खुद की नजर में

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बस एक बार भटकने की दी थी इजाजत,

कदम मेरे मुझको कहाँ ले कर आये,

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कहाँ हूँ मैं कोई बताता नहीं है,

सब की अपनी उलझनें, हल कौन बताये।

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अपने चांद और सूरज बदल करके देखा,

न फर्क रौशनी में न बदलते हैं साये।

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ऐसा नहीं कि कुछ भी बहुत अलग था पहले,

बदलते-बदलते बदल क्या हम पाये?

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जो हमने गुजारे, दिन-रात हैं कैसे?

उतने ही खूबसूरत, जितने हमने बनाये।

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शिकायतें बे मानी, क्योंकि है खुद को सुनना,

हम ही चाहते थे तकदीर खुद हम बनायें।

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कुछ ना छिना है, अगर सपने हैं बाकी,

फिर से शुरू कर जिंदगी फिर से बनायें।

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हैं खुद की नजर में हम कैसे दिखते,

बात ये हो ना कि हम बन क्या हैं पाये।

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