
आभा नभ में भरते तारे,
आँखमिचौली करते तारे,
लेटा उन्मुक्त गगन के नीचे,
छुप अपने अज्ञान के पीछे,
एक क्षण पास बुलाते लगते,
दूसरे क्षण कुछ बातें करते,
कभी लगते ममता से निहारते,
जैसे हों सो जाने को कहते।
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मेरा सब कुछ ज्ञात है उनको,
अक्सर कहते ठहर जा, सुन तो,
सुनता था पर समझ न पाता,
फिर भी यह खेल मुझे था भाता,
अब भी तर्क के धुंधलेपन से,
छन-छन कर स्मृति पटल पर,
उन निधियों की छवि जो बनती है,
गति देती, जब भी हो जाता जड़।
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युग कितने ही बीत गये पर,
अब भी अभिभावक-से हो कर,
वरदहस्त रख सर के ऊपर,
मुखर भाव आश्वस्ति का धर,
सजग दृष्टि, स्नेह मधुरतम,
मानव मन के अवलम्ब सनातन,
चंचल, तटस्थ, सुदूर पर प्रस्तुत,
चिर नवीन, आराध्य पुरातन।
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आभा नभ में भरते तारे,
आँखमिचौली करते तारे।
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