
क्षितिज के अंतिम छोड़ पर,
थमक गये मेरे पाँव,
न जाने उस पार होंगे,
कैसे-कैसे गाँव?
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जड़ता छायी, ठहर गया,
अच्छा ही लगा विश्राम,
पर चिंता, इस सुख के बदले,
क्या छूट गया कोई धाम?
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लेखा-जोखा हानि-लाभ का,
कभी भी अंतिम होता क्या?
प्रश्न करे, सोने ना दे,
पार्श्व खड़ी मेरी जिज्ञासा।
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बुद्धि, विवेक से भी पहले,
हुआ था कौतूहलता का भान,
गूँथ इसको तर्क, ज्ञान से,
जिज्ञासा दिया नाम।
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प्राणवान की प्रथम प्रवृत्ति,
जीवन रक्षा, संतति निर्माण,
निज प्रजाति की निरंतरता,
अस्तित्व के संकट का समाधान।
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परंतु चेतना के प्रकाश में,
उगती नयी-नयी इच्छाएँ,
जानने को रहस्य सृष्टि के,
रचने की नयी सीमाएँ।
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कहीं तो हो उद्घोष नवल का,
हृदय की ऐसी अभिलाषा,
रचना को आतुर चित्त बुनता,
नयी-नयी नित परिभाषा।
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उड़ने दे जब तक उड़े,
हो कर के मन निर्विकार,
पर जिज्ञासा तब तक भली,
जब तक शुचिता हो आधार।
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अपनी सीमा आप चुनें,
इसका हो सबको अधिकार,
संयम परंतु कि बाधित ना हो,
सृष्टि के मौलिक व्यापार।
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नहीं याचना से प्रात सामर्थ्य,
स्वयम कर सकें इसका निर्माण,
मन कृतज्ञ हो, पर जीवन रण में,
प्रवेश दृढ़ता से करे यह प्राण।
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बल दे, वर दे, दे कर्मठता,
और दे संकेत उन्नयन के,
तुझ से प्राप्त देवत्व अंश का,
निर्वाह कर सकूँ समर्पण से।
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