एक संवाद

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ढँकते छिपाते मन के छल,

आँकते अपनी इच्छा-शक्ति के बल,

द्वार के पार पगडंडियों पर सम्हल-सम्हल,

जितनी दूर हूँ आ पाया निकल,

खोये अवसरों से भले विकल,

हैं मेरे अर्जन, मेरे प्रयास के फल ।

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बीती हार से दग्ध हृदय,

कुछ भी नहीं निश्चित, मात्र संशय,

स्वयं से छिपाता अज्ञात का भय,

निर्पेक्ष काल नहीं कभी सदय,

विपरीत परिस्थितियों में ले निर्णय,

तेरे संधान को चल पड़े पग मेरे उभय ।

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थका, रुका, टूटा, जुड़ा पर चलता चला,

महा शून्य, महा प्रलय में अपनी ही आशीष पला,

तुझसे ली चिंगारी, फिर अपनी अस्थि जला,

चलता रहा, जब सूर्य विश्राम को ढला,

नमन तुझे कोटि कोटि, पर कैसे कह दूँ भला,

मेरा कुछ नहीं, सब कुछ तेरे कृपा फला ।

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पिता

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जितनी कम जरूरत महसूस होती है तुम्हारी,

मैं तुम्हें उतना ही अपने पास पाता हूँ,

तुम्हारी वर्जना है इसलिये प्रकट नहीं करता,

हर अभाव में खुद को बहलाता हूँ,

तुम ऐसे में मुझे कहीं छू जाते हो,

और मैं अपने को फिर से समर्थ पाता हूँ ।

.

तुम्हीं ने कहा था कभी,

तुम्हीं से सुना था कभी,

अभाव मात्र वह भाव है,

जिसे तुमने जाना नहीं है अब तक,

जिसके लिये तुमने संघर्ष नहीं किया है पर्याप्त,

अपने प्रयास को पूर्णता तक परिमार्जित नहीं किया है,

संक्षेप में जिसे तुमने अर्जित नहीं किया है ।

.

कितना समझा,

कब समझा,

पता नहीं,

पर अनायास ही,

कर्म सूत्र बन यह मेरे मन में बस गया था,

क्योंकि तुमने कहा था ।

.

मैंने देखा हर बार,

तुम्हें जीवन को तन्मयता से सुनते,

फिर तटस्थता से अपनी राह चुनते,

साधन पर विश्वास रखते,

साध्य को अज्ञेय मान भविष्य पर छोड़ देते,

ऐसा नहीं कि इस अनिश्चितता नहीं थे तुम डरते,

फिर भी जो उचित लगता वही थे तुम करते ।

.

सहज ही तुमने दिया एक ज्ञान,

अपने एक कर्ता होने का अभिमान,

चाहे जिन संशयों से हम गुजरते हैं,

हर दुविधा में निर्णय मात्र हम ही करते हैं ।

अच्छा किया कि मुझे बहलाया, पुचकारा नहीं,

सांत्वनाओं से मुझे रण से विमुख नहीं किया,

बस साथ खड़े रहे,

अपनी आशीष मुझ पर जड़े रहे,

बस मेरा संकल्प घटने नहीं दिया,

और यह मुझे यथार्थ के विषम धरातल से हटने नहीं दिया ।

.

तुम्हारा स्नेह कभी मुझे,

सपनों के संसार नहीं ले गया,

नहीं कभी दी मन बहलाने को

उलझती, उलझाती भूलभुलैया,

बस अपनी विदग्धता पर फूंक मारना सिखाया,

जब कोई अवलम्ब नहीं हो सम्भव कहीं,

तो अपने अंतर्मन को धैर्य से निहारना सिखाया,

जब शीत से जमने लगे शोणित,

तो अपनी ही सांसो की गरमी से जी पाना सिखाया,

जब सारे प्रकाश संग छोड़ दें तो,

अपनी ही आंखों की लौ में पथ देख पाना बताया ।

.

तुम्हारे स्नेह ने गूंथा मुझे,

इस काबिल बनाया कि आकार ले सकूँ,

और फिर तपा कर सामर्थ्य दिया,

कि बिना झुके अपना भार ले सकूँ ।

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पिता, आज भी,

सबसे कठिन क्षणों में,

तुम्हारी ही आस गहता हूँ ।

इसी लिये परमेश्वर को परम पिता कहता हूँ ।

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मन और समय

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ताप झेला, शीत झेला,

सृष्टि का हर घर्षण सहा,

मृत्यु के आतंक में भी,

‘मैं त्यागता हूँ’ नहीं कहा,

मानव मन दृढ़ता से चले चला,

समय अपनी गति बीतता रहा ।

.

भले अपने निशान छोड़े,

पर अपने प्रभाव में धर ना सका

साझा अनुभव, स्मृतियाँ थीं,

ना समय रुका ना मन ही थका,

अज्ञेय समय का कुछ ज्ञात नहीं,

पर मन हर पल सीखता रहा ।

मानव मन दृढ़ता से चले चला,

समय अपनी गति बीतता रहा ।

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श्रद्धा से नत समय के सम्मुख,

आदर और विनय से अभिनत,

जिज्ञासा में डूबता तैरता,

कुछ से बचता, कुछ से लड़ता,

हर स्थिति में त्याग कर जड़ता,

भले ही दिखता लहू-लुहान  हुआ,

बहुधा तो मृत-प्राण हुआ,

पर अंतत: मन हर समर जीतता रहा ।

मानव मन दृढ़ता से चले चला,

समय अपनी गति बीतता रहा ।

.

अनुभव करता सूक्ष्मतम कंपन,

झंझा में भी मृदुल स्पंदन,

हाहाकार में भी अश्रुपात की ध्वनि,

हर क्षय में जीवन का दर्शन,

सहज साधे हर विद्रूप, विपर्यय,

कर सारी संभावनाओं का संचय,

विकल प्रत्येक आगंतुक पल को,

हर अज्ञात के ज्ञान को तन्मय,

भरमाती अर्थहीनता को पार्श्व ले,

जीवन रथ आगे खींचता रहा ।

मानव मन दृढ़ता से चले चला,

समय अपनी गति बीतता रहा ।

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दरअसल

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लम्बी हो रही थी परछाई,

वहम हुआ कद के बढ़ने का,

दरअसल शाम हो रही थी,

और सूरज ढल रहा था ।

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शुक्रिया किसका करता,

झुलसाती धूप से राहत का,

सूरज शायद थक चला था,

और मौसम बदल रहा था ।

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तुमने क्या देखी है कहीं,

इतनी खामोश तबाही कभी,

मन के अंदर टूट हलके से,

मेरा रेत का महल रहा था ।

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यादों की तपिश का हिसाब,

सच मेरी समझ से बाहर है,

बाहर से ठिठुरता हुआ भी,

मन था कि अंदर से पिघल रहा था ।

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अपनी मुगालतों की बातें,

क्या सुनाऊँ किसी को अब मैं,

कब गिरा यह याद नहीं,

हर वक्त सम्हल रहा था ।

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सच का सामना इतना भी,

आसान नहीं होता हरदम,

लोग कर रहे थे तारीफ मेरी,

मेरे माथे पर आ बल रहा था ।

.

पहली बार मुझको हुआ,

शक अपने वजूद पर क्योंकि,

मुझसे भी बेहतर कोई,

कर मेरी नकल रहा था ।

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हम अपने अभिभावक

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आज धूप फिर खिली है,

यकीनन बादल हटा है,

कुहासा छँटा है,

पर इस प्रत्यक्ष घटना से आगे,

खोलते सोच के उलझे धागे,

मन के अंदर एक नयी अनुभूति मिली हैं ।

आज धूप फिर खिली है ।

.

जब अनचाहे का सामना होता है,

और अंधेरा जरा ज्यादा घना होता है,

प्रबुद्ध से प्रबुद्ध मन भी,

करते स्थिति का सही आकलन भी,

थोड़ी देर को बेचैन हो उठता है,

स्वीकार कर बैठता है,

हताशा की कल्पनाओं को,

असंभव्य संभावनाओं को,

यदि अंतिम यह रात हो तो ?

यदि अब फिर से न कोई प्रभात हो तो ?

यह भी सच है कि थोड़ी देर बाद सो जाता है,

और सपनों के तिलस्म में खो जाता है ।

.

और साथ ही गहनतम अंधकार में,

सारी संभावनाओं को छिन्न-भिन्न करते,

जगत के निष्ठुर व्यापार में,

जब संवेदनाएँ अस्त होती दिखती हैं,

कल की आशाएं ध्वस्त होती दिखती हैं,

एक नन्हा-सा शिशु मन की अंगुली थामे रहता है,

कोई जिद नहीं करता है, कुछ भी नहीं कहता है,

उसकी पकड़ में कोई बल नहीं होता है,

पर छूट जाये, इतना भी दुर्बल नहीं होता है,

पूछने पर दृढ़ता से मुस्कुराता है,

अपना नाम विश्वास बताता है,

अद्भुत होता है इसका साथ,

यह कभी छोड़ नहीं जाता है ।

.

वह अनुभवों से थका हारा मन,

और उस निर्मल शिशु का बचपन,

दोनों संग होते हैं हमारे,

हम चाहें या न चाहें,

विवेक है उन्हीं के सहारे,

उन्हीं से खुशी, उन्हीं से आहें ।

.

अपनी जिंदगी के अभिभावक,

किसकी कितनी सुनते हैं,

किधर कितना झुकते हैं,

और अंत में किसे चुनते हैं,

होता है निर्धारक ।

हम अपने अभिभावक ।

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आगे बढ़ते हुए

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आगे बढ़ने से अधिक, आगे दिखने की परवाह हो,

अपनी जीत से अधिक दूसरों की हार की चाह हो,

अपने से अधिक आसान दिखती दूसरों की राह हो,

संवेदनाओं का सतत अपनी ही ओर प्रवाह हो,

यदि विवेक समेट अपने अंदर झाँक पायेगा,

तो अपना प्रतिबिंब तुझे टेढ़ा नजर आयेगा ।

क्षीण होता जा रहा हो सब के कल्याण में विश्वास,

हर हाल में सही लगे अपने मन में जगती प्यास,

अपने से छोटा लगने लगे औरों के ऊपर के आकाश,

न्याय से अधिक सुंदर लगें तिरछे तर्कों के विन्यास,

जरा ठहर, क्या तुझसे पीछे मुड़ देखना हो पायेगा,

तुम्हारा चेहरा कई सारे सवाल लिये नजर आयेगा ।

कौतूहल और जिज्ञासा लगें वृथा के भाव,

यात्रा से अधिक रुचिकर लगने लगे पड़ाव,

उन्मुक्ति भयभीत करे, हो बंधन से जुड़ाव,

स्थिरता आकर्षित करे, व्यर्थ लगे बहाव,

इन संकेतों के अर्थ यदि समझ पाओ,

अब भी सम्भव है कि फिर से तुम बदल जाओ ।

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कभी नहीं झुठलाओगे

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सपना था या सम्मोहन,

निर्बाध गति या जड़ता का बंधन,

मन उस क्षण को जान न पाया,

थोड़ा झिझका और फिर पूछ लिया,

क्या हो तुम बतलाओगे,

छू लूँ यदि  तुमको,

तो तुम बदल तो न जाओगे?

.

सुरभित नीरवता चारों ओर,

हर दृष्टि अचंभित, भाव विभोर,

पग तल धरती, पर भार नहीं,

साक्षात सुंदरता, पर कोई आकार नहीं,

यह क्या है,

अस्तित्व का कौन-सा आयाम,

विकल कि यह क्षण-भंगुर ही होगा,

जिज्ञासा वश पूछ ही डाला,

तुम्हें अपना कह बाँहों में भर लूँ,

क्या इतने निकट कभी आ पाओगे,

मेरे पास आते ही सिमट तो न जाओगे?

.

प्रज्वलित दिगंत, दृग से उठते अंगार,

स्तब्ध प्रकृति, गूँजती प्रत्यंचा की टंकार,

शौर्य धधकता दावानल-सा,

नये सृजन का ज्वर सर चढ़ता,

कोई बार-बार अंतर्मन में कहता,

यही तो तुमने चाहा था,

अब क्या दुविधा, अब क्या बाधा,

पर मन कहता तनिक ठहर,

मैं अपनी साँसें समेट लूँ,

कृतज्ञता का ज्ञापन कर लूँ,

और फिर तेरे संग चलूँ,

क्या इतनी प्रतीक्षा मेरी कर पाओगे,

मुझे छोड़ तिरोहित तो न हो जाओगे?

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जीवन से परिचय सम्पूर्ण नहीं,

यदि उन प्रदेश से सम्पर्क नहीं,

जहाँ नीरवता हो गुंजायमान,

आभिजात्य समक्ष हो मूर्तिमान,

शौर्य सहचर नवनिर्माण का,

संशय बल दे समाधान का ।

.

स्पर्श, आलिंगन या सम्मोहन,

जिज्ञासा, स्नेह या सहज आकर्षण,

प्रेरित करते जुड़ने को सृष्टि के महा प्रवाह से,

एक होने को अनंत और अथाह से,

हर विस्मय और हर कौतुक,

जीवन के उतने ही शाश्वत रंग हैं,

जितने शौर्य और संवेदना इसके अंग हैं,

ऐसा मान कर चलूँ तो साथ तुम आओगे,

जानता हूँ कि तुम मेरे विश्वास को कभी नहीं झुठलाओगे

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विकल्प

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बँधी लीक से पहला विचलन,

था मेरा निर्णय या भव की माया,

क्यों उलझूँ इस विश्लेषण में,

प्रत्यक्ष हूँ प्रस्तुत, जो हो पाया,

चाहे जिस भी राह चला मैं,

संताप नहीं क्या खो आया,

संतोष यही कि हर बाधा से,

कुंठा मुक्त हो लड़ पाया ।

.

यह स्थल और यह पल मेरा,

अपनी हर गति का निर्माता मैं,

आराध्य कृतज्ञ तेरी करुणा का,

नहीं उसके बिना कुछ कर पाता मैं,

पर सारा जीवन कर्म बस मेरा,

यह कहते नहीं अघाता मैं,

और अंश हूँ तेरा स्वयं को मानता,

और इससे भी नहीं लजाता मैं ।

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विकल्प है सम्मुख हर पल, हर क्षण,

मतिभ्रम में कहते हम विचलन,

जीवन जब भी प्रस्तुत करता,

कोई आड़ोलन या स्पंदन,

वस्तुत: अवसर दे करता प्रेरित,

करने जीवन का अभिनंदन,

निर्माण करें हम अपने जग का,

निज हाथों से गढ़ लें जीवन ।

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मैं ने तुमको फिर देखा

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मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे,

मैं भ्रमित हुआ कहीं देख रहा था,

मुझे पास खड़े तुम निहार रहे थे ।

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मैं कल की चिंता में खोया,

तुम आज के कौतुक दिखा रहे थे,

भव के भय से पग थे दुर्बल,

तुम ज्ञान धैर्य के सिखा रहे थे ।

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किसी मार्ग पर भटक रहा मैं,

खोज रहा था कोई परिचित छाया,

विपरीत मेरी व्याकुलता के तुम,

बता रहे थे यथार्थ की माया ।

.

मैं संधि और विग्रह में उलझा था,

सूक्ष्म विवेचन की थी आशा,

तुम अपने ही मन की करते,

लिख दी अनिश्चितता की परिभाषा ।

.

अज्ञेय, तुझे आराध्य मान कर,

मान चला था पक्षधर निज का,

पर पक्ष यदि मेरा धरते तो, कौन

निर्पेक्ष विमर्शक होता मेरा ?

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हित अनहित की कथा कहूँ क्या,

तुम कर मेरा संचार रहे थे,

मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे ।

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अंश परम के

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क्यों भ्रमित मैं ऐसे हो रहा हूँ,

दिशा ज्ञान क्यों खो रहा हूँ,

किन वस्तुओं को दूर कर रहा,

और किन को संजो रहा हूँ ?

.

जीवन निर्धारण नीति कर रही,

न्याय लुप्त विश्लेषण में,                

घट ज्ञान का भरते-भरते,

विवेक भ्रमित अन्वीक्षण में ?

.

सृजन के संवेग को सम्हालता,

क्यों कर्म सदा विचलित होता,

हित और अपहित की व्याख्या में,

क्यों बल-कौशल बाधित होता ?

.

क्यों जीवन की रण भूमि में,

स्याह रंग अधिक दिखते हैं,

स्वेद और शोणित घुल मिल कर,

पीड़ा की गाथा क्यों लिखते हैं ?

.

क्यों कल्याण शोध में चलते पग,

हो वशीभूत किसी सम्मोहन से,

होते मात्र क्षण भर को विचलित,

और हम दूर लक्ष्य आरोहन से ।

.

मन की विधियाँ हैं दुरूह,

पर मन की क्रिया असंभव-सी,

रचना सब कुछ सुंदर है लक्ष्य, पर

चाहे कीर्ति, मान और वैभव भी ।

.

शोध सृष्टि की और अमरता,

और छूना हम चाहें आकाश,

परंतु पल-पल कसें कसौटी,

अपनी ही आस्था और विश्वास ।

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उन्मुक्तता वह मूल बिंदु है,

चेतना जहाँ से पाता विस्तार,

पर उद्देश्य यदि नहीं व्यापक तो,

करते मलिन इनको विकार ।

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भुज की शक्ति या विचार की,

हैं मात्र ऊर्जा और उपादान,

नियंत्रक सब के तुम ही चेतन,

अंश परम के, विधाता के वरदान ।  

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