आगे बढ़ते हुए

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आगे बढ़ने से अधिक, आगे दिखने की परवाह हो,

अपनी जीत से अधिक दूसरों की हार की चाह हो,

अपने से अधिक आसान दिखती दूसरों की राह हो,

संवेदनाओं का सतत अपनी ही ओर प्रवाह हो,

यदि विवेक समेट अपने अंदर झाँक पायेगा,

तो अपना प्रतिबिंब तुझे टेढ़ा नजर आयेगा ।

क्षीण होता जा रहा हो सब के कल्याण में विश्वास,

हर हाल में सही लगे अपने मन में जगती प्यास,

अपने से छोटा लगने लगे औरों के ऊपर के आकाश,

न्याय से अधिक सुंदर लगें तिरछे तर्कों के विन्यास,

जरा ठहर, क्या तुझसे पीछे मुड़ देखना हो पायेगा,

तुम्हारा चेहरा कई सारे सवाल लिये नजर आयेगा ।

कौतूहल और जिज्ञासा लगें वृथा के भाव,

यात्रा से अधिक रुचिकर लगने लगे पड़ाव,

उन्मुक्ति भयभीत करे, हो बंधन से जुड़ाव,

स्थिरता आकर्षित करे, व्यर्थ लगे बहाव,

इन संकेतों के अर्थ यदि समझ पाओ,

अब भी सम्भव है कि फिर से तुम बदल जाओ ।

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कभी नहीं झुठलाओगे

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सपना था या सम्मोहन,

निर्बाध गति या जड़ता का बंधन,

मन उस क्षण को जान न पाया,

थोड़ा झिझका और फिर पूछ लिया,

क्या हो तुम बतलाओगे,

छू लूँ यदि  तुमको,

तो तुम बदल तो न जाओगे?

.

सुरभित नीरवता चारों ओर,

हर दृष्टि अचंभित, भाव विभोर,

पग तल धरती, पर भार नहीं,

साक्षात सुंदरता, पर कोई आकार नहीं,

यह क्या है,

अस्तित्व का कौन-सा आयाम,

विकल कि यह क्षण-भंगुर ही होगा,

जिज्ञासा वश पूछ ही डाला,

तुम्हें अपना कह बाँहों में भर लूँ,

क्या इतने निकट कभी आ पाओगे,

मेरे पास आते ही सिमट तो न जाओगे?

.

प्रज्वलित दिगंत, दृग से उठते अंगार,

स्तब्ध प्रकृति, गूँजती प्रत्यंचा की टंकार,

शौर्य धधकता दावानल-सा,

नये सृजन का ज्वर सर चढ़ता,

कोई बार-बार अंतर्मन में कहता,

यही तो तुमने चाहा था,

अब क्या दुविधा, अब क्या बाधा,

पर मन कहता तनिक ठहर,

मैं अपनी साँसें समेट लूँ,

कृतज्ञता का ज्ञापन कर लूँ,

और फिर तेरे संग चलूँ,

क्या इतनी प्रतीक्षा मेरी कर पाओगे,

मुझे छोड़ तिरोहित तो न हो जाओगे?

.

जीवन से परिचय सम्पूर्ण नहीं,

यदि उन प्रदेश से सम्पर्क नहीं,

जहाँ नीरवता हो गुंजायमान,

आभिजात्य समक्ष हो मूर्तिमान,

शौर्य सहचर नवनिर्माण का,

संशय बल दे समाधान का ।

.

स्पर्श, आलिंगन या सम्मोहन,

जिज्ञासा, स्नेह या सहज आकर्षण,

प्रेरित करते जुड़ने को सृष्टि के महा प्रवाह से,

एक होने को अनंत और अथाह से,

हर विस्मय और हर कौतुक,

जीवन के उतने ही शाश्वत रंग हैं,

जितने शौर्य और संवेदना इसके अंग हैं,

ऐसा मान कर चलूँ तो साथ तुम आओगे,

जानता हूँ कि तुम मेरे विश्वास को कभी नहीं झुठलाओगे

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विकल्प

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बँधी लीक से पहला विचलन,

था मेरा निर्णय या भव की माया,

क्यों उलझूँ इस विश्लेषण में,

प्रत्यक्ष हूँ प्रस्तुत, जो हो पाया,

चाहे जिस भी राह चला मैं,

संताप नहीं क्या खो आया,

संतोष यही कि हर बाधा से,

कुंठा मुक्त हो लड़ पाया ।

.

यह स्थल और यह पल मेरा,

अपनी हर गति का निर्माता मैं,

आराध्य कृतज्ञ तेरी करुणा का,

नहीं उसके बिना कुछ कर पाता मैं,

पर सारा जीवन कर्म बस मेरा,

यह कहते नहीं अघाता मैं,

और अंश हूँ तेरा स्वयं को मानता,

और इससे भी नहीं लजाता मैं ।

.

विकल्प है सम्मुख हर पल, हर क्षण,

मतिभ्रम में कहते हम विचलन,

जीवन जब भी प्रस्तुत करता,

कोई आड़ोलन या स्पंदन,

वस्तुत: अवसर दे करता प्रेरित,

करने जीवन का अभिनंदन,

निर्माण करें हम अपने जग का,

निज हाथों से गढ़ लें जीवन ।

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मैं ने तुमको फिर देखा

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मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे,

मैं भ्रमित हुआ कहीं देख रहा था,

मुझे पास खड़े तुम निहार रहे थे ।

.

मैं कल की चिंता में खोया,

तुम आज के कौतुक दिखा रहे थे,

भव के भय से पग थे दुर्बल,

तुम ज्ञान धैर्य के सिखा रहे थे ।

.

किसी मार्ग पर भटक रहा मैं,

खोज रहा था कोई परिचित छाया,

विपरीत मेरी व्याकुलता के तुम,

बता रहे थे यथार्थ की माया ।

.

मैं संधि और विग्रह में उलझा था,

सूक्ष्म विवेचन की थी आशा,

तुम अपने ही मन की करते,

लिख दी अनिश्चितता की परिभाषा ।

.

अज्ञेय, तुझे आराध्य मान कर,

मान चला था पक्षधर निज का,

पर पक्ष यदि मेरा धरते तो, कौन

निर्पेक्ष विमर्शक होता मेरा ?

.

हित अनहित की कथा कहूँ क्या,

तुम कर मेरा संचार रहे थे,

मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे ।

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अंश परम के

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क्यों भ्रमित मैं ऐसे हो रहा हूँ,

दिशा ज्ञान क्यों खो रहा हूँ,

किन वस्तुओं को दूर कर रहा,

और किन को संजो रहा हूँ ?

.

जीवन निर्धारण नीति कर रही,

न्याय लुप्त विश्लेषण में,                

घट ज्ञान का भरते-भरते,

विवेक भ्रमित अन्वीक्षण में ?

.

सृजन के संवेग को सम्हालता,

क्यों कर्म सदा विचलित होता,

हित और अपहित की व्याख्या में,

क्यों बल-कौशल बाधित होता ?

.

क्यों जीवन की रण भूमि में,

स्याह रंग अधिक दिखते हैं,

स्वेद और शोणित घुल मिल कर,

पीड़ा की गाथा क्यों लिखते हैं ?

.

क्यों कल्याण शोध में चलते पग,

हो वशीभूत किसी सम्मोहन से,

होते मात्र क्षण भर को विचलित,

और हम दूर लक्ष्य आरोहन से ।

.

मन की विधियाँ हैं दुरूह,

पर मन की क्रिया असंभव-सी,

रचना सब कुछ सुंदर है लक्ष्य, पर

चाहे कीर्ति, मान और वैभव भी ।

.

शोध सृष्टि की और अमरता,

और छूना हम चाहें आकाश,

परंतु पल-पल कसें कसौटी,

अपनी ही आस्था और विश्वास ।

.

उन्मुक्तता वह मूल बिंदु है,

चेतना जहाँ से पाता विस्तार,

पर उद्देश्य यदि नहीं व्यापक तो,

करते मलिन इनको विकार ।

.

भुज की शक्ति या विचार की,

हैं मात्र ऊर्जा और उपादान,

नियंत्रक सब के तुम ही चेतन,

अंश परम के, विधाता के वरदान ।  

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अंश तुम्हारा

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तुमने मुझको मन दिया,

हृदय और स्पंदन दिया,

भाव दिये, संवेदना दी,

जुड़ पाने की भावना दी,

पैरों तले आधार दिया,

स्वप्नों को गगन का विस्तार दिया,

गति और नियंत्रण संग-संग दिया,

गहने को अपना अवलम्ब दिया,

चेतना दी, अनुराग दिया,

ध्वनि, प्रकाश और राग दिया,

जीवन के अद्भुत रंग दिये,

असीमित उल्लास, उमंग दिये ।

.

बुद्धि दी, विवेक दिया,

संयम और अतिरेक दिया,

चिंतन की शक्ति और तर्क दिया,

तप, साधना का सम्पर्क दिया,

अपने ही विश्लेषण की शक्ति दी,

प्रेम दिया और भक्ति दी,

जिज्ञासा का आकाश दिया,

रचनाधर्मिता और प्रयास दिया,

नव चिंतन और आविष्कार दिया,

नीति, न्याय और संस्कार दिया,

अपने अंक का पाश दिया,

चेतना का प्रकाश दिया,

समाज दिया, संयास दिया,

और अपने ऊपर विश्वास दिया ।

.

आश्चर्य, कहाँ छल को जाना,

शक्ति भौतिक बल को माना,

कैसे पाये तृष्णा के विकार,

क्यों रुचिकर लगने लगा अहंकार,

घर से चला अच्छा बनने पर,

बड़ा बनना क्यों लगा महत्तर,

आगे बढ़ना कर्तव्य परम था,

क्यों पीछे छोड़ना स्वभाव बन गया,

मिथ्या क्यों हो गया परिष्कार,

झुकने लगी नैतिकता बारम्बार,

सारा अस्तित्व अर्थहीन और निराधार,

स्वीकार्य हुआ कैसे मन का यह अंधकार,

अब अच्छा हूँ यह कह नहीं सकता,

मन घिरती असहज व्याकुलता,

पर मन अबोध शिशु एक अभी भी गाता,

शेष है आशा, कहता जाता ।

.

असहनीय है यह भाव पराभव,

पर विश्वास कि तुम हो तो है सम्भव,

दोष कहाँ ये घर कर आये,

क्यों हम उन्हें पहचान न पाये,

पर प्रकाश एक अब भी है जलता,

तेरी करुणा में विश्वास एक पलता,

दे दो निवारण और समाधान,

समेट पाऊँ बिखरा स्वाभिमान,

अंश तुम्हारा होने का,

रख पाऊँ फिर से सम्मान ।

.

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शाम

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शामें भी अजीब होती हैं,

जीने की शर्तों को पूरा करने में,

दिन भर का थका-माँदा  तन,

दो पल बेफिक्री के गुजार कर,

घर लौटना चाहता है,

अपनी चारपाई पर लेट पाने को,

चिर परिचित महक की आगोश में,

बेसुध हो सो जाने को,

कि अचानक,

दिन भर की उलझनें भी प्यारी लगने लगती है,

थकान एक मीठे दर्द-सा महसूस होती है,

जिससे कोई शिकायत नहीं होती है,

बल्कि उस पर गर्व होता है,

क्योंकि वही तो दिन भर की कमाई होती है,

बाकी तो सब खर्च हो चुका होता है,

दिन की रोशनी की तरह,

और बेचारा आदमी,

इस उलझन में,

कि रोजमर्रा का सुकून बेहतर है,

या फिर से एक बार लापरवाही में भटकना,

और फिर वह अपने अंदर ही बँट जाता है,

अंत में कुछ कल के लिये छोड़,

आज की बाहों में सिमट जाता है ।

.

शामें सचमुच अजीब होती हैं,

घर जाना एक साथ

बुलावा भी लगता है,

और छलावा भी,

बंधन भी लगता है,

और कल के लिये ईंधन भी,

कुछ ऐसा जो बांध के रख सकता है,

सदा-सदा के लिये,

अपने माया जाल में,

अपने हैरतअंगेज सवाल में,

आने वाले कल के सम्भावित प्रस्फुटन में,

और बीते कल के असहज सम्मोहन में ।

मन तय नहीं कर पाता,

कि इस आकर्षण को स्वीकार करे,

और इसमें समा जाये,

या बची हुई ऊर्जा को लगा दे,

ढूँढ ले एक जगह जो सारे आकर्षण से परे हो,

और वहाँ चला जाये।

.

दोनों ही स्थिति,

चाहे जितनी भी अलग हों,

कोई फर्क नहीं पड़ता दुनिया के व्यापार में,

कुछ उसी तरह जैसे,

एक दिन की शाम हो, या जिन्दगी की,

बहुत कम अंतर होता है,

मन में उठती भावनाओं के ज्वार में ।

मन के उच्छवास

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लहरों की लालिमा,

नभ में बिखरे रंगों से नहीं,

बहती धारा के उमंगों से नहीं,

शाम के सूरज की किरणों से खेलती,

हवा के छूने से उठती जल के तरंगों से बनी ।

.

मन के उच्छवास,

मात्र परिवेश पर नियंत्रण या अधिकार से नहीं,

जीवन की गति, नियति और आधार से नहीं,

अवस्था चित्त के आनंद की सदा ही,

अपेक्षा और प्रतिफल के संतुलनऔर स्वीकार से बनी ।

.

नीरवता चारों ओर,

अन्यमनस्क मन, भाव विहीन,

असह्य शिथिलता, कुछ भी ना नवीन,

सहसा एक विस्मृत स्मरण कौंध कर,

कर जाता चित्त को आनंद में आसीन ।

.

मन के आनंद,

प्राप्त लक्ष्य की उन्मत्त भावनाओं  से परे हैं,

कल की सुखद परिकल्पनाओं से परे हैं,

शायद मन का अनुरंजन हर पल में छुपी,

संभावनाओं के असीमित रहस्य से भरे हैं ।

अब थोड़ी देर सो ले

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बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,

समय ने कुछ कहा,

और चला गया ।

.

बहुत ही मृदुल पल था,

स्पंदन विहीन, उत्तेजना से परे,

सारा अस्तित्व कहता रहा,

ऐसा ही ठहर, कुछ और पहर,

ना जाने क्यों मैं सजग हो,

उसमें अर्थ की संभावना ढूँढने लगा ।

.

वह विस्तार था या गति थी,

अर्धचेतना के धुँधलके में,

तय नहीं कर पाया,

चल पड़ा मैं पीछे-पीछे,

अपने ही सम्मोहन में ।

.

बहुत काल बीते,

समझ नहीं पाया,

यह कोई यात्रा थी,

या अकारण एक प्रवाह,

पर गंतव्य के अज्ञान में,

कितनी सहज थी जीवन की गति ।

.

पथ की पगडंडियाँ थीं,

या कौतूहल के भरमाते सुरंग,

किन राहों से गुजरा समय,

कभी संग ले, कभी अपने गर्भ में धर,

बार-बार सोता जगता रहा,

अपनी ही वेदना की हिमशिला पर ।

चरम सार्थकता और अर्थहीनता के बीच,

एक पतली लकीर नहीं,

पूरा जीवन ही होता है,

बहुत देर चलो तो,

वहीं पहुँच जाते हो जहाँ से चले थे ।

.

पर चलने की क्या माया है,

कि गति और मति एक दूसरे को,

समझ नहीं पाते हैं,

उलझ-उलझ सुलझाते और

सुलझ-सुलझ उलझाते हैं ।

.

एक पल को जब सब कुछ छोड़ दिया,

मन की गति को अंदर की ओर मोड़ लिया,

तो स्पष्ट हुआ,

कि बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,

समय ने क्या कहा,

उसने कहा,

अभी कुछ पल सब कुछ ठहरने दे,

मूंद ले नयन और अपने को,

अनंत विस्तार में खो ले,

बहुत चल चुका मतिभ्रम में,

अब थोड़ी देर सो ले,

और फिर वह चला गया ।

संवेदनाएँ और हम

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संवेदनाएँ जब स्थूल होने लगती हैं,

अधिक जगह लेती हैं,

मन थोड़े से ही भर जाता है,

और कोई समझाता है,

चले चलो, ऐसा ही होता आया है,

इससे अधिक किसी ने नहीं पाया है ।

.

संवेदनाएँ जब आकार लेने लगती हैं,

हृदय में समा नहीं पाती हैं,

इसके जो हिस्से बाहर पड़े रहते हैं,

किसी आकलन में हम उन्हें अनावश्यक कहते हैं,

फिर उन्हें काट कर अलग कर देते हैं,

और एक जरूरी काम पूरा हुआ मान लेते हैं ।

.

संवेदनाएँ जब विषम होने लगती है,

जहाँ से भी गुजरती है,

अपने खुरदरेपन से निशान छोड़ती जाती हैं,

और धीरे-धीरे हम उनके सम्पर्क से दूर होने लगते है,

और अपने को समझाने के लिये मन में,

उनकी जगह नये-नये विचार बोने लगते हैं ।

.

संवेदनाएँ जब असहज होने लगती हैं,

रंग बदलती हुए जीती हैं,

और अपने अर्थ खोने लगती है,

फिर तो कई बार,

उन्हें हम खुद नहीं पहचान पाते हैं,

और किसी मोड़ पर अचानक उनसे सामना हो जाये,

तो बड़ी सफाई से नजर चुरा कर आगे निकल जाते हैं ।

.

प्रश्न यह नहीं कि संवेदनाएँ,

स्थूल क्यों हो जाते हैं,

आकार में ढलने की उनमें प्रवृत्ति कहाँ से आती है,

आरम्भ में इतने स्निग्ध होते हैं,

तो इतने विषम और रुक्ष क्यों हो जाते हैं,

और अंतत: कौन भरता इनमें वह असहजता,

जिसके होने का हमें पता भी नहीं चलता ।

.

स्वाभाविक है,

क्यों कि संवेदनाएँ भी उसी परिवेश में पलती हैं,

जो हमारे चारों ओर हैं,

हमारे संग वह भी नये-नये साँचे में ढलती है ।

प्रश्न सनातन यह है कि किस यत्न से हमने इन्हें पाला है,

हमारा बदलना तो तय था,

कितनी शुचिता से हमने संवेदनाओं को सम्हाला है।