
लहरें मेरे पद चिन्हों को मिटाने आती हैं,
या मेरे पैर भिंगाने,
पता नहीं,
पर आती रहती हैं,
बिना बुलाये,
बिना अलसाये,
कहते हैं, यह उनका स्वभाव है।
जो भी है, जैसा भी है,
कहीं तो जुड़े हैं हम,
हमारे बीच कुछ तो लगाव है।
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कभी-कभी मन बस मान लेना चाहता है,
वे भी मेरे मन की भाँति चंचल हैं,
बस करती हैं मुझसे अठखेलियाँ,
कहती हैं – मैं जानती हूँ,
कि तुम्हें पता है ,
कि जीवन का आनंद यही है,
फिर भी ना जानें क्यों,
भूलभुलैया तुम्हें प्यारे हैं,
प्यारी हैं पहेलियाँ।
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सुनना अच्छा लगता है,
सुन लेता हूँ,
और उनके बारे में,
धारणाएँ बुन लेता हूँ।
जीवन है, तो आश्चर्य कभी रुकते नहीं,
एक दिन देखा, लहरें थम-सी गयीं,
सब कुछ शांत हो गया,
मन विकल हो उठा,
चित्त उद्भ्रांत हो गया।
कुछ पल बीते,
लहरें फिर पहले-सी हो गयी,
फिर सब कुछ सामान्य हो चला,
पर मुझे एक सीख मिल गयी,
मुझे लहरों के एक स्वभाव की,
आदत जो पड़ गयी थी,
और यह मुझे अपनी अनधिकृत आसक्ति लगी,
मेरे और लहरों के सम्बंध में,
क्या इसका कोई स्थान होना चाहिये?
या मात्र एक-दूसरे की निजता का,
सम्मान होना चाहिये?
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जीवन है, तो आश्चर्य कभी चुकते नहीं,
एक बार सहसा,
लहरों को उत्ताल होते देखा,
सहज, मनोरम से विकराल होते देखा।
चौंक गया, ठिठका,
और मन ही मन गणना करने लगा,
असहजता के भाव उठे,
अपने आकलन पर हठात संशय जगा।
इस बार लहरों ने मेरे पैरों को नहीं,
पूरा मुझे भिंगा दिया,
मैं अस्थिर हुआ,
असहज हो, अपने आप में सिमट लिया।
क्षुब्ध हुआ,
मन ने लहरों के प्रति क्षोभ पाल लिया।
परंतु,
दूसरे ही क्षण मन ने अपने आप से,
कुछ प्रश्न किये,
और सहजता लौटने लगी,
बिना कोई उत्तर लिये।
यदि मैं लहरों को स्वीकार नहीं कर पाता हूँ,
जैसे भी वे हैं,
तो पारस्परिकता में समता की मूल धारणा को,
नकार रहा हूँ,
प्राय: कहीं अपनी पराजय सहज स्वीकार रहा हूँ।
पर इस पराजय में ग्लानि नहीं है,
आत्मसम्मान की कोई हानि नहीं है।
मन के अपने पर,
उचित अवसर पर,
प्रश्न कर पाने की क्षमता पर गर्व हुआ,
आश्चर्य कि विपदा में भी उत्कर्ष का पर्व हुआ।
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तर्क के अंतिम छोर तक,
अपने पर प्रश्न करने की क्षमता,
और इसके लिये सतत प्रयास,
मनुष्य की विशिष्टता पर अमिट विश्वास।
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