अंधेरे

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अंधेरे बहुत तरह के होते हैं,

कुछ आँखों के आगे होते हैं,

और कुछ की हम गठरी बना कर सोते हैं,

कुछ मन में उगते हैं,

और कुछ जीवित ही उजाले को छल कर होते हैं।

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एक अंधेरा,

सुकून भरा होता है,

जहाँ सब कुछ अच्छा लगता है,

अपना हर यकीन सच्चा लगता है,

लगता है कि यह एक तोहफा है,

अब तक की सारी मेहनत का,

अपने खून, पसीने, हौसले और हिम्मत का।

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कुछ अंधेरे डर के होते हैं,

जैसे सब कुछ छिन जाने को हो,

अपना पूरा आप,

फिर कभी न वापस आने को हो,

नहीं जगता फिर अपने भरोसे से प्यार,

रह जाती है बस उजाले की गुहार,

और रौशनी का इंतजार।

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एक अंधेरा बस अंधेरा होता है,

बस उजाले का नहीं होना,

सारी समवेदनाओं से परे,

प्राणहीन, गतिहीन,

बस एक वास्तविकता खालीपन से भरे,

यह भले ही हमारे चारों ओर हो,

हमें छू नहीं पाता है,

उदासीन रहता है,

बस आता है, जाता है।

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पर एक अंधेरा वह भी होता है,

जो एक पिता-सा ढक लेता है,

दोस्त-सा लिपट जाता है,

माँ-सा दुलार करता है,

और एक बच्चे-सा खिलखिलाता है।

उसका किसी से कोई बैर नहीं,

उजाले का स्वागत करता है,

खुद जब जरूरत हो सिमट जाता है,

सब को जगह दे, बाकी में रहता है,

उसके होने से तकलीफ नहीं होती,

बस रौशनी का आतंक थोड़ा कम हो जाता है,

वह हमेशा कुछ देता है,

हमें बनाता है, समझाता है, सिखाता है,

हम सिर्फ उजाले से नहीं,

इस अंधेरे से भी बने हैं,

इसी लिये रौशनी में खो नहीं जाते,

यंत्र नहीं हैं, जिजीविषा के घने हैं।

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