हे रचनाकार

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नत होना और उन्नत होने को,

हो समर्पण, सम्मान का सोपान,

आराधना चित्त के शुद्धिकरण को,

सर्व-मंगल भाव सिंचित हो प्राण ।

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मन का विचरण हो स्वच्छंद,

सब का अपना उन्मुक्त गगन हो,

नयन क्षितिज के पार हों केंद्रित,

स्नेह सिक्त मन का आंगन हो ।

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न ज्ञात, न अज्ञात का भय हो,

बंधन जोड़ें, पर करते निर्भय हों,

विधि-विधान आतंक मुक्त हो,

न्याय करे, जो सदा सदय हो ।

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हो सत-चित्त-आनंद की चिर आशा,

उन्नति, रचना, प्रथम धर्म हो,

किसी अपेक्षा से न हो बाधित,

संपूर्णता को लक्षित प्रत्येक कर्म हो ।

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हर विचार का एक स्थल हो,

हर संवेदना आदर का अधिकारी,

हर चेतना स्वतंत्र चुनने को,

अपना ईंधन और अपनी चिंगारी ।

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अभिव्यक्ति नहीं अनुमति पर आश्रित,

संवाद कभी न हो बाधित,

स्पर्श सभी को मृदुल पवन-सा,

ऐसे आलोचना हो मर्यादित ।

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तेरी रचना में महा पूर्णता,

सारी संभावनाओं का संसार,

मात्र अपेक्षा, समर्थ हमें कर,

हम अपना रच पायें, हे रचनाकार ।

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तुझको ही आजमा सकूँ

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इसलिये खोना कि उसको ही फिर से पा सकूँ,

और पाने की खुशी में दीया फिर एक जला सकूँ,

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दूर होना ताकि फिर से लौट कर पास आ सकूँ,

क्या होती है पाने की धड़कन दिल को यह बतला सकूँ,

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सच कहूँ खामोश रहना, नयी मेरी कोई जिद नहीं,

चुप हूँ बस इसलिये कि नया कुछ फिर से गा सकूँ,

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तंग गलियों में भटकना, निपट अकेले रात भर,

घर मुझे प्यारा है, सवेरे दिल को ये समझा सकूँ,

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अपने में सिमट कर रहने की, वजह कोई और नहीं,

कोई अपना-सा लगे तो, फिर बाँहों को फैला सकूँ,

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कभी-कभी सब कुछ बिखेरना अच्छा लगता इसलिये,

खुद को ही सब कुछ समेट कर, एक बार दिखला सकूँ,

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कुछ और नहीं तो बस इसलिये कई बार रुक जाता हूँ,

रफ्तार के जुनून को एक बार फिर महसूस कर पा सकूँ,

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हौसला भी, जिद भी, चाहत भी और जरूरत भी है,

सब कुछ मिटा कर एक बार, फिर नये सिरे से बना सकूँ,

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जिन्दगी तेरे दिये इन रहमतों को दिल से सलाम,

इतना कुछ दिया तुमने कि तुझको ही आजमा सकूँ,

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समय के हस्ताक्षर

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जो बीता, मृदुल था या प्रचण्ड था,

वह हमसे होकर निकला एक कालखंड था,

अब नहीं है पर हमारे चिंतन में मुखर है,

हमारे जीवन पटल पर समय का हस्ताक्षर है,

जो आयेगा, थोड़ा भय और थोड़ा प्रलोभन है,

थोड़ी आशा, थोड़ा विश्वास, थोड़ा सम्मोहन है,

यह क्षण जो बीत रहा है,

आकलन से परे है, जीवन है ।

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कोई विघटन नहीं, एक निरंतरता है,

जो बीता है, हमको रचता है,

देता है सामर्थ्य, आगत के साक्षात्कार का,

उसके स्वागत और उससे संघर्ष के विचार का,

जीवन के लिये नीति का व्यवहार का,

अपने लिये नियमों का, आधार का ।

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जो आगामी है, हमारा पथ भी है लक्ष्य भी,

अपने परिष्कार का अवसर भी है,

रचने की सम्भावना भी,

देखे स्वप्न का प्रत्यक्षीकरण भी है,

अनदेखे स्वप्न के जगने का संयोग भी,

साक्षात अज्ञात संभावनाओं का भँवर है,

हमारे अब तकी यात्रा पर हमारा ही अभियोग भी ।

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आसन्न क्षण जो मूर्तिमान है,

प्रत्यक्ष है वर्तमान है,

मात्र एक प्रश्न पूछता है,

हमने उसके प्रवाह के लिये,

मन के कौन-से द्वार खोले हैं,

कितना ढाला है खुद को,

उन साँचों में,

जिनमें हम चाहते हैं ढलना ।

यही एक सार्थकता है,

बाकी निरी अकर्मण्यता, दुविधा और छलना ।

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अपना खयाल रखना

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मौसम तो यूँ ही बदलेंगे,

तुम अपना खयाल रखना,

खुशियों को बचा के सीने में अपने,

ब-हर-हाल रखना ।

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कोई और जवाब नहीं देगा,

चाहे जितना भी तुम पूछोगे,

खुद के लिये बचाकर तुम,

अपने सारे सवाल रखना ।

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यह जिंदगी तुम्हारी है,

और ये रास्ते भी तुम्हारे हैं,

इशारे भी बहुत सारे होंगे,

सीधी अपनी चाल रखना ।

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हर तरह की बातें होंगी,

उनके असर अलग-अलग होंगे,

सम्हाल नहीं पाओगे उनको,

उन्हे न दिल में पाल रखना ।

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सिर्फ तेरी ही नहीं उनकी भी,

अपनी-अपनी दुश्वारियाँ हैं,

शिकायत करने बदले,

कोशिश बेहतरी की बहाल रखना ।

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कोई वादा नहीं कि दुनियादारी से,

थक कर चूर नहीं हो जाओगे,

इसलिये खुद ही बहल जाने की,

कुछ हुनर पाल रखना ।

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कभी न कभी रंग दुनिया के,

मटमैले हो ही जाते हैं,

जिंदगी से वफा की चाहत हो तो,

अपने रंग, गुलाल रखना ।

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स्तुति

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प्रार्थना ऐसी हो मेरी,

जिसमें कोई भी अपेक्षा न हो ।

आभार और श्रद्धा तो हो,

परंतु अवांछित दासता न हो ।

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पूजा ऐसी हो मेरी,

जिसमें निहित याचना न हो,

हो भाव समर्पण का प्रबल,

परंतु अशक्त दीनता न हो ।

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विचार ऐसा हो मेरा,

जो कभी भी न विभाजित करे,

ढूँढे अर्थ जीवन का हर क्षण,

परंतु गहे अहं की कालिमा न हो ।

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शब्द ऐसे हों मेरे,

हो जिनमें स्पष्टता, संवेदना,

करे सत्य का अनुशीलन,

परंतु प्रगल्भ हठ-धर्मिता न हो ।

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विवेक ऐसा हो मेरा,

हो सकल कल्याण का वाहक जो,

दृढता से दिशा निर्देश करे,

परंतु मृदुलता का घातक न हो ।

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धर्म ऐसा हो मेरा,

जो सकल जग धारण कर सके,

पुण्य की विवेचना करे,

परंतु नव्यता का अवरोधक न हो ।

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खुशी, कुछ देर और ठहर

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मेरे नहीं तो किसी और के घर,

खुशी, कुछ देर और ठहर,

जीना आता है तेरे बिन लेकिन,

अच्छा लगता है तेरे साथ सफर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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आज भी तेरा पता मालूम नहीं,

लोग पूछते हैं, मैं टाल देता हूँ,

मुस्कुराता हूँ कि तलाश तेरी,

ले कर गयी मुझको किधर-किधर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

.

लोग कहते थे तुम्हारे बारे में,

कि तुम कभी भी मिल सकती हो,

खोजता हूँ तुझे रात के अंधेरों में,

और ढूँढ़ता हूँ सुबह, शाम, दोपहर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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फूलों से, तितली से, पंछी से,

माँगी उधार, तो वे कहने लगे,

तलाश अपनी, है तुझ में ही कहीं,

फिर सम्हाल ले जा उसे अपने घर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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खयाल रखूंगा तेरी नाजुक मिजाजी का,

वादा है दूर से ही देखूंगा तुझको,

कल जरा-सा जो छू के देखना चाहा,

तुम टुकड़ों में टूट कर थी गयी बिखर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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बड़ दिलचस्प है रिश्ता हमारा तुम्हारा,

किसी भी जगह या तुम हो या हम,

तुम क्या करती हो मालूम नहीं मुझको,

तेरी आहटों से मैं जाता हूँ निखर-निखर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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शायद मैंने ही की कोशिश कुछ कम,

वरना जाती नहीं तुम बार-बार आकर,

तुझे उसकी या मेरी में नहीं बाँटूंगा कभी,

कहीं ठहर, बस थोड़ा और ठहर ।

खुशी, कुछ देर और ठहर ।

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त्रिवेणी

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मेरी आवश्यकता, आकांक्षा और आशा की,

अनवरत एक त्रिवेणी बहती है,

जो समय के बहुरंगी पटल से गुजरती,

अपने रूप बदलती रहती है ।

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कभी-कभी समतल विस्तार से,

नन्हे शिशु-सा, विस्मय के भार से,

अचंम्भित हो,

भूल कर गंतव्य को,

कुछ सुनती है, न कहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

और कभी ढलान पर,

गति पर अपना पूरा अधिकार मान कर,

बिना अगले पल का विचार किये,

न जीत के लिये, न हार के लिये,

बस प्रचंड वेग प्राप्ति को बहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

.

गुजरते हुए पत्थरों से अवरुद्ध मार्ग से,

क्षत-विक्षत हो नुकीले चट्टानों की धार से,

फेनिल हो और आर्तनाद करते,

आघात से जूझते आत्मसात करते,

परीक्षा मान यंत्रणा सहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

.

एक चेष्टा जो अब तक है अर्धपूर्ण,

शैशव की लालसा, यौवन का स्वप्न,

ऊपर उठूँ, गुरुत्व के नियम तोड़,

संवेग जोड़, हो एकाग्र विभोर,

प्राण के अंतिम छोर तक जा,

अनुभूति आनंद के दे सर्वथा,

यत्न कुछ और बढ़ाने को कहती है ।

अपने रूप बदलती रहती है ।

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जीवन अबुझ और अप्रमेय

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हृदय विह्वल,

नयन सजल,

सखा भाव की पराकाष्ठा,

या मन नत और आभार विकल,

सौंदर्य की महिमा से सम्मोहित,

या नश्वरता का आतंक अटल,

अस्तित्व, उद्देश्य के द्वन्द्व सघन,

या एकांत की नीरवता विरल,

चिंता निर्माण के दायित्वों का,

या कल के स्वागत में जी विह्वल,

जीवन धन्य भावों का अभिनंदन से,

या गंतव्य के आरोहण से है सफल ?

.

भावों का अतिरेक,

जिज्ञासा, विस्मय समेत,

गहे प्राण को समय मुट्ठी में,

या उगता जीवन समय को भेद,

जीवन रौद्र, बलि और शोणित,

या संरचना, उद्यम और स्वेद,

विध्वंश की आशा परिवर्तन को,

या पग-पग चढ़ते शिखर अनेक,

संगठन, रणनीति, राजनीति,

या स्वच्छंद मानवता का अभिषेक,

टिका अधर में उहापोह में,

कहाँ मिले समुचित विवेक ।

.

गर्भ धरे चिर विस्मय,

हर क्षण अद्भुत, अपरिमेय,

जीवन क्षण से या क्षण ही जीवन,

पराक्रम लक्ष्य या सौन्दर्य हो ध्येय,

रचना का कर्ता या मात्र एक रचना,

जीवन अबुझ और अप्रमेय ।

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भविष्य

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अतीत से जुड़ा हुआ,

युग संधि पर मुड़ा हुआ,

कल्पना के चरम से भी अधिक,

प्रचण्ड रोमांच का पथिक,

निरंतरता की डोर से बँधा,

इतिहास की समिधा से बना,

काल का हविष्य हूँ,

वर्तमान के संघर्ष का सार,

अज्ञेय मैं भविष्य हूँ।

.

अभेद्य चिर रहस्य हूँ,

लक्ष्य हूँ, आराध्य हूँ,

जीवन का इष्ट हूँ,

सृष्टि की रचना का साध्य हूँ,

भय और आशा का संधि क्षेत्र,

जिज्ञासा की क्षितिज के उस पार हूँ,

चेतना को अर्थ देता,

प्रत्यक्ष अलौकिकता साकार हूँ ।

.

स्वप्न का सहचर मैं,

कल्पना का विस्तार हूँ,

इच्छा का सजग प्रहरी मैं,

आस्था का पवित्र विचार हूँ,

जनक हूँ मैं आशा का,

सृष्टि का निरंतर व्यापार हूँ,

निष्ठुर, संवेदना हीन जग विदित,

परंतु मूल चेतना का आधार हूँ,

संसार का परम प्रश्न चिन्ह,

समय का हूँ अग्रणी,

अनंत काल का मैं शिष्य हूँ,

वर्तमान के संघर्ष का सार,

अज्ञेय मैं भविष्य हूँ।

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गुजर गयी

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उसे जानने की जिद में लगा रहा,

जिंदगी बगल से गुजर गयी,

फिर पूछता रहा हर शख्श से,

बता दे जिंदगी किधर गयी ।

.

कोई शिकायत नहीं, बस इतना,

कि छू कर देखना है उसको,

मैं बेपरवाह, तो वह क्या थी,

जो वादा करके मुकर गयी ।

.

कुछ बातें कहनी है उससे,

अब तक नहीं कर पाया हूँ,

बसी जो मेरे सपनों में थी,

दिलचस्प कहानी किधर गयी ।

.

जगी आँखों के सपने मेरे,

आँखों में कटती पागल रातें,

समेटता बाँहों में, कि छूते ही,

वक्त की लहरों में बिखर गयी ।

.

अफसोस नहीं उसके जाने का,

खूबसूरत थी हरेक लम्हे में,

वही तो है जो सिर्फ मेरी है,

बाकी थोड़ी दूर ही ठहर गयी ।

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हसीन कहूँ या दिलफरेब कहूँ,

नियामत कहूँ या कयामत कहूँ,

और कुछ नहीं बस जिंदगी कहूँ,

अच्छी गुजरी, जितनी गुजर गयी ।

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