समाधान

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मेरे ही मन में,

मुझसे छुप कर रहने वाले,

तुम कौन हो?

पदचाप तुम्हारी कानों में है,

आभास तुम्हारे स्पर्श का पूरी काया में,

पर सामने कभी खुल कर आते नहीं।

क्या रूठे हो?

क्यों मौन हो?

तुम कौन हो?

.

स्मरण नहीं कभी बुलाया तुझे,

ऐसा भी नहीं कि,

तू कभी बता कर आया, मुझे,

यह भी नहीं ज्ञात कि सबसे पहले,

कब हुई थी तेरी प्रतीति,

और कब तुम हो गये,

मेरी सबसे अधिक परिचित अनुभूति,

अब कुछ ऐसा सहज लगने लगा है तेरा होना,

कि यह प्रश्न ही,

अव्यवस्थित कर जाता है मुझको,

’कल यदि तुम नहीं हुए तो?’

यह अनुराग मुझे आक्रांत करता है,

पहले झकझोरता है,

फिर सहला कर शांत करता है।

.

कैसे तुम एक साथ,

मरुस्थल और हरीतिमा सुरम्य बन गये हो?

मेरी सारी दुविधा को पार कर,

मेरे एकमात्र अवलम्ब बन गये हो?

कहो तो क्या यह अनुचित आसक्ति है?

स्वयम को नकारने की,

अंत:स्थल में छुपी कोई प्रवृत्ति है,

अथवा अपने इतर,

किसी निर्पेक्ष सत्ता के होने की स्वीकृति है?

जो बिना अवरोध डाले जीवन में उपस्थित है,

जो नियंत्रित नहीं करता,

पर उससे जीवन व्यवस्थित है।

.

प्रश्न यह भी कि क्यों,

‘कौन हो’ बतलाते नहीं?

सदैव रहते अवगुंठन में,

अपना रूप दिखलाते नहीं,

मन में बसे रहते हो,

प्रत्यक्ष सम्पर्क में आते नहीं?

क्या यही तुम्हारा दिया,

सबसे बड़ा वरदान है?

क्या यही सर्वथा दु:साध्य जीवन का,

समुचित समाधान है?

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