जिये जाता हूँ।

मेरे दिल के बहुत से रंग हैं

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मेरे दिल के बहुत से रंग हैं,

तुझे दिखता क्यों बस लाल है?

मेरी आँखों में हैं इतनी कहानियाँ,

तुझे दिखता बस एक सवाल है।

तेरी सारी बातें जायज हों,

है इससे मुझे इनकार नहीं,

मुझे सुने बिना दिया फैसला,

बस इस बात का मलाल है।

हर वक्त कुछ गढते रहें,

अपनी जिद रही है उम्र भर,

कुछ थके-थके से लगते हो,

तुम अपना कहो क्या हाल है?

कोई अपना हुआ तो सब गैर क्यों,

यह गफलत है या प्यार है,

कहीं शुरु से ही तो हम गलत नहीं,

करता बेचैन मुझे यह खयाल है।

बस हम ही हम जब दिखने लगे,

लगता बाकी सब फिजूल हो,

नजर तो गलत है शर्तिया,

शायद गलत राह पर चाल है।

हक के नाम क्यों ऐसे लड़े,

कि सही गलत धुँधला गये,

नजर आता सिर्फ धुआँ ही है,

जब खत्म होता यह उबाल है।

एक मुस्कुराहट जो हमसे कहे,

कि सबकुछ अच्छा है लग रहा,

उस पर लगा दी पाबंदियाँ,

और कहते हैं कि जीना मुहाल है।

शख्सियत अपने से बड़ी,

करने में खर्च दी काबीलियत,

कहते हैं अब कुछ बचा नहीं,

सचमुच यह सादगी कमाल है।

तुझको पाया

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अंत:स्थल में फूटती

पहली किरण के साथ ही,

मन के पटल पर एक छाया पड़ी,

किसकी?

कभी समझ नहीं आय़ा,

पर अंतर्मन के केंद्र में,

तुम्हें सदैव विद्यमान पाया।

राह निहारते थकता रहा मन,

फिर भी मैंने मूँदे नहीं नयन,

ढूँढता रहा,

उन सारी अमल-धवल राहों पर,

तुम्हार पैरों के छाप,

जो कहीं गोचर हो नहीं पाया।

तुम किस राह आये, ज्ञात नहीं,

पर अंतर्मन के केंद्र में,

तुम्हें सदैव विद्यमान पाया।

शांत दिगंत, शांत वातावरण,

सबकुछ भूल, तेरी पदचाप टोहता मन,

कहीं न मिलता आभास कोई,

सूक्ष्मतम गति भी दिख नहीं पाया।

मैंने तो खोला नहीं कोई द्वार,

पर अंतर्मन के केंद्र में,

तुम्हें सदैव विद्यमान पाया।

मन का आकाश था मेघाच्छन्न,

प्रकाश मद्धिम और व्याकुल मन,

भय, संदेह, आशंका होते सघन,

आह, अलौकिक, क्षण भर का,

पवन प्रवाह और असनि आलोक,

मेघ छँटा,

दिखी भू से नभ तक तेरी ही माया।

मैंने तो किया नहीं कोई उपचार,

पर अंतर्मन के केंद्र में,

तुम्हें सदैव विद्यमान पाया।

जन समूह का सागर मंथन,

प्राण और चित्त हारे सहज नियंत्रण,

विश्वास तर्क से टूट रहा था,

कातर मैं, संबल ढूँढ रहा था,

एकांत ने आकर मुझको सहलाया,

चमत्कार, मैंने तुझे पार्श्व में पाया।

बहुत कुछ चारों ओर रहे,

पर सदैव अंतर्मन के केंद्र में,

विद्यमान रही है तेरी छाया।

हम छोटे होने लगते हैं

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हम छोटे होने लगते हैं,

जब हमें लगता है,

हमारा होना औरों से अच्छा है।

बाकी सब के थोड़े मलिन हैं,

मन का उजाला हमारा ही सच्चा है।

समझ हमारी ही पूरी है, गहरी है,

बाकी सबों का ज्ञान अभी कच्चा है।

हमने अपने आपको तपाया है,

औरों की बनावट का सामान सभी कच्चा है।

हम खोटे होने लगते हैं,

जब हमें लगता है,

हमारा ही सिक्का सबसे खरा है।

कहीं से भी देख लो,

हमारा कद दिखता औरों से बड़ा है।

हमें और ऊपर चढने की जरूरत क्या अभी,

कितना कुछ कदमों के नीचे ही पड़ा है।

हमारे ही तो पूरे जीते जागते हैं,

औरों का एहसास जिंदा नहीं, अधमरा है।

हम छिछले होने लगते हैं,

जब अपनी जड़ों से दूर होते हैं।

बीते कल को नहीं पहचानने को,

करते खुद को ही मजबूर होते हैं।

अपनी जागीर मानते हैं आने वाले कल को,

और अपने से भी जरा-सा मगरूर होते हैं।

नाम देते हैं इसे बड़प्पन का,

दरअसल अपने मद में चूड़ होते हैं।

हम हलके होने लगते हैं,

जब हमें अपने पैरों का छाप

लगता औरों से गहरा लगता है।

औरों खुलेपन की तमन्ना होती है,

और खुद पर अंधेरे में भी पहरा लगता है।

लगती औरों की दुनियाँ बदरंग-सी,

और अपना हर सपना सुनहरा लगता है।

दिखती हैं चेहरों की छिपी मैल भी हमें औरों की,

और अपना चेहरा चमक भरा लगता है।

हम घटने लगते हैं,

जब हम अपनी परछाइयों से,

लोगों को अपना कद बताते हैं।

औरों की कामयाबी पर,

अपनी दुआओं का हक जताते हैं।

पाँयचे उठा के चलते हैं,

भीड़ से दूरी बनाके आते-जाते हैं।

वहाँ फलसफा की बातें करते हैं,

जहाँ खुद अदब भी नहीं निभा पाते है।

आगे बस इतना है कि,

जब भी खुद से सामना होता है तो,

अपनी ही शर्मिंदगी में भींगे रहते हैं,

अक्सर खुद से नजर मिलाने से कतराते हैं।

जानते हैं कि एक फरेब के बस के में चल रहे हैं,

हकीकत की जिंदगी जी नहीं पाते हैं।

और औरों को क्या खुद को भी,

यह घुटन, यह सच्चाई बता नहीं पाते हैं।