
जीवन की मरीचिका में,
अंतिम शून्यता को स्वीकार कर,
किसी अज्ञात नव्यता के अन्वेषण में,
समय के निष्ठुर तरंगों पर बहते-बहते,
दबी, छुपी हुई, विस्मृत भावनाएँ हृदय की,
जब अनायास ही करवट बदलती हैं,
स्वभावत:, स्वयम तो सो जाती हैं,
थोड़ी ही देर बाद,
पर छोड़ जाती हैं,
लम्बे समय के लिये एक आड़ोलन,
जो बार-बार सिहराती है,
मन को अकारण ही,
व्याकुलता के भँवरों में ले जाती है,
कभी-कभी आँखों में धुंधलका बन उतर आती है,
और बहुत लम्बे समय के लिये,
कई प्रश्न छोड़ जाती हैं।
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फिर व्याकुलता की लहरें उठती हैं,
जिनके उद्गम का पता नहीं चलता,
और छोड़ हमें आश्चर्य में, कि हुआ क्या,
धीरे-धीरे शांत हो जाती है।
फिर एक नये सूनेपन का आच्छादन,
फिर शून्यता की सम्मोहन से भरा आलिंगन।
थोड़े अंतराल के पश्चात मन अर्धचेतना में,
बिना किसी अपेक्षा के,
पुन: करने लगती है प्रतीक्षा,
भावनाओं के दूसरे करवट की।
कुछ नहीं गलत, कुछ नहीं सही,
जीवन का एक रंग यह भी।
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