
तुम रोये नहीं होगे यह कैसे स्वीकार करूँ?
हमें बना कर जब उच्छवास ले,
एक पग पीछे को धर,
निहारा होगा अपनी रचना को,
आँखें तो नम हुई होंगी,
अपने कौशल की परिपूर्णता पर,
अपने हृदय में छुपे भावों को,
उसके स्पंदन में तरंगित होता देख कर,
और फिर कुछ बूंदें छलक आयी होंगी,
सहज वात्सल्य से उमड़-घुमड़।
तुम्हारी करुणा का प्रस्फुटन साकार हूँ।
तुम रोये नहीं होगे यह कैसे स्वीकार करूँ?
.
सृजन के आनंद के अतिरेक के समाप्त होने पर,
इसके प्रयोजन की सार्थकता के प्रश्न के व्याप्त होने पर,
तुम्हारे पुनरवलोकन ने,
अंतर्निहित जटिलता के निष्पक्ष आकलन ने,
जो तथ्य किये होंगे उजागर,
प्रयोजन, उपयोगिता, सामर्थ्य और संभावनाओं की समीक्षा से
जो सन्निहित विकलता हुई होंगी परिलक्षित,
प्रवेश कर गयी होंगी शूल की भाँति,
तुम्हारे हृदय में,
और क्षीण हो गयी होगी क्षण भर को,
तुम्हारे आनन की दिव्य कांति,
फिर जो विषाद के आप्लावन को,
नयन में ही रोक लिया होगा,
मन में उठते अवसाद को,
निर्पेक्षता के अग्निकुण्ड में झोंक दिया होगा,
मैं अनभिज्ञ नहीं, तुम्हारी इस व्यथा से,
मैं भी तो हर क्षण चेतना में, अवचेतन में,
इसका प्रत्यक्ष अनुभव बरम्बार करूँ।
तुम रोये नहीं होगे यह कैसे स्वीकार करूँ?
.
एक वत्सल जनक-सा,
परम पिता,
किस भाँति तुम्हारी करुणा ने,
समस्त त्रुटियों को अंगीकार किया,
करूणा के सहज प्रवाह में,
अपूर्ण इस रचना को प्राण दिये,
जीवन का अधिकार दिया,
इसके बल, कौशल को,
इसके स्वार्थ और छल को,
इसके समर्पण और निश्चल विश्वास को,
आकांक्षा के द्वन्द्व, आनंद और संत्रास को,
सहज एक नवीन विधा में गढ़ लिया,
और स्मित हास ले इसे मानव जीवन कह दिया।
धन्य यदि फिर से इस अनुकम्पा का,
आभार प्रकट एक बार करूँ?
तुम रोये नहीं होगे यह कैसे स्वीकार करूँ?
.
ऋण-सा प्राप्त इस जीवन में,
व्यवहारिकता के निर्वहन में,
हर प्रतिरोध में प्राप्त तुम्हारा स्नेह,
हर प्रलोभन में हो पाऊँ तुझ-सा विदेह,
त्रुटियों में हो सहिष्णु सर्वथा,
रचना में जगत हित भाव सर्वदा,
जिज्ञासा में सदा अपरिमित,
आकांक्षा कल्याण को समर्पित,
उत्थान मात्र सामर्थ्य का प्रयोजन,
गढ़ता अपने नैतिक अनुशासन,
भाव कृतज्ञता का हो अविचल,
विश्वास कभी भी हो नहीं दुर्बल,
नहीं पात्रता फिर भी,
इस वर का तुझसे बिनती और एक बार करूँ।
तुम रोये नहीं होगे यह कैसे स्वीकार करूँ?
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