तहखाने

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आदतन अक्सर मैं दिल के तहखानों को टटोलता हूँ,

भूली-बिसरी पोटलियों को सम्हल-सम्हल कर खोलता हूँ ।

कोई आहट, कोई खुशबू, कहीं खो न जाये इन लम्हों में,

धीरे-धीरे साँसें लेता और हल्के-हल्के बोलता हूँ ।

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रुकी नहीं है जिंदगी, कहती रहती चल पड़ने को,

हैं अब भी बहुत-से चोटी-घाटी चढ़ने और उतरने को,

जिया हुआ हर लम्हा अब भी बुनता एक नया धागा,

और उन्हीं से बुनी पोटली सहेजता तहखाने में धरने को ।

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गिले-शिकवे की बात नहीं है, सिर्फ दुआएँ हैं मन में,

हासिल और छूटा सब मेरा, तहखाने और आंगन में,

सारे शीशा, सारे पत्थर, मैं ने सहेज कर रखे हैं,

हर इत्र की खुशबू, दाग लहू के, बसे हैं मेरे तन-मन में ।

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काले और सफेद रंग की बात चली तो कहता हूँ,

मटमैले वह गाँव हैं सारे मैं जिनका हो कर रहता हूँ,

साफ शहर के किस्से मैंने खूब सुने हैं यारों से,

जब कालिख की बात छिपाते, सुनता हूँ और सहता हूँ ।

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मेरे दिल की धड़कन मुझसे अक्सर यह पूछा करती है,

मैं नाहक ही चलती रहती या कोई रूह यहाँ पर रहती है,

ठीक-ठीक नहीं मालूम, पर हँसकर मैं कह देता हूँ,

तू है, बस इतना काफी है, वैसे लौ की एक दरिया बहती है ।

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नहीं कोई तिलस्म या जादू, जो है खुली किताब है एक,

खानाबदोश खयालों का मैं, खुद से ही बैठा लगाकर टेक,

आवाज कभी तुम दे देना, एक इशारा भी वैसे काफी है,

रहूँ जहाँ भी आ जाऊंगा, लेकर एक पोटली की भेंट ।

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