अंतरंग

rawpixel-633849-unsplash

पोर-पोर में बसते

जीवन की खुशबू-सी अपनी,

अनजाने राहें, टेढी-मेढी,

मुड़-मुड़ के देखती आखों से धुंधली,

मौजूद मुझमें हर पल बंधु,

तुम कौन हो,

क्यौं मौन हो?

 

कौतूहल जगा-जगा कर,

दबे पाँव आ-आ कर,

मुझे ले चलते,

असंभव-सी ऊँचाईयों पर,

न पाँव तले जमीन,

न सहारे को तिनका,

रोमांच का अतिरेक,

ठहरा-सा जाता पल,

कोई फर्क नहीं यदि

आगे कुछ भी हो, न हो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

 

अररबेल-सी लिपट-लिपट कर,

इस काया को बाहों में भर,

डोर कभी साँसों-सी बाँधे,

और दोस्त-सा पास सिमटकर,

मेरे संग-संग

अपना करती सारी दुनिया को,

कहाँ से लाते इतना प्यार, कहो?

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

किसी पिता-सा ज्ञीर्ष हाथ धर,

एक भरोसा अंतिम पल तक,

‘उतर पड़ो जीवन समर में,

सिद्धि तय जो संकल्प हो सार्थक।‘

विश्वास जिंदगी को देते,

और भरते एक नया प्राण

तुम मुझमें किस विधि अहो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

 

संवेदनाएँ प्राणों में रची सूक्ष्मतम,

कर जड़ अनुभूतियों को चेतन,

रोष नहीं था किंचित मन मे, जब

चढा कसौटियों पर मैं हर क्षण।

ऋणी हूँ परीक्षा के लिये,

इस सृजन का श्रेय स्वीकार करो।

बंधु,

तुम कौन हो, क्यौं मौन हो?

मेरा गाँव

img_7325मेरा गाँव मुझे बहुत याद आता है।

जैसे मेरे गुजरे हुए पुरखे याद आते हैं।

वे लौट कर आयेंगे नहीं,

और मैं लौट कर जाऊंगा नहीं।

फिर भी एक रिश्ता है,

जो निभता चला आया है अभी तक।

कभी एक माँ और उसके खोये बच्चे की तरह,

कभी एक बच्चे और टूट चुके सबसे प्यारे खिलौने की तरह।

 

ऐसा नहीं कि वे ठगते नहीं।

पर उनका छल सरल होता है।

कुछ ऐसा कि उनकी गाँठें तब भी झलकती रहती है,

जब वे अपना सबसे गहरा चोला पहने होते हैं।

और अक्सर वे जानते हैं कि उनका पर्दा इतना पतला है,

कि उनके मन के सारे कोने साफ साफ दिख रहे होते हैं।

मैं जानता हूँ कि ऐसी दलीलें कुछ साबित नहीं करती,

पर मैं कुछ साबित करना भी नहीं चाहता,

बस एक पुराने लगाव का इजहार है,

जिसमे मैं किसी हद से गुजरना भी नहीं चाहता।

 

कुछ तो बात है कहीं कि

अब भी उसकी बाँहें खुली मिलती हैं मुझे,

आगोश में जकड़ती नहीं,

गुनहगार-सा पकड़ती नहीं,

उसकी जहालत भी ओस से धुली मिलती हैं मुझे।

उसकी गलियों में मुझे

पायचों के मैले होने की फिक्र नहीं होती,

आस्तीन से पोछ लेता हूँ पसीना,

तो भी अपने कद की ऊँचाई नहीं खोती।

 

हुआ है कई बार ऐसा,

कि अपनी खुदगर्जियों ने मुझे बेपरदा कर दिया है।

मैं ने चाहा है कि कोई कहे मुझ से,

तू ने खुद को ही नही अपनो को भी नंगा किया है।

हर बार ऐसे में

एक आवाज दालान-आंगन से उठी है,

तू तो सगा है,

मालूम है तम्हारी भी मजबूरियाँ होंगी।

तुम्हे बाँधना हमारी मंशा कभी न थी हमारी,

तुम आगे बढो,

हम तुम्हारे ही रहेंगे,

बीच में चाहे जितनी भी दूरियाँ होगीं।

संकेत

pexels-photo-3675083 (1)

मन के

संकेत सुनूँ,

या मन का

हठ सुनूँ?

चुनना यदि हो निश्चित,

तो किसे चुनूँ?

 

संकेत नव्यता का संधान,

हठ यथास्थिति मूर्तमान,

हूँ ऋणि श्रिष्टि का कोटि कोटि,

क्या वर्तमान का बंदी मैं बनूँ?

मन के संकेत सुनूँ, या हठ को सुनूँ?

 

संकेत गतिमान उद्वेगशील,

हठ अति मनोरम शांत सलिल,

गति त्याग सौन्दर्य धरूँ,

तो मैं जो हूँ वह क्यौं मैं हूँ?

मन के संकेत सुनूँ, या हठ कोसुनूँ?

 

संकेत विध्वंश उपरांत सृजन,

हठ प्रिय पार्श्व कसता बंधन,

आलिंगन के सुख जितने चाहे,

नव सर्जन का क्या हंता मैं बनूँ?

मन के संकेत सुनूँ, या हठ को सुनूँ?

 

संकेत अनिश्चितता, अखंड विस्तार,

हठ शक्ति, सुरक्षा के सहज उद्गार,

समृद्धि में सीमित मुदित रहूँ,

या यायावर बन जीवन धन्य करूँ?

मन के संकेत सुनूँ, या हठ को सुनूँ?

 

संकेत नियमों से ऊपर उठकर,

हठ उनका सबसे प्रबल पक्षधर,

नवल शोध, समीकरण, आयाम,

या बँध धूरी से वृत्ताकार घूमूँ?

मन के संकेत सुनूँ, या हठ को सुनूँ?

 

संकेत मुझे दो तुम हठ लेलो,

कुछ मैं झेलूँ, कुछ तुम खेलो,

तुम समगति बनाये रखना, जब तक

मैं अज्ञात लोक की झलक ले लूँ।

मेरी विनती सुन कि मैं संकेत सुनूँ?

मंदिर का दीया

3E4E44A3-98E1-4D59-A7A1-F013E991E74B

मंदिर का दीया, मैंने चुरा लिया

जहाँ अंधेरा घना था, उस जगह जला दिया।

 

लौट रहा था,

असमंजस में था,

कि मंदिर के आगे

देवी सहसा प्रगट हुई।

हँस कर बोलीं,

“तुमने तो मेरा काम कर दिया।

बता इस पुण्य का चाहिये तुम्हें क्या?”

 

“पुण्य का फल क्या माँगना पड़ता है?

और जो भी हो वांछित, पा सकताहै?”

मैं ने पूछा, तो वही सहज स्मित-हास,

देवी बोली सही-ही होगा,

क्या है तुम्हारी शंका, क्यौं क्षीणता के आभास?

 

चिंतित,

उत्तर पर थोड़ा विस्मित,

ठगा-सा, भ्रमित,

पूछा “शंका है, या कौतूहल है,

ज्ञात नहीं, पर जाननेको मन विकल है।”

उत्तर था फिर से करता चकित,

फल तो माँगने से ही मिलता,

जो स्वत: प्राप्य, मिला तुम्हे सदैव,

बिना, शर्त बिन बंधन है।

क्या नहीं बिन माँगे ही मिला,

तुम्हे तुम्हारा जीवन है?

और यदि यह प्रश्न है कि,

क्या कोई माँग सकता है कुछ भी?

हाँ, अवश्य, निश्चय ही,

यदि मन में पाने का विश्वास है।

वरना पाने और खुश होने के बीच का रिश्ता,

जीवन कथा नहीं परिहास है।

विश्वास तुम्हे संकल्प देते,

संकल्प कर्म कर्म फल समुचित,

बाकी शून्य, रिक्ति अवकाश है।

 

कुछ समझा, थोड़ा भ्रांत रहा,

चित्त व्यग्र और अशांत रहा,

पर नींद बहुत ही आयी अच्छी,

जगा तो मन विश्रांत लगा।

 

अगली रात जब मैंने दीया उठाया,

आशंकित मन से पाँव बढाया,

सम्मुख मंदिर के पंडित को पाया।

 

इससे पहले कि कुछ कह पाता,

मेरी बाँह पकड़ वह चल पड़ा उधर,

उसी जगह रख दिया दीया,

और सकते में आ गया पल भर।

यह क्या,

गाँव का हर अंधेरा कोना,

दीप प्रकाश जगमग दिखा।

 

लौट आया मंदिर सत्वर,

आँखें ली बंद कर,

और मन के ही भीतर,

एक बात कही,

फल तो तुमने पहले ही दिया है दे,

जो यह जीवन है।

इस आभार का निर्वाह कर सकूँ,

यह वर दे।

अपने प्रति कृतज्ञता से,

सहज सुलभ आत्मीयता से,

मेरी झोली भर दे।

मन के गह्वर

fireworks-1544997__480

कहीं निहित है सार्थकता,

या अंतहीनता में विलुप्त हुआ,

निमित्त मात्र, या हूँ एक कर्ता,

हूँ विशवरूप या निरर्थकता?

प्रश्न बहुत से और कई,

कुछ मूर्त और कुछ निराकार।

चेतना इन सब का उद्गम,

या विवेक इनका आधार?

 

सब कुछ सम सा,

पहली लौ से छँटते तम सा,

नि:शब्द धरा, नि:शब्द प्राण,

नहीं कोई प्रश्न, ना समाधान,

ऐसे में कहाँ से उठती हैं,

संवेदनाये ये निर्विकार?

मन के किस गह्वर में हैं,

रचे-बसे इनके आधार?

खुद से बातें

img_7192

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये,

अपनी चुप्पी को सहलाते,

मन को बच्चों सा बहलाते,

मन के अंदर एहसास जगे हैं कई नये।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

मेघ, कोयल, नदी, और उपवन,

संगीत मधुर और कर्कश गर्जन,

छूने लगे कहीं, और मन के तार बजे।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

बीती बातें, भूले किस्से और धुँधलका,

यादें पुरानी और उजाला हलका-हलका,

अपने से कहने को कितने लफ्ज मिले।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

किसी मोड़ पर रंज, कहीं पर प्यार,

वादे जुड़े और,  टूटे कितनी बार,

नहीं निभाये रिश्ते भी मीठे जान पड़े।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

धड़कन बेकाबू, कितने मन के डर अनजाने,

हैरत भरते, नहीं  समझ आये  अफसाने,

नस नस दौड़े और घुमड़ कर ठहर गये।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

बिना बंद के गाने, बिन कड़ियों की बातें,

मतलब की तलाश से दूर, बेफिक्री की रातें,

जैसे सब कुछ छोड़, अपने के ही पास हुए।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

 

स्वाभिमान से उन्नत  हर सर की इच्छा,

मान किसी का कभी न हत हो ऐसी शिक्षा,

पड़ी रौशनी मन में तो अंदर ये दीख गये।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

 

किलकारियाँ बच्चों की जैस बिना अर्थ के,

सबका हक खुश होना हो बिना शर्त के,

जब यह मन में आये लगा कि जीत गये।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

दुनियाँ

pexels-photo-203088

ये दुनियाँ कोई सराय नहीं है,

जहाँ रात गुजारने को ठहर गये,

थके तो रुक गये,

और चले जब जी चाहा, पहर दो पहर गये।

 

ये दुनियाँ कोई खेल का मैदान नहीं,

कि जी चाहा तो खेले,

नहीं तो बैठ गये बनके महज एक तमाशबीन,

कि लुत्फ बस मेरा, बाकी जिसका वो झेले।

 

मैदान यह किसी जंग का भी नहीं है,

जहाँ हों बस दो ही खेमे, एक बदी हो एक ईमान हो,

लड़ने या छोड़ने की खुली छूट हो,

और पहले से ही दुश्मनों की पहचान हो।

 

ना ही है यह कोई नुमाइस

रंगबिरंगे खिलौनों की, दिलफरेब और नये-नये,

कि कुछ को देखा, कुछके लिये रोये,

फिर जो मिला, सब कुछ भुला बस उसी के हो लिये।

 

यह बिल्कुल नहीं अनगिनत लहरों का कोई समुंदर,

जहाँ कदमों के निशान बहुत सारे हों,

बिखरी पड़ी खुबसूरती हो, थकाती लहरों की अठखेलियाँ हों,

और जब होश आये तो सुस्ताने को किनारे हों।

 

यह हर ओर जाती हुजूमों का मेला भी नहीं,

जहाँ यूँ तो हर कोई चलता नजर आता है,

पर कोई कहीं पहुंचने की जरूरत में नही दिखता,

गुमनाम सा दिन सारा हैरानी में गुजर जाता है।

 

यह सीधा साधा गणित नहीं, जहाँ दो और दो सिर्फ चार होते हैं,

हल करने के तरीके और जवाब तयशुदा होते हैं,

या फिर किसी रूहानी बहस मुबाहसे की शाम भी नहीं,

जहाँ एक सब एक ही सुर मे बोलते हैं, और सबके खयाल जुदा होते हैं।

 

दुनियाँ इतना ही नहीं, उतना भी नहीं,

यह सब कुछ और औरभी बहुत कुछ है,

जिसे हम छू नहीं पाते हैं, जान नहीं पाते हैं,

जो दिखता नहीं पर मौजूद सचमुच है।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

बनी चहे जैसे भी, हर पल हमारे हाथों यह बनती है।

 

तुम इसे गुजरगाह नहीं, अगर अपना घर बनाओ,

हँसो, रोओ, लड़ो, खेलो और इसका हिस्सा हो जाओ,

खुद को तलाशो और हो सके तो इस तलाश में खो जाओ,

फिर जब थको तो बिना किसी फिक्र के सो जाओ?

 

तनी हुई रस्सी पर नट के पाँव,

तालियाँ बजाता, तमाशा देख रहा सारा गाँव,

किसको प्यारे ऐसे जमघट नहीं?

फिर क्यौं इस दुनियाँ में तमाशबीन हों हम, नट नहीं?

 

जीना सीखेंगे अगर औरों के जंग देखकर,

चुभता रहे एहसास कि जिन्दगी परायी सी गयी गुजर?

तो बहाना लहू और पसीना अच्छा है,

कीमत की क्या फिक्र, अगर लगे इस तरह जीना सच्चा है।

 

जिद ऐसी कि कोशिश हासिल करने की कयामत तक,

अगर नहीं तो क्या बने और बने ही क्यौं?

खिलौने, खयाल, खूबसूरती, होती सस्ती तो नहीं,

हक जतायें, हम पहले तो उसके काबिल भी हों।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

समेटो मत सँवारो, कि इसके हुस्न में नहीं कोई कमी है।

चाहतें

fireworks-1544997__480

मन के सिलबटों में सोयी    चुप पड़ी जो चाहतें हैं,

क्या हम  इनको चाहते हैं   या ये हमको चाहते हैं?

नासूर पुराने  टीसते,   या उल्लास  किसी कल के,

अलौकिक किस माया से, मिली हम सबको चाहतें है?

 

ललक हर भोले बचपन की,  निर्वाध किलक मनका,

या दुनियाँ बदलने पाने की,   हर यौवन का सपना,

बंद गलियों में गोल-गोल,  खोज अनबुझ संकेतों की,

स्पर्ष सजग मन, पर ज्ञात नहीं कि किसको चाहते हैं?

 

बेसुध  सारी  दुनियाँ से,    किसी  प्रिय को पा जाना,

या छिन्न-भिन्न कर बंधन सब, संधान लक्ष्य कर पाना,

जो सच-सा  दिखता, पर      है धूमिल और निराकार,

प्रश्न  वहीं का  वहीं खड़ा है,   चाहे  जिसको चाहते हैं?

 

स्वार्थ-शून्य  होकर जीने की   जो उठती  तरंगें चंचल,

नयी चेतना  जगा-जगा,  ले  जाती  चरम  शिखर पर,

उन्माद  इन गतियों का   फिर पूछता सहज  मन को,

उन्मेष चाहते हैं हम या,  जगत के  हित को चाहते हैं?

 

सब अपने हों, चाहें सबसे   निजता के बंधन में बंधना,

या सबके  बन  पाएँ हम,   जैसे नभ  सबका  अपना,

भेद तनिक सा क्षद्म है गहरा,  जान कभी पाएँ न पाएँ,

उन्मुक्त भाव  या स्नेह-रुग्न   इस  चित्त को  चाहते हैं?

 

कल हो सुदंर,   दोषमुक्त,   हर मन में पलती ये चाहतें,

हम हों बेहतर, द्वेष रहित जग, मंद मंद जलती ये चाहतें,

संधान स्वर्ग का है उचित,  यदि मूल्य किसीका मान नहीं,

साधन यदि  अधम हैं तो    क्या हम अधम हो चाहते हैं।

 

बंधन जो मन को दे उड़ान, उन्मुक्तता जिससे मुग्ध प्राण,

स्नेह जो न आसक्ति भरे,  संग जो न एकांत में व्यवधान,

चाहत बस  चाहत बोझ नहीं,   आराध्य बना दे कर्म सभी,

स्वप्न लगे पर  आखिर में हम   ऐसा  जाये हो  चाहते हैं।

मिलना अपने आप से

pexels-photo-3675083 (1)

 

इतना आसान भी नहीं होता है,

अपने आपसे मिलना।

पहले चश्मा साफ करो,

फिर आईना,

फिर जो नजर आता है,

क्या पता पहचाना जाने वाला हो न हो।

 

वह अगर पहचान में आता है,

तो अच्छा नहीं लगता बिल्कुल,

और अगर अच्छा लगता है,

तो पहचानने में होती है मुश्किल।

यहाँ कुछ भी मान लेने से काम नहीं चलता,

क्यौकि मन अब कठोर हो चुका होता है,

कुछ भी नहीं मान लेता,

सिर्फ अच्छा देख नहीं मचलता है,

उस अज्ञात सच्चे को,

एकबार छूने का हठ जो उसमें पलता है।

 

 

फिर अपना पता ढूंढना होता है।

और इसमे मुश्किल ये होती है,

कि बहुत सारे पता मिलते हैं खुदके,

कहीं वह गाता है, कहीं वह रोता है,

और पूरा का पूरा कहीं नहीं होता है।

पता सब के सब सच्चे हैं,

कई तो रोबदार हैं, अच्छे हैं,

पर सही कौन सा है, निर्णय नहीं होता है,

और आदमी पाने से अधिक अपने आपको खोता है।

 

जो पता सबसे प्यारा लगे,

उस पर अगर हम चल पड़े,

जो मिलता है, प्यारा लगता है,

बड़ा भला पर नि:स्सहाय, बेचारा लगता है,

राम-राम, दुआ-सलाम तक तो बात चलती है,

पर नहीं चलता है ये खेल लम्बा,

जो शुरू से ही हारा-हारा लगता है।

 

अगला पड़ाव जिस कारण भी,

पहली भेंट की निराशा या मात्र जिज्ञासु मन,

हो अपना सबसे अवाछिंत पता यदि,

तो भी चल पड़ते हम आदतन,

 

 

संभव है, घेर ले आश्चर्य,

संशय में मन में बनने लगे नये समीकरण,

“कितना भला तो दिखता है,

क्या बुरा है अगर थोड़ा कठिन और थोड़ा दूर लगता है?”

मन मानने को होता ही है कि मौलिक प्रश्न जगता है,

दूर से देखने को मुलाकात कहने की मजबूरी अगर हो,

तो इसे मिलना हरगिज न कहेंगे, तुम चाहे जो भी कहो।

 

पता तो और भी बहुत सारे हैं,

अधिकतर बिखरे बीच में, कुछेक सुदूर किनारे हैं।

कठिन है,

पर जीवन चुनने की कला है,

जीने की मजबूरी नहीं है।

जीने से पहले अपना सबकुछ जान लेना,

एक असाध्य राग हो सकता है, जरूरी नहीं है।

अच्छा है खुद से हरवक्त मिलो और जीते चलो,

वरना प्रश्न और उत्तर चाहे जितने मिलें,

जिन्दगी से और खुद से खुद की पहचान हो न हो।

फुर्सत और हम

pexels-photo-1038935

 

 

 

फुर्सत में अपने आप को देखा,

तो थोड़ा थकमका गया।

बहुत जाना पहचाना था चेहरा,

पर पहचानने में थोड़ा वक्त लगा।

बुरा लगा कि वक्त लगा,

पर सुकून मिला कि वह चेहरा,

चा हे जितना भी बदला हो,

अब भी काफी वैसा ही था।

 

थोड़े कौतूहल और थोड़े अचरज से,

भरा-भरा चेहरा,

कुछ कहने से पहले सोचता,

हिचकिचाता, फिर कहता चेहरा,

भरी दोपहर धूप में चलता,

जलता, फिर भी सपनों में रहता चेहरा,

अधखुली किताब-सा आधी छिपाये,

आधी कहानी को अपनों से कहता चेहरा।

 

 

 

 

किताबों य़े जब धूल हटाई,

एक हैरत अंदर फूट पड़ी।

पढ चुका किसे, किसे छुआ नहीं,

कौन-कौन मिले तोहफे में,

और कौन किसीकी छूट गयी।

इतनी महकें जानी-अनजानी,

इतनी निशानें सीधी-बहकी,

और मुड़े-तुड़े पन्नों की यादें,

कुछ साथ हैं अब भी, कुछ रूठ गयीं।

 

यादें जिंदगी के चहरे हैं,

या कोई तिलस्म का जंगल?

देश काल और पात्रों में उलझे,

बहते जल की धार-सी चंचल।

राह दिखाती, मन भरमाती,

शक्ति श्रोत, पर करती विह्वल।

साँसों जैसी प्राण नियामक,

भाव चक्र का चिरंतन शतदल।

 

यह फुर्सत, और ऐसी खाली पहरें,

एक दूसरे से खेलती लहरें,

जाती कभी भी कहीं नहीं,

पर चलती रहती साँझ दुपहरे।

कितना बीता, कितना बाकी,

कितने परतें, कितने पहरे,

लाख लगाये काले चश्मे,

पर सब कुछ तो कह जाते चेहरे।