
जीवन की ठंढी आँच पर पिघल-पिघल,
सारे बल, सारे कौशल,
सत्य के हठ और मन के छल,
प्रतिरोध दुर्बल और आकांक्षा प्रबल,
जिस रूप में ढले,
और उस साँचे में,
हम जिस भाँति पले,
वही बने खड़े हैं,
परंतु,
संशय से भरे हैं,
कि यदि यह अवसर फिर मिले,
तो क्या-कुछ दुहरायेंगे,
और क्या-कुछ अलग कर पायेंगे,
ऐसे ही पूर्णता से वंचित मन के संग,
जीवन गुजार देंगे,
या कुछ नये अनुभव और कुछ नये रंग,
इसमें और भरेंगे,
और नया इसे एक आकार देंगे?
.
कोई पश्चाताप नहीं,
ग्लानि, रुदन या विलाप नहीं,
यह मात्र एक प्रश्न है,
जो निश्छल है और मौलिक भी,
एक पुराने मित्र की भाँति आता रहता है,
दूर भी हो तो स्नेह त्यागता नहीं कभी।
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एक ऐसा मित्र,
जो प्रभाव भी हो और कारण भी,
प्रश्न भी हो और उत्तर भी,
लक्ष्य भी हो और मार्ग भी,
मन में सुषुप्त भी हो चारों ओर सक्रिय भी,
मुझ में समाहित भी हो और करता हो आप्लावित भी।
यह प्रश्न वही एक मित्र है,
जो देता है प्राणांतक पीड़ा भी,
और रखता है चेतन और जीवित भी।
है सारे विघटन का कारण भी,
और रचने की मूल प्रवृत्ति का आधार यही।
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