प्रयत्न

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मेरा संघर्ष मुझे यदि,

मेरे लक्ष्य से आगे नहीं ले जाते,

मेरे पाँव मुझे अनदेखे रास्तों पर नहीं भटकाते,

मेरे स्पर्श किसी अदृश्य के छुअन से नहीं सिहराते,

मेरे प्राण मुझे मेरे अस्तित्व से ऊपर नहीं उठाते,

तो अपूर्ण कुछ किंचित रह गया है,

यह जीवन वंचित रह गया है ।

.

यह जीवन वंचित रह गया है,

कल्पना के विचरण के उन्मुक्त गगन से,

जिज्ञासा के अंतहीन स्वच्छंद भ्रमण से,

मन के चतुर्दिक विकास से, उन्नयन से,

रचने को नये एक जग के अपने प्रण से,

जो दिया उसका आभार सहर्ष स्वीकार,

परंतु क्षमा याचना,

जो शेष उस पर अधिकार की मेरी प्रस्तावना ।

.

अधिकार की मेरी प्रस्तावना,

बिना कोई अवमानना;

है मुझे स्वीकार कि मुझसे ही कोई त्रुटि रही हो,

हो विश्वास काँपता, या प्रयास में कमी पड़ी हो,

भावना में शुचिता भी सम्पूर्ण नहीं हो,

समर्पण में ठहरा मन का कोई व्यवधान कहीं हो,

दोष है मेरा, नहीं तुम पर कोई उपालम्भ,

बस बल, अवसर दो कि कर सकूँ पुन: आरम्भ

.

कर सकूँ पुन: आरम्भ,

बार-बार उठ पराजय की गहन हताशा से,

हर असफलता के बाद द्विगुणित आशा से,

नहीं बंधूँ किसी स्थापित परिभाषा से,

प्राण हो सुरभित हर पल नयी जिज्ञासा से,

नहीं धृष्टता, मेरी यही मूल बनावट है,

अंश तुम्हारा हूँ, हर चेष्टा में यही प्रकट है ।

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अपूर्ण और जो भी हो, रहे,

मन प्रयत्न का अभाव नहीं सहे ।

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संवेदना के संदर्भ

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संवेदना के संदर्भ जब मुखर हुए,

यथार्थ के स्तम्भ कितने बिखर गये,

एक लांछना, एक भृकुटि, एक संकेत,

नीतियाँ कितनी धूल-धूसरित कर गये ।

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निहित अर्थ तक पहुँचने से पहले कहीं,

संवाद कह जाते निहित अभिप्राय भी,

तप, साधना की भी हैं अपनी सीमाएँ,

अभिमान ने देवों को भी न छोड़ा कभी ।

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जीवन में व्यवहारिकता का स्थान उचित,

सब उचित जिससे प्राण ठहरे प्रज्वलित,

पर जहाँ अस्तित्व अपना अर्थ ढूँढ़ता,

स्थल, संवेदना के तंतुओं में अंतर्निहित ।

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काया, आश्रय, पोषण और निरंतरता,

सब यद्यपि स्थूल संरचना ही है,

पर दिशा देती हर निर्णय, हर रचना को,

संवेदना, भावना और उदित कल्पना ही है।

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उत्सव की समाप्ति पर उच्छवास,

जीत – हार के बाद शून्यता का आभास,

खाली पेट भी स्वाभिमान का उन्माद,

मर कर फिर जी उठने का भीषण विन्यास ।

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हर आयाम जीवन में सम्पूर्ण है जीवन,

जीवन युगलबंदी जीव-मर्म का हर क्षण,

इन दोनों के व्यापक कौतुक-माया में व्याप्त,

बल-कौशल, नीति-न्याय, हास और क्रंदन ।

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प्रयत्न पर अधिकार

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निरा हठ नहीं है,

चांद-तारों तक पहुँचने की मेरी कोशिश,

ना ही यह कोरी ललक है;

ऐसा करना मेरा स्वभाव है,

और यह मेरे प्रयत्नों पर मेरे अधिकार की झलक है ।

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यह परिणाम की लालसा नहीं,

जो मुझे दिशा, बल और प्राण देता है;

अमिट जिज्ञासा पाँव रुकने नहीं देता,

और कुछ रचने का आवेश,

हर पल गति और स्वाभिमान देता है ।

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रचने की उत्कट इच्छा, महत्वाकांक्षा है,

या है इसका कुछ और ही विधान;

यह प्रश्न सदा ही अनुत्तरित,

एक पल ये हैं विपरीत, अगले क्षण लगें एक समान ।

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महत्वाकांक्षा,

ना तो मात्र परिणाम का क्रूर आकर्षण है,

ना ही अपने साथ बहा ले जाता उद्देश्य का बहाव है;

बस जगता है, चाहे-अनचाहे,

और पता नहीं चलता है,

प्रारब्ध है, प्रतिबद्धता है या स्वभाव है ।

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महत्वाकांक्षा भविष्य की आशा का,

वर्तमान में भविष्य का उभरता आकार है;

अपने सामर्थ्य के स्वीकार की अभिव्यक्ति है,

और रचना की मूल प्रवृत्ति का उद्घोष साकार है ।

.

महत्वाकांक्षा परंतु निर्मल हो कर भी,

अपनी ऊर्जा का दास होता है,

वहीं रचनाधर्मिता का एक अलग विन्यास होता है;

पहला नीतियों का और न्याय का,

परिणाम हेतु बलि देने में संकोच नहीं करता है;

दूसरा सकल कल्याण को,

अपने ही नियंत्रण और अंकुश की बलि चढ़ता है ।

.

अब तारे चाहे मुट्ठी में ना हों,

प्रयत्न में आस्था है, प्रयत्न के प्रति समर्पण है;

शायद मैं यह संघर्ष तुम्हारे लिये छोड़ जाऊँ,

पर अन्याय को नहीं मेरा समर्थन है ।

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कुछ मुक्तक

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सूना मन,

जैसे दिन का आकाश,

खालीपन,

जैसे भूख और प्यास,

भरा हुआ,

नीरवता का आभास,

शून्य,

जैसे गहराता विश्वास,

कहना कठिन है,

धन है या ऋण है ?

.

आत्मविभोर,

जैसे पूनम का चंद्रमा,

स्वनामधन्य,

जैसे अपेक्षा रहित क्षमा,

चिर सम्मोहन,

धरती का सूर्य की परिक्रमा,

सदा अज्ञेय,

अपने ही अंदर बसती आत्मा,

होकर भी अपनी परिभाषा,

तृप्त नहीं करते जिज्ञासा ।

.

बीते दिन,

जैसे काल, स्मृति का बंदी होकर,

इतिहास,

समय का अमिट हस्ताक्षर,

भविष्य,

एक चिर सम्मोहन प्रखर,

वर्तमान,

जैसे अनिश्चितता का मुखर स्वर,

काल और प्राण का सम्बंध,

और जीवन से जीव का अनुबंध ।

.

संगीत,

जैसे बहाव में आकृति,

क्षितिज के रंग,

जैसे आशा की अंतहीन अनुकृति,

सौंदर्य,

सृष्टि की सफलतम कलाकृति,

संवेदना,

सृष्टि में चेतना की पहली स्वीकृति,

सब कुछ अपने स्थल,

विवेक, क्षमा, स्नेह, कौशल ।

.

धन्यता,

जीवन के सार्थक होने से उगती,

सार्थकता,

कुछ रचने में विश्वास और प्रगति,

विश्वास,

कि कोई उद्देश्य, प्रयोजन की अनुभूति,

उद्देश्य,

जड़ता का निषेध, चेतना की प्रकृति,

कई प्रश्न अंत में अनुत्तरित रहे,

क्या हो अंतिम उत्तर कौन कहे ।

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जीवन का अक्ष

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जिससे भी मिला,

उसने यही बताया,

कि पूरी पड़ताल के बाद,

उसने अपने जीवन का अक्ष,

अपने से दूर पाया,

और यह भी कि यह दूरी,

बढ़ती ही जा रही है,

और किसके चाहे ऐसा हो रहा है,

यह बात समझ में नहीं आ रही है ।

.

जीवन के अक्ष को,

अपने समीप पाना,

या उसका अपने अस्तित्व के केंद्र से,

गुजरने की इच्छा रखना,

उचित है या अनुचित,

कौन कहे,

और क्या हो इसका परिणाम,

स्पष्ट है, बस एक अनुमान रहे,

अद्भुत अपेक्षा, अद्भुत परिस्थिति,

कोई तर्क नहीं,

मात्र विवाद और असहमति ।

.

हमारे अक्ष के हमसे दूर जाने से,

क्या वह दूसरे के अक्षों के पास आता है,

दो पृथक अस्तित्वों के,

बीच की दूरी को घटाता है,

क्या यह वस्तुत:,

हमें एक-दूसरे से जोड़ने का उपक्रम है,

और सीमित करता हमारी चिंतन का भ्रम है,

कि अपने ही अक्ष पर निर्बाध घूम पाना,

स्वच्छंदता है,

शेष मात्र उलझाता तान-बाना,

और अपूर्ण स्वतंत्रता है ?

.

है अंतिम उत्तर कहीं नहीं,

और कदाचित हो कभी नहीं,

हम जो भी मानेंगे, निश्चय ही सापेक्ष है,

परंतु विश्वास रखना

कि जीवन निष्ठुर नहीं  निर्पेक्ष है,

उसका दायित्व हमें आकाश देना है,

धरती देनी है और प्रकाश देना है,

देना पीड़ा का गरल,

या हर्ष का अमृत निर्मल,

इसका अभिप्राय हो असम्भव है,

क्योंकि उसके पास भाव नहीं मात्र भव है,

और उसके पास है समय, ऊर्जा, प्राण,

और सारी संभावनाओं से भरा अनंत निर्पेक्ष वितान ।

.

हमें सब कुछ दे कर,

वह तटस्थ हो,

परे हट जाता है,

सारा विस्तार हमें दे,

मात्र पर्यवेक्षक बन,

दूर सिमट जाता है ।

.

परंतु चेतना निर्पेक्ष नहीं हो सकती,

उसे चाहिये रंग, गंध, स्वाद और गति,

इसलिये हम विश्लेषण करते हैं,

रचना और विध्वंस के संग-संग,

निरंतर नये अन्वेषण करते है ।

.

इस प्रक्रिया में ,

सम्पूर्ण से सुख को अलग करते ही,

स्वत: विषाद उत्पन्न होता है,

प्रेम को परिशोधित करते हैं,

तो वितृष्णा का सृजन होता है,

इसी भाँति मोह- विराग, अहंकार-विनम्रता,

ज्ञान-प्रमाद, अधिकार-समर्पण, वर्चस्व-समता,

जीवन की सम्पूर्णता के निर्पेक्ष तरल से बनते हैं,

जैसे श्वेत प्रकाश के पुंज,

विघटित हो सात रंग जनते हैं ।

.

हमारे बनाये अवयवों से,

असहज जीवन पटल है,

मूलत: जीवन की कल्पना,

निर्पेक्ष और सरल है ।

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हे रचनाकार

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नत होना और उन्नत होने को,

हो समर्पण, सम्मान का सोपान,

आराधना चित्त के शुद्धिकरण को,

सर्व-मंगल भाव सिंचित हो प्राण ।

.

मन का विचरण हो स्वच्छंद,

सब का अपना उन्मुक्त गगन हो,

नयन क्षितिज के पार हों केंद्रित,

स्नेह सिक्त मन का आंगन हो ।

.

न ज्ञात, न अज्ञात का भय हो,

बंधन जोड़ें, पर करते निर्भय हों,

विधि-विधान आतंक मुक्त हो,

न्याय करे, जो सदा सदय हो ।

.

हो सत-चित्त-आनंद की चिर आशा,

उन्नति, रचना, प्रथम धर्म हो,

किसी अपेक्षा से न हो बाधित,

संपूर्णता को लक्षित प्रत्येक कर्म हो ।

.

हर विचार का एक स्थल हो,

हर संवेदना आदर का अधिकारी,

हर चेतना स्वतंत्र चुनने को,

अपना ईंधन और अपनी चिंगारी ।

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अभिव्यक्ति नहीं अनुमति पर आश्रित,

संवाद कभी न हो बाधित,

स्पर्श सभी को मृदुल पवन-सा,

ऐसे आलोचना हो मर्यादित ।

.

तेरी रचना में महा पूर्णता,

सारी संभावनाओं का संसार,

मात्र अपेक्षा, समर्थ हमें कर,

हम अपना रच पायें, हे रचनाकार ।

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तुझको ही आजमा सकूँ

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इसलिये खोना कि उसको ही फिर से पा सकूँ,

और पाने की खुशी में दीया फिर एक जला सकूँ,

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दूर होना ताकि फिर से लौट कर पास आ सकूँ,

क्या होती है पाने की धड़कन दिल को यह बतला सकूँ,

.

सच कहूँ खामोश रहना, नयी मेरी कोई जिद नहीं,

चुप हूँ बस इसलिये कि नया कुछ फिर से गा सकूँ,

.

तंग गलियों में भटकना, निपट अकेले रात भर,

घर मुझे प्यारा है, सवेरे दिल को ये समझा सकूँ,

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अपने में सिमट कर रहने की, वजह कोई और नहीं,

कोई अपना-सा लगे तो, फिर बाँहों को फैला सकूँ,

.

कभी-कभी सब कुछ बिखेरना अच्छा लगता इसलिये,

खुद को ही सब कुछ समेट कर, एक बार दिखला सकूँ,

.

कुछ और नहीं तो बस इसलिये कई बार रुक जाता हूँ,

रफ्तार के जुनून को एक बार फिर महसूस कर पा सकूँ,

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हौसला भी, जिद भी, चाहत भी और जरूरत भी है,

सब कुछ मिटा कर एक बार, फिर नये सिरे से बना सकूँ,

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जिन्दगी तेरे दिये इन रहमतों को दिल से सलाम,

इतना कुछ दिया तुमने कि तुझको ही आजमा सकूँ,

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समय के हस्ताक्षर

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जो बीता, मृदुल था या प्रचण्ड था,

वह हमसे होकर निकला एक कालखंड था,

अब नहीं है पर हमारे चिंतन में मुखर है,

हमारे जीवन पटल पर समय का हस्ताक्षर है,

जो आयेगा, थोड़ा भय और थोड़ा प्रलोभन है,

थोड़ी आशा, थोड़ा विश्वास, थोड़ा सम्मोहन है,

यह क्षण जो बीत रहा है,

आकलन से परे है, जीवन है ।

.

कोई विघटन नहीं, एक निरंतरता है,

जो बीता है, हमको रचता है,

देता है सामर्थ्य, आगत के साक्षात्कार का,

उसके स्वागत और उससे संघर्ष के विचार का,

जीवन के लिये नीति का व्यवहार का,

अपने लिये नियमों का, आधार का ।

.

जो आगामी है, हमारा पथ भी है लक्ष्य भी,

अपने परिष्कार का अवसर भी है,

रचने की सम्भावना भी,

देखे स्वप्न का प्रत्यक्षीकरण भी है,

अनदेखे स्वप्न के जगने का संयोग भी,

साक्षात अज्ञात संभावनाओं का भँवर है,

हमारे अब तकी यात्रा पर हमारा ही अभियोग भी ।

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आसन्न क्षण जो मूर्तिमान है,

प्रत्यक्ष है वर्तमान है,

मात्र एक प्रश्न पूछता है,

हमने उसके प्रवाह के लिये,

मन के कौन-से द्वार खोले हैं,

कितना ढाला है खुद को,

उन साँचों में,

जिनमें हम चाहते हैं ढलना ।

यही एक सार्थकता है,

बाकी निरी अकर्मण्यता, दुविधा और छलना ।

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अपना खयाल रखना

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मौसम तो यूँ ही बदलेंगे,

तुम अपना खयाल रखना,

खुशियों को बचा के सीने में अपने,

ब-हर-हाल रखना ।

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कोई और जवाब नहीं देगा,

चाहे जितना भी तुम पूछोगे,

खुद के लिये बचाकर तुम,

अपने सारे सवाल रखना ।

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यह जिंदगी तुम्हारी है,

और ये रास्ते भी तुम्हारे हैं,

इशारे भी बहुत सारे होंगे,

सीधी अपनी चाल रखना ।

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हर तरह की बातें होंगी,

उनके असर अलग-अलग होंगे,

सम्हाल नहीं पाओगे उनको,

उन्हे न दिल में पाल रखना ।

.

सिर्फ तेरी ही नहीं उनकी भी,

अपनी-अपनी दुश्वारियाँ हैं,

शिकायत करने बदले,

कोशिश बेहतरी की बहाल रखना ।

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कोई वादा नहीं कि दुनियादारी से,

थक कर चूर नहीं हो जाओगे,

इसलिये खुद ही बहल जाने की,

कुछ हुनर पाल रखना ।

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कभी न कभी रंग दुनिया के,

मटमैले हो ही जाते हैं,

जिंदगी से वफा की चाहत हो तो,

अपने रंग, गुलाल रखना ।

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स्तुति

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प्रार्थना ऐसी हो मेरी,

जिसमें कोई भी अपेक्षा न हो ।

आभार और श्रद्धा तो हो,

परंतु अवांछित दासता न हो ।

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पूजा ऐसी हो मेरी,

जिसमें निहित याचना न हो,

हो भाव समर्पण का प्रबल,

परंतु अशक्त दीनता न हो ।

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विचार ऐसा हो मेरा,

जो कभी भी न विभाजित करे,

ढूँढे अर्थ जीवन का हर क्षण,

परंतु गहे अहं की कालिमा न हो ।

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शब्द ऐसे हों मेरे,

हो जिनमें स्पष्टता, संवेदना,

करे सत्य का अनुशीलन,

परंतु प्रगल्भ हठ-धर्मिता न हो ।

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विवेक ऐसा हो मेरा,

हो सकल कल्याण का वाहक जो,

दृढता से दिशा निर्देश करे,

परंतु मृदुलता का घातक न हो ।

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धर्म ऐसा हो मेरा,

जो सकल जग धारण कर सके,

पुण्य की विवेचना करे,

परंतु नव्यता का अवरोधक न हो ।

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