संवेदना के संदर्भ

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संवेदना के संदर्भ जब मुखर हुए,

यथार्थ के स्तम्भ कितने बिखर गये,

एक लांछना, एक भृकुटि, एक संकेत,

नीतियाँ कितनी धूल-धूसरित कर गये ।

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निहित अर्थ तक पहुँचने से पहले कहीं,

संवाद कह जाते निहित अभिप्राय भी,

तप, साधना की भी हैं अपनी सीमाएँ,

अभिमान ने देवों को भी न छोड़ा कभी ।

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जीवन में व्यवहारिकता का स्थान उचित,

सब उचित जिससे प्राण ठहरे प्रज्वलित,

पर जहाँ अस्तित्व अपना अर्थ ढूँढ़ता,

स्थल, संवेदना के तंतुओं में अंतर्निहित ।

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काया, आश्रय, पोषण और निरंतरता,

सब यद्यपि स्थूल संरचना ही है,

पर दिशा देती हर निर्णय, हर रचना को,

संवेदना, भावना और उदित कल्पना ही है।

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उत्सव की समाप्ति पर उच्छवास,

जीत – हार के बाद शून्यता का आभास,

खाली पेट भी स्वाभिमान का उन्माद,

मर कर फिर जी उठने का भीषण विन्यास ।

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हर आयाम जीवन में सम्पूर्ण है जीवन,

जीवन युगलबंदी जीव-मर्म का हर क्षण,

इन दोनों के व्यापक कौतुक-माया में व्याप्त,

बल-कौशल, नीति-न्याय, हास और क्रंदन ।

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