जीवन का एक रंग यह भी

Photo by Syed Qaarif Andrabi on Pexels.com

जीवन की मरीचिका में,

अंतिम शून्यता को स्वीकार कर,

किसी  अज्ञात नव्यता के अन्वेषण में,

समय के निष्ठुर तरंगों पर बहते-बहते,

दबी, छुपी हुई, विस्मृत भावनाएँ हृदय की,

जब अनायास ही करवट बदलती हैं,

स्वभावत:, स्वयम तो सो जाती हैं,

थोड़ी ही देर बाद,

पर छोड़ जाती हैं,

लम्बे समय के लिये एक आड़ोलन,

जो बार-बार सिहराती है,

मन को अकारण ही,

व्याकुलता के भँवरों में ले जाती है,

कभी-कभी आँखों में धुंधलका बन उतर आती है,

और बहुत लम्बे समय के लिये,

कई प्रश्न छोड़ जाती हैं।

.

फिर व्याकुलता की लहरें उठती हैं,

जिनके उद्गम का पता नहीं चलता,

और छोड़ हमें आश्चर्य में, कि हुआ क्या,

धीरे-धीरे शांत हो जाती है।

फिर एक नये सूनेपन का आच्छादन,

फिर शून्यता की सम्मोहन से भरा आलिंगन।

थोड़े अंतराल के पश्चात मन अर्धचेतना में,

बिना किसी अपेक्षा के,

पुन: करने लगती है प्रतीक्षा,

भावनाओं के दूसरे करवट की।

कुछ नहीं गलत, कुछ नहीं सही,

जीवन का एक रंग यह भी।

poems.bkd@gmail.com

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment