
शाश्वत कल के भाल पर,
थोड़ी-सी जगह निकाल कर,
कुछ रचा अपने हाथों से,
सामर्थ्य भर, सम्हाल कर।
आरम्भ में क्या साथ था,
स्वयं से अधिक, कुछ याद नहीं,
जिज्ञासा उगी, स्वाभिमान जगा,
दृढ़ता भी रही अपवाद नहीं।
संग्रह की लिप्सा थी जगी नहीं,
जिया, हर क्षण का स्पर्श किया,
हर रोमांच, हर संवेदना का,
अंतर में अनुभव सहर्ष किया।
जीने की इस सजग सहजता ने,
कुछ अर्थ दिए, कुछ भाव रचे,
उद्देश्य रहित जीवन न रहा,
जब सामर्थ्य, करुणा के जुड़ाव रचे।
फिर और बहुत ही अपना-सा,
हर संघर्ष और हर उत्सव था,
हर हार मात्र एक अर्धविराम,
हर जीत प्रगति का उद्भव था।
अब जो मुड़ कर देखता हूं,
एक से जय-पराजय दिखते,
कर्ता का स्वाभिमान जागता,
परिणाम नहीं, हम आशय लिखते।
कचोट हैं थोड़े, पर स्नेह बहुत है,
अब तक के बीते काल पर,
अपने नियम, अपना संयम,
हर जीवन छंद के ताल पर ।
शाश्वत कल के भाल पर,
मिले हुए अंतराल भर,
जिया हो उन्मुक्त हृदय,
निर्बाध समर्पण डाल कर।
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