
मात्र अनुभूति का विषय नहीं,
इसकी व्यापक माया होती है,
खुशी का एक प्रकाश होता है,
और खुशी की एक छाया होती है।
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इसका प्रकाश वरद हस्त होता है,
दृष्टि देता है, सचेत करता है,
बाधा हों या अवसर, उन्हें निस्पृह हो,
एक समान, सम्मुख धरता है,
भविष्य का आमंत्रण लिये,
आगे बढ़ने को उत्सुक करता है।
कोई वचन नहीं, आश्वासन नहीं,
मात्र प्रेरणा का भाव लिये विचरता है।
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इसकी छाया में विश्वास होता है,
एक वात्सल्य होता है,
जो अब तक की हमारी यात्रा को,
भविष्य को गढ़ने का आधार मानता है,
शक्ति संचय के लिये,
विश्राम को हमारा अधिकार मानता है।
श्रम-स्वेद से संकोच नहीं,
परंतु उल्लास को सर्वथा स्वीकार मानता है।
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खुशी में सखा भाव भी होता है,
और सन्हित निषेध का स्वभाव भी होता है।
इसका सखा भाव भय विहीन करता है,
लय भरता, क्लांति को विलीन करता है,
अरुचि के संत्रास को हर,
सुरक्षा कवच के अधीन करता है,
सदा अग्रसोची बनाता,
हर पल की ऊर्जा को नवीन करता है।
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इसके निषेध का भाव अद्भुत,
अभिभावक और शिक्षक जैसे एक संग,
रोकता हर अतिरेक से,
तंद्रा, निद्रा या हो आत्म श्लाघा की तरंग,
अधीन रखता मौलिक निष्ठा के,
हर उद्यम और हर प्रसंग।
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इसी भाँति हर भावना में एक तरंग,
संग ही उसकी एक काया भी होती है
दीप्तमान करता प्रकाश भी होता है,
और शीतल करती छाया भी होती है।
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