
अपने-अपने अनुराग, विषाद,
और अपने-अपने पागलपन हैं,
विचरण उन्मुक्त गगन में अपने,
और सब के अपने बंधन हैं ।
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कोई घट इतना नही खाली,
कि कोई सपनों के साथ समाये,
ऐसा भी भरा हुआ नहीं देखा,
कि स्नेह किसी का धर ना पाये ।
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खालीपन कितना खाली होता,
जब अंतर्घट में भरता जाता,
मन में भरते एकांत प्रेम से,
खालीपन का क्या है नाता ?
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स्नेह कितनी उन्मुक्ति देता,
कितने इसके अनजाने बंधन,
इन गणना से परे है कितना,
बंधुत्व खोजता मानव का मन ।
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छुपा-छुपा रखते कितने,
अपने बीते पल की याद,
सब कुछ लुटा देने का लेकिन,
उससे भी ऊपर उन्माद ।
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कथा कभी भी शेष न होती,
बस कहने वाला लेता थाम,
खुश हम होते इतने से कि,
यहाँ अल्प, वहाँ पूर्ण विराम ।
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एक प्रण जो निभ नहीं पाया,
बल और गति है देता रहता,
अब तक जी भर जी नहीं पाया,
आगे रहूँ ना इस श्राप को सहता ।
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सब कुछ जानने वाला कैसे,
जानता कुछ भी नहीं है शेष,
और जो कहे कुछ नहीं जानता,
उसी से है मानवता का उन्मेष ।
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सहज शोध उल्लास-क्रंदन का,
माया स्पर्धा-अभिनंदन का,
गणना इस क्षण और अनंत का,
बोधातीत है अर्थ जीवन का ।
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