सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है?

Photo by Dominic M Contreras on Pexels.com

चपल शिशु का क्रीड़ा प्रांगण,

अभिसारिका का सज्जित आंगन,

अंतरिक्ष का प्रसार विहंगम,

हर रंग में करता सम्मोहित,

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

सागर से उठ उड़ते बादल,

हिमनद से झरता निर्मल जल,

जटिल जीवन चक्र के मूल सरल,

सबके सब हैं स्वत: जनित,

या सन्निहित इनमें कोई प्रयास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

उत्सर्ग अभिमान पर सारी निधियाँ,

ढूंढते जीवनभर ऋद्धि-सिद्धियाँ,

अनगिन धारना अनगिन बिधियाँ,

हैं निराधार या आधार कोई विश्वास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

बल, बुद्धि, स्नेह की सतत पिपासा,

पल-पल होती त्वरित जिज्ञासा,

टूट-टूटकर जुड़ती आशा,

मनके सारे भाव स्वयम्भू,

या किसी अपरिभाषित का आभास है?

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

अपना मौलिक अर्थ ढूँढता,

ज्ञान, विवेक, परमार्थ ढूँढता,

निरे अस्तित्व में अर्थ गूंथता,

सत्य, मोक्ष के अन्वेषण में,

कैसी अद्भुत अमिट प्यास है।

इस सृष्टि का सौन्दर्य अनायास है,

या इसके पीछे अलौकिक विन्यास है?

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