कुछ तारे

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कुछ तारे ऐसे भी होते हैं,

व्याप्त चतुर्दिक गहन तम मे भी,

कभी अपनी आभा नहीं खोते हैं।

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यायावर को दिशा ज्ञान,

प्रबुद्ध को चिंतन का अभिमान,

शैशव की कल्पना को उड़ान,

कवियों को प्रेरणा और वरदान,

देते रहते अनवरत,

ना थकते, ना सोते हैं।

कुछ तारे ऐसे भी होते हैं।

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ऊर्जा अपने अंत:स्थल धर,

अपने प्रकाश के जनक प्रखर,

जीवन उनका एक संवाद मुखर,

‘जलता मैं तुझ-सा ही नश्वर,’

निज प्राण से कलुष हर धोते हैं।

कुछ तारे ऐसे भी होते हैं।

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सम्यक चित्त, स्मित हास मंद,

झिलमिल, उनका उल्लास छंद,

आदि रहस्य, अज्ञेय अंत,

ग्रीष्म, शिशिर, आषाढ़, बसंत,

हर ऋतु निष्ठा ही बोते हैं।

कुछ तारे ऐसे भी होते हैं।

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नियम गढ़ें और विज्ञान गढ़ें,

नियोजन कर अभियान करें,

आहूत काया और प्राण करें

दुर्भेद्य लक्ष्य संधान करें।

नहीं पूजित, बस प्यारे होते हैं।

कुछ तारे ऐसे भी होते हैं।

poems.bkd@gmail.com

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