किसकी सुनें

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विभ्रांत मन,

विषम प्रश्न,

किसकी सुनें ?

.

संस्कार सुनने का,

दिया गया,

अनुग्रहित;

अधिकार चुनने का,

क्या हममें ही निहित ?

हैँ भ्रमित;

कब तक रुकें ?

करनी निर्धारित दिशा,

किसकी सुनें ?

.

गुरु बिन ज्ञान नहीं,

और मन है कि मानता,

कुछ भी बिन प्रमाण नहीं,

क्या गुरु को भी कसौटी पर धरें ?

नमन में भी संशय करें,

किसकी सुनें ।

.

विवेक रहित जीवन का अर्थ नहीं,

पर वह भी जिज्ञासा के समक्ष समर्थ नहीं,

कहाँ तक द्वंद्व से लड़ें,

कब जिज्ञासा के ऊपर,

विश्वास धरें ?

किसके ऊपर किसको कहें,

किसकी सुनें ?

.

सुनना,

किसी की अनुभूतियों पर विश्वास है,

औरों के सच को स्वीकारने का प्रयास है,

परंतु क्या यह पर्याप्त आधार है,

कौतूहल के दमन का,

जो मन में उठता अनायास है ?

यह छद्म क्यों बुने ?

पर प्रश्न वहीं का वहीं,

किसकी सुनें ?

.

यदि हम,

मानव श्रृंखला के सहभागी,

तो यह प्रश्न कदाचित त्रुटिपूर्ण है,

प्रस्तावना अपूर्ण है,

चेतना के व्यापार में,

इस महाप्रयाण के विस्तार में,

हम याचक भी,

हम वाचक भी,

हम कारण भी,

हम कर्ता भी,

तो उचित कि सब की सुन,

अपनी सुनें,

अपने विश्वास जनें,

फिर अपनी राह चुनें ।

कोई भ्रांति नहीं,

सब को सुनें,

और अंत में अपनी सुनें ।

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