
चलते-चलते सुध आयी जब,
जग से पूछा अपना मतलब,
गगन हँसा, धरती मुस्कायी,
‘थोड़ी देर चल तो ले भाई।‘
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खुली आँख, पहला अवलोकन,
कुछ पद चिन्ह, कुछ राह पुरातन,
अनंत विविधता लिये था सम्मुख,
अनछुए दिशाओं का आमंत्रण।
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अपनी-अपनी दिशा चुनी एक,
और चल पड़े आगे की ओर,
लीक और पद चिन्ह छोड़ कर,
उत्सुक, अज्ञात सम्मोहन विभोर।
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एक में शीतल छाँव थी पहले,
फिर प्रचंड था ताप प्रबल,
दूसरे में शूल पग तल पहले,
और बाद में तृण दल शीतल।
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वैराग्य एक में पहला स्वर था,
सुर, श्रृंगार बाद में मुखर हुए,
ललित विधा थे अपर में आदि ही,
अंत में तप, संयम प्रकट हुए।
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तप, बल, श्रद्धा, करुणा, उल्लास,
छल, ईर्ष्या, द्वेष, प्रमाद, उपहास,
निश्चय ही आते हर पथ पर,
क्रम हो चयनित या अनायास।
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मिले पथिक दो किसी ठौर जब,
कुशल क्षेम भी पूछ लिया,
कौतूहल फिर रुक नहीं पाया,
क्या समान था, क्या था नया?
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जितना कुछ एक जैसा ही था,
उतना ही अलग होता प्रतीत,
जैसे कि हर जीव एक-सा,
परंतु नहीं सकल सम या विपरीत।
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जीवन को परिभाषित मत कर,
चुना मार्ग तेरा अभियान,
किस भाँति तय की यात्रा वही,
तेरी निधि और तेरा सम्मान।
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