
बहुत दिनों से दिखे नहीं,
क्या और कहीं थे चले गये,
पहचान पुरानी है अपनी,
पर लगते हो कुछ नये-नये।
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खुशी मुझे कि हम हर बंधन,
के पार गये, हर बार गये,
निष्ठा अंतिम सत्य के प्रति,
रहा अक्षुण्ण, बिन अपवाद किये।
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मैं ने कभी अपने जुड़ाव को,
कभी नहीं कोई नाम दिया,
ना बंधन, ना बोझ, ना दुविधा,
अंतरंगता कह, सम्मान किया।
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सीमित रहे मेरे परिचय से,
अपना अस्तित्व भी स्वीकार नहीं,
अपने नियमों से अन्य को बाँधे,
किसी का भी यह अधिकार नहीं।
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भाव हो उन्मुक्त, बंधन विहीन,
चेतना स्वतंत्र हर चिंतन को,
न्याय अंकुश नहीं, स्वभाव हो,
मति कल्याण का वाहन हो।
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इस मूल धारणा का विश्वास धरे,
प्रिय सखा आसक्ति रही वर्जित,
मेरे सर्वस्व, चेतना अंतर्मन के,
हो सदा स्वतंत्र, स्वत: ऊर्जित।
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सखा विचार, चिंतन, जिज्ञासा,
तुम से ही परिभाषित हूँ,
मात्र एक संकल्प इसके भी ऊपर,
नहीं बंधूँ कभी, ना ही तुझे बांधूँ।
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