हे चिर अशेष

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जगमग करते नभ में तारे,

अपनी सज्जा में स्वयम मगन,

मैं हूँ इनमें या ये हैं मुझमें,

इस परिहास से मुदित गगन,

यह सब मेरा या मैं हूँ इनका,

जिज्ञासा में उद्वेलित मानव मन।

पास बुलाते जैसे हर पल,

हरा-भरा और शस्य श्यामल,

बसुधा ओढती इनको ऊपर,

या हैं ये वन उनके वल्कल?

आकर्षित भी, आतंकित भी,

पहली छवि आसक्ति का निर्मल।

दुग्ध-सिक्त तप-मग्न शिखर,

किसी सिद्धि में लीन विप्रवर,

प्रेरणा लक्ष्य और आकांक्षा के,

जागृत करते संकल्प प्रखर,

धन्य बनूँ बन उपासक इनका,

या बनूँ इनसा मैं अजर अमर।

विस्तृत प्रांगण का चिर सम्मोहन,

वक्ष स्थल आदि पुरुष का पावन,

उद्वेलन और स्थिरता संग संग,

सागर मनीषी का आत्ममंथन,

सीखूँ समेटना उत्ताल तरंगें,

या अंतर्मन का स्वभाव गहन।

अद्भुत यह विविधता, समावेश,

मैं चिर याचक का धरे भेष,

मन के यायावर से पूछ रहा,

जियूँ या निहारूँ प्रकृति निर्निमेष,

हे रचनाकार समग्र सृष्टि के,

दे सहज समर्पण, हे चिर अशेष।

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2 thoughts on “हे चिर अशेष”

  1. इसे अतिश्योक्ति मत समझिएगा, लेकिन आपका लेखन इस दशक में मैंने जितने लेखकों को पढ़ा है, उन सबों में उत्कृष्ट है।🙏

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  2. आपकी प्रशंसा से नत हूँ। मेरी रचनाओं पर ध्यान देने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। आभारी हूँ। अपनी आलोचना और सुझाव भेजते रहें।

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