कहाँ से आता है बल

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चढ-चढ कर दुर्दांत शिखर पर,

आज का अपना सब कुछ दे कर,

थक कर दिन जब जाता ह ढल,

कहाँ से आता है बल,

फिर से अपने स्नेह में सिक्त होने का,

बीते कल के भार से रिक्त होने का,

और कैसे मलिन मन

फिर से एक आहुति को होता है निर्मल,

कहाँ से आता है बल?

 

यह कोई अमूर्त आकांक्षा है,

या कोई अमिट जिज्ञासा है,

है कोई विचलन, मतिशून्यता,

या स्वर्णिम कल की आशा है?

 

अवचेतन मन में लिखा हुआ ,

यह अबूझ कोई प्रारब्ध है,

और सारी गति, हर घटना क्रम का,

संकेत कहीं उपलब्ध है?

 

अनाहूत है, विध्वंसमुखी है,

या कहीं  कोई नियंत्रण है,

इतनी ऊर्जा क्षय करता यह,

कहाँ इसका अक्षय ईंधन है?

 

ज्ञान सही, विज्ञान सही है,

जहाँ बंधे चित्त ध्यन सही है,

पर इनमें भी मेरी जिज्ञासा का,

सटीक समाधान नहीं है।

 

उत्तर सारे मिल जाते जो,

क्या रहता फिर ले आने को,

बिन ऐसे मौलिक प्रश्नों के,

कहता ‘तुझे’ क्या समझाने को।

 

आभार कि रहस्य ये विद्यमान हैं,

नत हूँ, जिजीविषा अक्षय प्राण है,

जीवन जीने से महान है,

जीने के अनुभव से महान है।

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