पीड़ा

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पीड़ा,

थी तो पहले भी,

पर थोड़ी तरल थी,

बहुत ही सरल थी,

दिखती थी,

समझ में आती थी,

अक्सर साथ रहती थी,

बस कभी-कभी कुछ देर के लिये,

दूर चली जाती थी ।

.

पता नहीं कैसे,

अब सख्त हो गयी है,

चुभने लगी है,

नन्ही टहनी से,

अब दरख्त हो गयी है,

जड़ें गाड़ चुकी है,

मेरे हर यकीन पर,

बस उसी की छाया है,

मेरी पूरी जमीन पर,

अब पल भर को भी,

कहीं जाती नहीं है,

पहले की तरह,

रूप रंग बदल पाती नहीं है,

कहाँ से बटोर लिये हैं उसने कंकड़ पत्थर,

पूछना चाहता हूँ कभी उससे मिलकर ।

पूछते हो,

क्यों पाल रखा है मैंने इसको अब तक ?

क्योंकि,

बाकी सारे सहचरों ने,

कभी ना कभी छला है,

बस एक यही है,

जो विध्वंस में, निर्माण में,

मृणमयता में और सजग प्राण में,

बिना डिगे,

मेरे साथ चला है ।

.

तुम निर्पेक्ष, तुम निष्काम,

पीड़ा, तुम्हें प्रणाम ।

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तुम कौन हो

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तुम कौन हो ?

कुछ कहते हुए या मौन हो,

कभी आँखों ही आँखों में,

कभी मुस्कुराहट से,

कभी अट्टहास से कभी आहट से,

कितना कुछ कह देते हो,

जीवन को कितने रंग देते हो,

फिर से प्राण फूँकने वाले चमत्कार-सा,

अपना अनमोल संग देते हो ।

.

यह क्या है ?

जो मुझे एक बच्चे-सा बहलाता है,

चोट लगे तो सहलाता है,

कभी कीचड़ में गिर जाऊँ तो,

उठाता और नहलाता है ।

क्या यह मात्र तुम्हारा साथ है,

या हर कदम मेरी चिंता करने वाला,

तुम्हारा हाथ है ?

.

यह कैसे हुआ?

दिन भर हम रोते रहे,

रात भर हम सोते रहे,

हरे भरे मन के आंगन में,

प्यास ही प्यास बोते रहे,

क्या अर्जित किया पता नहीं,

तेरा दिया खरापन खोते रहे ।

तेरा फिर से आभार कि,

दूर मुझसे तुम फिर भी नहीं गये,

निविड़तम अंधकार में भी,

मिलते रहते हैं तुम्हारे जलाये दीये ।

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सखा भाव

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कभी नरम-नरम, कभी खुरदुरे,

हरदम लेकिन रस से भरे,

बातें तीखी, बातें मीठी,

पर सरल अर्थ से बहुत परे,

कुछ होता है ऐसा ही सखा भाव,

कि परिहास और भी संग जड़े ।

.

रख सम्हाल इसे तू अंकपाश,

सम्बंध नहीं, यह है विश्वास,

जो जीने की इच्छा प्रबल करता,

अंतर्मन को देता आकाश,

प्रश्न उठे क्या पाया जग में,

उत्तर, बंधुत्व और मन का विकास ।

.

अकेलेपन से भय को छीन,

देता बल यदि एकांत में लीन,

पाँव की बेड़ी, न अपेक्षा का भार,

दुर्गम पथ बीते श्रम से विहीन,

छोड़ अहम् हो सहज प्राण,

हो सखा भाव के उल्लास अधीन ।

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कभी खत्म नहीं होती

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छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती,

अपने से मुलाकात है जो कभी खत्म नहीं होती ।

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मैं खुद चला या मुझको चलाया गया,

कुछ याद है, तो बाकी क्यों भुलाया गया,

लौ जो एक जलती रही है सीने में हरदम,

खुद जली या उसको भी है जलाया गया,

इन मुद्दों की बारात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

जिस पर चला मैं वह राह किसने दिखायी,

जाती कहाँ है और है किस ओर से आयी,

चलना और पहुँचना कितने एक या जुदा,

आज तक किसी ने यह बात नहीं बतायी,

खुद से शह और मात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

ख्वाहिशें कितनी हो तो अच्छा है होना,

उन्हें पाने का जुनून करता बड़ा या बौना,

मापते इस सब को हम किस औजार से,

कुछ पाने मतलब क्यों थोड़ा खुद को है खोना,

तिलिस्म की यह रात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

क्या होता अगर सारे ये सवाल नहीं होते,

कम सोचते, इतने सारे खयाल नहीं होते,

समय के संग गुजर तो जाती जिन्दगी,

पर उनके कद इतने विशाल नहीं होते,

नेमत है या खैरात, कभी खत्म नहीं होती,

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

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आगे ही बढ़ती है

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मेघ से छन कर आती किरणों ने मुझसे कहा,

परेशान मत हो,

सूरज बिल्कुल ठीक है,

और यह कुछ देर की ही बात है ।

.

मेघ से गिरी एक बूंद ने मुझे बताया,

बादल फिर आयेगा,

फिर बारिश होगी,

अभी सूरज के ताप ने छीन ली है नमी,

पर बादल फिर से उठा लायेगा पानी,

और यह कुछ देर की ही बात है ।

.

दोनों की बातें मुझे सच्ची लगी,

और मैंने दोनों से दोस्ती कर ली ।

.

अब तक मैं दोनों से नाराज था,

कि ये कभी भी हमारा कहा नहीं करते हैं,

पर अचानक बहुत कुछ बदल गया,

मुझे अपनी नाराजगी बेमतलब लगने लगी,

मैं तय नहीं कर पा रहा था,

यह मेरी नयी-नयी दोस्ती का असर है,

या मैं अब समझने लगा हूँ,

कि कुछ है जो हमारी निजी नाराजगी से बेहतर है ।

.

जिन एहसासों को मैंने सही मान लिया था,

उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ,

ऐसा मन ही मन ठान लिया था,

हर वक्त सोचता रहा था,

सिर्फ गुजरते वक्त ने नहीं सिखायी हैं ये बातें,

 मैं उन्हीं के संग पला हूँ, बढ़ा हूँ,

और सीखा है इन्हें जिंदगी के एक हिस्से की तरह,

वही एहसास आज सवालों के घेरे में थे,

कई सारे यकीन आधे अंधेरे में थे,

खुद को ही नहीं,

अपने एहसासों को चाहे हम जो भी मानते हैं,

हम उन्हें पूरी तरह कभी नहीं जानते हैं ।

.

एक सवाल और भी था,

मेरा उन पर या उनका मुझ पर इख्तियार है,

ये एहसास मुझे राह दिखा रहे हैं,

या इन्होंने मुझ पर कर रखा है काबू,

यह उलझन अब भी बरकरार है ।

ऐसा भी नहीं कि,

काबू में इनके होना मुझे अच्छा नहीं लगा,

पर इसे आखिरी सच मान लूँ,

इतना भी सच्चा नहीं लगा,

बहरहाल उसको भी एक एहसास बना लिया,

आगे बढकर उसको गले लगा लिया ।

.

आड़े-तिरछे रास्तों से गुजरती है,

कभी थमे होने का,

कभी ठगने का,

तो कभी मुड़ कर लौटने का वहम पैदा करती है,

पर हमेशा ऊपर उठाती है,

क्योंकि जिन्दगी हमेशा आगे ही बढ़ती है ।

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पता नहीं

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दूर की चीजें छोटी दिखती हैं,

यह अभिशाप है या वरदान,

पता नहीं ।

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पुरानी यादें जड़-सी बैठती जाती हैं मन के अंदर,

ठंढी हो जाती हैं,

सिकुड़ कर छोटी हो जाती हैं,

नयी यादों के लिये जगह बनाती हैं,

यह पुरानेपन की नियति है,

या नये का सम्मान,

पता नहीं ।

.

दूर कहीं लेट कर,

अंतिम पहर के अंधेरे में,

सर्द आँखों से बीते कल के अपने आप को देखने पर,

जो नजर आता है,

उलझाता है,

लेकिन उससे जो उठती है टीस,

हमारी पूरी लड़ाई उसी से है,

या वही है हमारी पहचान,

पता नहीं ।

.

कल जो हम छोड़ आये थे,

बेकार मान कर अपने कई हिस्सों को,

क्योंकि कुछ पुराने लगने लगे थे,

कुछ नयी आदतों को चुभने लगे थे,

फुर्सत की घड़ी में,

अपने से होती बतकही में,

एक सवाल क्यों बार-बार सर उठाता,

और रुला जाता है,

‘क्यों फेंक आये इतने जरूरी सामान,’

तो उत्तर होता है,

पता नहीं ।

.

पौ फटने से पहले,

आकाश से उतरती सुंदरता को निहारता मन,

कब आखेट को निकल पड़ता है,

और कब थकान के आगोश में सो जाता है,

फिर उठ कर,

बीते समय का आकलन कर,

हैरान हो पूछता है,

कि क्या इसी के लिये बना था वह,

क्या जिन्दगी गुजरनी है इसी तरह,

कौन दे सकता है उसके सवालों के जवाब,

और कहाँ ढूंढ सकता है वह अपना खोया अभिमान,

फिर उत्तर होता है,

पता नहीं ।

.

जहाँ हम होते हैं,

वहाँ होना हमारी नियति है,

या उद्गम से हमारी यात्रा का परिणाम,

सफर है मुसलसल,

या है इसका कोई अंजाम,

हजारों बार पूछा गया इस सवाल का,

हर बार लगता है कि मिल गया है जवाब,

पर जैसे ही लगता है,

कि सब कुछ सुलझ गया है,

क्यों किसी कोने में सर उठा कर,

वही सवाल कर देता है हैरान,

पता नहीं ।

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अपना-अपना जीवन

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अपने-अपने अनुराग, विषाद,

और अपने-अपने पागलपन हैं,

विचरण उन्मुक्त गगन में अपने,

और सब के अपने  बंधन हैं ।

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कोई घट इतना नही खाली,

कि कोई सपनों के साथ समाये,

ऐसा भी भरा हुआ नहीं देखा,

कि स्नेह किसी का धर ना पाये ।

.

खालीपन कितना खाली होता,

जब अंतर्घट में भरता जाता,

मन में भरते एकांत प्रेम से,

खालीपन का क्या है नाता ?

.

स्नेह कितनी उन्मुक्ति देता,

कितने इसके अनजाने बंधन,

इन गणना से परे है कितना,

बंधुत्व खोजता मानव का मन ।

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छुपा-छुपा रखते कितने,

अपने बीते पल की याद,

सब कुछ लुटा देने का लेकिन,

उससे भी ऊपर उन्माद ।

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कथा कभी भी शेष न होती,

बस कहने वाला लेता थाम,

खुश हम होते इतने से कि,

यहाँ अल्प, वहाँ पूर्ण विराम ।

.

एक प्रण जो निभ नहीं पाया,

बल और गति है देता रहता,

अब तक जी भर जी नहीं पाया,

आगे रहूँ ना इस श्राप को सहता ।

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सब कुछ जानने वाला कैसे,

जानता कुछ भी नहीं है शेष,

और जो कहे कुछ नहीं जानता,

उसी से है मानवता का उन्मेष ।

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सहज शोध उल्लास-क्रंदन का,

माया स्पर्धा-अभिनंदन का,

गणना इस क्षण और अनंत का,

बोधातीत है अर्थ जीवन का ।

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तहखाने

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आदतन अक्सर मैं दिल के तहखानों को टटोलता हूँ,

भूली-बिसरी पोटलियों को सम्हल-सम्हल कर खोलता हूँ ।

कोई आहट, कोई खुशबू, कहीं खो न जाये इन लम्हों में,

धीरे-धीरे साँसें लेता और हल्के-हल्के बोलता हूँ ।

.

रुकी नहीं है जिंदगी, कहती रहती चल पड़ने को,

हैं अब भी बहुत-से चोटी-घाटी चढ़ने और उतरने को,

जिया हुआ हर लम्हा अब भी बुनता एक नया धागा,

और उन्हीं से बुनी पोटली सहेजता तहखाने में धरने को ।

.

गिले-शिकवे की बात नहीं है, सिर्फ दुआएँ हैं मन में,

हासिल और छूटा सब मेरा, तहखाने और आंगन में,

सारे शीशा, सारे पत्थर, मैं ने सहेज कर रखे हैं,

हर इत्र की खुशबू, दाग लहू के, बसे हैं मेरे तन-मन में ।

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काले और सफेद रंग की बात चली तो कहता हूँ,

मटमैले वह गाँव हैं सारे मैं जिनका हो कर रहता हूँ,

साफ शहर के किस्से मैंने खूब सुने हैं यारों से,

जब कालिख की बात छिपाते, सुनता हूँ और सहता हूँ ।

.

मेरे दिल की धड़कन मुझसे अक्सर यह पूछा करती है,

मैं नाहक ही चलती रहती या कोई रूह यहाँ पर रहती है,

ठीक-ठीक नहीं मालूम, पर हँसकर मैं कह देता हूँ,

तू है, बस इतना काफी है, वैसे लौ की एक दरिया बहती है ।

.

नहीं कोई तिलस्म या जादू, जो है खुली किताब है एक,

खानाबदोश खयालों का मैं, खुद से ही बैठा लगाकर टेक,

आवाज कभी तुम दे देना, एक इशारा भी वैसे काफी है,

रहूँ जहाँ भी आ जाऊंगा, लेकर एक पोटली की भेंट ।

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हृदय ने फिर द्वार खोले  


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हृदय ने फिर द्वार खोले,

कई वसंत बीत गये,

युग अनंत बीत गये,

छोड़ वृथा मौन का हठ अब,

समवेत गान में संग हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

‘मैं कौन?’ यह शोध भला है,

जप, तप, ज्ञान और बोध भला है,

भला सदा एकांत और चिंतन,

पर जीवन समन्वय की कला है,

इन भ्रम के सम्मोहन से उबर,

जीवन बुला रहा बाँह खोले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

दु:ख छूटे का होना निश्चित,

भग्न स्वप्न पर रोना निश्चित,

जीवन प्रवाह नहीं रुकता है,

यद्यपि सर्वस्व का खोना निश्चित,

उतना ही निश्चित चिर अनिश्चय,

परंतु अर्थ तेरा तुझसे ही भोले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

संकोच नहीं, अभिमान भूत पर,

निर्मल भविष्य के स्वप्न सजा कर,

वर्तमान हो एक उत्सव जिसमें,

करुणा, बल, एक संग मिलकर,

कर्म को दे आनंद का आवरण,

जीवन स्वयं अभिप्राय-सा हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

स्थायी नहीं कोई जीवन दर्शन,

चढ़ता तर्क की कसौटी हर क्षण,

अपना रूप देती संवेदनाएँ उसे,

पर कर्म चाहता निर्विघ्न उन्नयन,

सारे विरोध मिथ्या हैं यदि तुझे,

सब भाव सहज स्वीकार हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

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क्या जोड़ चले

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किनारे बैठा भला था ।

उस पार की रोमांचक जनश्रुति थी,

बहती नदी में सुन्दरता की अनुभूति थी,

जल के छल-छल में मोहक संगीत था,

पक्षियों के कलरव में राग थे और गीत था,

पानी के वेग से उठता हुआ उन्माद था,

बहती बयार की छुअन में सुरभि थी, आह्लाद था,

सब कुछ समरस था, स्थिरता का भाव था,

जीवन में कोई विक्षोभ नहीं स्थायी ठहराव था ।

.

जीवन भर के चिंतन से जो मनीषियों ने लिखे,

वह सभी कुछ था वहाँ, अंतत: जो चाहिये,

निष्कर्ष तो था वहाँ, निष्कर्ष की यात्रा नहीं थी,

और हठात यह शांति आनंद नहीं तंद्रा लगी ।

.

क्या नहीं था जान पाना इतना भी दुर्बोध नहीं था,

पौरुष को अवलंब देता कहीं कोई प्रतिरोध नहीं था,

स्नायुओं को अर्थ देता ऐसा कोई संघर्ष नहीं था,

हृदय को उद्वेलित करती नहीं थी वेदना और व्यथा,

संवेदना फिर जी उठे, ऐसा कोई स्पर्श नहीं था,

मन का जाया कह सकूँ ऐसा कोई हर्ष नहीं था,

सृष्टि से अनवरत प्रश्न करती कहाँ खोयी वह चेतना,

जीवन में थी मिठास, लावण्य का कोई पुट नहीं था ।

.

दान में सिद्धि मिले, मन तृप्त हो पाता नहीं,

बिन उद्यम के प्राप्त बैकुंठ भी मन भाता नहीं,

पर तथ्य यह पूरा नहीं,

और सत्य तो निश्चय नहीं,

बीतना जीवन का है सत्य निश्चित यद्यपि,

मात्र सुगमता बीतने का हो सकता इसका लक्ष्य नहीं,

अंत तक तो है पहुँचना,

अंत पर जीवन नहीं,

उपस्थित अनगिनत रूप में,

जीवन इष्ट है, अभिप्राय भी ।

.

कौतूहल ले नदी में उतरा,

सृष्टि की विविधता में सानंद चकित-सा,

असिमित विस्तार का एक बौना द्रष्टा,

अपने मन बिंदु में ब्रह्माण्ड समेटे,

अद्भुत गति से दौड़ रहा था,

कभी पाषाणों के नीचे पिसता,

कभी सूक्ष्म रंध्रों से विवश निकलता,

कभी पलायन, कभी पारायण,

कभी युद्ध और कभी समर्पण ।

इस क्षण तृप्ति कुछ पा लेने की,

अगले क्षण अपरिग्रह, तिलांजलि,

कभी विस्मय कि रहस्य में छुपा कल,

और कभी लगे पूर्व नियोजित सृष्टि सकल ।

.

यह जो सतत शोध, अन्वेषण है,

जिसमें पथ, साधन, साध्य समेकित है,

यह उद्वेलन ही जीवन है,

यह अपनी ही प्रेरणा प्रेरित है ।

तर्क हो जो भी, चाहे जितना,

अंतिम प्रश्न तो है बस इतना,

‘बस कौतूहल था, छोड़ चले,

या जिया इसे, कुछ जोड़ चले ।‘

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