एक बूंद-स्वच्छंद

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मेघ से गिरती पानी की एक बूंद ने,

कहा वर्जना में हवा से,

मत थामो मुझे, मत सम्हालो,

मुझे गिरने दो,

थपेड़े झेलने दो,

बिगड़ने दो,

फिर वापस अपना रूप ले लेने दो ।

.

तुम कहोगे-

निरादर है यह तुम्हारी कृपा का,

मैं कृतघ्न होने लगा हूँ,

पर मेरी सुनो,

जी रहा था आश्वस्ति की जड़ता में,

अभी तो मैं जगा हूँ ।‘

स्वच्छंद बूंद थपेड़े सहती रही,

कभी उड़ती, कभी गिरती रही,

कभी ओस बन फूलों सजी,

कभी बन तुहिन कण,

वेगवती हो चली,

कभी बनी वाष्प और खो दिया आकार,

जैसे कोई स्वप्न हो रह हो साकार,

असीम उन्मुक्तता,

न कोई बंधन, न भार ।

.

विविधता थी,

उसमें रोमांच था,

रस का अनवरत संचार था,

भरा पूरा रंगमंच था,

लालित्य था, श्रृंगार था,

परंतु कहीं कुछ था,

जो था प्रत्यक्ष नहीं, मात्र संकेत-सा,

बार-बार किसी अपूर्णता का स्मरण दिलाता,

चेतना में निहित संदेश-सा ।

.

एक दिन सहसा,

एक सीप प्रत्यक्ष हो पड़ा,

एक बूंद की चरम परिणति,

सौभाग्य का रत्न दुर्लभ मोती,

बन जाने का आग्रह लेकर खड़ा,

‘तुम बनाओगे और मैं मोती बन जाऊंगा ?

परंतु इसमें मैं ने क्या किया,

अपने से क्या कह पाऊंगा ?’

बूंद ने कहा-

‘मुझे रूप नहीं रचना का अधिकार चाहिये,

अपने से अर्जित क्षमता,

और अपने से रचा संसार चाहिये ।

मैं कुछ बनने से पहले,

कुछ बनाना चाहता हूँ,

थोड़ा-सा ही सही,

पहले कुछ देना,

उसके बाद ही कुछ पाना चाहता हूँ ।

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साथ

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चढ़ती हुई दोपहर है,

इसे शाम मत कहो,

हर दौर खूबसूरत है,

इसे कोई नाम मत दो ।

.

जीये अपनी अंदाज में,

बस इतना भी कम नहीं,

उस पर शबाब यह,

कि तुम सब भी साथ हो ।

.

मुझे मालूम नहीं,

इस जहाँ में अहमियत मेरी,

पर इसका वजूद इसी से,

कि मैं हूँ और तुम हो ।

.

कब किससे जुड़ा, जुदा हुआ,

अब याद नहीं मुझे,

हसरत और दुआ यही है,

कि तेरा हरदम साथ हो ।

.

रंग बहुत से मिले,

कुछ ठहरे, कुछ बिखर गये,

कोई गिला शिकवा नहीं,

बस तुम संग होने का दम भरो ।

.

किसी को क्या हिसाब दूंगा,

न सोचा है, न सोचूंगा,

मैं तरी नजरों में खरा रहूँ,

तुम नजरों में तुम रहो ।

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प्रतिफलन

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मरघट पर जितने वीर मिले,

कुछ चकित, भ्रमित, अधीर मिले,

निकट कहीं रुधिर रंजित,

धनुष, तुणीर और तीर मिले ।

.

सब की आत्मा प्रश्न एक ही था,

परिपूर्ण हुआ या गया वृथा,

संकल्प लिये जो हमने थे,

हे बंधु, कहो उसका क्या हुआ ?

.

पूछा:

हे वीर, तुम्हारा शौर्य प्रखर,

तेरी आहूति ध्वज बन कर,

बन दिव्य ज्योति स्थापित है,

शेष यह आसक्ति अब क्योंकर ?

.

बिना निमेष बलिदान दिया,

तेरी गाथा तेरे धूमिल नहीं हुई,

क्या हुआ यह ललक नहीं छूटी,

क्या आहूति भी निष्काम नहीं ?

.

उत्तर:

आदर्श नहीं होता श्री विहीन,

वैराग्य कदापि नहीं अर्थहीन,

निष्काम कर्म नहीं निष्प्रयोजन,

हर क्रिया एक उद्देश्य अधीन ।

.

हर कर्म सदैव परिणाम हेतु,

हर चेष्टा उन्मुख उपलब्धि को,

लोलुप आसक्ति है वर्जित,

कलुषित करता मत, नीति को ।

.

लक्ष्य अहम् से गुरुतर हो,

उद्देश्य हो व्यापक सर्वांगीण,

क्षितिज के पार की दृष्टि हो,

सकल हित विवेक हो समीचीन ।

.

जीवन अर्हित उद्देश्य से है,

और उद्देश्य कर्म का निर्माता,

बलिदान कर्म का शिखर बिंदु,

इनके फलन से सार्थक मानवता ।

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अनुकम्पा

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जीवन के अविरल प्रवाह में,

मेरे चाहे, अनचाहे,

कुछ प्रसंग जुड़े, कुछ प्रश्न जुड़े,

कुछ घटनाएँ घटी, कुछ संभावनाएँ घटी,

जो शेष बचा,

वह मैं था,

इतना भी अकिंचन नहीं,

कि इसे अपना किया स्वीकार ना करूँ,

इतना भी प्रगल्भ नहीं,

कि इसमें तेरी महिमा को शिरोधार्य ना करूँ,

ज्ञात नहीं तेरा विधान था,

अथवा मेरा नवनिर्माण,

मैं ने कई सारे संभाव्य बुने,

पथ पर बिछे कुछ फूल चुने ।

.

जितने फूल चुने मैं ने,

दिया तुमने ऐसा स्मरण नहीं,

फिर भी आभार तुम्हारा,

कि तुमने उन्हें चुनने का झुकाव दिया,

और चुन पाने की क्षमता का विश्वास दिया,

और फिर कभी मुझे अंगुली पकड़ चलाया नहीं,

छोड़ दिया इस अनंत विस्तार में,

बस पैरों के नीचे धरती दी,

और सिर के ऊपर आकाश दिया ।

.

आभार मुझ पर इस अनुकम्पा के लिये,

आभार इस स्वच्छंदता के लिये,

आभार मुझ में दिये स्वाभिमान के लिये,

आभार जीवन के सारे संग्राम के लिये ।

.

अभी बहुत सारे प्रतिवाद हैं, उपालम्भ हैं,

पर क्या होता,

यदि तुम नहीं देते जो दिया,

क्या हम कह पाते,

कि यह जीवन है,

जिसका हर अणु जीवंत है,

और अर्थपूर्ण प्रत्येक क्षण है ।

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समाधान

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कहाँ से जगती सहज भावना,

जुड़ती कहाँ से भाव, चेतना,

रहस्य आज भी उतना ही अनबुझ,

किस विधि मानस पटल बना,

.

किसी ने अपरिमित प्यास दी,

किसी ने दी छलनामयी तृप्ति,

किसी ने दी देखने की इच्छा,

किसी ने देख पाने की दृष्टि,

.

कहीं से आयी मायावी आसक्ति,

कहीं से उपजा मधु सा मोह,

कहीं जन्मी प्ररखर अभिव्यक्ति,

और कहीं से जग उठा उहापोह,

.

कोई मर्म पर औषधि धरता,

देता कोई कुटिल, कठोर आघात,

दिये किसी ने दिवस अंधेरे,

और किसी ने दी चमकीली रात,

.

आतंक धवल की चकाचौंध का,

और मादक अंधेरा अपरंपार,

बीच सदा ही दिया किसी ने,

अनंत रंगों का ललित उपहार,

.

उद्ग्रीव मन संग सजग चेतना,

रचते आभिजात्य और नवनिर्माण,

और शून्य के गहन ध्यान में,

अर्थ जीवन का ढूंढे किसी के प्राण,

.

विस्मयजन्य हृदय का स्पंदन,

अविश्वसनीय मन का पटल विशाल,

चाहे जानना फिर भी यह प्राणी,

क्या है क्षितिज के पार का हाल,

.

ज्ञान मृत्यु और अमरता का,

युगों से छलता रहा निरंतर,

परिभाषित फिर भी करना चाहे,

क्या अमर और क्या है नश्वर,

.

जीवन विविधता का है उत्सव,

वृथा परिभाषा और समाधान,

संयोग, जिज्ञासा, सहजीवन,

इसके तन, मन और प्राण,

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पीड़ा

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पीड़ा,

थी तो पहले भी,

पर थोड़ी तरल थी,

बहुत ही सरल थी,

दिखती थी,

समझ में आती थी,

अक्सर साथ रहती थी,

बस कभी-कभी कुछ देर के लिये,

दूर चली जाती थी ।

.

पता नहीं कैसे,

अब सख्त हो गयी है,

चुभने लगी है,

नन्ही टहनी से,

अब दरख्त हो गयी है,

जड़ें गाड़ चुकी है,

मेरे हर यकीन पर,

बस उसी की छाया है,

मेरी पूरी जमीन पर,

अब पल भर को भी,

कहीं जाती नहीं है,

पहले की तरह,

रूप रंग बदल पाती नहीं है,

कहाँ से बटोर लिये हैं उसने कंकड़ पत्थर,

पूछना चाहता हूँ कभी उससे मिलकर ।

पूछते हो,

क्यों पाल रखा है मैंने इसको अब तक ?

क्योंकि,

बाकी सारे सहचरों ने,

कभी ना कभी छला है,

बस एक यही है,

जो विध्वंस में, निर्माण में,

मृणमयता में और सजग प्राण में,

बिना डिगे,

मेरे साथ चला है ।

.

तुम निर्पेक्ष, तुम निष्काम,

पीड़ा, तुम्हें प्रणाम ।

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तुम कौन हो

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तुम कौन हो ?

कुछ कहते हुए या मौन हो,

कभी आँखों ही आँखों में,

कभी मुस्कुराहट से,

कभी अट्टहास से कभी आहट से,

कितना कुछ कह देते हो,

जीवन को कितने रंग देते हो,

फिर से प्राण फूँकने वाले चमत्कार-सा,

अपना अनमोल संग देते हो ।

.

यह क्या है ?

जो मुझे एक बच्चे-सा बहलाता है,

चोट लगे तो सहलाता है,

कभी कीचड़ में गिर जाऊँ तो,

उठाता और नहलाता है ।

क्या यह मात्र तुम्हारा साथ है,

या हर कदम मेरी चिंता करने वाला,

तुम्हारा हाथ है ?

.

यह कैसे हुआ?

दिन भर हम रोते रहे,

रात भर हम सोते रहे,

हरे भरे मन के आंगन में,

प्यास ही प्यास बोते रहे,

क्या अर्जित किया पता नहीं,

तेरा दिया खरापन खोते रहे ।

तेरा फिर से आभार कि,

दूर मुझसे तुम फिर भी नहीं गये,

निविड़तम अंधकार में भी,

मिलते रहते हैं तुम्हारे जलाये दीये ।

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सखा भाव

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कभी नरम-नरम, कभी खुरदुरे,

हरदम लेकिन रस से भरे,

बातें तीखी, बातें मीठी,

पर सरल अर्थ से बहुत परे,

कुछ होता है ऐसा ही सखा भाव,

कि परिहास और भी संग जड़े ।

.

रख सम्हाल इसे तू अंकपाश,

सम्बंध नहीं, यह है विश्वास,

जो जीने की इच्छा प्रबल करता,

अंतर्मन को देता आकाश,

प्रश्न उठे क्या पाया जग में,

उत्तर, बंधुत्व और मन का विकास ।

.

अकेलेपन से भय को छीन,

देता बल यदि एकांत में लीन,

पाँव की बेड़ी, न अपेक्षा का भार,

दुर्गम पथ बीते श्रम से विहीन,

छोड़ अहम् हो सहज प्राण,

हो सखा भाव के उल्लास अधीन ।

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कभी खत्म नहीं होती

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छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती,

अपने से मुलाकात है जो कभी खत्म नहीं होती ।

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मैं खुद चला या मुझको चलाया गया,

कुछ याद है, तो बाकी क्यों भुलाया गया,

लौ जो एक जलती रही है सीने में हरदम,

खुद जली या उसको भी है जलाया गया,

इन मुद्दों की बारात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

जिस पर चला मैं वह राह किसने दिखायी,

जाती कहाँ है और है किस ओर से आयी,

चलना और पहुँचना कितने एक या जुदा,

आज तक किसी ने यह बात नहीं बतायी,

खुद से शह और मात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

ख्वाहिशें कितनी हो तो अच्छा है होना,

उन्हें पाने का जुनून करता बड़ा या बौना,

मापते इस सब को हम किस औजार से,

कुछ पाने मतलब क्यों थोड़ा खुद को है खोना,

तिलिस्म की यह रात कभी खत्म नहीं होती ।

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

.

क्या होता अगर सारे ये सवाल नहीं होते,

कम सोचते, इतने सारे खयाल नहीं होते,

समय के संग गुजर तो जाती जिन्दगी,

पर उनके कद इतने विशाल नहीं होते,

नेमत है या खैरात, कभी खत्म नहीं होती,

छोटी-सी है एक बात जो कभी खत्म नहीं होती ।

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आगे ही बढ़ती है

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मेघ से छन कर आती किरणों ने मुझसे कहा,

परेशान मत हो,

सूरज बिल्कुल ठीक है,

और यह कुछ देर की ही बात है ।

.

मेघ से गिरी एक बूंद ने मुझे बताया,

बादल फिर आयेगा,

फिर बारिश होगी,

अभी सूरज के ताप ने छीन ली है नमी,

पर बादल फिर से उठा लायेगा पानी,

और यह कुछ देर की ही बात है ।

.

दोनों की बातें मुझे सच्ची लगी,

और मैंने दोनों से दोस्ती कर ली ।

.

अब तक मैं दोनों से नाराज था,

कि ये कभी भी हमारा कहा नहीं करते हैं,

पर अचानक बहुत कुछ बदल गया,

मुझे अपनी नाराजगी बेमतलब लगने लगी,

मैं तय नहीं कर पा रहा था,

यह मेरी नयी-नयी दोस्ती का असर है,

या मैं अब समझने लगा हूँ,

कि कुछ है जो हमारी निजी नाराजगी से बेहतर है ।

.

जिन एहसासों को मैंने सही मान लिया था,

उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ,

ऐसा मन ही मन ठान लिया था,

हर वक्त सोचता रहा था,

सिर्फ गुजरते वक्त ने नहीं सिखायी हैं ये बातें,

 मैं उन्हीं के संग पला हूँ, बढ़ा हूँ,

और सीखा है इन्हें जिंदगी के एक हिस्से की तरह,

वही एहसास आज सवालों के घेरे में थे,

कई सारे यकीन आधे अंधेरे में थे,

खुद को ही नहीं,

अपने एहसासों को चाहे हम जो भी मानते हैं,

हम उन्हें पूरी तरह कभी नहीं जानते हैं ।

.

एक सवाल और भी था,

मेरा उन पर या उनका मुझ पर इख्तियार है,

ये एहसास मुझे राह दिखा रहे हैं,

या इन्होंने मुझ पर कर रखा है काबू,

यह उलझन अब भी बरकरार है ।

ऐसा भी नहीं कि,

काबू में इनके होना मुझे अच्छा नहीं लगा,

पर इसे आखिरी सच मान लूँ,

इतना भी सच्चा नहीं लगा,

बहरहाल उसको भी एक एहसास बना लिया,

आगे बढकर उसको गले लगा लिया ।

.

आड़े-तिरछे रास्तों से गुजरती है,

कभी थमे होने का,

कभी ठगने का,

तो कभी मुड़ कर लौटने का वहम पैदा करती है,

पर हमेशा ऊपर उठाती है,

क्योंकि जिन्दगी हमेशा आगे ही बढ़ती है ।

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