तेरा प्रकाश भी चाहिये        

 

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जो किया काफी नहीं, अब कुछ नये प्रयास भी चाहिये,

सूरज जरा मद्धिम है आज, इसे तेरा प्रकाश भी चाहिये

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कहती नहीं पूरी कहानी, फकत ताकत तुम्हारी बाहों की,

चेहरे पर झलकने के लिये, मन में विश्वास भी चाहिये ।

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आँखों के खुलने से पहले, एक झोंका छू कर कह गयी,

बहुत हुआ दुहराना, होना हर कुछ दिन खास भी चाहिये ।

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दूर तक नहीं दिखा कोई संग चलने वाला तो मन ने कहा,

एक नयी ऊर्जा के लिये, कभी होना बेआस भी चाहिये ।

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दुनियाँ को बदलने की जिद है खूब वाजिव अपनी जगह,

दूसरों के आँसू पी ले, दिल में एक ऐसी प्यास भी चाहिये ।

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गम की इंतहा क्या खूब उतर आती है हमारे चेहरों पर,

उदास ना कर दे फूलों को, मन इतना ही उदास भी चाहिये ।

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महज ढूँढने की नहीं, खुशी गढ़ते रहने की चीज है यारों,

चाहे जैसे भी जगायें, मन में खिलता हुलास भी चाहिये ।

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और थोड़ी कोशिश हो जरूरी अक्सर सच ऐसा ही होता है,

पर चाहना गलत है कि थोड़ा कम ऊँचा आकाश भी चाहिये ।

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खूबसूरती एक की दूसरे से जुड़ती है, कभी टकराती नहीं

हरी दूब काफी नहीं, नजरों को अमलतास भी चाहिये ।

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एक ही तरफ हो तो अपनी ही करवट भी चुभने लगती है,

पीड़ा की करुणा सही, स्वच्छंद मन का विलास भी चाहिये ।

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थोड़ा ढीला अपने आपको छोड़ भी दिया कर भला होगा,

कभी-कभी बनफूलों-सा, होता कुछ अनायास भी चाहिये ।

उत्सव

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जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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रचना में अभिजात है,

रूप में हर क्षण अभिनव है ।

पीड़ा में जननी है,

भाव में सदैव उद्भव है ।

प्रलय में भी अमर्त्य है,

असम्भव प्रतीत, परंतु संभव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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चरित्र में अप्रतिम चेष्टा,

कर्तव्य में एकाग्र निष्ठा,

संस्कार में शुचिता प्रत्यक्ष,

प्रेम में साक्षात पराकाष्ठा ।

हर दिशा से मूर्तिमान सौष्ठव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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विक्षुब्ध करता अनंत विस्तार,

प्रकाश से अधिक अंधकार,

पर अपनी ज्योति जलाने का,

अवसर देता बारम्बार ।

परीक्षा है सतत, नहीं पराभव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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जितनी बाधाएँ, उतने ही बल,

हारने की पीड़ा, जीतने के छल,

कितने ही कुटिल प्रतिघात,

और उतने ही परोपकार निर्मल ।

यहाँ उन्माद है तो वहाँ नीरव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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अपेक्षा कि हर रंग प्रगाढ़ हो,

मधुर-मदिर स्थायी स्वाद हो,

चेतना बना रहे समरस,

शेष नहीं कोई प्रमाद हो ।

यह अभाव शाश्वत अनुभव है ?

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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ज्ञान, कि सब कुछ नश्वर है,

यह आतंक भी बहुत सुन्दर है,

जगती इससे अबूझ जिज्ञासा,

क्या है निश्चित और अमर है ?

सतत शोध का अमिट वैभव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

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प्राप्त हुआ तो संघर्ष है,

जी लिया तो उत्कर्ष है,

गहनतम वेदना में भी,

इसमें देवत्व का स्पर्श है ।

एक क्षण मोहिनी, दूसरे ताण्डव है ।

जीवन हर रंग में उत्सव है ।

सम्हालते-सम्हालते

जीवन की वास्तविकताओं को सम्हालते-सम्हालते,

बहुत दूर निकल आया,

मुड़ के देखा तो बीते पल झिलमिला रहे थे,

हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे थे,

जैसे अभी भी चल रहे हों मेरे संग ।

कुछ गुनगुना रहे थे,

ध्वनि स्पष्ट नहीं थी,

पर मुझे छू रही थी,

उनसे उठती तरंग ।

मन निर्णय नहीं कर पाता,

कि इन बंधनों को तोड़ कर निकलना,

सही गति है?

इनसे लगाव के मादक भाव आभार हैं,

या निराधार आसक्ति है?

ऐसे और भी कई जिज्ञासाएँ रहते हैं मुझको सालते ।

जीवन की वास्तविकताओं को सम्हालते-सम्हालते ।

.

जो पार किये पड़ाव हैं,

उनमें बसे जितने धूप छाँव हैं,

करते हैं परिभाषित मेरे अब तक के जीवन को,

पर उन्हें भी खूब पता है,

कि वे मात्र राह हैं, गंतव्य नहीं,

और अर्थहीन है कहना कि उनमें क्या गलत, क्या सही,

कितना कुछ ढल जाता है,

दिये गये साँचे में खुद को ढालते-ढालते ।

जीवन की वास्तविकताओं को सम्हालते-सम्हालते ।

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सपने जो अब तक आँखों में आये हैं,

सपने जो मन में बैठे हैं, विश्वास के जाये हैं,

कभी आपस में उलझते नहीं,

बहुत अलग-अलग हैं,

चुपचाप जलते रहते हैं, कभी बुझते नहीं,

कोई विवशता नहीं कि उनमें से कुछ को चुनूँ,

या उन सब की कहानियाँ सुनूँ,

जीवन का हिस्सा बन जायेंगे सारे,

यूँ ही आँखों में पालते-पालते ।

जीवन की वास्तविकताओं को सम्हालते-सम्हालते ।

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बीते हुए को अनुभवों से तौलना,

बंद किये दरवाजों को बार-बार खोलना,

सम्बंधों को प्रगाढता से आँकना,

आने वाले कल की ओर समय के विवर से झाँकना,

कभी-कभी जीवन के अर्थपूर्ण होने की अनुभूति देते हैं,

और बाकी सारे समय में लगता है,

सारी सृष्टि कह रही है:

जी, बस जी,

यात्रा ही जीवन है,

बाकी सब छलना है,

सत्य बस चलना है,

मत पाल फिजूल के मुगालते ।

जीवन की वास्तविकताओं को सम्हालते-सम्हालते ।

करुणा

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ज्ञान, विवेक, साधना, वंदन,

देते नहीं चैतन्य, स्पंदन,

मन सूखा, मरुभूमि पड़ा था,

हो अर्थहीन पाषाण खड़ा था,

तुमने एक नया संसार दिया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया

.

करुणा, तुमसे दूरी-सी थी,

‘क्यों’ की बीच दीवार खड़ी थी,

चित्त तृषित था और विकल था,

अर्थहीन लगता जगत सकल था,

तू ने छू कर दुविधा पार किया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

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ज्ञान का अपना तेज-ताप,

तर्क का सम्मोहक विलाप,

कारण के मायावी गह्वर,

सदैव प्रश्न, शून्य थे उत्तर,

सहज एक तुमने आधार दिया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

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पौरुष भी था कुलिश कठोर,

मदमाता और संघनित घोर,

देने से अधिक था हर लेता,

उद्देश्यपूर्ण पर नहीं प्रणेता,

लक्ष्य में रस का संचार किया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

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संधान निर्मल आनंद चित्त का,

आराध्य सत्य हो और सुन्दरता,

जब मात्र इन्हीं को चुन लिया,

अभेद्य एक आवरण बुन लिया,

तुमने इस चक्रव्यूह के पार किया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

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तृणदल पर तुहिन के कण,

छूने से पैरों में कम्पन,

अकस्मात सृष्टि जाग्रत लगी,

हृदय व्यापक संवेदना जगी,

एक स्पर्श ने उपकार किया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

.

व्यग्र नयन ने नभ को छोड़,

देखे जीवन को प्रत्यक्ष, विभोर,

जुड़ने और पाने की भाषा,

अद्भुत, नवीन जीवन परिभाषा,

मन से मन का अभिसार किया ।

तुम आये तो श्रृंगार किया ।

सच के संग

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अध्ययन से अर्जित ज्ञान से नहीं,

जीवन में मिले सम्मान से नहीं,

मन के अक्षुण्ण अभिमान से नहीं,

विधान के दिये हुए प्रमाण से नहीं;

अंतिम निर्णय में हम उतने ही भले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

.

संवेदना की गहन चेतना से नहीं,

दर्शन के सूक्ष्म विवेचना से नहीं,

दिव्य आलोक की संभावना से नहीं,

उत्तुंग शिखर पर पद स्थापना से नहीं;

अज्ञान तिमिर में उतने ही दीप जले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

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बीते हुए पथ के वैभव से नहीं,

अर्जित किये हुए अनुभव से नहीं,

प्राप्त सारी निधियाँ दुर्लभ से नहीं,

साधे हर असम्भव-सम्भव से नहीं;    

सार्थकता के साँचे उतना ही ढले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

.

भुजाओं में निहित पुरुषार्थ से नहीं,

मन में बसे कुरुक्षेत्र के पार्थ से नहीं,

भ्रम से मुक्ति, या स्पष्ट अर्थ से नहीं,

परलोक के हेतु किये परमार्थ से नहीं;

प्रकाश के पुंज राह में उतने ही जले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

.

अन्वेषण के आह्लादों से नहीं,

चिंतन से नहीं, संवादों से नहीं,

त्याग से नहीं, आस्वादों से नहीं,

अर्जित हुए सारे साधुवादों से नहीं;

भाग्य के उतने ही आशीष फले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

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जीवन सुरभित करते हर्ष भी भले,

सत्य और यथार्थ के स्पर्ष भी भले,

सारे पुरस्कार और संघर्ष भी भले,

चेतना व्यापक करते उत्कर्ष भी भले;

हम सार्थकता के रंग उतने ही ढले हैं,

जितना जीवन में सच के संग चले हैं ।

.

जीवन में अंतत: हम उतने ही भले हैं,

जितना हम सच के साथ चले हैं ।

दीया जलेगा

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धूप का धीरे-धीरे कम होना,

उजाले का क्रमश: मध्यम होना,

गहराता मन का कोना-कोना;

थकी नसों में शीतलता जगती,

शामें हैं इतनी अच्छी लगती,

इसलिये कि तय है दीया जलेगा,

एक और उजाला साथ चलेगा ।

.

अंतरिक्ष के तारों-से झिलमिल,

माया रचे दीप अंधकार से मिल,

भयभीत नहीं, पलकें हों स्वप्निल;

स्वागत बाँह पसारे रात का,

निमंत्रण स्वीकार इस अज्ञात का,

इसलिये कि तय है दीया जलेगा,

अंधकार अब नहीं छलेगा ।

.

जो बाधाओं से जूझ प्राप्त हो,

साध चित्त के भय को, भ्रांति को,

जन्म देता उस चिर सामर्थ्य को;

प्रगट जिससे अंधकार में आशा,

विश्वास जीवन में हर पल बढता-सा, 

जब भी हमने कोई दीया बनाया,

जीवन को सत् की ओर बढाया ।

.

निविड़तम निशि में भी विश्वास पलेगा,

जो हमने बनाया वह दीया जलेगा ।

बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है

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मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है

,

कभी अपनी यात्रा के आरम्भ का अनुमान लगाने,

कभी बीते पथ को निहारने आत्मीय स्नेह से,

कभी फिर से जीने, बीते क्षण अतिरेक के,

पर अधिकतर अब तक के बीते समय का आभार जताने,

बीते की जटिलता से ही उभरती,

आगे की दिशा-रेखा है ।

 मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है ।

,

स्पष्ट है,

कि हर उत्कर्ष की यात्रा की भाँति,

इसमें भी बीते बिंदु लगते अभी से नीचे हैं,

प्रतीत होते,

आज के यथार्थ से आँखें मीचे हैं,

परंतु यही तो इस यात्रा का अर्थ है,

इतना सदा सत्य रहेगा,

कि आने वाला कल,

आज के लिये भी ऐसा ही कहेगा,

सच कहूँ तो मुझसे,

रहा नहीं किभी भी वर्तमान का सौंदर्य अनदेखा है।।

मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है ।

,

पैरों में चुभते शूलों की,

अपने निर्णय के भूलों की,

अपने हाथों हुए विनाश की,

पश्चाताप और गढने के हर प्रयास की,

हर हर्ष-वेदना मुझे स्वीकार है,

अतिशयोक्ति नहीं कि मुझे बेहद उनसे प्यार है,

वे जोड़ते मुझे हैं उस विधा से,

जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का लेखा है ।

मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है ।

,

अभी तक आभास हो रहा है जिस आकर्षण का,

सहगामियों की परछाईयोँ से जुड़े स्नेह बंधन का,

जिनकी स्मृति अनायास ही धन्यता से भर देता है,

बीते के गौरव अनायास गौरवान्वित कर देता है,

शीतलता देने में सक्षम आज की हर व्यथा में,

सदा एक सरस अर्थ देता हर संघर्ष की कथा में ।

हर निराशा के पल इन्हीं स्मृतियों साँसों में भर देखा है ।

मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है ।

,

नियमों की परिधि से अलग हो कर,

संवेग के उत्प्लावन में खो कर,

पूर्णत: निष्काम हो,

शुचिता के बीज बो कर,

देख लिया, और पाया,

बाकी आभूषण हैं, तत्थ्य मात्र यात्रा है ।

यात्रा सार्थक तभी लगी ,

जब पूरी यात्रा से जुड़ कर देखा है ।

मैं ने बार-बार पीछे मुड़ कर देखा है ।

पूर्णता और पूर्णता की यात्रा

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पूर्णता के प्रयास में,

राह में मिलते आलोक बिंदु,

मात्र मरीचिका हैं,

या संभवत:,

दिशा के सही होने के आभास हैं?

पर यदा कदा मन में कौंधता,

चकाचौंध करता,

पूर्णता का विश्वास,

 प्राय: कुछ और नहीं है, छलना है?

कदाचित यही वह छद्म है,

जहाँ विवेक को सम्हलना है ।

.

जब प्रतीत होता सब कुछ सही,

 कहीं भी कोई कमी नहीं,

कोई ऐसी कहानी नहीं,

जो बच रही हो अनकही;

हम जड़ हो रहे होते है,

अपनी संवेदना खो रहे होते हैं ।

.

घुमावदार रास्तों से चलते हुए,

मोड़ आकर्षित नहीं करें,

सिर्फ तय किये हुए दूरी की चिंता हो,

मन में केवल उस पार का सवाल हो,

मोड़ों का होना आनंद नहीं,

प्रतीत होता व्यवधान हो,

रोमांच एक बेमतलब का खयाल हो;

जीवन जिया नहीं जा रहा होता,

गुजारा जा रहा होता है,

साँसें चलती है,

मन, जड़वत सोता है ।

.

अपनी पीड़ा विशाल लगे,

परपीड़ा की हृदय में अनुभूति न हो,

पर अपनी हर व्यथा के लिये,

सारी दुनियाँ को खड़ा कर रहे हों,

सवालों के घेरे में,

स्वयम् अपने दायित्व की प्रतीति न हो,

ऐसे में कब अचानक,

 जीवन के अवयव बदल जाते हैं,

मन के विचार ढल जाते हैं,

अपने हित से,

औरों के अनहित की इच्छा में,

और परोपकार की भावना परपीड़न में,

और इस बदलाव का हमें पता नहीं चलता ।

ऐसे में लड़खड़ाता कदम फिर नहीं सम्हलता ।

.

एकांत का सम्मोहन भी,

समूह के सकल बंधन भी,

निर्पेक्ष चिंतन के उत्तुंग शिखर,

समरसता का आस्वादन भी,

संग साथ के बंधन भी,

अस्तित्व  ज्ञान का अकेलापन भी,

जब एक साथ करें आकर्षित,

लगें जटिल, पर करें सम्मोहित,

नयी जिज्ञासाएँ जगती रहें हर पल,

पुरानी होती रहें तिरोहित,

जीवन सम्पूर्णता की ओर बढ रहा होता है,

सार्थकता के सोपान चढ रहा होता है ।

.

पूर्णता के प्रकाश की चकाचौंध से,

सहज है खुद को छलना,

पर जीवन है,

खुद को जला प्रकाश पाना,

और अपने ढूँढे रास्तों पर चलना ।

तुम्हारा होना, नहीं होना एक समान है

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मेरी समग्र चेतना,

एक साथ उत्प्लावित और स्तब्ध है,

कि तुम्हारा होना,

तुम्हारी अनुपस्थिति में भी उप्लब्ध है।

तुम्हारा मेरे संग होना,

या तुम्हारा मेरे संग नहीं होना,

मुझे लगता एक समान है,

मेरा तुम्हें एक बच्चे की भाँति जकड़े रहना

तुम्हारा मुझे सदा स्वच्छंद छोड़ देना,

इसका प्रमाण है ।

.

जब भी मैं ने अपनी धड़कन सुनी,

जब भी अपनी साँसों को महसूस किया,

जब भी बाहर से सिमट कर अपने अंदर जिया,

और तुम्हें प्रत्यक्ष नहीं पाया,

चौंका नहीं, निराश नहीं हुआ,

क्योंकि तुम वहाँ नहीं हो,

ऐसे विचार ने मुझे कभी नहीं छुआ ।

मेरा होना ही मुझे कहता है,

तू विद्यमान है ।

तुम्हारा मेरे संग होना,

या तुम्हारा मेरे संग नहीं होना,

मुझे लगता एक समान है ।

.

जब भी मैं,

प्राप्ति की अनुभूति से जाता हूँ भर,

छलकते रहते हैं मेरे संचित,

उछृंखल हो  कर,

या जब भी मेरे पूरे विस्तार में,

निपट शून्यता आती है उभर,

विश्रांति का आलस्य छाने लगता है मुझ पर,

दोनों ही स्थिति में,

एक-सा ही भाव समर्पण का,

मुझे हल्के से सहलाता है,

फिर पूछता है मुस्कुरा कर,

क्या तुम जानते हो,

तुझे मिला यह सब किस विधि का विधान है ?

तुम्हारा मेरे संग होना,

या तुम्हारा मेरे संग नहीं होना,

मुझे लगता एक समान है ।

.

अपने अस्तित्व के निरंतर आकलन में,

‘जो करना है’, के उद्यम में,

और ‘जो कर चुका हूँ’, के अध्ययन में,

एक प्रश्न उठता बार-बार, पग-पग पर,

करना और होना क्या हैं, युग्म, हैं अनंतर?

क्या एक दूसरे के आगे पीछे,

क्या आश्रित एक दूसरे पर?

देखूँ शुरू से अंत की ओर,

या अंत से निहारूँ आरंभ के छोर

जो होता है दृष्टिगत,

है जीवन, सम्पूर्ण, अक्षुण्ण, अक्षत,

इसमें कुछ भी विभाजित नहीं होता,

कुछ जीतने से कुछ पराजित नहीं होता,

कुछ जुड़ने से इसका आकार बड़ा नहीं होता,

कुछ घटने से लघुता का संकट खड़ा नहीं होता,

जो होता है, होता है,

जो नहीं होता, वह भी समग्र का एक अंश होता है।

इस जीवन के यायावर के लिये,

तुम्हारा प्रत्यक्ष नहीं होना भी,

मात्र एक होना है,

कदापि नहीं है तुम्हें खोना ।

शून्य और समग्र के बीच हर कुछ,

एक दूसरे से  जुड़ हुआ है पूर्णत:,

यही समेकितता प्रतीत होता वास्तविक ज्ञान है ।

तुम्हारा मेरे संग होना,

या तुम्हारा मेरे संग नहीं होना,

मुझे लगता एक समान है ।