बंधन-उन्मुक्ति

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बंधनों के टूटने से,

बंधनों के छूटने से,

स्वच्छंदता की तरंगें बनती हैं,

जो, आगे चलकर, जीवन के नये आयाम जनती हैं ।

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जिस जगह बंधे होते हैं बंधन के तंतु,

बंधन के हस्ताक्षर वहाँ परंतु,

सदा के लिये ठहर जाते हैं,

कोई भी प्रयास उन्हें मिटा नहीं पाते हैं ।

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ये बंधन के स्मृति चिन्ह,

साक्षी होते हैं सदा के लिये,

उन सारे पथ और मोड़ के,

और उन मृगमरीचिका के,

जिन से हो कर हम जिये ।

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बंधन हमें जड़ से जोड़ते,

जड़ नहीं करते,

हमारे पिछला पता होते हैं,

जिसके स्मरण से हम अज्ञात से नहीं डरते ।

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हर बंधन को ज्ञात है,

कि वह टूटने के लिये ही बना है,

और यह भी कि हर नया गंतव्य,

उसी की एक नयी परिकल्पना है ।

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बंधन से उन्मुक्ति,

सदा बंधन की ऋणी है,

अपनी संतति को आगे बढ़ाती,

बंधन उन्मुक्ति की जननी है ।

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शब्दों में, छंदों में,

सदा हम ऐसा कहने से बचते हैं,

पर बंधन और उसका टूटना,

जीवन को दोनों ही मिलकर रचते हैं ।

कुछ बिम्ब

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भोर का सपना,

थोड़ा याद, थोड़ा भूला हुआ,

जैसे पिछले जनम से कोई आवाज दे,

अगले जनम का कोई संदेश देता हुआ ।

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दिन में दिखता चांद,

जैसे कोई भटका हुआ राही,

डरता हुआ कि कहीं फिर से न हो,

वही तारों की भीड़ और रात की स्याही ।

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मंदिर में जलता अंतिम दिया,

जैसे कहता हो समय से ‘थोड़ा और धीरे’,

सुबह होते ही कोई बुझा देगा,

सूरज की ओर आभार से बार-बार नत होते ।

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फूल की पंखुड़ी पर,

उगती पहली ओस की बूंद,

जैसे हृदय के अछूते कोने में,

करुणा और विश्वास जन्म ले रहे साथ-साथ,

जीवन के सुंदर होने में ।

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मेघ के कोमल गात से,

सहसा चमकी वज्र की रेखा,

मानव की आकांक्षा की सीमा को,

प्रकृति ने अभी कहाँ है देखा ?

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इंद्रधनुष  का वलय खिंचा नभ,

कैसे, क्यों, किसका? अज्ञात,

जैसे सारी सुंदरता पहनकर,

सृष्टि निकली सद्य: स्नात ।

हर क्षण सहज आनंद है

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जब हम आज में कम होते हैं,

बीते दिनों की स्मृतियों में भटकते, खोते हैं,

निश्चय ही यह कहीं से आता एक संदेश है,

कि कम महत्वपूर्ण अब परिवेश है,

अपने अंदर में जो भी समाहित है,

ज्ञात नहीं कितना उचित या अनुचित है,

उनको सजाने का समय आ गया है,

अब स्वयं को पाने का समय आ गया है ।

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जब संग्रह से कुछ न बढ़ता प्रतीत हो,

दे देने से लगता न कुछ व्यतीत हो,

व्यर्थ लगने लगे बीते दिनों की तृष्णा,

मन आगे बढ़ता चले बिना आलोचना,

चलना आवश्यक लगे, दौड़ना अनिवार्य न हो,

आनंद से अधिक कभी धन-धान्यता स्वीकार्य न हो,

तो ज्ञात हो कि जीवन के कुछ अवगुंठन खुल रहे हैं,

कठिन कवच-आवरण इस योद्धा के हो मृदुल रहे हैं ।

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अपेक्षा जब अपना अर्थ खोने लगे,

करुणा क्षमा के बीज बोने लगे,

अपने दंभों पर लज्जा आये, पश्चाताप हो,

आकांक्षाओं को अंदर समेटना अपने आप हो,

सृष्टि में अपना स्थल बनाना न हो संघर्ष का आधार,

हर प्रयत्न इस ओर कि कैसे स्थित प्रतीक का हो परिष्कार,

जब परिमार्जन अर्जन से अधिक रुचिकर लगने लगे,

सम्भवत: आप हैं उचित दिशा में चलने लगे ।

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भोर की तरह ही सुंदर हो सकते है संध्या के परिदृश्य भी,

एक वय में हम अपने गुरु, हम ही अपने शिष्य भी,

क्षितिज के समीप होते, बस उसमें ही समाना चाहते हों,

सामर्थ्य की लालसा नहीं, अब अर्थ पाना चाहते हों,

जीवन अब सरस, सुमधुर, शाश्वत छंद हो,

संधान बस आनंद का, हर क्षण सहज आनंद हो ।

हर पल लगने लगा नया था

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अनजानी राहों पर ठिठक-ठिठक कर,

राह पूछते, हिचक-हिचक कर,

कौतूहल था, और भय भी था,

मन में हल्का संशय भी था,

ज्ञान नहीं था, मान क्या करता,

कुछ होने का दम्भ क्या भरता,

विस्मय से देखता अनंत प्रसार मैं,

बढ़ता ही चला, हो निर्विकार मैं ।

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जगह नयी थी, देश नया था,

आगंतुक होना अच्छा लगता था,

खुले-खुले सपने लगते थे,

कोई न बंधन, सब अपने लगते थे,

था मन पर कोई भार न लगता,

किसी से छुपने का विचार न जगता,

जीवन बहुत सहज लगता था,

स्फूर्त और सजग लगता था ।

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समय कौन-सा, वह जादू क्या था,

पर इससे भी था फर्क क्या पड़ता,

पता नहीं प्रयोजन क्या था,

पर भटकने में एक सम्मोहन-सा था ।

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जी करता था चलता जाऊँ,

इस सुलझे पल को ना उलझाऊँ,

बाकी सब आलोचना है,

जीवन ऐसा ही होने को बना है,

जीवन इस पल के नाम बना दूँ,

बस यहीं इस पर पूर्ण विराम लगा दूँ  ।

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सारी शंकाओं को परे हटा कर,

मन ने ढूँढ लिया था उत्तर,

सहज सरलता कभी मत खोना,

यायावर, विचलित मत होना,

आरोप जटिलता दूर न करते,

दिकभ्रम कभी आशा नहीं भरते,

संधान नव्यता का एक बल है,

जिज्ञासा सदैव निर्मल है,

बिन अपेक्षा का हर उद्यम,

करता सदैव थोड़ा और सक्षम,

विश्वास सहज हर भय हर लेता,

अपने निश्चय से डिगने नहीं देता ।

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जीवन के आयाम बहुत हैं,

हर प्रयास के परिणाम बहुत हैं,

कहीं धवल तो कहीं श्याम है,

कहीं तिरस्कार तो कहीं प्रणाम है,

सुंदर मात्र विशद विविधता ,

‘मन वांछित जीवन’ मरीचिका,

चित को बाल सुलभ किया तो,

लाभ-हानि से दूर जिया तो,

जीवन लगने लगती क्रीड़ा,

थोड़ी सह्य लगती हर पीड़ा ।

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जिये जीवन के जो भी क्षण,

दर्शक बन, आगंतुक बन,

जब याचक सा व्यवहार किया,

जिज्ञासा को मौलिक संस्कार किया,

जो मेरा था देय, दिया,

मधु-गरल सम भाव पिया,

ऐसे जीकर जब आँखें खोली,

भरी-भरी थी मेरी झोली ।

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पग तल के आधार वहाँ थे,

समता के अधिकार वहाँ थे,

आकांक्षा थी, अभिलाषा थी,

जीवन-उद्देश्य की परिभाषा थी,

भाव समर्पण का मधुर मदिर,

चित्त को कर गया स्थिर,

भय अब उर से निकल गया था,

हर पल लगने लगा नया था

मन घर भी है, मन आंगन भी

दीवार, छत, द्वार, दहलीज,

मन घर भी है, मन आंगन भी,

उन्मुक्त गगन का सपना भी है,

और उन सपनों का बंधन भी ।

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पग के नीचे सौम्य धरातल,

ऊपर स्वच्छंद उन्मुक्त गगन,

कैलाश, कुरुक्षेत्र, वैतरणी,

तप, हवन, य़ज्ञ और चंदन भी ।

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स्मित हास और अट्टहास भी,

कभी संदेश, कभी संवाद,

एक साथ सब मन के अंदर,

अश्रु, हास और क्रंदन भी ।

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अमूर्त, अस्फुट, बीज भाव के,

जब भी उगें, संरक्षण उनका,

बचा-बचा कर अतिरेकों से,

करता पालन-पोषण, सिंचन भी ।

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जलें, बुझें असंख्य भाव पर,

जड़ता कभी स्वीकार्य नहीं,

विपरीत सही पर भिन्न मतों का,

विच्छेदन और विश्लेषण भी ।

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सूक्ष्म संवेदना, गहन अनुभूति,

दुर्लभ अलौकिकता का रोमांच,

इस प्रांगण सब संग क्रीड़ारत,

युद्ध, पलायन, विचरण भी ।

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संतोष यहीं, संताप यहीं पर,

हर विद्रूप, विपर्यय का घर,

सुंदरता का निर्माण यहीं हो,

यहीं कुटिलता का नर्तन भी ।

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बंधुत्व भाव, सहयोग सखावत,

मूल्यों पर जीवन का उत्सर्ग,

क्षणिक आवेश में सर्वस्व स्वाहा,

और शून्य-अनंत का मंथन भी ।

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स्वयं ही बनते, टूटते बुदबुद,

और समगति प्रवाह की धीर नदी,

अनियंत्रित गर्जन, नाद प्रलय का,

और निस्सहाय चित्त का स्तवन भी ।

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आश्चर्य नहीं कि इस गह्वर से,

छल, क्षद्म, घात भी जनमे हैं,

रूप उकेरने के लिये पटल पर,

आवश्यक प्रतिरूप का अंकन भी ।

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यह मूल्य भी नव निर्माण का,

सदैव स्वीकारे यह नि:संकोच,

घाटी से होकर ही प्रशस्त,

मार्ग शिखर के आरोहन की ।

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ऋणी ऋणात्मक भावों का

कि सत्य उजागर है सम्मुख,

तम के घर्षण से प्रकाश कर,

आलोकित पथ उन्नयन की ।

आनंद और अस्तित्व

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अधमुंदी आँखों से भोर की पहली किरण को निहारने में,

नये दिन की खुशी को मन में उतारने में,

सुबह उठ कर दरवाजा खोलने में,

अपने से नया कुछ कहने बोलने में,

जो समय जाता है,

मुझसे हो कर जाता है,

पूरी तरह मेरा बन पाता है ।

बाकी समय तो हर बार,

मेरे ऊपर से गुजरता है,

रीढ़ को पत्थरों की तरह रौंदते हुए,

आँखों में बिजली की तरह कौंधते हुए,

मुझमें आगे सफर के लिये ईंधन भरता है ।

मानता हूँ कि निश्चय ही मुझे जीवन में आगे करता है ।

चुनने का नहीं चिंतन का विषय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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अपने मन की व्यथा के दिखने के पहले,

अपने संघर्ष की कथा लिखने के पहले,

आँखें जब जाती हैं ठहर,

रात में टिमटिमाते तारों की नटखट आँखमिचौली पर,

बादलों के हर पल बनते बिगड़े घर,

हवाओं में झूमते पेड़-पौधे करते जीवन का मनुहार,

सब की अपनी कहानी, सब के अपने श्रृंगार ।

प्रकृति के इस वरदान को निहारने में,

इस जीवित सुंदरता को अंगीकारने में,

जो समय गुजरता है,

मेरे चित्त का अंश बन मुझमें ठहरता है ।

बाकी मुझे रंगते हैं, रंगमंच के कलाकार की तरह,

कहते हैं, समर्थ बन, अर्जन कर,

नहीं जी सकते जीवन एक उधार की तरह ।

उनको भी प्रणाम, जीवन के आभार की तरह ।

जीवन समन्वय है, यहाँ दोनों का विलय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

.

श्रम से लथपथ दिन के अवसान पर,

अपने अस्त्र-शस्त्र को थोड़ी देर के लिये अलग कर,

अपने लिये ढूँढने चलता हूँ खुशियाँ,

लगती है मुझे अपनी कर्जदार यह दुनिया,

तभी अचानक जो कोई आ के मिलता है,

गले लगाता है,

अपनी कहानी सुनाता है,

मुझमें सहसा वांछित होने का भाव जगाता है,

और मेरी सूखी आँखों में नमी भर जाता है,

उसकी मुस्कुराहट मैं अपनी खुशी पा लेता हूँ,

और अपनी खोज को विश्राम दे देता हूँ ।

अपनी खुशी की खोज की शुरुआत से लेकर,

इस विराम के बीच का समय,

मेरे मानव होने की परिभाषा है,

पूरी करता मेरी पहली अभिलाषा है ।

बाकी मुझे व्यवहार के गणित सिखाते,

जीवन की गणना में पटु बनाते,

कला हैं, कौशल हैं ।

उन्हें अपना नहीं भी कहूँ तो, कोई विवाद नहीं,

उचित हैं, निर्मल हैं ।

त्याग भी, संग्रह भी, रहस्य है, विस्मय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

.

हर चमकते तारे को तोड़ लाने की ललक में बढ़ते हाथ,

नहीं जान पाते, सफर में किस-किस का छूटा साथ,

न जाने कितने रणो को जीतने के बाद,

कितने ही प्रणो को हारने के बाद,

उभरा मन के पटल पर,

जीवन का एक अर्थ,

लेना एक प्रवृत्ति है,

और देना एक सामर्थ्य ।

समूह से, समाज से,

सृष्टि से, प्रकृति से,

भूत से, वर्तमान से,

आदि से और इति से,

सदा कुछ न कुछ लेने वाला,

क्या दे सकता है,

कृतज्ञता के सिवाय?

ललक में हाथ के उठने से,

कृतज्ञता के भाव के जगने तक,

जो समय गुजरता है,

मेरे आभारों का खजाना है ।

बाकी दिनचर्या हैं,

बहुत ही उपयोगी ऐसा मैं ने जाना है ।

सामान्य से ही विशिष्ट का होता अभ्युदय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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जीवन हर पल है,

बहता ही रहता, तरल है,

सारी उलझनों के बावजूद,

मन के अवगुंठनों से सरल है ।

पर कुछ जो इसे उत्कर्ष भरता है,

धन्यता देता है, हर्ष भरता है,

अपने अंतर्मन से बिना पूर्वाग्रह के बातें करना,

दूसरों के सुख-दुख को अपने से आगे रखना,

चारों ओर बिखरी सुंदरता का अध्ययन, आस्वादन,

सृष्टि के रचनाकार का,

इस जीवन के लिये आभार पूर्ण नमन,

जीवन को उस बिंदु तक ले जाते हैं,

जहाँ आनंद और होना एक हो जाते हैं ।

ये वह पल हैं जहाँ मन और प्राण का होता परस्पर विलय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

गर्व तो होता होगा

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प्रकृति, पुरुष,

शक्ति, संकल्प,

पृथ्वी, आकाश,

चेतना, पदार्थ;

उद्देश्य, समर्पण,

चेतना, स्पंदन,

परहित, स्वार्थ;

हे अज्ञेय, हे रचनाकार,

तुम जो भी हो,

या सब के सब,

मेरे जनक और जननी,

मेरी अस्थि, मज्जा और प्राण के निर्माता,

सृष्टि के नियंत्रक, सारे जगत के विधाता,

तेरे पास तो विकल्प रहे होंगे,

फिर तुमने मुझे क्यों बनाया,

जैसा मैं अपने आपको पाता हूँ?

क्यों दिये ऐसे अंत: करण और आवरण,

जिनमें उलझकर मैं रह जाता हूँ ।

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तुमने मुझे इतना दुर्बल क्यों बनाया,

जिसका जीवन है संभव,

तुम्हारे विस्तार की इतनी छोटी परिधि में,

कि मुझे अपना होना,

तेरी रचना कम,

एक संभावनाओं की दुर्घटना अधिक लगता है,

और मन में अनायास अवांछित होने का भाव जगता है ।

.

तुमने मेरे मन को इतना असहाय क्यों बनाया,

कि मुझे सदा एक अवलंब चाहिये,

समूह की सुरक्षा और किसी का संग चाहिये,

क्यों बनाया इतने संशयों से भरा,

अपने ही प्रश्नों के पंक में पड़ा,

कि हृदय और मस्तिष्क एक दूसरे से भ्रमित हो जाते हैं,

अपने पर ही सहजता से विश्वास नहीं कर पाते हैं ।

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परिणाम यह कि जीवन का अर्थ संकुचित हो जाता है,

सब कुछ निरंतरता को बचाये रखने पर सीमित हो जाता है ।

आकांक्षा छूट जाती है,

ललक छूट जाती है,

रंग छूट जाते हैं,

महक छूट जाती है,

जो बचा रहता है,

बस प्राण से लिपटी चेतना,

और कुछ नहीं कर पाने की वेदना ।

.

फिर जीवन के क्षेत्र में,

प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष,

आरम्भ हो जाती है एक स्पर्धा,

और अधिक बल के संचय की,

सुरक्षा के आश्वासन के संग्रह की ।

कहने को तो कहते इसे पराक्रम है,

पर वास्तव में होता है लघुता का आभास,

जो कौंधता रहता है मन में,

जब भी करता हूँ उन्नयन के प्रयास,

और उस के ऊपर विफलताओं का तिरस्कार,

जो बेध देते हैं उन कवचों के भी आर-पार,

जो हमें मिले हैं विरासत में,

तुम्हारी थाती कह कर,

पर वह हमें आघातों से नहीं बचाता,

मात्र हमारी पीड़ा को चिरजीवी बनाता है ।

.

तुमने मुझे इतना अकुशल क्यों बनाया,

कि अपनी गति से, अपने भार से,

अपनी दक्षता से, अपने आकार से,

सदा अपूर्ण-से लगते अपने विचार से,

उचित-अनुचित के बीच जूझते अनगढ़ व्यवहार से,

सृष्टि में अपनी जगह ढूँढते अपनी याचना के अंधकार से,

धमनियों अनियंत्रित रक्त के संचार से,

सदैव मिला मुझे संकोच, अवरोध और अर्थहीनता,

मात्र लघुता को बोध फिर भी सह लेता,

पर यह तो थी,  

अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाती साक्षात अपूर्णता ।

.

यहीं समाप्त नहीं हुई तेरी माया,

यह कैसा छल कि तुमने इस मरु में भी,

जिज्ञासा के बीज बोये,

कल्पना के उर्वरक दे,

स्वप्निल नयनों के जल से सिंच-सींच कर,

आकांक्षाओं का नया एक संसार बसाया ।

जैसे एक अकिंचन को,

अलकापुरी की झलक दिखला कर,

कदाचित तुमने अपना मन बहलाया ।

.

एक और मन की व्यथा कहूँ,

तुम मुझे छोड़ गये यहाँ,

और अब मिलते भी नहीं,

पुकारता हूँ तो बस मुस्कुराते हो,

कुछ कहते नहीं,

अस्फुट-सा कुछ फुसफुसाते हो,

जब भी कुछ पूछना चाहता हूँ तुझसे,

मुझे निपट अकेला छोड़ कर,

किसी न किसी छल से,

अपने होने का विश्वास दिला, बहलाते हो ।

.

अंतिम प्रश्न,

सच कहो,

तुम मेरी दुर्बलता से अधिक दुखी हो,

या इस बात से कि मैं अपने को,

और सबल नहीं बना पाया?

सच बताना जब ऐसे प्रयासों में,

जब मैं अपनी सीमाओं को लाँघता हूँ,

और तोड़ डालता हूँ वह सारे नियम,

जो तुम्हारे नाम पर मुझे बताये गये हैं,

तो तुम्हें खुशी नहीं होती क्या?

सदा की तरह,

तुमसे इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं आता,

पर तुम्हारा मौन है मुझे तंद्रा से सहला कर जगाता,

तो लगता है,

 कि मैं अब तुम्हें समझने लगा हूँ,

नींद से जगने लगा हूँ ।

.

अब जो मेरा चित्त जगा है,

तो मुझे विश्वास होने लगा है,

कि तुम व्यथित होते हो,

देख अपनी इस रचना को,

आचारों और विचारों के,

प्रतीकों और व्यवहारों के घेरों में घिरे हुए,

और लगभग स्वेच्छा से,

लीकों पर गोल-गोल चलते हुए ।

ऐसे में कई बार,

निपट सहजता में,

अनायास जो आंसू मेरी आँखों में आ जाया करते थे,

जिन्हें मैं समझ नहीं पाया था,

सच बतलाना, तेरे ही थे ना?

.

तो अब जो मैं तुम्हें चुनौती देता

कुछ कह जाता हूँ,

स्वयम् को सम्हालता नहीं,

अतिरेकों में बह जाता हूँ,

जिज्ञासा को तुम्हारे अस्तित्व की सीमा तक ले जाता हूँ,

कल्पनाओं में एक समानांतर सृष्टि बनाता हूँ,

जानना चाहता हूँ वह सारे रहस्य जिससे तुमने संसार बनाया,

और वह भी जिससे तुमने अपना अस्तित्व पाया,

तो तुम्हें प्रसन्नता होती है ना ?

भले ही सुख-दुख से परे हो तुम,

अपनी रचना की इस सफलता पर तुम्हें,

हर्ष तो होता होगा?

तुमने जो अपना एक अंश दिया था मानव को,

इस तथ्य पर गर्व तो होता होगा?

जैसे हमारे होते हैं देवों के पर्व,

तुम्हारा भी मानव पर्व तो होता होगा?

समय निहारता रहा मुझे

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अपना समर मैं जूझ रहा था,

सरल जीवन हो अबूझ रहा था,

हर दुविधा में कातर हो गहा तुझे,

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

कभी आश्चर्यचकित नयन से,

कभी ऊबे, थके-से मन से,

कभी निष्पक्ष दर्शक बन के,

पर सदैव ही बड़े जतन से ,

जान न पाया क्यों करता वह ऐसा,

मन ही मन विचारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

मैं ने समय को जुड़ते देखा,

सीधे चलते, मुड़ते देखा,

कभी-कभी श्रम से लथपथ,

और अगले पल फिर उड़ते देखा,

क्यों समय की गति है मायावी?

विकल हो पुकारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

समय मुझसे होकर बीता,

या मैं समय में होकर बीता,

जब भी बैठा करने आकलन,

दर्शन हारा और संशय जीता ।

हर भ्रम में, बालक अबोध-सा,

बस मानता, स्वीकारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

अनंत सृष्टि का एक सूक्ष्म अंग मैं,

व्यापक काल का क्षणिक तरंग मैं,

जैसे कोई अस्तित्वहीन स्पंदन,

अर्थ तभी, जब सब के संग मैं,

सह-जीवन मुझको प्रिय है, किंतु,

‘क्या उद्देश्य?’, पुकारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

एक दूसरे को देख रहे थे,

सहसा हम एक हो गये थे,

अब मेरा समय मुझमें सन्निहित,

जीवन के अब अर्थ नये थे,

उलझे सूत्र अब सुलझ रहे थे,

कृतज्ञ मैं विचारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

एक समय, जो मुझमें जनमा,

पला, बढा, जीवन बन पनपा,

मेरे संग हो जायेगा विलुप्त जो,

वह मेरा, और मैं अंश प्रवाह का,

अब अस्तित्व नहीं था प्रश्न चिन्ह,

तेरे संकेतों में तारता रहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

.

समय निर्पेक्ष, अनादि, अशेष,

सूक्ष्म मैं इसका एक अंग विशेष,

एक वहिर्जगत का विस्तार अनंत,

एक अथाह अंतर्मन का अंत:प्रदेश,

अंतर के आलोक में भ्रम टूट गये,

पुलकित मन, सारथी कहा तुझे ।

और समय निहारता रहा मुझे ।

उद्विग्न मन

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जीवन के सागर में डूबते-उतराते,

मन उगती रही एक ही इच्छा,

कितना सुंदर होता जीवन, यदि तैर पाते ।

प्रश्न जीवन की रक्षा का था,

नहीं था कुछ भी दूर का दिखता,

बस यहीं तक थी सोच की परिधि,

प्राप्त हो चाहे यह जिस विधि ।

.

जिजीविषा में शक्ति अपार,

मन केंद्रित, अंग-अंग सक्रिय,

तैरने का स्वप्न हुआ साकार,

अरे, पर यह क्या?

न किसी का आभार,

न अपनी क्षमता पर गर्व का विचार,

आगे कुछ अलग ही हो गया,

इस प्राप्ति का सारा आकर्षण खो गया,

तैरना इतना सहज लगने लगा,

कि अर्थहीन-सा हो गया ।

.

असंगत लगने लगा कि जीने के क्रम में,

करनी पड़े व्यय सारी ऊर्जा,

मात्र तैरने के श्रम में,

कुछ पल तो हों,

विश्रांति के आनंद में समाने को,

और चेतना से अठखेलियाँ कर पाने को ।

क्यों न ऐसा सम्भव हो,

ऐसी एक युक्ति का उद्भव हो,

कि सागर पर घर हो,

जिसमें बिना श्रम तैर पाने का वर हो ।

.

संग-संग बहते, उपलाते,

शाखाओं से शुरू किया,

फिर कुछ समय बीता और मेरे पास थी नौका ।

सुरक्षा की शांति,

चित्त निर्द्वंद्व और सजग,

जल के ऊपर, पर जल से अलग,

तैरता-उपलाता,

लहरों के हिचकोले खाता,

जीवन था बढता जाता,

पर न दिशा पर, न गति पर कोई नियंत्रण,

अनायास ही खिन्न हो उठा मन ।

.

चेतना घनीभूत हुई,

अनुभव सजाये,

भुजाओं ने सृजन किया,

और पतवार बन आये ।

गति पायी, दिशा पायी,

एक यथार्थता मन में भर आयी,

एक ठहराव आया,

सार्थक होने का मन में भाव आया,

क्षितिज पर रंग भरने लगे,

आँखों में सपने भर आये,

पतवार ने होने के नये अर्थ दिखाये ।

.

नयी ऊर्जा, नयी दृष्टि,

रहस्य-रोमांच से भरी पड़ी सृष्टि,

क्षितिज के पार का संसार,

आमंत्रण देने लगा बारम्बार,

पर मन अब और भी उद्विग्न हो चला,

अज्ञात की जिज्ञासा से भरने लगा,

प्रयोजन और उद्देश्य का अनुसंधान करने लगा,

आनंद की परिभाषा सहसा छलने लगी,

सहजता करवटें बदलने लगी,

नया है सब कुछ, पर यह क्या भला है ?

जीवन ने यह सब दे कर किया धन्य या छला है ?

मैं जीवन में पलता रहा हूँ, या जीवन मुझमें पला है ?

सपने

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सपने पूरे होते हैं,

शायद हजारों में एक के,

कोई करे शिकायत या शुक्रिया,

नहीं चलता पता,

और समय बीत जाता है देखते-देखते ।

.

सपने यदि सब पूरे हो जाते,

तो निश्चय सपने नहीं कहलाते,

फिर ये बंद पलकों में नहीं उगते,

खुली आँखों में बेचैनी बन बस नहीं जाते ।

.

अधूरे सपने भी सपने ही होते हैं,

टूटे सपने भी अपनी कहानी नहीं खोते हैं

जब जीने कोई बहाना नहीं मिलता,

खयालों का कोई खजाना नहीं मिलता,

मन में नयी सम्भावना के बीज बोते हैं ।

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सपने स्पंदन देते हैं, तरंग देते हैं,

एकरस जिन्दगी में अनगिनत रंग देते है,

सपने गति देते हैं और गति को दिशा देते हैं,

चारों तरफ पसरी उदासीनता में जीजिविषा देते हैं ।

मन को देह की सीमाओं से बढ़ कर प्राण देते हैं,

तर्क और शास्त्रों से भी सूक्ष्म ज्ञान देते हैं,

और कई बार अप्रत्याशित भूमिका निभाते हैं,

अर्थहीनता में जीवन का उद्येश्य बन जाते हैं ।

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सपने कभी निराश नहीं करते,

हमेशा जोड़ते हैं, ह्रास नहीं करते,

पुराने होकर भी पुरातनता पर विश्वास नहीं करते,

चिर नवीन होते हैं,

नहीं किसी के अधीन होते हैं,

हर किसी के हजारों सपनों में,

एक तो जरूर पूरा होता है,

कि वह जब चाहे सपने देख सकता है,

कुछ देने का वह दम्भ नहीं भरते,

कभी किसी का सपने देखने का अधिकार नहीं हरते ।