हृदय ने फिर द्वार खोले  


Photo by Turgay Koca on Pexels.com

हृदय ने फिर द्वार खोले,

कई वसंत बीत गये,

युग अनंत बीत गये,

छोड़ वृथा मौन का हठ अब,

समवेत गान में संग हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

‘मैं कौन?’ यह शोध भला है,

जप, तप, ज्ञान और बोध भला है,

भला सदा एकांत और चिंतन,

पर जीवन समन्वय की कला है,

इन भ्रम के सम्मोहन से उबर,

जीवन बुला रहा बाँह खोले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

दु:ख छूटे का होना निश्चित,

भग्न स्वप्न पर रोना निश्चित,

जीवन प्रवाह नहीं रुकता है,

यद्यपि सर्वस्व का खोना निश्चित,

उतना ही निश्चित चिर अनिश्चय,

परंतु अर्थ तेरा तुझसे ही भोले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

संकोच नहीं, अभिमान भूत पर,

निर्मल भविष्य के स्वप्न सजा कर,

वर्तमान हो एक उत्सव जिसमें,

करुणा, बल, एक संग मिलकर,

कर्म को दे आनंद का आवरण,

जीवन स्वयं अभिप्राय-सा हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

.

स्थायी नहीं कोई जीवन दर्शन,

चढ़ता तर्क की कसौटी हर क्षण,

अपना रूप देती संवेदनाएँ उसे,

पर कर्म चाहता निर्विघ्न उन्नयन,

सारे विरोध मिथ्या हैं यदि तुझे,

सब भाव सहज स्वीकार हो ले ।

हृदय ने फिर द्वार खोले ।

poems.bkd@gmail.com

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment