
अपने ही भार से नत होते गगन को देखा,
और आभार से नत होते मानव मन को देखा,
सहसा कौंध गयी एक प्रतीति की रेखा,
आवश्यक नहीं कि आभार से ही नत हो मन,
और विशाल होने को आवश्यक नहीं अनंत गगन।
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ऐसे दृश्य कई भाँति, कई प्रकार मिले,
और मानव मन के कुछ अवयव वहाँ हर बार मिले ,
अंतर्मन में विश्वास,
उद्देश्य का आभास,
मन में सहज जिज्ञासा,
क्रमश: उन्नयन की आशा।
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निषेध नहीं पर संयम का प्रादुर्भाव दिखा
कुछ भावों का प्रायोजित-सा अभाव दिखा,
घृणा, द्वेष का राग,
अवांछित अनुराग,
सबसे ऊपर होने की पिपासा,
मनवांछित फल की प्रत्याशा।
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हर घटनाक्रम जैसे हो एक यज्ञकर्म का प्रतिफलन,
कुछ विशिष्ट प्रण से आप्लावित था मन का आंगन,
कल्याण के भावों का संग्रह,
शुचिता का प्रबल आग्रह,
आत्मरति से पूर्ण वियोग,
नव निर्माण के सतत प्रयोग।
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नत मन को आभार से देखा,
प्रयत्न जनित है विधि का लेखा।
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