
समय के अनंत विस्तार पर,
कुछ मनगढंत चिन्ह उकेर कर,
हर तरह की यादों को,
हुए और संभावित संवादों को,
निष्कर्ष तक पहुँचे और ठहर गये विवादों को,
अपने तथाकथित सम्मान,
और अनायास मिले अपवादों को,
एक-एक कर रखता जाता हूँ,
फिर जब एक पड़ाव आता है,
तो उसे चादर की तरह बाँध कर एक गट्ठर बना लेता हूँ,
फिर कभी इसे सिरहना,
कभी पीठ का बोझ,
तो कभी बनाये ढाल रहता हूँ ।
बोल चाल की भाषा में इसे एक साल कहता हूँ ।
.
बीत कर यह कहीं चला नहीं जाता,
पार्श्व में पड़ा रहता है;
जब भी छूता हूँ तो,
स्पंदित करता है,
हँसाता है, रुलाता है,
भूलने की कोशिश करूँ भी तो रूठता नहीं,
पर जब भी बेचैन होता हूँ,
तो राह दिखाने को खड़ा रहता है ।
.
ये अनगढ़ आकृति वाले गट्ठर,
मेरे धरोहर हैं,
मेरे अर्जित निधि हैं,
काल्पनिक सीमाओं में बँधे टुकड़ों-से दिखते हैं,
पर वास्तव में मुझे परिभाषित करती,
मेरी परिधि हैं ।
.
निरा काल खण्ड नहीं,
भविष्य का आकर्षण है, भूत से मुक्ति है,
यथार्थ में जीवन को समय में बुनने की एक युक्ति है,
जो हमारी अब तक की यात्रा का,
प्रमाण, परिणाम और आकार है,
संग ही हमारी आगे की यात्रा की,
चेतना, ऊर्जा और आधार है ।
poems.bkdas@gmail.com
