खुशी, कुछ देर और ठहर

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मेरे नहीं तो किसी और के घर,

खुशी, कुछ देर और ठहर,

जीना आता है तेरे बिन लेकिन,

अच्छा लगता है तेरे साथ सफर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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आज भी तेरा पता मालूम नहीं,

लोग पूछते हैं, मैं टाल देता हूँ,

मुस्कुराता हूँ कि तलाश तेरी,

ले कर गयी मुझको किधर-किधर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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लोग कहते थे तुम्हारे बारे में,

कि तुम कभी भी मिल सकती हो,

खोजता हूँ तुझे रात के अंधेरों में,

और ढूँढ़ता हूँ सुबह, शाम, दोपहर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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फूलों से, तितली से, पंछी से,

माँगी उधार, तो वे कहने लगे,

तलाश अपनी, है तुझ में ही कहीं,

फिर सम्हाल ले जा उसे अपने घर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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खयाल रखूंगा तेरी नाजुक मिजाजी का,

वादा है दूर से ही देखूंगा तुझको,

कल जरा-सा जो छू के देखना चाहा,

तुम टुकड़ों में टूट कर थी गयी बिखर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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बड़ दिलचस्प है रिश्ता हमारा तुम्हारा,

किसी भी जगह या तुम हो या हम,

तुम क्या करती हो मालूम नहीं मुझको,

तेरी आहटों से मैं जाता हूँ निखर-निखर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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शायद मैंने ही की कोशिश कुछ कम,

वरना जाती नहीं तुम बार-बार आकर,

तुझे उसकी या मेरी में नहीं बाँटूंगा कभी,

कहीं ठहर, बस थोड़ा और ठहर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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त्रिवेणी

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मेरी आवश्यकता, आकांक्षा और आशा की,

अनवरत एक त्रिवेणी बहती है,

जो समय के बहुरंगी पटल से गुजरती,

अपने रूप बदलती रहती है ।

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कभी-कभी समतल विस्तार से,

नन्हे शिशु-सा, विस्मय के भार से,

अचंम्भित हो,

भूल कर गंतव्य को,

कुछ सुनती है, न कहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

और कभी ढलान पर,

गति पर अपना पूरा अधिकार मान कर,

बिना अगले पल का विचार किये,

न जीत के लिये, न हार के लिये,

बस प्रचंड वेग प्राप्ति को बहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

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गुजरते हुए पत्थरों से अवरुद्ध मार्ग से,

क्षत-विक्षत हो नुकीले चट्टानों की धार से,

फेनिल हो और आर्तनाद करते,

आघात से जूझते आत्मसात करते,

परीक्षा मान यंत्रणा सहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

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एक चेष्टा जो अब तक है अर्धपूर्ण,

शैशव की लालसा, यौवन का स्वप्न,

ऊपर उठूँ, गुरुत्व के नियम तोड़,

संवेग जोड़, हो एकाग्र विभोर,

प्राण के अंतिम छोर तक जा,

अनुभूति आनंद के दे सर्वथा,

यत्न कुछ और बढ़ाने को कहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

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जीवन अबुझ और अप्रमेय

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हृदय विह्वल,

नयन सजल,

सखा भाव की पराकाष्ठा,

या मन नत और आभार विकल,

सौंदर्य की महिमा से सम्मोहित,

या नश्वरता का आतंक अटल,

अस्तित्व, उद्देश्य के द्वन्द्व सघन,

या एकांत की नीरवता विरल,

चिंता निर्माण के दायित्वों का,

या कल के स्वागत में जी विह्वल,

जीवन धन्य भावों का अभिनंदन से,

या गंतव्य के आरोहण से है सफल ?

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भावों का अतिरेक,

जिज्ञासा, विस्मय समेत,

गहे प्राण को समय मुट्ठी में,

या उगता जीवन समय को भेद,

जीवन रौद्र, बलि और शोणित,

या संरचना, उद्यम और स्वेद,

विध्वंश की आशा परिवर्तन को,

या पग-पग चढ़ते शिखर अनेक,

संगठन, रणनीति, राजनीति,

या स्वच्छंद मानवता का अभिषेक,

टिका अधर में उहापोह में,

कहाँ मिले समुचित विवेक ।

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गर्भ धरे चिर विस्मय,

हर क्षण अद्भुत, अपरिमेय,

जीवन क्षण से या क्षण ही जीवन,

पराक्रम लक्ष्य या सौन्दर्य हो ध्येय,

रचना का कर्ता या मात्र एक रचना,

जीवन अबुझ और अप्रमेय ।

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भविष्य

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अतीत से जुड़ा हुआ,

युग संधि पर मुड़ा हुआ,

कल्पना के चरम से भी अधिक,

प्रचण्ड रोमांच का पथिक,

निरंतरता की डोर से बँधा,

इतिहास की समिधा से बना,

काल का हविष्य हूँ,

वर्तमान के संघर्ष का सार,

अज्ञेय मैं भविष्य हूँ।

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अभेद्य चिर रहस्य हूँ,

लक्ष्य हूँ, आराध्य हूँ,

जीवन का इष्ट हूँ,

सृष्टि की रचना का साध्य हूँ,

भय और आशा का संधि क्षेत्र,

जिज्ञासा की क्षितिज के उस पार हूँ,

चेतना को अर्थ देता,

प्रत्यक्ष अलौकिकता साकार हूँ ।

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स्वप्न का सहचर मैं,

कल्पना का विस्तार हूँ,

इच्छा का सजग प्रहरी मैं,

आस्था का पवित्र विचार हूँ,

जनक हूँ मैं आशा का,

सृष्टि का निरंतर व्यापार हूँ,

निष्ठुर, संवेदना हीन जग विदित,

परंतु मूल चेतना का आधार हूँ,

संसार का परम प्रश्न चिन्ह,

समय का हूँ अग्रणी,

अनंत काल का मैं शिष्य हूँ,

वर्तमान के संघर्ष का सार,

अज्ञेय मैं भविष्य हूँ।

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गुजर गयी

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उसे जानने की जिद में लगा रहा,

जिंदगी बगल से गुजर गयी,

फिर पूछता रहा हर शख्श से,

बता दे जिंदगी किधर गयी ।

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कोई शिकायत नहीं, बस इतना,

कि छू कर देखना है उसको,

मैं बेपरवाह, तो वह क्या थी,

जो वादा करके मुकर गयी ।

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कुछ बातें कहनी है उससे,

अब तक नहीं कर पाया हूँ,

बसी जो मेरे सपनों में थी,

दिलचस्प कहानी किधर गयी ।

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जगी आँखों के सपने मेरे,

आँखों में कटती पागल रातें,

समेटता बाँहों में, कि छूते ही,

वक्त की लहरों में बिखर गयी ।

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अफसोस नहीं उसके जाने का,

खूबसूरत थी हरेक लम्हे में,

वही तो है जो सिर्फ मेरी है,

बाकी थोड़ी दूर ही ठहर गयी ।

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हसीन कहूँ या दिलफरेब कहूँ,

नियामत कहूँ या कयामत कहूँ,

और कुछ नहीं बस जिंदगी कहूँ,

अच्छी गुजरी, जितनी गुजर गयी ।

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एक बूंद-स्वच्छंद

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मेघ से गिरती पानी की एक बूंद ने,

कहा वर्जना में हवा से,

मत थामो मुझे, मत सम्हालो,

मुझे गिरने दो,

थपेड़े झेलने दो,

बिगड़ने दो,

फिर वापस अपना रूप ले लेने दो ।

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तुम कहोगे-

निरादर है यह तुम्हारी कृपा का,

मैं कृतघ्न होने लगा हूँ,

पर मेरी सुनो,

जी रहा था आश्वस्ति की जड़ता में,

अभी तो मैं जगा हूँ ।‘

स्वच्छंद बूंद थपेड़े सहती रही,

कभी उड़ती, कभी गिरती रही,

कभी ओस बन फूलों सजी,

कभी बन तुहिन कण,

वेगवती हो चली,

कभी बनी वाष्प और खो दिया आकार,

जैसे कोई स्वप्न हो रह हो साकार,

असीम उन्मुक्तता,

न कोई बंधन, न भार ।

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विविधता थी,

उसमें रोमांच था,

रस का अनवरत संचार था,

भरा पूरा रंगमंच था,

लालित्य था, श्रृंगार था,

परंतु कहीं कुछ था,

जो था प्रत्यक्ष नहीं, मात्र संकेत-सा,

बार-बार किसी अपूर्णता का स्मरण दिलाता,

चेतना में निहित संदेश-सा ।

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एक दिन सहसा,

एक सीप प्रत्यक्ष हो पड़ा,

एक बूंद की चरम परिणति,

सौभाग्य का रत्न दुर्लभ मोती,

बन जाने का आग्रह लेकर खड़ा,

‘तुम बनाओगे और मैं मोती बन जाऊंगा ?

परंतु इसमें मैं ने क्या किया,

अपने से क्या कह पाऊंगा ?’

बूंद ने कहा-

‘मुझे रूप नहीं रचना का अधिकार चाहिये,

अपने से अर्जित क्षमता,

और अपने से रचा संसार चाहिये ।

मैं कुछ बनने से पहले,

कुछ बनाना चाहता हूँ,

थोड़ा-सा ही सही,

पहले कुछ देना,

उसके बाद ही कुछ पाना चाहता हूँ ।

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साथ

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चढ़ती हुई दोपहर है,

इसे शाम मत कहो,

हर दौर खूबसूरत है,

इसे कोई नाम मत दो ।

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जीये अपनी अंदाज में,

बस इतना भी कम नहीं,

उस पर शबाब यह,

कि तुम सब भी साथ हो ।

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मुझे मालूम नहीं,

इस जहाँ में अहमियत मेरी,

पर इसका वजूद इसी से,

कि मैं हूँ और तुम हो ।

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कब किससे जुड़ा, जुदा हुआ,

अब याद नहीं मुझे,

हसरत और दुआ यही है,

कि तेरा हरदम साथ हो ।

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रंग बहुत से मिले,

कुछ ठहरे, कुछ बिखर गये,

कोई गिला शिकवा नहीं,

बस तुम संग होने का दम भरो ।

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किसी को क्या हिसाब दूंगा,

न सोचा है, न सोचूंगा,

मैं तरी नजरों में खरा रहूँ,

तुम नजरों में तुम रहो ।

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प्रतिफलन

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मरघट पर जितने वीर मिले,

कुछ चकित, भ्रमित, अधीर मिले,

निकट कहीं रुधिर रंजित,

धनुष, तुणीर और तीर मिले ।

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सब की आत्मा प्रश्न एक ही था,

परिपूर्ण हुआ या गया वृथा,

संकल्प लिये जो हमने थे,

हे बंधु, कहो उसका क्या हुआ ?

.

पूछा:

हे वीर, तुम्हारा शौर्य प्रखर,

तेरी आहूति ध्वज बन कर,

बन दिव्य ज्योति स्थापित है,

शेष यह आसक्ति अब क्योंकर ?

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बिना निमेष बलिदान दिया,

तेरी गाथा तेरे धूमिल नहीं हुई,

क्या हुआ यह ललक नहीं छूटी,

क्या आहूति भी निष्काम नहीं ?

.

उत्तर:

आदर्श नहीं होता श्री विहीन,

वैराग्य कदापि नहीं अर्थहीन,

निष्काम कर्म नहीं निष्प्रयोजन,

हर क्रिया एक उद्देश्य अधीन ।

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हर कर्म सदैव परिणाम हेतु,

हर चेष्टा उन्मुख उपलब्धि को,

लोलुप आसक्ति है वर्जित,

कलुषित करता मत, नीति को ।

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लक्ष्य अहम् से गुरुतर हो,

उद्देश्य हो व्यापक सर्वांगीण,

क्षितिज के पार की दृष्टि हो,

सकल हित विवेक हो समीचीन ।

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जीवन अर्हित उद्देश्य से है,

और उद्देश्य कर्म का निर्माता,

बलिदान कर्म का शिखर बिंदु,

इनके फलन से सार्थक मानवता ।

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अनुकम्पा

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जीवन के अविरल प्रवाह में,

मेरे चाहे, अनचाहे,

कुछ प्रसंग जुड़े, कुछ प्रश्न जुड़े,

कुछ घटनाएँ घटी, कुछ संभावनाएँ घटी,

जो शेष बचा,

वह मैं था,

इतना भी अकिंचन नहीं,

कि इसे अपना किया स्वीकार ना करूँ,

इतना भी प्रगल्भ नहीं,

कि इसमें तेरी महिमा को शिरोधार्य ना करूँ,

ज्ञात नहीं तेरा विधान था,

अथवा मेरा नवनिर्माण,

मैं ने कई सारे संभाव्य बुने,

पथ पर बिछे कुछ फूल चुने ।

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जितने फूल चुने मैं ने,

दिया तुमने ऐसा स्मरण नहीं,

फिर भी आभार तुम्हारा,

कि तुमने उन्हें चुनने का झुकाव दिया,

और चुन पाने की क्षमता का विश्वास दिया,

और फिर कभी मुझे अंगुली पकड़ चलाया नहीं,

छोड़ दिया इस अनंत विस्तार में,

बस पैरों के नीचे धरती दी,

और सिर के ऊपर आकाश दिया ।

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आभार मुझ पर इस अनुकम्पा के लिये,

आभार इस स्वच्छंदता के लिये,

आभार मुझ में दिये स्वाभिमान के लिये,

आभार जीवन के सारे संग्राम के लिये ।

.

अभी बहुत सारे प्रतिवाद हैं, उपालम्भ हैं,

पर क्या होता,

यदि तुम नहीं देते जो दिया,

क्या हम कह पाते,

कि यह जीवन है,

जिसका हर अणु जीवंत है,

और अर्थपूर्ण प्रत्येक क्षण है ।

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समाधान

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कहाँ से जगती सहज भावना,

जुड़ती कहाँ से भाव, चेतना,

रहस्य आज भी उतना ही अनबुझ,

किस विधि मानस पटल बना,

.

किसी ने अपरिमित प्यास दी,

किसी ने दी छलनामयी तृप्ति,

किसी ने दी देखने की इच्छा,

किसी ने देख पाने की दृष्टि,

.

कहीं से आयी मायावी आसक्ति,

कहीं से उपजा मधु सा मोह,

कहीं जन्मी प्ररखर अभिव्यक्ति,

और कहीं से जग उठा उहापोह,

.

कोई मर्म पर औषधि धरता,

देता कोई कुटिल, कठोर आघात,

दिये किसी ने दिवस अंधेरे,

और किसी ने दी चमकीली रात,

.

आतंक धवल की चकाचौंध का,

और मादक अंधेरा अपरंपार,

बीच सदा ही दिया किसी ने,

अनंत रंगों का ललित उपहार,

.

उद्ग्रीव मन संग सजग चेतना,

रचते आभिजात्य और नवनिर्माण,

और शून्य के गहन ध्यान में,

अर्थ जीवन का ढूंढे किसी के प्राण,

.

विस्मयजन्य हृदय का स्पंदन,

अविश्वसनीय मन का पटल विशाल,

चाहे जानना फिर भी यह प्राणी,

क्या है क्षितिज के पार का हाल,

.

ज्ञान मृत्यु और अमरता का,

युगों से छलता रहा निरंतर,

परिभाषित फिर भी करना चाहे,

क्या अमर और क्या है नश्वर,

.

जीवन विविधता का है उत्सव,

वृथा परिभाषा और समाधान,

संयोग, जिज्ञासा, सहजीवन,

इसके तन, मन और प्राण,

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