अंश तुम्हारा

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तुमने मुझको मन दिया,

हृदय और स्पंदन दिया,

भाव दिये, संवेदना दी,

जुड़ पाने की भावना दी,

पैरों तले आधार दिया,

स्वप्नों को गगन का विस्तार दिया,

गति और नियंत्रण संग-संग दिया,

गहने को अपना अवलम्ब दिया,

चेतना दी, अनुराग दिया,

ध्वनि, प्रकाश और राग दिया,

जीवन के अद्भुत रंग दिये,

असीमित उल्लास, उमंग दिये ।

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बुद्धि दी, विवेक दिया,

संयम और अतिरेक दिया,

चिंतन की शक्ति और तर्क दिया,

तप, साधना का सम्पर्क दिया,

अपने ही विश्लेषण की शक्ति दी,

प्रेम दिया और भक्ति दी,

जिज्ञासा का आकाश दिया,

रचनाधर्मिता और प्रयास दिया,

नव चिंतन और आविष्कार दिया,

नीति, न्याय और संस्कार दिया,

अपने अंक का पाश दिया,

चेतना का प्रकाश दिया,

समाज दिया, संयास दिया,

और अपने ऊपर विश्वास दिया ।

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आश्चर्य, कहाँ छल को जाना,

शक्ति भौतिक बल को माना,

कैसे पाये तृष्णा के विकार,

क्यों रुचिकर लगने लगा अहंकार,

घर से चला अच्छा बनने पर,

बड़ा बनना क्यों लगा महत्तर,

आगे बढ़ना कर्तव्य परम था,

क्यों पीछे छोड़ना स्वभाव बन गया,

मिथ्या क्यों हो गया परिष्कार,

झुकने लगी नैतिकता बारम्बार,

सारा अस्तित्व अर्थहीन और निराधार,

स्वीकार्य हुआ कैसे मन का यह अंधकार,

अब अच्छा हूँ यह कह नहीं सकता,

मन घिरती असहज व्याकुलता,

पर मन अबोध शिशु एक अभी भी गाता,

शेष है आशा, कहता जाता ।

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असहनीय है यह भाव पराभव,

पर विश्वास कि तुम हो तो है सम्भव,

दोष कहाँ ये घर कर आये,

क्यों हम उन्हें पहचान न पाये,

पर प्रकाश एक अब भी है जलता,

तेरी करुणा में विश्वास एक पलता,

दे दो निवारण और समाधान,

समेट पाऊँ बिखरा स्वाभिमान,

अंश तुम्हारा होने का,

रख पाऊँ फिर से सम्मान ।

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शाम

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शामें भी अजीब होती हैं,

जीने की शर्तों को पूरा करने में,

दिन भर का थका-माँदा  तन,

दो पल बेफिक्री के गुजार कर,

घर लौटना चाहता है,

अपनी चारपाई पर लेट पाने को,

चिर परिचित महक की आगोश में,

बेसुध हो सो जाने को,

कि अचानक,

दिन भर की उलझनें भी प्यारी लगने लगती है,

थकान एक मीठे दर्द-सा महसूस होती है,

जिससे कोई शिकायत नहीं होती है,

बल्कि उस पर गर्व होता है,

क्योंकि वही तो दिन भर की कमाई होती है,

बाकी तो सब खर्च हो चुका होता है,

दिन की रोशनी की तरह,

और बेचारा आदमी,

इस उलझन में,

कि रोजमर्रा का सुकून बेहतर है,

या फिर से एक बार लापरवाही में भटकना,

और फिर वह अपने अंदर ही बँट जाता है,

अंत में कुछ कल के लिये छोड़,

आज की बाहों में सिमट जाता है ।

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शामें सचमुच अजीब होती हैं,

घर जाना एक साथ

बुलावा भी लगता है,

और छलावा भी,

बंधन भी लगता है,

और कल के लिये ईंधन भी,

कुछ ऐसा जो बांध के रख सकता है,

सदा-सदा के लिये,

अपने माया जाल में,

अपने हैरतअंगेज सवाल में,

आने वाले कल के सम्भावित प्रस्फुटन में,

और बीते कल के असहज सम्मोहन में ।

मन तय नहीं कर पाता,

कि इस आकर्षण को स्वीकार करे,

और इसमें समा जाये,

या बची हुई ऊर्जा को लगा दे,

ढूँढ ले एक जगह जो सारे आकर्षण से परे हो,

और वहाँ चला जाये।

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दोनों ही स्थिति,

चाहे जितनी भी अलग हों,

कोई फर्क नहीं पड़ता दुनिया के व्यापार में,

कुछ उसी तरह जैसे,

एक दिन की शाम हो, या जिन्दगी की,

बहुत कम अंतर होता है,

मन में उठती भावनाओं के ज्वार में ।

मन के उच्छवास

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लहरों की लालिमा,

नभ में बिखरे रंगों से नहीं,

बहती धारा के उमंगों से नहीं,

शाम के सूरज की किरणों से खेलती,

हवा के छूने से उठती जल के तरंगों से बनी ।

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मन के उच्छवास,

मात्र परिवेश पर नियंत्रण या अधिकार से नहीं,

जीवन की गति, नियति और आधार से नहीं,

अवस्था चित्त के आनंद की सदा ही,

अपेक्षा और प्रतिफल के संतुलनऔर स्वीकार से बनी ।

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नीरवता चारों ओर,

अन्यमनस्क मन, भाव विहीन,

असह्य शिथिलता, कुछ भी ना नवीन,

सहसा एक विस्मृत स्मरण कौंध कर,

कर जाता चित्त को आनंद में आसीन ।

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मन के आनंद,

प्राप्त लक्ष्य की उन्मत्त भावनाओं  से परे हैं,

कल की सुखद परिकल्पनाओं से परे हैं,

शायद मन का अनुरंजन हर पल में छुपी,

संभावनाओं के असीमित रहस्य से भरे हैं ।

अब थोड़ी देर सो ले

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बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,

समय ने कुछ कहा,

और चला गया ।

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बहुत ही मृदुल पल था,

स्पंदन विहीन, उत्तेजना से परे,

सारा अस्तित्व कहता रहा,

ऐसा ही ठहर, कुछ और पहर,

ना जाने क्यों मैं सजग हो,

उसमें अर्थ की संभावना ढूँढने लगा ।

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वह विस्तार था या गति थी,

अर्धचेतना के धुँधलके में,

तय नहीं कर पाया,

चल पड़ा मैं पीछे-पीछे,

अपने ही सम्मोहन में ।

.

बहुत काल बीते,

समझ नहीं पाया,

यह कोई यात्रा थी,

या अकारण एक प्रवाह,

पर गंतव्य के अज्ञान में,

कितनी सहज थी जीवन की गति ।

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पथ की पगडंडियाँ थीं,

या कौतूहल के भरमाते सुरंग,

किन राहों से गुजरा समय,

कभी संग ले, कभी अपने गर्भ में धर,

बार-बार सोता जगता रहा,

अपनी ही वेदना की हिमशिला पर ।

चरम सार्थकता और अर्थहीनता के बीच,

एक पतली लकीर नहीं,

पूरा जीवन ही होता है,

बहुत देर चलो तो,

वहीं पहुँच जाते हो जहाँ से चले थे ।

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पर चलने की क्या माया है,

कि गति और मति एक दूसरे को,

समझ नहीं पाते हैं,

उलझ-उलझ सुलझाते और

सुलझ-सुलझ उलझाते हैं ।

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एक पल को जब सब कुछ छोड़ दिया,

मन की गति को अंदर की ओर मोड़ लिया,

तो स्पष्ट हुआ,

कि बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,

समय ने क्या कहा,

उसने कहा,

अभी कुछ पल सब कुछ ठहरने दे,

मूंद ले नयन और अपने को,

अनंत विस्तार में खो ले,

बहुत चल चुका मतिभ्रम में,

अब थोड़ी देर सो ले,

और फिर वह चला गया ।

संवेदनाएँ और हम

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संवेदनाएँ जब स्थूल होने लगती हैं,

अधिक जगह लेती हैं,

मन थोड़े से ही भर जाता है,

और कोई समझाता है,

चले चलो, ऐसा ही होता आया है,

इससे अधिक किसी ने नहीं पाया है ।

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संवेदनाएँ जब आकार लेने लगती हैं,

हृदय में समा नहीं पाती हैं,

इसके जो हिस्से बाहर पड़े रहते हैं,

किसी आकलन में हम उन्हें अनावश्यक कहते हैं,

फिर उन्हें काट कर अलग कर देते हैं,

और एक जरूरी काम पूरा हुआ मान लेते हैं ।

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संवेदनाएँ जब विषम होने लगती है,

जहाँ से भी गुजरती है,

अपने खुरदरेपन से निशान छोड़ती जाती हैं,

और धीरे-धीरे हम उनके सम्पर्क से दूर होने लगते है,

और अपने को समझाने के लिये मन में,

उनकी जगह नये-नये विचार बोने लगते हैं ।

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संवेदनाएँ जब असहज होने लगती हैं,

रंग बदलती हुए जीती हैं,

और अपने अर्थ खोने लगती है,

फिर तो कई बार,

उन्हें हम खुद नहीं पहचान पाते हैं,

और किसी मोड़ पर अचानक उनसे सामना हो जाये,

तो बड़ी सफाई से नजर चुरा कर आगे निकल जाते हैं ।

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प्रश्न यह नहीं कि संवेदनाएँ,

स्थूल क्यों हो जाते हैं,

आकार में ढलने की उनमें प्रवृत्ति कहाँ से आती है,

आरम्भ में इतने स्निग्ध होते हैं,

तो इतने विषम और रुक्ष क्यों हो जाते हैं,

और अंतत: कौन भरता इनमें वह असहजता,

जिसके होने का हमें पता भी नहीं चलता ।

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स्वाभाविक है,

क्यों कि संवेदनाएँ भी उसी परिवेश में पलती हैं,

जो हमारे चारों ओर हैं,

हमारे संग वह भी नये-नये साँचे में ढलती है ।

प्रश्न सनातन यह है कि किस यत्न से हमने इन्हें पाला है,

हमारा बदलना तो तय था,

कितनी शुचिता से हमने संवेदनाओं को सम्हाला है।

अब जिंदगी से प्यार कर लूँ

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सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ,

बनी बनायी लीक को छोड़ दूँ,

एक पगडंडी अपनी तैयार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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मिल गयी है जिंदगी, तो जीये जा रहे हैं,

आखिर क्यों, के सवालों से कतरा रहे हैं,

देख लिये मौजूदा, अपने चलन बना कर,

इस जिंदगी से आँखें दो चार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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पा लेना, जीने का मतलब बन गया था,

जीत पाऊँ जहाँ, उस शहर को ढूँढ़ता था,

देने की खुशी क्या है, दिया तो पता चला,

अब लेने से अधिक देने का विचार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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खुशी छुपी कहाँ, तलाश अब भी है जारी,

अपनी है या परायी यह बहस सच पर है भारी,

हर एक की खुशी को अपनी कहूँ तो खुशी है,

चाहता हूँ, अब इस सच को स्वीकार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

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प्यार बांधता, या देता मन को उड़ान है,

हिस्से करता मन के या एक होने का ज्ञान है,

जुड़ूँ अपने मन से और सब को जोड़ पाऊँ,

आज इस भावना का सहज सत्कार कर लूँ ।

सोचता हूँ, अब जिंदगी से प्यार कर लूँ ।

बीते हुए पड़ाव

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बिछड़े संगी, भूली यादें, छूट चुका वह गाँव,

अनगढ़ जीवन, अटपट बातें, दौड़ना नंगे पाँव,

फिर नये देश में, नये भेष से नये-नये जुड़ाव,

बढ़ते जाने की धुन में खुद ही जुड़ते गये पड़ाव ।

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उन में से कई पड़ाव मुझे अक्सर पुकारते हैं ।

जैसे कोई कहता हो,

चलो कुछ वक्त फिर से वहाँ गुजारते हैं ।

हिचकिचा के मगर मैं ठहर जाता हूँ,

इसमें कहीं कुछ गलत तो नहीं, कर तय नहीं पाता हूँ ।

और बिना इजाजत कुछ करने की आदत जो खो डाली है,

लूँ किससे इजाजत, यह समझ नहीं पाता हूँ ।

कहीं इनके मतलब कोई बुलाने के अलावा तो नहीं,

मासूम पुकार ही हैं, इनमें कोई छलावा तो नहीं ?

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वक्त की रफ्तार, कहते हैं, आगे ही चलती है,

पर जिंदगी तो बहुत सारे रंग बदलती है,

बनाती रहती है अपने साँचे, फिर उन्हीं में ढलती है,

कई बार बीते दिनों में भी पलती है ।

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जो हमें बताया गया है,

कि जिंदगी आगे बढ़ने का ही नाम है,

सच है, पर अधूरा,

बड़ा सच तो यह है कि कोई नहीं जानता,

क्या है इसका सच पूरा,

और सिर्फ होने के अलावा,

क्या इसका कोई काम है ?

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इसे नाम भी हम ही देते हैं,

और मतलब भी हम ही,

कभी पूरा जान नहीं पाते,

पर तय करते हैं क्या गलत है क्या सही ।

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हम इसमें आजादी ढूँढ़ते हैं,

जबकि आजादी जिंदगी को चाहिये होती है,

बढ़ने की, सिमटने की,

दूर होने की, लिपटने की,

बार-बार गिर कर उठने की, आगे बढ़ने की,

बार-बार पीछे मुड़ कर भूली इबारतों को फिर से पढ़ने की ।

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सो बीते पड़ाव जो मुझे पुकारते हैं,

मुझे रोकते नहीं,

मेरी उलझनों सँवारते हैं,

जिन्दगी को बचाते हैं महज एक रफ्तार बनने से,

और बड़ी सफाई से अनदेखे भँवरों के पार उतारते हैं ।

बीता कुछ भी खत्म नहीं होता,

बल्कि जुड़ जाता है,

जिन्दगी का हासिल,

उसी से तो समझ में आता है ।

अपने अपने महाभारत

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समर हैं सब के अपने-अपने,

अपनी नीति, अपना इतिहास,

नियम, न्याय और दण्ड हैं अपने,

अपने संशय और विश्वास ।

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युद्ध कौशल, पौरुष प्रखर,

अंबा, अंबालिका के अपवाद,

भूला ये सब और शरशैया ,

पर सदा भीष्म प्रतिज्ञा याद ।

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कहे सूर्य पुत्र या सूत पुत्र,

रहा जीवन का असमंजस,

कालांतर भी मिटा न पाया,

माता कुंती की पीड़ा, अपयश ।

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द्रोण, द्रुपद, और धृष्टद्युम्न,

हों महा समर की मुख्य कथा,

एकलव्य, अश्वत्थामा किंतु,

विषय रहस्य के, प्रत्यक्ष व्यथा ।

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द्यूत क्रीड़ा और लाक्षागृह,

मायावी इंद्रप्रस्थ के भवन,

याद नहीं, कोई भूल न पाया,

एक वधु का चीर हरण ।

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छल, कौशल, युक्ति, शौर्य की,

करती चकाचौंध गाथाएँ,

पर किशोर अभिमन्यु का वध,

शूल हृदय का, चैन न दे ।

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संदर्भ बिना असंगत लगते,

सारे हठ, प्रण और विद्वेष,

सुना कहीं शोणित से बंधते,

कभी किसी रानी के केश ।

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कितने भिन्न प्रभाव हैं सब पर,

यद्यपि एक रणभेरी की धुन,

कर्ण सदा ही अपने-अपने,

सब के अपने-अपने अर्जुन ।

गति चेतना

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परिधि पर चलते-चलते,

अन्यमनस्क-सा हो रहा था,

कौशल बढ़ रहा था सम्भवत:,

अपना अर्थ परंतु खो रहा था ।

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कारण कोई चेतन प्रयास,

या था अवचेतन की अकर्मण्यता ?

कुछ और नहीं हुआ ज्ञात,

तो इसे नाम प्रारब्ध का दे दिया ।

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निर्विघ्न और निर्विवाद,

शाश्वत आवर्ती यह सम गति,

शांत, शिथिल और सम्मोहक,

पर होती मात्र जड़ पिंडों की ।

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जो भी थे आकर्षण इसके,

हुआ नहीं स्वीकार्य कभी,

उस मोह पाश के विघटन की,

कथा वहीं से शुरू हुई ।

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सहज प्रयास कि सिद्ध करूँ,

चेतना का मैं धारक हूँ,

महा यंत्र का एक अंग नहीं,

कर्ता हूँ, और कारक हूँ ।

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पर पथ विचलन के हेतु,

आवश्यक एक नये बल को,

अंदर ही उत्पन्न करूँ,

या प्राप्त किसी संधान से हो ।

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ऐसे ही क्षण ऊपर देखा,

याचना की, आभार लिया,

कुछ पाने के पहले देने का,

था यह मन का व्यापार नया ।

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विस्मयकारी यज्ञ अनूठा,

बिना ज्ञान सम्पन्न हुआ,

आहूति थी फल के इच्छा की,

सहज जिज्ञासा थी समिधा ।

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पश्चात हवन एक बल ने मुझको,

सक्षमता का स्पर्श दिया,

तोड़ चक्रव्यूह परिधि का,

मैंने चेतना का सम्मान किया ।

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जड़ता से सजग चेतना की,

यात्रा ने अद्भुत चमत्कार किया,

सम्मोहन को विघटित कर,

मन में विश्वास और आभार दिया ।

झंकार

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चारों ओर के अनवरत कोलाहल में ही कहीं,

किसी आवेश के बस मन में छुपा एक तार झंकृत हुआ,

 चेतना का समस्त क्षितिज,

जैसे एक नयी आभा से अलंकृत हुआ,

अचंभित हो स्वाभाविक संशय से घिरने लगा,

सहसा,

मन में कोई द्वंद्व नहीं था,

था एक सरल आभासस जगा,

कि कर के जुड़ने से,

और शीश के झुकने से,

आँखों में नमी आती है,

धड़कनों के वेग में कमी आती है ।

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सत्य को चाहने की शक्ति आती है,

ओझल सुन्दरता दिखने लग जाती है ।

मुझसे सहज जीवन का निर्वाह जो होता है,

हृदय में उस अदृश्य द्रव का प्रवाह जो होता है,

जिससे सारे रुग्ण तंतु सामान्य हो जाते हैं,

विकटतम पराभव की अनुभूति को सह पाते हैं,

गहनतम संघर्ष से नहीं मिलता,

किसी महान मनीषि के परामर्श से नहीं मिलता,

जो मिलता है समर्पण में, जिज्ञासा की व्यथा में,

बहुधा करुणा में, करबद्ध, नत शीश अवस्था में ।

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विचारों की व्यापकता का पहला अनुमान,

अनंत के संभव होने का स्पष्ट प्रमाण,

विस्मयों से भरा सूक्ष्मता का ज्ञान,

मन के उत्तुंग शिखर और धू धू जलते श्मशान,

इन सब की अनुभूति, प्रत्यक्ष या अन्यथा,

तभी मिला जब नयन मुंदे थे, शीश झुका था ।

.

मानता हूँ,

यदि इतने पर ही छोड़ दूँ,

तो लगेगा यह कथानक अधूरा,

पर किसी अनुभूति को आत्मसात करना,

क्या होता कभी है पूरा ?

उन्हें जीना अभी शेष है,

जीवन के हर झंकार में,

कुछ न कुछ विशेष है ।