शायद खुशी यही है

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कभी यादों में डूब कर जीना,

कभी यादों को भूल कर जीना,

कभी दुनिया भर की फिक्र करना,

कभी सिमट कर अपने भर जीना।

सच में लगता है जीने की आजादी यही है।

शायद खुशी यही है।

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सोचना कि अभी क्या सोच मैं रहा था,

कहाँ हूँ अभी, और अब तक कहाँ था,

कुछ ना करना भी इतना दिलचस्प है अगर,

जो अब तक किया क्या मेरा फैसला था?

गलत नहीं नीयत, तो सब कुछ सही है।

शायद खुशी यही है।

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सांसो को जिया या सांसों में जिया,

कितना समेटा, किस-किस से लिया,

फिर भी बची यह चाहत और कुछ पाने की,

यह जिंदगी का दिया या खुद हमने किया।

पर दिया जो भी हमने, हासिल बस वही है।

शायद खुशी यही है।

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सबसे प्यार पाने के बचपन के सपने,

आगे कभी हम लगे सब को परखने,

मतलब तलाशता, सवालों में उलझा,

खूबसूरत पहेली, जिंदगी की तिलस्में।

चाहा मिल ही जाये तो फिर क्या ये जिंदगी है?

शायद खुशी यही है।

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झिलमिल खुशबू बीते समय की,

उड़ आ मिलती, हँस कर कहती,

सुनो, उलाहना देने नहीं आयी,

खुश हूँ, करते देख तैयारी कल की।

हर पल जो गुजरता कहता जाता यही है।

शायद खुशी यही है।

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