
अभिशाप है या आशीर्वाद?
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सम्पूर्णता से सदा वंचित हो रहना,
इस नित्य को स्वीकारना, सहना,
इस सीमित परिधि को जीवन कहना,
अस्तित्व का उद्देश्य या होने का अवसाद?
अभिशाप है या आशीर्वाद?
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महत्तम क्या, यह ज्ञान नहीं,
और अन्वेषण का अभिमान नहीं,
जो ज्ञात, शोघ उसी का कर,
जो क्षतिज मिला उसे मान सही,
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जीवन का हर व्यापार किया,
एक संरचना को आधार दिया,
क्या इसके पार नहीं ज्ञात अभी,
जो मिला श्रेष्ठ स्वीकार किया।
असहज मन का यह स्वयम् से संवाद।
अभिशाप है या आशीर्वाद?
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गहन तर्क, शोध, अन्वेषण में,
विकल्पों के सूक्ष्म विश्लेषण में,
एक तथ्य स्पष्ट परिलक्षित है,
कुछ भी व्यर्थ नहीं इस जीवन में,
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सीमित सही, परंतु संकीर्ण नहीं,
सम्भावनाएँ यहाँ हैं सदा अपरिमित,
सामर्थ्य को अपने चरम बिंदु तक,
ले जायें यदि इच्छा शक्ति हो विकसित,
जीवन में अवसर असंख्य हैं, निर्विवाद।
अभिशाप है या आशीर्वाद?
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सम्पूर्णता से यदि आरम्भ ही,
तो गति, प्रगति, सामर्थ्य है अर्थहीन,
उद्देश्य और आकांक्षा खोकर,
चेतना हो जीजिविषा से विहीन,
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वरदान कि अंतिम लक्ष्य है दुसाध्य,
वरदान सम्पूर्णता का होना अप्रमेय,
हैं सार्थक चिंतन, बल और कौशल इससे,
और पाता जीवन रचना का ध्येय,
जीवन प्रमाद नहीं, चिर संघर्ष का आह्लाद।
सतत कर्म का आशीर्वाद?
सृजन धर्म का आशीर्वाद?
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