
मन के अपरिमित आकाश में,
विविधता के संयोजन के प्रयास में,
चित्त में सारे भावों का समावेश हो,
उचित है,
यह भाव पटल को सम्पूर्णता देता है।
यह व्यक्तित्व की परिपूर्णता का प्रणेता है।
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पर इनकी उपस्थिति समरूप हो, समतुल्य हो,
अनावश्यक विचार है।
यह भंग करता विविधता के स्वागत का,
मूलभूत आधार है।
समरसता की सोच यदि संकीर्ण करे,
विचारों की स्वतंत्रता पर आघात बने,
तो विश्लेषण आवश्यक है,
क्योंकि ऐसे व्यतिक्रमित दर्शन ने,
मौलिकता का दमन किया है।
बहुत सारी सुंदरता का,
निर्माण से पहले हनन किया है।
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निषेध अभिप्राय नहीं,
पर अनुशासन अपेक्षित है,
अंतहीन यदि तो जीवन भी हो,
मूल धारणा में अनुचित है।
अतिरेक किसी भी भाव का हो,
रोमांच तो देता है,
पर अपना मूल्य,
अनायास ही ले लेता है।
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आसक्ति, बलवती हो अतिरेक से,
उन्माद बन जाती है,
फिर सुमति, विवेक और निष्ठा,
अपवाद बन जाती है।
जो बचता है वह है प्राप्ति की लालसा,
विवेकहीनता की पराकाष्ठा, अंधकार और शून्यता।
विविधता और विषमता,
के अंतर को जितना ही हम जान पाते हैं,
उतने ही उन्नत और सहयोग के,
सक्षम हम बन जाते हैं।
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