
तुझे देख मन हो स्नेहिल,
नयन सजल, चित्त हर्षित, उर्मिल,
स्वप्न तेरे, मन मेरा स्वप्निल
सारा जग, आनंद से झिलमिल,
पा कर तुझे मैं ने क्या पाया?
तुमने मुझे हँसना सिखलाया।
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तुच्छ प्रतीत होते सब वैभव,
अनायास पूर्णता का अनुभव,
कितना अपना-सा तेरा शैशव,
सुखद, मधुर जीवन का कलरव,
मन पर पड़ी आह्लाद की छाया,
तुमने मुझे करुणा सिखलाया।
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सहज धन्यता मन के आंगन,
बंधन में भी सुख का अर्जन,
मुखर स्नेह शीतल-सा ईंधन,
मूर्त सार्थकता हर पल, हर क्षण,
अभिनव अर्थ जीवन का पाया,
तुमने मुझे रचना सिखलाया।
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सुन्दरता की क्या परिभाषा?
मुग्ध नयन या तृप्त अभिलाषा,
चिर कोमलता, शुचिता की आशा,
चित्त अनुरंजित, विलुप्त निराशा,
हर ऋण को मैं धन कर पाया,
तुमने मुझे करना सिखलाया।
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