
कदम जो कभी-कभी रुक जाते हैं,
कंधे बिना बोझ के ही झुके नजर आते हैं,
जरूरी नहीं कि थक गया होऊँ,
या शक हो कि मंजिल सही चुनी या नहीं,
या हो चुने हुए रास्ते से कोई शिकायत,
और ऐसा भी नहीं कि सफर ने अपना रोमांच कहीं खो दिया हो,
दरअसल कभी-कभी यूँ ही ठहरने जाने को जी चाहता है,
एक पूरी तरह से बेफिक्र जिंदगी,
जिसमें हो न कुछ गलत न सही, चाहता है।
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चाहता है कि रुक पाऊँ जब भी चाहूँ,
बस देखने के लिये,
कि अब भी रुकना मेरे वश में है या नहीं?
कि ऐसा करने की चाहत बची तो है सही?
कि ऐसा करने में जलने वाला ईंधन,
अभी भी मेरे अंदर बचा है या नहीं?
कि अपने हाथों से,
उस ईंधन को सुलगाने वाली चिंगारी,
पैदा कर सकता हूँ या नहीं?
पर सबसे ऊपर,
कि खालिश जिंदगी के हाशिये पर पड़ी,
कब से अनचाही और बहुत दूर खड़ी,
जिंदगी के उन पहलुओं को,
वही प्यार दे सकता हूँ या नहीं?
जो उन दिनों देता था,
जब जीना बस एक आदत थी,
जिंदगी से कुछ अपने लिये नहीं लेता था।
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उस दौर में,
जब हमें यकीन था कि जिंदगी को,
गति और दिशा हम देते हैं,
और आज के वक्त, जब मान चुके हैं कि,
जिंदगी हमारी गति और दिशा को चुनती है,
फर्क बस इतना है,
कि देखने के तरीके अलग हैं,
और समझने का ढंग भी थोड़ा बदल गया है।
पहले जिन्दगी को उसकी सतह के ऊपर से देखते थे,
और मानते थे,
कि चाहूँ तो सब कुछ बदल सकता है,
अब उसे उसी में डूब कर देखते हैं,
और पाते हैं कि
यह जितना भी बदला उतना ही पहले जैसा है,
अनंत, असाध्य, अनियंत्रित और उक्षृंखल।
जो बदला है वह हम हैं,
और इस महासागर में होता बदलाव बहुत कम है।
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