अब जिंदगी से प्यार कर लूँ

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सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ,

बनी बनायी लीक को छोड़ दूँ,

एक पगडंडी अपनी तैयार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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मिल गयी है जिंदगी, तो जीये जा रहे हैं,

आखिर क्यों, के सवालों से कतरा रहे हैं,

देख लिये मौजूदा, अपने चलन बना कर,

इस जिंदगी से आँखें दो चार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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पा लेना, जीने का मतलब बन गया था,

जीत पाऊँ जहाँ, उस शहर को ढूँढ़ता था,

देने की खुशी क्या है, दिया तो पता चला,

अब लेने से अधिक देने का विचार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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खुशी छुपी कहाँ, तलाश अब भी है जारी,

अपनी है या परायी यह बहस सच पर है भारी,

हर एक की खुशी को अपनी कहूँ तो खुशी है,

चाहता हूँ, अब इस सच को स्वीकार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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प्यार बांधता, या देता मन को उड़ान है,

हिस्से करता मन के या एक होने का ज्ञान है,

जुड़ूँ अपने मन से और सब को जोड़ पाऊँ,

आज इस भावना का सहज सत्कार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

बीते हुए पड़ाव

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बिछड़े संगी, भूली यादें, छूट चुका वह गाँव,

अनगढ़ जीवन, अटपट बातें, दौड़ना नंगे पाँव,

फिर नये देश में, नये भेष से नये-नये जुड़ाव,

बढ़ते जाने की धुन में खुद ही जुड़ते गये पड़ाव ।

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उन में से कई पड़ाव मुझे अक्सर पुकारते हैं ।

जैसे कोई कहता हो,

चलो कुछ वक्त फिर से वहाँ गुजारते हैं ।

हिचकिचा के मगर मैं ठहर जाता हूँ,

इसमें कहीं कुछ गलत तो नहीं, कर तय नहीं पाता हूँ ।

और बिना इजाजत कुछ करने की आदत जो खो डाली है,

लूँ किससे इजाजत, यह समझ नहीं पाता हूँ ।

कहीं इनके मतलब कोई बुलाने के अलावा तो नहीं,

मासूम पुकार ही हैं, इनमें कोई छलावा तो नहीं ?

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वक्त की रफ्तार, कहते हैं, आगे ही चलती है,

पर जिंदगी तो बहुत सारे रंग बदलती है,

बनाती रहती है अपने साँचे, फिर उन्हीं में ढलती है,

कई बार बीते दिनों में भी पलती है ।

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जो हमें बताया गया है,

कि जिंदगी आगे बढ़ने का ही नाम है,

सच है, पर अधूरा,

बड़ा सच तो यह है कि कोई नहीं जानता,

क्या है इसका सच पूरा,

और सिर्फ होने के अलावा,

क्या इसका कोई काम है ?

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इसे नाम भी हम ही देते हैं,

और मतलब भी हम ही,

कभी पूरा जान नहीं पाते,

पर तय करते हैं क्या गलत है क्या सही ।

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हम इसमें आजादी ढूँढ़ते हैं,

जबकि आजादी जिंदगी को चाहिये होती है,

बढ़ने की, सिमटने की,

दूर होने की, लिपटने की,

बार-बार गिर कर उठने की, आगे बढ़ने की,

बार-बार पीछे मुड़ कर भूली इबारतों को फिर से पढ़ने की ।

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सो बीते पड़ाव जो मुझे पुकारते हैं,

मुझे रोकते नहीं,

मेरी उलझनों सँवारते हैं,

जिन्दगी को बचाते हैं महज एक रफ्तार बनने से,

और बड़ी सफाई से अनदेखे भँवरों के पार उतारते हैं ।

बीता कुछ भी खत्म नहीं होता,

बल्कि जुड़ जाता है,

जिन्दगी का हासिल,

उसी से तो समझ में आता है ।

अपने अपने महाभारत

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समर हैं सब के अपने-अपने,

अपनी नीति, अपना इतिहास,

नियम, न्याय और दण्ड हैं अपने,

अपने संशय और विश्वास ।

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युद्ध कौशल, पौरुष प्रखर,

अंबा, अंबालिका के अपवाद,

भूला ये सब और शरशैया ,

पर सदा भीष्म प्रतिज्ञा याद ।

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कहे सूर्य पुत्र या सूत पुत्र,

रहा जीवन का असमंजस,

कालांतर भी मिटा न पाया,

माता कुंती की पीड़ा, अपयश ।

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द्रोण, द्रुपद, और धृष्टद्युम्न,

हों महा समर की मुख्य कथा,

एकलव्य, अश्वत्थामा किंतु,

विषय रहस्य के, प्रत्यक्ष व्यथा ।

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द्यूत क्रीड़ा और लाक्षागृह,

मायावी इंद्रप्रस्थ के भवन,

याद नहीं, कोई भूल न पाया,

एक वधु का चीर हरण ।

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छल, कौशल, युक्ति, शौर्य की,

करती चकाचौंध गाथाएँ,

पर किशोर अभिमन्यु का वध,

शूल हृदय का, चैन न दे ।

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संदर्भ बिना असंगत लगते,

सारे हठ, प्रण और विद्वेष,

सुना कहीं शोणित से बंधते,

कभी किसी रानी के केश ।

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कितने भिन्न प्रभाव हैं सब पर,

यद्यपि एक रणभेरी की धुन,

कर्ण सदा ही अपने-अपने,

सब के अपने-अपने अर्जुन ।

गति चेतना

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परिधि पर चलते-चलते,

अन्यमनस्क-सा हो रहा था,

कौशल बढ़ रहा था सम्भवत:,

अपना अर्थ परंतु खो रहा था ।

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कारण कोई चेतन प्रयास,

या था अवचेतन की अकर्मण्यता ?

कुछ और नहीं हुआ ज्ञात,

तो इसे नाम प्रारब्ध का दे दिया ।

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निर्विघ्न और निर्विवाद,

शाश्वत आवर्ती यह सम गति,

शांत, शिथिल और सम्मोहक,

पर होती मात्र जड़ पिंडों की ।

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जो भी थे आकर्षण इसके,

हुआ नहीं स्वीकार्य कभी,

उस मोह पाश के विघटन की,

कथा वहीं से शुरू हुई ।

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सहज प्रयास कि सिद्ध करूँ,

चेतना का मैं धारक हूँ,

महा यंत्र का एक अंग नहीं,

कर्ता हूँ, और कारक हूँ ।

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पर पथ विचलन के हेतु,

आवश्यक एक नये बल को,

अंदर ही उत्पन्न करूँ,

या प्राप्त किसी संधान से हो ।

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ऐसे ही क्षण ऊपर देखा,

याचना की, आभार लिया,

कुछ पाने के पहले देने का,

था यह मन का व्यापार नया ।

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विस्मयकारी यज्ञ अनूठा,

बिना ज्ञान सम्पन्न हुआ,

आहूति थी फल के इच्छा की,

सहज जिज्ञासा थी समिधा ।

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पश्चात हवन एक बल ने मुझको,

सक्षमता का स्पर्श दिया,

तोड़ चक्रव्यूह परिधि का,

मैंने चेतना का सम्मान किया ।

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जड़ता से सजग चेतना की,

यात्रा ने अद्भुत चमत्कार किया,

सम्मोहन को विघटित कर,

मन में विश्वास और आभार दिया ।

झंकार

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चारों ओर के अनवरत कोलाहल में ही कहीं,

किसी आवेश के बस मन में छुपा एक तार झंकृत हुआ,

 चेतना का समस्त क्षितिज,

जैसे एक नयी आभा से अलंकृत हुआ,

अचंभित हो स्वाभाविक संशय से घिरने लगा,

सहसा,

मन में कोई द्वंद्व नहीं था,

था एक सरल आभासस जगा,

कि कर के जुड़ने से,

और शीश के झुकने से,

आँखों में नमी आती है,

धड़कनों के वेग में कमी आती है ।

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सत्य को चाहने की शक्ति आती है,

ओझल सुन्दरता दिखने लग जाती है ।

मुझसे सहज जीवन का निर्वाह जो होता है,

हृदय में उस अदृश्य द्रव का प्रवाह जो होता है,

जिससे सारे रुग्ण तंतु सामान्य हो जाते हैं,

विकटतम पराभव की अनुभूति को सह पाते हैं,

गहनतम संघर्ष से नहीं मिलता,

किसी महान मनीषि के परामर्श से नहीं मिलता,

जो मिलता है समर्पण में, जिज्ञासा की व्यथा में,

बहुधा करुणा में, करबद्ध, नत शीश अवस्था में ।

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विचारों की व्यापकता का पहला अनुमान,

अनंत के संभव होने का स्पष्ट प्रमाण,

विस्मयों से भरा सूक्ष्मता का ज्ञान,

मन के उत्तुंग शिखर और धू धू जलते श्मशान,

इन सब की अनुभूति, प्रत्यक्ष या अन्यथा,

तभी मिला जब नयन मुंदे थे, शीश झुका था ।

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मानता हूँ,

यदि इतने पर ही छोड़ दूँ,

तो लगेगा यह कथानक अधूरा,

पर किसी अनुभूति को आत्मसात करना,

क्या होता कभी है पूरा ?

उन्हें जीना अभी शेष है,

जीवन के हर झंकार में,

कुछ न कुछ विशेष है ।

बंधन-उन्मुक्ति

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बंधनों के टूटने से,

बंधनों के छूटने से,

स्वच्छंदता की तरंगें बनती हैं,

जो, आगे चलकर, जीवन के नये आयाम जनती हैं ।

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जिस जगह बंधे होते हैं बंधन के तंतु,

बंधन के हस्ताक्षर वहाँ परंतु,

सदा के लिये ठहर जाते हैं,

कोई भी प्रयास उन्हें मिटा नहीं पाते हैं ।

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ये बंधन के स्मृति चिन्ह,

साक्षी होते हैं सदा के लिये,

उन सारे पथ और मोड़ के,

और उन मृगमरीचिका के,

जिन से हो कर हम जिये ।

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बंधन हमें जड़ से जोड़ते,

जड़ नहीं करते,

हमारे पिछला पता होते हैं,

जिसके स्मरण से हम अज्ञात से नहीं डरते ।

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हर बंधन को ज्ञात है,

कि वह टूटने के लिये ही बना है,

और यह भी कि हर नया गंतव्य,

उसी की एक नयी परिकल्पना है ।

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बंधन से उन्मुक्ति,

सदा बंधन की ऋणी है,

अपनी संतति को आगे बढ़ाती,

बंधन उन्मुक्ति की जननी है ।

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शब्दों में, छंदों में,

सदा हम ऐसा कहने से बचते हैं,

पर बंधन और उसका टूटना,

जीवन को दोनों ही मिलकर रचते हैं ।

कुछ बिम्ब

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भोर का सपना,

थोड़ा याद, थोड़ा भूला हुआ,

जैसे पिछले जनम से कोई आवाज दे,

अगले जनम का कोई संदेश देता हुआ ।

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दिन में दिखता चांद,

जैसे कोई भटका हुआ राही,

डरता हुआ कि कहीं फिर से न हो,

वही तारों की भीड़ और रात की स्याही ।

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मंदिर में जलता अंतिम दिया,

जैसे कहता हो समय से ‘थोड़ा और धीरे’,

सुबह होते ही कोई बुझा देगा,

सूरज की ओर आभार से बार-बार नत होते ।

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फूल की पंखुड़ी पर,

उगती पहली ओस की बूंद,

जैसे हृदय के अछूते कोने में,

करुणा और विश्वास जन्म ले रहे साथ-साथ,

जीवन के सुंदर होने में ।

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मेघ के कोमल गात से,

सहसा चमकी वज्र की रेखा,

मानव की आकांक्षा की सीमा को,

प्रकृति ने अभी कहाँ है देखा ?

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इंद्रधनुष  का वलय खिंचा नभ,

कैसे, क्यों, किसका? अज्ञात,

जैसे सारी सुंदरता पहनकर,

सृष्टि निकली सद्य: स्नात ।

हर क्षण सहज आनंद है

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जब हम आज में कम होते हैं,

बीते दिनों की स्मृतियों में भटकते, खोते हैं,

निश्चय ही यह कहीं से आता एक संदेश है,

कि कम महत्वपूर्ण अब परिवेश है,

अपने अंदर में जो भी समाहित है,

ज्ञात नहीं कितना उचित या अनुचित है,

उनको सजाने का समय आ गया है,

अब स्वयं को पाने का समय आ गया है ।

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जब संग्रह से कुछ न बढ़ता प्रतीत हो,

दे देने से लगता न कुछ व्यतीत हो,

व्यर्थ लगने लगे बीते दिनों की तृष्णा,

मन आगे बढ़ता चले बिना आलोचना,

चलना आवश्यक लगे, दौड़ना अनिवार्य न हो,

आनंद से अधिक कभी धन-धान्यता स्वीकार्य न हो,

तो ज्ञात हो कि जीवन के कुछ अवगुंठन खुल रहे हैं,

कठिन कवच-आवरण इस योद्धा के हो मृदुल रहे हैं ।

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अपेक्षा जब अपना अर्थ खोने लगे,

करुणा क्षमा के बीज बोने लगे,

अपने दंभों पर लज्जा आये, पश्चाताप हो,

आकांक्षाओं को अंदर समेटना अपने आप हो,

सृष्टि में अपना स्थल बनाना न हो संघर्ष का आधार,

हर प्रयत्न इस ओर कि कैसे स्थित प्रतीक का हो परिष्कार,

जब परिमार्जन अर्जन से अधिक रुचिकर लगने लगे,

सम्भवत: आप हैं उचित दिशा में चलने लगे ।

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भोर की तरह ही सुंदर हो सकते है संध्या के परिदृश्य भी,

एक वय में हम अपने गुरु, हम ही अपने शिष्य भी,

क्षितिज के समीप होते, बस उसमें ही समाना चाहते हों,

सामर्थ्य की लालसा नहीं, अब अर्थ पाना चाहते हों,

जीवन अब सरस, सुमधुर, शाश्वत छंद हो,

संधान बस आनंद का, हर क्षण सहज आनंद हो ।

हर पल लगने लगा नया था

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अनजानी राहों पर ठिठक-ठिठक कर,

राह पूछते, हिचक-हिचक कर,

कौतूहल था, और भय भी था,

मन में हल्का संशय भी था,

ज्ञान नहीं था, मान क्या करता,

कुछ होने का दम्भ क्या भरता,

विस्मय से देखता अनंत प्रसार मैं,

बढ़ता ही चला, हो निर्विकार मैं ।

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जगह नयी थी, देश नया था,

आगंतुक होना अच्छा लगता था,

खुले-खुले सपने लगते थे,

कोई न बंधन, सब अपने लगते थे,

था मन पर कोई भार न लगता,

किसी से छुपने का विचार न जगता,

जीवन बहुत सहज लगता था,

स्फूर्त और सजग लगता था ।

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समय कौन-सा, वह जादू क्या था,

पर इससे भी था फर्क क्या पड़ता,

पता नहीं प्रयोजन क्या था,

पर भटकने में एक सम्मोहन-सा था ।

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जी करता था चलता जाऊँ,

इस सुलझे पल को ना उलझाऊँ,

बाकी सब आलोचना है,

जीवन ऐसा ही होने को बना है,

जीवन इस पल के नाम बना दूँ,

बस यहीं इस पर पूर्ण विराम लगा दूँ  ।

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सारी शंकाओं को परे हटा कर,

मन ने ढूँढ लिया था उत्तर,

सहज सरलता कभी मत खोना,

यायावर, विचलित मत होना,

आरोप जटिलता दूर न करते,

दिकभ्रम कभी आशा नहीं भरते,

संधान नव्यता का एक बल है,

जिज्ञासा सदैव निर्मल है,

बिन अपेक्षा का हर उद्यम,

करता सदैव थोड़ा और सक्षम,

विश्वास सहज हर भय हर लेता,

अपने निश्चय से डिगने नहीं देता ।

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जीवन के आयाम बहुत हैं,

हर प्रयास के परिणाम बहुत हैं,

कहीं धवल तो कहीं श्याम है,

कहीं तिरस्कार तो कहीं प्रणाम है,

सुंदर मात्र विशद विविधता ,

‘मन वांछित जीवन’ मरीचिका,

चित को बाल सुलभ किया तो,

लाभ-हानि से दूर जिया तो,

जीवन लगने लगती क्रीड़ा,

थोड़ी सह्य लगती हर पीड़ा ।

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जिये जीवन के जो भी क्षण,

दर्शक बन, आगंतुक बन,

जब याचक सा व्यवहार किया,

जिज्ञासा को मौलिक संस्कार किया,

जो मेरा था देय, दिया,

मधु-गरल सम भाव पिया,

ऐसे जीकर जब आँखें खोली,

भरी-भरी थी मेरी झोली ।

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पग तल के आधार वहाँ थे,

समता के अधिकार वहाँ थे,

आकांक्षा थी, अभिलाषा थी,

जीवन-उद्देश्य की परिभाषा थी,

भाव समर्पण का मधुर मदिर,

चित्त को कर गया स्थिर,

भय अब उर से निकल गया था,

हर पल लगने लगा नया था

मन घर भी है, मन आंगन भी

दीवार, छत, द्वार, दहलीज,

मन घर भी है, मन आंगन भी,

उन्मुक्त गगन का सपना भी है,

और उन सपनों का बंधन भी ।

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पग के नीचे सौम्य धरातल,

ऊपर स्वच्छंद उन्मुक्त गगन,

कैलाश, कुरुक्षेत्र, वैतरणी,

तप, हवन, य़ज्ञ और चंदन भी ।

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स्मित हास और अट्टहास भी,

कभी संदेश, कभी संवाद,

एक साथ सब मन के अंदर,

अश्रु, हास और क्रंदन भी ।

.

अमूर्त, अस्फुट, बीज भाव के,

जब भी उगें, संरक्षण उनका,

बचा-बचा कर अतिरेकों से,

करता पालन-पोषण, सिंचन भी ।

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जलें, बुझें असंख्य भाव पर,

जड़ता कभी स्वीकार्य नहीं,

विपरीत सही पर भिन्न मतों का,

विच्छेदन और विश्लेषण भी ।

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सूक्ष्म संवेदना, गहन अनुभूति,

दुर्लभ अलौकिकता का रोमांच,

इस प्रांगण सब संग क्रीड़ारत,

युद्ध, पलायन, विचरण भी ।

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संतोष यहीं, संताप यहीं पर,

हर विद्रूप, विपर्यय का घर,

सुंदरता का निर्माण यहीं हो,

यहीं कुटिलता का नर्तन भी ।

.

बंधुत्व भाव, सहयोग सखावत,

मूल्यों पर जीवन का उत्सर्ग,

क्षणिक आवेश में सर्वस्व स्वाहा,

और शून्य-अनंत का मंथन भी ।

.

स्वयं ही बनते, टूटते बुदबुद,

और समगति प्रवाह की धीर नदी,

अनियंत्रित गर्जन, नाद प्रलय का,

और निस्सहाय चित्त का स्तवन भी ।

.

आश्चर्य नहीं कि इस गह्वर से,

छल, क्षद्म, घात भी जनमे हैं,

रूप उकेरने के लिये पटल पर,

आवश्यक प्रतिरूप का अंकन भी ।

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यह मूल्य भी नव निर्माण का,

सदैव स्वीकारे यह नि:संकोच,

घाटी से होकर ही प्रशस्त,

मार्ग शिखर के आरोहन की ।

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ऋणी ऋणात्मक भावों का

कि सत्य उजागर है सम्मुख,

तम के घर्षण से प्रकाश कर,

आलोकित पथ उन्नयन की ।