जीवन मेरे, वही तुम हो

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निहारते-निहारते हर पल तुमको,

क्या देखा, क्या कुछ छूट गया,

ऐसी बातों की गणना अब क्या,

जो बीता, क्षितिज के पार गया,

तेरा बनता हर पल आकार नया,

अब कहता हूँ तो, मान भी लो,

जितना जो कुछ देख मैं पाया,

निराकार या परिलक्षित काया,

अंतत: मन में ठहर पाया जो,

जीवन मेरे, वही तुम हो।

.

सँवारते-सँवारते पल-पल तुमको,

बहुत तराशा, बहुत सजाया,

क्या तोड़ा, क्या कुछ जोड़ लिया,

कितना कुछ पाया और छोड़ दिया,

क्या सधा, क्या बिगड़ा, अर्थहीन,

नहीं दोष किसी आपाधापी को,

सब मिल बने चित्र पटल पर जो,

जीवन मेरे, वही तुम हो।

.

विचारते-विचारते अनवरत तुमको,

कुछ ज्ञान मिला, कुछ अर्थ मिले,

कुछ भाव प्रदीप्त, कुछ व्यर्थ मिले,

विविध भाव और विविध थे रंग,

जोड़ा जब सब को एक संग,

एक शिल्प बना अद्भुत-सा जो

जीवन मेरे, वही तुम हो।

.

पुकारते-पुकारते खो कर तुमको,

अपने ही हृदय का नाद सुना,

हर वाद सुना, प्रतिवाद सुना,

‘शून्य भी शून्यता से परिपूर्ण,’

किसी को कहते यह संवाद सुना।

जो मिला और जो नहीं मिला,

रहा उपवन सूना, मरु फूल खिला,

जो रिक्त रहा, जो भरा गया,

जहाँ छला और जहाँ छला गया,

कभी संघर्ष छोड़ उसे त्याग कहा,

कभी अड़ा मूल्यों पर अत्याचार सहा,

कभी ययाति और कभी दधीचि,

कभी स्वयम्, कभी मनवता से प्रीति,

कोई पद्धति न बाँध सके जिसको,

जहाँ समावेश चरम विपरीत का हो,

जीवन मेरे, वही तुम हो।

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